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Blog: Shabd Banjare

Blogger: Krishan Vrihaspati
फारसी भाषा में एक शब्द है सब्ज: या सब्जा, जिसका मतलब है हरा रंग, हरियाली या हरी घास। इसी शब्द से बना है सब्जी। जिसका शब्दकोश में मतलब है- साग-भाजी, हरे पत्ते और तरकारी आदि। सब्ज यानी हरे रंग से संबंधित होने की वजह से सब्जी का मूल अर्थ हरे पत्तों या हरी सब्जी से ही था, मगर वर्... Read more
clicks 137 View   Vote 0 Like   5:52pm 13 Feb 2015 #
Blogger: Krishan Vrihaspati
तंदूर का इतिहास करीब चार हज़ार साल से ज्यादा पुराना है। दुनिया के पहले तंदूर के सबूत हड़प्पा-मुअन-जो-दड़ो की खुदाई में मिले थे। तंदूर मूलत: हिब्रू भाषा का शब्द है, इसे अरबी में तनूर या तन्नूर कहते हैं जो $फारसी भाषा में जाकर यह तंदूर हो गया। तनूर का मूल सेमिटिक धातु के न्... Read more
clicks 129 View   Vote 0 Like   5:47pm 13 Feb 2015 #
Blogger: Krishan Vrihaspati
लगभग सारे मांसाहारी पदार्थों के नाम या तो अंग्रेजी में हैं या फिर अरबी, फारसी और तुर्की भाषा में हैं। हालांकि उत्तर भारतीयों ने उन्हें अपने ढ़ंग से मुर्गा-शुर्गा, कुक्क्ड़-सुक्क्ड़, बोटी-सोटी या लाल मांस कह कर कुछ देशी टच दिया है। आश्चर्य होता है कि हिन्दी वाले यहां कै... Read more
clicks 118 View   Vote 0 Like   4:20pm 3 Feb 2015 #
Blogger: Krishan Vrihaspati
फारसी भाषा में एक शब्द है नहार जिसका अर्थ है दिन या दिवस। इसे ध्यान में रखते हुए दिन के पहले खाने को नहारी कहते हैं, जो आजकल बिगड़कर निहारी हो गया है। पुराने जमाने में जिस शोरबेदार गोश्त को खमीरी या रात की बची हुई रोटी के साथ खाया जाता था उसे नहारी कहते थे। यही वजह है कि आज... Read more
clicks 165 View   Vote 0 Like   4:07pm 3 Feb 2015 #
Blogger: Krishan Vrihaspati
मूलत: गालियां दो तरह की होती हैं। आम बोल-चाल की भाषा में पहली श्लील और दूसरी अश्लील। पहली गालियां रिश्तों पर केंद्रित न होकर गुणों पर ज्यादा केंद्रित होती हैं जैसे किसी को कम-अक्ल बताने के लिए गधा या उल्लू कहा जाता है या किसी को तुच्छ या अति चापलूस बताने के लिए कुत्ता कह... Read more
clicks 118 View   Vote 0 Like   5:21pm 5 Jan 2015 #
Blogger: Krishan Vrihaspati
आम धारणा है कि भाषा को अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे लोगों ने बिगाड़ा है। सच्चाई इसके बिलकुल उल्ट है, भाषा की जो जड़ें तथा-कथित पढ़े-लिखे वर्ग ने खोदी हैं वैसी अनपढ़ तो कर ही नहीं सकता। हालांकि लेखकों, कवियों और शायरों से शुद्ध भाषा की उम्मीद नहीं रखी जाती उनके यहां तो नए विचार औ... Read more
clicks 133 View   Vote 0 Like   4:52pm 4 Jan 2015 #
Blogger: Krishan Vrihaspati
गालियों  का प्रचलन समाज में कब से प्रारम्भ हुआ और सबसे पहले किसने किसको गाली दी थी तथा सुनने वाले पर उसकी प्रतिक्रिया किस रूप में प्रकट हुई थी- यह शोध के लिए एक मजेदार विषय हो सकता है। मान्यता है कि गालियों का प्रादुर्भाव भाषा के विकास के साथ-साथ ही हुआ होगा। तीक्ष्ण, अ... Read more
clicks 132 View   Vote 0 Like   4:32pm 4 Jan 2015 #
Blogger: Krishan Vrihaspati
हम अकसर चंचल और शोख बच्चों को बदमाश कह देते हैं। बहुत सारे कारणों से बच्चे बदमाश नहीं हो सकते। बदमाश फारसी का शब्द है जो दो शब्दों से मिलकर बना है बद और मआश या माश। बद का अर्थ है खराब या बुरा। यह शब्द बहुत से शब्दों के पहले लगता है जैसे जिसकी नीयत खराब हो उसे बदनीयत, जिसका ... Read more
clicks 143 View   Vote 0 Like   1:48pm 15 Jun 2014 #
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राजस्थान में अभिवादन के लिए बहुत ही प्रचलित वाक्य है- खम्मा घणी। इसके जवाब में सामने वाला भी घणी घणी खम्मा कह देता है। इसकी देखा-देखी आजकल टीवी सीरिअल और फिल्मों में अभिवादन के लिए घणी खम्मा का प्रयोग किया जाता है जिसका जवाब सलामुन आलैकुम की तर्ज पर वालेकुम अस्सलाम या... Read more
clicks 215 View   Vote 0 Like   5:26pm 14 Jun 2014 #
Blogger: Krishan Vrihaspati
भाषा के मामले में दुनिया का हर आदमी जुगाड़ी है। वह शब्दों का जुगाड़ मुख-सुख के लिए ढूंढ ही लेता है। जैसे बहुत से पंजाबी अदरक को अदकर कहते हैं, कीचड़ को चिक्कड़ और चाकू को काचू बोलते हैं। इसी तरह उत्तरप्रदेश के बहुत लोग लखनऊ को नखलऊ कहते सुने जा सकते हैं। जब बात जुगाड़ की ... Read more
clicks 191 View   Vote 0 Like   9:10am 13 Jun 2014 #
Blogger: Krishan Vrihaspati
कुछ समय पहले चर्चा हुई थी वहशी दरिंदे और हैवान की। जब बात जानवरों की हो तो क्यों न जंगलराज की बात भी करली जाए। आम मान्यता के अनुसार जहां कानून-कायदे नाम की कोई चीज न हो उसे जंगलराज कहते हैं और सभ्य समाज में जो हरकतें स्वीकार नहीं हैं, उन्हें पाश्विकता कहते हैं। अब इससे बड... Read more
clicks 168 View   Vote 0 Like   12:39pm 5 Apr 2014 #
Blogger: Krishan Vrihaspati
एक जमाने पहले जो भाषा लुगदी जासूसी उपन्यासों की हुआ करती थी, वह आजकल हमारे अख़बारों और टीवी चैनल्ज की है। आज भाषा हमारे लिए महज सम्प्रेषण का माध्यम भर है, शब्दों का सही अर्थ जानने का तरीका नहीं। इसलिए हम जाने-अनजाने शब्दों का गलत-सही प्रयोग करते रहते हैं। दिल्ली और मुंबई... Read more
clicks 180 View   Vote 0 Like   2:17pm 4 Apr 2014 #
Blogger: Krishan Vrihaspati
मैं यह लेख किसी भाषा विज्ञानी की हैसियत से नहीं लिख रहा हूं, मैं भी भाषा का एक साधारण सा छात्र हूं जो उत्सुकतावश बंजारे शब्दों के साथ भाषा के इस जंगल में आ गया हूं। इस आवारगी में जो कुछ भी मिल रहा है उसे ही साझा करने का प्रयास कर रहा हूं। इस सफर को आरम्भ करने से पहले कुछ छोट... Read more
clicks 181 View   Vote 0 Like   4:57am 4 Apr 2014 #
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