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अनंत जी की कविताएँ

जहां  से यात्रा शुरू होती है वहीँ जा कर समाप्त होती है किन्तु कुछ रास्ते ऐसे होते हैं जिनका कोई जवाब नहीं होता ।ऐसा ही था तुम्हारा रास्ता तुम्हारे साथ का आदमीथक नहीं , रुका नहीं ,सिर्फ चालता रहा 'चरैवेती  चरैवेति'। वाकई झुकना  ही पड़ता है गोकि आदमी झुकना  नही चाहताक...
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  September 6, 2014, 10:25 am
मुझे किसी महाकवि ने नहीं लिखासड़कों के किनारेमटमैले बोर्ड परलाल-लाल अक्षरों मेंबल्कि किसी मामूलीपेंटर कर्मचारी नेमजदूरी के बदले यहाँ वहाँलिख दियाजहाँ-जहाँ पुल कमज़ोर थेजहाँ-जहाँ जिंदगी कीभागती सड़कों परअंधा मोड़ थात्वरित घुमाव थाघनी आबादी को चीर करसनसनाती आगे निकल...
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  July 17, 2014, 2:12 pm
मकान :आदमी के ऊपर छत होनी ही चाहिए वह घरेलू महिला हमेशा मिलने पर कहती है उसका बंगला नया है उसके नौकर उसके लान की सोहबत ठीक करते हैं और वह अपने ड्राइंगरूम को हमेशा सजाती रहती है |मैंने नीले आसमान के नीचे खड़े हो कर अनुभव किया कि छत मेरे सिर से शुरू होगी या मे...
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  July 9, 2014, 9:56 pm
धीरे-धीरे मन भारी हो जाता हैशाम इबारत लिखती है अवसादों की धीरे-धीरे तन भारी हो जाता है |भारी हो जाता है समय भारी और लगते हैं कंधों पर ठहरे जिम्मेदारियों के बोझ लोगों की प्रतिकूल बहुत छोटी-छोटी बातें भी भारी लगाने लगती हैं,समय आदमी को घर में बंद कर बाहर से ताला लगा देता है |...
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  April 13, 2014, 9:51 am
बूढ़े दिमाग सेमैदान के हिस्से में एक छोटी जगह चुनते हैं और अपनी बेतुकी धुन में ऐसे बैठे रहते हैं गोया हरकतें उनकी दुश्मन हों |बूढ़ा सिर्फ जरुरी हरकत करता है मैं चीख कर बताता हूँ और बूढ़े का व्याकरण बदल जाता है |...
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  April 12, 2014, 9:40 pm
उसकी मशीनकैची और उसके पास है फीता,वह पैर चलाता है सधे हुए,और डोर लगाने के लिए बड़ी सधी उगलियों का प्रयोग करता है,कपड़े की नाप लेते हुए दर्जी बड़े ध्यान से देखता है,वह आदमी को  उसकी कमर, कलाई, उसके कंधे के आधार पर जानता है |दर्जी सिल रहा है कपड़े और कपड़े लहरा रहे हैं आ-जा रहे हैं ...
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  April 12, 2014, 9:31 pm
शहर में कई नाले हैं जहाँ शहर का पानी गन्दगी के साथ निकलता है धोबी, नाऊ, भंगी,कूड़े बीनने वाले लोगों की तरह ये गन्दगी से लड़ते हुए पेशा करते हैं | भले कोई पेशा नहीं करते, पड़े रहते हैं, बहते हैं बहाते हैं |शहर हमारा इन्ही नालों की कृपा से साफ़, सुथरा है नाला नाल, माडर्न साफ़-सु...
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  April 6, 2014, 9:07 pm
हमारे समय मेंक्रांति भी एक फैशन है सत्य, अहिंसा, करुणाऔर दलितोद्धार स्त्रीविमर्श और गाँव के प्रति जिम्मेदारी |हमारे समय में भक्ति भी एक फैशन है सत्संग,ईश्वरऔर सहविचार |प्रेम और मोह सभी फैशन की तरह यहाँ तक कि गांधीवाद यथार्थवाद अंतिम व्यक्ति की चिंता और लाचारी |हमार...
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  March 22, 2014, 1:02 pm
जैसे सब बीतता है वैसे बीत गई एक शब्द उठा रंगीन फ़व्वारो पर रखे बैलून की तरह रात आते-आते मशीन बंद हो गईन रंग है, न फव्वारा न वह बैलून होली मिठाइयाँ और गुजियों के पच गए अवसाद के स्वाद की तरह खत्म हो गई। मिल आए लोग जिनसे मिलना था मिल लिए लोग जो मिलने आए थ...
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  March 19, 2014, 7:37 pm
झुकी हुई औरत गर्दन पर बाल खोलती है दिख गए मर्द को देखती है और अंदर भाग जाती है,औरत जब मर्द देखती है तो अंग छुपाती है मर्द जब औरत को देखता है तो सीना फुलाता है,चिड़िया जब चिड़िया को देखती है चहचहाती है,मैंने पेड़ से पूछा आप क्या करते हैं श्रीमान आदमी को द...
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  March 10, 2014, 10:16 am
ढकेले रहेंगे हम विपत्तियों को जैसे कूड़े को अपने द्वार से बाहर कर कही दूर कर आते हैं झाड़ू से हम पर फिर वे आ जाते हैं जैसे वैसे आफते आही जाती हैं घर में,  दरवाजे पर दिल में और देह में। आदमी -आदमी के काम आता है इसीलिए कि हर आदमी के घर और बाहर विपत्तियाँ आती ...
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  March 7, 2014, 1:18 pm
बच्चे आते हैं पास और ऐसा कोई प्रश्न करते हैं जो उत्तर के रूप में केवल बच्चे को और अधिक बिम्ब में बदल देते हैं बच्चा प्रश्न करते समय बच्चा नहीं होता पर जब भी आप बच्चे को प्रश्न करते देखते हैं तो वो बच्चा ही रहता है उसके छोटे-छोटे हाथ छोटा सा मुँह और छ...
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  March 7, 2014, 12:45 pm
गैर भरोसे की दुनिया में भी आदमी को भरोसा करना ही पड़ेगा अपने हाथ पर भरोसा कि वह निवाले को मुँह तक ले जायेगा और अपने उत्सर्जन तंत्र का भरोसा कि वह वहिर्गमन करेगा ही अपने सांसों पर भरोसा कि वह चलेंगे और दिल और फेफड़े को मिलता  रहेगा आक्सीजन ,रोटी ,आटे औ...
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  March 7, 2014, 12:35 pm
जीवन की सांध्य वेला में जिंदगी का हिसाब लगाते हुए कुछ याद नहीं आता ऐसा जो दर्ज करने लायक हो,किसी के काम आया कि नहीं आया वे तो वही जानते होंगे पर अपने लिए जुगाड़ने में इज्जत की रोटी पूरी जिंदगी खर्च हो गयी चाहता तो यही था कि सभी को इज्जत की रोटी जिंदगी भर...
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  March 5, 2014, 12:22 pm
कोई नहीं सुनना चाहता सत्य जैसे मौत की खबर सुनकर अपनी मौत के होने के सच को टालते हुए जीवन में शरीक हो जाता है आदमी। अन्याय के प्रतिकार का समर्थन वह तभी तक करता है जबतक उससे होने वाले अन्याय के प्रतिकार की चर्चा न की  जाय। प्रेम,सहानभूति और करुणा सब अ...
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  March 5, 2014, 12:01 pm
इच्छा इतनी नहीं कि किसी से भिक्षा मांगू घमंड भी इतना नहीं कि किसी की महानता के सामने सिर झुका सकूँ अब मेरे जैसे औसत आदमी के लिए कहाँ है दुनिया में गुंजाइश मुझे तो लगने लगा है कि अब कविताओं में भी मेरे जैसों की कोई गुंजाइश नहीं रही। फिर भी आप के लिए नह...
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  March 5, 2014, 11:37 am
कहने के लिए बहुत कुछ नहीं है हल होगी मूलभूत समस्याएं जबसे चलने के लिए था मेरे सपनों का रास्ता पर वह पूरी न हो सके क्यों कि जुड़े थे दूसरों के साथ वे मेरे नहीं हो सकते थे इसलिए हो गयी चुनौतियों के बीच,बड़ा मुश्किल है जीना और मुकम्मल बने रहनाक्यों कि  ...
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  March 5, 2014, 11:19 am
वह चीखता ऐसे है जैसे छप रहा हो और जब हँसता है तो उसे मशीन से अखबार की तरह लद-लद गिरते देखा जा सकता है ,वह इकठ्ठा होता है अपने वजूद में बंडल का बंडल सबसे आँख लड़ाती बेहया औरत की तरह वह इतना प्रसिद्द होता है कि दिन भर में ही पूरा-पूरा फ़ैल जाता है आबादी...
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  March 4, 2014, 1:20 pm
बड़े-बड़े लोगो ने कहीं बड़ी-बड़ी बातें प्रेम अभी और करना है दुनिया को और अधिक बनाना है बेहतर प्रकृति को बचाये रखना है सुन्दर स्त्रियों का सौंदर्य और अधिक चिन्हित होना है और कर्म नायक उपजाने हैं प्रबन्धकाव्यों की खेती में नायिकाओं को और अधिक बनाना है&nbs...
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  March 4, 2014, 1:00 pm
बच कर निकल गई हाथ आई जिंदगी मछली जैसे पकड़ में आई-आई फिसल गई। चुप चाप मृत्यु की  प्रतीक्षा में बैठा बूढ़ा आदमीकब तक नाती-पोतो का मुँह देखता रहेगा दवाई और रोग पेट की कमजोरी हड्डियों का कड़कड़ापन और अतीत का बोझ वर्तमान में रहने नहीं देता। मेरा देश एक...
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  March 3, 2014, 2:13 pm
इसी तरह के मौन सन्नाटे में जीभ को साधते रहते हैं हम अपारदर्शी भविष्य और चमकीले अतीत में वर्तमान ऐसे लुढकता है जैसे कोई पत्थर लुढक रहा हो और गंतव्य का पता न हो हमारा असली भविष्य हम नहीं लोग देखेंगे जो बचे रहेंगे। इस अपार असमझ बूझ को दर्ज करते रहना क...
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  March 3, 2014, 12:21 pm
समाधि के स्वाद की तरह मौन के आस-पास शब्द छोटे-छोटे बच्चों की भाँति उधम मचाते हैं उन्हें देखने की चेष्टा में मैं असहजता का अनुभव करता हूँ ,क्या कर सकता हूँ मंदिर के सामने मंगलवार के दिन पंक्तिबद्ध दरिद्रों ,अपंगो ,कोढ़ियों के लिए मैं कुछ भी तो नहीं कर सकत...
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  March 3, 2014, 11:55 am
जियेंगे तो दुनिया देखेंगे मर गये तो क्या देखेंगे लोग देखेंगे हम तो नहीं देखेंगे पैसा नहीं भी रहेगा तो धुधली आँखे रहेंगी और चल नहीं पाये तो बैठे-बैठे देखेंगे जो लोग चलेंगे उनमे से कोई तो हमारे पास से गुजरेंगे। किसी बागीचे में फूल नहीं तो सामने के ...
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  March 3, 2014, 11:37 am
सत्य का गूंगापन एक बारझूठ का धपोल शंखबजता है बार-बार।एक दिन कोई अच्छा साबुरे दिन महीनो बजोरहते देह मन-प्राणों पर सवार।एक जगह कहीं कोई फूल खिलारंग और गंध सेआकर्षित करता निहालबाकी जगह कूड़े कतवारकरते रहते कि हम जायेंउनके पासहोता तो यही है बहुधा अनेक बार।आदमी को औरत का...
अनंत जी की कविताएँ ...
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  February 25, 2014, 10:15 am
दिल का क्या हाल है मत पूछ हाल बेहाल है मत पूछ ,वक्त को तोड़ रहा रोटी सा साथ में दाल नही मत पूछ ,इश्क़ में क्या मिला किया उनसे एक नाजुक सवाल मत पूछ। ...
अनंत जी की कविताएँ ...
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  February 24, 2014, 8:41 am
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