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अनंत जी की कविताएँ

अचानक उठ जाता हूँडूबते हुए गोयानिकल आया हूँइस कमरे से उस कमरे जाता हूँखोजता हूँ एक शब्दजो मेरी अकुलाहट को भाषा दे देअचानक खिड़की से दिखता है खुला आसमानआसमान के पास पहुंची पेड़ की डालियाँ और पत्तियाँसुनता हूँ सड़क पर चलती गाड़ियों की आवाजफेरी वालों की पुकारऔर मेरा खोया ह...
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  June 1, 2017, 4:21 pm
जब भी कातर होता हूँतो कविता लिखता हूँखोजता हूँ कलमहड़बड़ी होती है सहसा न मिलने पर बेचैनी कि कलम कहाँ हैव्यवस्थित कभी नही रहा किसब कुछ समय पर मिलेपर शायद इसी अव्यवस्था नेदी है इतनी बेचैनी कि कविता लिखता हूँमन का मजबूत होता तो क्यों लिखता कविताकातर भी क्यों होतामैं भी ...
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  June 1, 2017, 4:19 pm
दिनांत में सूर्य के घोड़े चले गएटापों की आवाज धीमी हो गईपेड़ पौधे कहीं नहीं गएपर चुप हो गएँ सुबह जिन पक्षियों की आवाज आई थीवह कहाँ गईंपता नहींरात आने को हैघर में आए लोगइधर-उधर कही बैठे लेटेबच्चे ऊधम मचातेअभी वक्त हो जाएगाखाना बन जाने काखाने काऔर लोगों के सोने थोड़ा पढ़न...
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  June 1, 2017, 4:18 pm
उखड़ गए मन की जड़ से बने जीवन की त्वचा का स्पर्शरह गए वंचित हँसी के सागर की लहर से अविरलऔ पुरातन देह के यथार्थ मेंकोने में छिपे हरे-हरे कुछ पत्तों का बोधअजब है ,अजब है जंगले से बाहर देखनाऔर अनकनादोपहर की धूप कोजिंदगी की शाम में ,क्या बचा हुआ आदमीइतना दयनीय होता हैवह मर ...
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  June 1, 2017, 4:17 pm
और शाम गहरा जाती हैविदा समय मेंविदा द्वार पर खड़ा पेड़मानो कुछ कहताऔर जैसे वह प्रश्न पूछताफिर कब आओगे,वह अपनी जड़ छोड़ नहीं सकतामैं पर लौट-लौट सकता हूँ ।पेड़ एक भाषा बुनता हैमौन अँधेरा गहरे-गहरेऐसे-ऐसे प्रश्न करता हैजिसके उत्तर दे पानाअत्यंत असंभव ।कभी कहो यदि किसी स्वजन ...
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  June 1, 2017, 4:15 pm
उजले दीप जले किसके सुन्दर अधर कोर परये मुस्कान खिलेनयनों में आई दिवालीस्नेह भरी भाई दिवालीदीपक थाल संभाले आँचलपायल झूम चलेउजले दीप जलेझूम उठी आँगन की तुलसीअंधकार की पाँखें झुलसींप्यारे-प्यारे गीत पिया केरह-रह मचल चलेंउजले दीप जलेद्वार देख साजन परदेसीआँसू उमड़ प...
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  June 1, 2017, 4:13 pm
आप जिस व्यक्ति से संपर्क करना चाहते हैं वे अभी व्यस्त हैंया कवरेज क्षेत्र से बाहर हैं कृपया थोड़ी देर में कॉल करें ,मोबाइल पर इस हिंदी भाषा के इबारत केकई भाषाई अनुवाद दिन मेंकई बार सुनने पड़ते हैं ,आप अभी नहींकृपया प्रतीक्षा करें ,वे प्रतीक्षा करें जिन्हेंअभी रोटी क...
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  June 1, 2017, 4:10 pm
अंततः सभी चले जाएंगेयह मुहावरा बोलने वालों को इतना बोध नहीं रहता कि कि कम जाते हैं ज्यादा लोग रह जाते हैंप्रलय किताबों में पूर्ण होता हैप्रलय भूगोल मेंहमेशा खंड प्रलय रहता हैऔर बचे हुए लोगदुःख, संवेदना, आंसू, श्रद्धाऔर स्मृति के फूल चढ़ातेकैंडिल जलातेदिवंगत आत...
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  June 1, 2017, 4:09 pm
जहां  से यात्रा शुरू होती है वहीँ जा कर समाप्त होती है किन्तु कुछ रास्ते ऐसे होते हैं जिनका कोई जवाब नहीं होता ।ऐसा ही था तुम्हारा रास्ता तुम्हारे साथ का आदमीथक नहीं , रुका नहीं ,सिर्फ चालता रहा 'चरैवेती  चरैवेति'। वाकई झुकना  ही पड़ता है गोकि आदमी झुकना  नही चाहताक...
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  September 6, 2014, 10:25 am
मुझे किसी महाकवि ने नहीं लिखासड़कों के किनारेमटमैले बोर्ड परलाल-लाल अक्षरों मेंबल्कि किसी मामूलीपेंटर कर्मचारी नेमजदूरी के बदले यहाँ वहाँलिख दियाजहाँ-जहाँ पुल कमज़ोर थेजहाँ-जहाँ जिंदगी कीभागती सड़कों परअंधा मोड़ थात्वरित घुमाव थाघनी आबादी को चीर करसनसनाती आगे निकल...
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  July 17, 2014, 2:12 pm
मकान :आदमी के ऊपर छत होनी ही चाहिए वह घरेलू महिला हमेशा मिलने पर कहती है उसका बंगला नया है उसके नौकर उसके लान की सोहबत ठीक करते हैं और वह अपने ड्राइंगरूम को हमेशा सजाती रहती है |मैंने नीले आसमान के नीचे खड़े हो कर अनुभव किया कि छत मेरे सिर से शुरू होगी या मे...
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  July 9, 2014, 9:56 pm
धीरे-धीरे मन भारी हो जाता हैशाम इबारत लिखती है अवसादों की धीरे-धीरे तन भारी हो जाता है |भारी हो जाता है समय भारी और लगते हैं कंधों पर ठहरे जिम्मेदारियों के बोझ लोगों की प्रतिकूल बहुत छोटी-छोटी बातें भी भारी लगाने लगती हैं,समय आदमी को घर में बंद कर बाहर से ताला लगा देता है |...
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  April 13, 2014, 9:51 am
बूढ़े दिमाग सेमैदान के हिस्से में एक छोटी जगह चुनते हैं और अपनी बेतुकी धुन में ऐसे बैठे रहते हैं गोया हरकतें उनकी दुश्मन हों |बूढ़ा सिर्फ जरुरी हरकत करता है मैं चीख कर बताता हूँ और बूढ़े का व्याकरण बदल जाता है |...
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  April 12, 2014, 9:40 pm
उसकी मशीनकैची और उसके पास है फीता,वह पैर चलाता है सधे हुए,और डोर लगाने के लिए बड़ी सधी उगलियों का प्रयोग करता है,कपड़े की नाप लेते हुए दर्जी बड़े ध्यान से देखता है,वह आदमी को  उसकी कमर, कलाई, उसके कंधे के आधार पर जानता है |दर्जी सिल रहा है कपड़े और कपड़े लहरा रहे हैं आ-जा रहे हैं ...
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  April 12, 2014, 9:31 pm
शहर में कई नाले हैं जहाँ शहर का पानी गन्दगी के साथ निकलता है धोबी, नाऊ, भंगी,कूड़े बीनने वाले लोगों की तरह ये गन्दगी से लड़ते हुए पेशा करते हैं | भले कोई पेशा नहीं करते, पड़े रहते हैं, बहते हैं बहाते हैं |शहर हमारा इन्ही नालों की कृपा से साफ़, सुथरा है नाला नाल, माडर्न साफ़-सु...
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  April 6, 2014, 9:07 pm
हमारे समय मेंक्रांति भी एक फैशन है सत्य, अहिंसा, करुणाऔर दलितोद्धार स्त्रीविमर्श और गाँव के प्रति जिम्मेदारी |हमारे समय में भक्ति भी एक फैशन है सत्संग,ईश्वरऔर सहविचार |प्रेम और मोह सभी फैशन की तरह यहाँ तक कि गांधीवाद यथार्थवाद अंतिम व्यक्ति की चिंता और लाचारी |हमार...
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  March 22, 2014, 1:02 pm
जैसे सब बीतता है वैसे बीत गई एक शब्द उठा रंगीन फ़व्वारो पर रखे बैलून की तरह रात आते-आते मशीन बंद हो गईन रंग है, न फव्वारा न वह बैलून होली मिठाइयाँ और गुजियों के पच गए अवसाद के स्वाद की तरह खत्म हो गई। मिल आए लोग जिनसे मिलना था मिल लिए लोग जो मिलने आए थ...
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  March 19, 2014, 7:37 pm
झुकी हुई औरत गर्दन पर बाल खोलती है दिख गए मर्द को देखती है और अंदर भाग जाती है,औरत जब मर्द देखती है तो अंग छुपाती है मर्द जब औरत को देखता है तो सीना फुलाता है,चिड़िया जब चिड़िया को देखती है चहचहाती है,मैंने पेड़ से पूछा आप क्या करते हैं श्रीमान आदमी को द...
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  March 10, 2014, 10:16 am
ढकेले रहेंगे हम विपत्तियों को जैसे कूड़े को अपने द्वार से बाहर कर कही दूर कर आते हैं झाड़ू से हम पर फिर वे आ जाते हैं जैसे वैसे आफते आही जाती हैं घर में,  दरवाजे पर दिल में और देह में। आदमी -आदमी के काम आता है इसीलिए कि हर आदमी के घर और बाहर विपत्तियाँ आती ...
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  March 7, 2014, 1:18 pm
बच्चे आते हैं पास और ऐसा कोई प्रश्न करते हैं जो उत्तर के रूप में केवल बच्चे को और अधिक बिम्ब में बदल देते हैं बच्चा प्रश्न करते समय बच्चा नहीं होता पर जब भी आप बच्चे को प्रश्न करते देखते हैं तो वो बच्चा ही रहता है उसके छोटे-छोटे हाथ छोटा सा मुँह और छ...
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  March 7, 2014, 12:45 pm
गैर भरोसे की दुनिया में भी आदमी को भरोसा करना ही पड़ेगा अपने हाथ पर भरोसा कि वह निवाले को मुँह तक ले जायेगा और अपने उत्सर्जन तंत्र का भरोसा कि वह वहिर्गमन करेगा ही अपने सांसों पर भरोसा कि वह चलेंगे और दिल और फेफड़े को मिलता  रहेगा आक्सीजन ,रोटी ,आटे औ...
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  March 7, 2014, 12:35 pm
जीवन की सांध्य वेला में जिंदगी का हिसाब लगाते हुए कुछ याद नहीं आता ऐसा जो दर्ज करने लायक हो,किसी के काम आया कि नहीं आया वे तो वही जानते होंगे पर अपने लिए जुगाड़ने में इज्जत की रोटी पूरी जिंदगी खर्च हो गयी चाहता तो यही था कि सभी को इज्जत की रोटी जिंदगी भर...
अनंत जी की कविताएँ ...
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  March 5, 2014, 12:22 pm
कोई नहीं सुनना चाहता सत्य जैसे मौत की खबर सुनकर अपनी मौत के होने के सच को टालते हुए जीवन में शरीक हो जाता है आदमी। अन्याय के प्रतिकार का समर्थन वह तभी तक करता है जबतक उससे होने वाले अन्याय के प्रतिकार की चर्चा न की  जाय। प्रेम,सहानभूति और करुणा सब अ...
अनंत जी की कविताएँ ...
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  March 5, 2014, 12:01 pm
इच्छा इतनी नहीं कि किसी से भिक्षा मांगू घमंड भी इतना नहीं कि किसी की महानता के सामने सिर झुका सकूँ अब मेरे जैसे औसत आदमी के लिए कहाँ है दुनिया में गुंजाइश मुझे तो लगने लगा है कि अब कविताओं में भी मेरे जैसों की कोई गुंजाइश नहीं रही। फिर भी आप के लिए नह...
अनंत जी की कविताएँ ...
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  March 5, 2014, 11:37 am
कहने के लिए बहुत कुछ नहीं है हल होगी मूलभूत समस्याएं जबसे चलने के लिए था मेरे सपनों का रास्ता पर वह पूरी न हो सके क्यों कि जुड़े थे दूसरों के साथ वे मेरे नहीं हो सकते थे इसलिए हो गयी चुनौतियों के बीच,बड़ा मुश्किल है जीना और मुकम्मल बने रहनाक्यों कि  ...
अनंत जी की कविताएँ ...
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  March 5, 2014, 11:19 am
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