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बिड़वा.... : View Blog Posts
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बिड़वा....

एक कंकड़ तुमनेंयों ही फेंक दिया तालाब में,तमाम उम्र बीत गई मेरीदरिया की तालाश में,(अप्रमेय)...
बिड़वा.......
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  October 25, 2017, 2:53 pm
वहीं से उठती है कविता जहां से दूब उग आती हैवहीं से निकलता है गानजहां से हवा सरसराती हैवहीं से उड़ती है चिड़िया जहां से सपने फैल जाते हैंवहीं से हम होते हैं विदाजहां से लोग अपने हो जाते हैं ।(अप्रमेय)...
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  October 25, 2017, 2:40 pm
वहां नहीं मिली मुझे प्रेरणा जहाँ पढ़ा था मैंने भूख से गई जानवहां भी नहीं निकली थी आहजहाँ आदमी को पकड़ लिया गया थाजेब काट कर भागते हुएकल शाम सब्जी मंडी मेंदेर रात के बादबंद होती दूकानों के बीचवह सभ्य महिलाबीन रही थीइधर-उधर पड़ी सब्जियांमैंने पूछ ही लिया बहनइसका क्य...
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  October 25, 2017, 2:32 pm
अचानक एक भद्द सी आती है आवाज और खुल जाती है नींद मेरीरात को जैसेगिरा हो पिछवाड़े पेड़ से पक कर कोई आमबिस्तरे पर बाग़ नहीं होताऔर कितना भीकूलर कर ले शोरआँधिया नहीं आतीअक्सर कई दिनों सेऐसे ही अचानकटूट जाती है नींद मेरीऔर धड़कनसीने से खिसक करकानों के पासचली आती है मेरी ...
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  October 25, 2017, 2:31 pm
चन्द्रमा की गोलाई लिए दो नन्ही सी प्यारी आँखों ने अपने गालों पर बना दिए अश्रु चित्र....पेड़ों ने देखाकिन्तु वह केवल खड़े नहीं रहेहिलाया अपना पत्ता-पत्ताजिनके पास फूल थेंउन्होंने झाड़ लीं अपनी-अपनी पंखुड़ी,और धरती इधर पीती रहीआसमान का पसीनाखेल चलता ही रहाऔर हम खेलते ...
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  October 25, 2017, 1:09 pm
आने को है वसंतयह तो वहां लिखा हैपर कोकिल ने तो सुन लियाउसका पदचाप अपनी धड़कन मेंऔर चुप-चाप हवाओं से छुप कर साधने लगा गानहवाएं नारद की तरह ले ही जातीखबर इसलिए ही तोपेड़-पत्तों और पुष्प नेभोर में जब वह अलसाया खोज रहाहोता है अपनी माँ का अंधकार मेंतारों भरा जड़ित आँचल तब हीस...
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  October 25, 2017, 1:08 pm
स्त्रियों को कभी सुंदर लगने के लिएपोथी पढ़ते नहीं देखाआदमी ने किस धर्म-ग्रंथ सेसीखा प्रेम करना !बूढ़ों को चुप हो जाना हैऔर बच्चों को इजाजत नहीं लेनीखेलने-कूदने के लिएयह किस नीतिशास्त्र की पुस्तकमें पढ़ कर उन्हों ने जाना ?सदी बदल चुकी हैअभी और भी बदली जानी हैआदमी खुले आका...
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  October 25, 2017, 1:01 pm
प्यास लगी तो पानी भूख लगी तो अन्नतोहे देखन की आस जगीतो हो गयाजियरा सन्न ।(अप्रमेय)...
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  October 25, 2017, 12:58 pm
पिंजरा भर आकाशऔर ताले भर का प्यारकहाँ रोक सका हैचिड़ियों को,गिनी-चुनी गिनतियाँऔर ढेले भर के शास्त्रकी हकीकतकौन नहीं जानता ?एक कुत्ता जब चिल्लाता हैऔर एक बकरी जबकाटी जा रही होती हैतब कौन हैजो तड़प नही जाता हैकाम, जाति और स्वाद के तुमतर्क कितने भी क्यों न गढ़ लोमृत्यु का स...
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  October 25, 2017, 12:56 pm
कल औचक नहीं दिख पड़ा था चाँदसांझ से ही जैसे प्रहरी नेसंभाली थी कमानपड़ा न व्यवधान कि उतर पड़ा प्रकाश की सीढ़ियों सेसागर का सागर रसरस-सागर की लहरेंलहरें न थीचाँद की गोद में बैठाअमृतस्य पुत्र के अबूझ प्रश्न थे,रह-रह कर उन्ही का ही तोजवाब खोज रहें हैं मदमस्त फकीरकुरेद रह...
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  October 25, 2017, 12:55 pm
नई दुनिया मेंछूटता चला जा रहा हैसादे पन्नों का साथ,पन्नों की स्मृति अबस्कूल के बीते दिनों केचित्र भर से ज्यादा नहीं,कोई आवाज नहींऔर न ही कोई जीवित परछाईंआती है कड़क पन्नों के बीच,एक सुगंध जो फूल की तरहकॉपियों के बीच से उठती थीवह भाप बन कर कबकाघुल गईं बादलों में,जाने कहा...
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  October 25, 2017, 12:53 pm
बादल गरजते हैं और जबजोर-जोर से चलती हैं हवाएंतब केवल पेड़ ही नहीं लहरातेखड़बड़ाता है उनका छप्पर भीगिरता है ऊपर से लोटाटन्न-टन्न करता हुआजिसकी आवाज हृदय की धड़कन सेसन्न सा लय जोड़ देती हैतार मन्द्र और मध्य मेंसपाट चलती हैं सांसेदेर तक बाहर बरसता है रागऔर छप्पर के अंदरएक एक ...
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  October 25, 2017, 12:48 pm
बाहर सुबह हो गईऔर इधर रात का अंधेरा जला अंदर धीरे-धीरेदिए के मानिंद,जोरन ने दूध को रात में जाने कबबना दिया दहीजाने कब अंतिम सांस लीबूढ़े ने करते-करते इंतजार,मंदिरों में बजा घण्टास्कूल के घंटो के साथ,धीरे-धीरे चीटियों की तरहआदमी ने बढ़ाए अपने कदमवहीं लौट आने के लिए,आदमी...
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  October 25, 2017, 12:47 pm
सटी किताबों के ऊपर धूलऔर थोड़े दूरी पररखी चीज़ों परजाल लग जाते हैं,कितना भी गहराक्यों न हो तालाबधीरे-धीरेसूख ही जाता है,मुझे अच्छा नहीं लगतासुबह-सुबह उदास होकरअपनी कविताओं मेंउन्हें बुलाना परचिड़ियों की पुकारऔर सूर्य का प्रकाशहड्डियों से लेकर आत्मा तकचुप-चाप हाथ की प...
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  October 25, 2017, 12:46 pm
आकाश में तो मिलते नहीं दानेफिर ये चिड़िया क्यों उड़ती हैपंख पसारे इधर-उधर,निसर्ग ने वैसे ही तो नहींदिए उन्हें पंख जैसेवैसे ही तो नहीं उन्हेंदेख कर मुझमें चला आया ये प्रश्न,इतना मूर्ख तो नहीं लगताकि अनंत आकाश की यात्रा कोचिड़ियों के पंख के मत्थे मढ़ करवह ध्यानस्थ हो गया हो...
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  October 25, 2017, 12:44 pm
धड़कन कौवे की तरह जबकांव-कांव करने लगेऔर स्वांस हैण्डपम्प की आवाज साचोचियाने लगे तब कोयल की आवाज मृत्यु के स्कूल में बज रहेछुट्टी के घंटों सा सुनाई पड़नेलग जाती है,कौन नहीं चाहता आकाश को निहारनापर किन्ही-किन्ही क्षणों मेंउसे देखना भरनिर्गुण के दुल्हनिया सासिसकता...
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  October 25, 2017, 12:42 pm
मैं लिखता हूँ शब्द जोलकड़ी की तरहभाव के जल में डूबते हीटेढ़ा हो जाता हैतुम्हे मालूम है औरमुझे है यकीनकविता का सत्यभाषा की चौहद्दी मेंकैसे गोरख धंधा साउलझ जाता है।(अप्रमेय)...
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  October 25, 2017, 12:38 pm
तुम ने तय कर ली हदें अपनीपार हो कर मैं जुदा हो गयारास्ते जो कभी थे एक अपनेएक जमी एक आसमां हो गया वक्त इतना नहीं के कोई ठहर सकेदेखो सब-कुछ कैसे फना हो गया(अप्रमेय)...
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  October 25, 2017, 12:35 pm
कितना आतुर हैदर्पण के भीतरतुम सा दिखता हुआ,भूत का रंगऔर वर्तमान की तरलताकैसे बदल देती है छवि,भविष्य में संभावनाएं हैंजो ये बोल देकि दर्पण तो पारा थाजो छिटकता रहाइन तीनों के आर-पार ।(अप्रमेय)...
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  June 1, 2017, 6:08 pm
तुम्हारे होनेऔर तुम्हारे न होने के बीचएक टीस के अतिरिक्त कोई और सेतु नहीं है,मैंने गलती से उस सेतु पे चल करतुम्हे पाना चाहा,नई दुनिया मेंसेतु का अर्थ पार होने के अर्थ मेंनहीं ग्रहण किया जातादलाली से लिया जाता है !(अप्रमेय)...
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  June 1, 2017, 6:07 pm
ये जो पुकारते हुए से सुनाई पड़ जाते हैंगौर से देखो कुछ छुपा कर बस आवाज लगाए जाते हैं,मैंने चुप हो कर बस एक बात पूछ ली थी उनसे सरे जिंदगी वे बस इसकाजवाब दिए जाते हैंदुनिया ने जिनको भगवान् कहावे चुप है सदियों सेये कौन हैं बिचारेजो राम नाम रटे जाते हैं।(अप्रमेय)...
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  June 1, 2017, 6:04 pm
कैलेंडर जीवन से गायब हो जाना चाहिएऔर अगर नहींतो मुझे तारिखों से मुक्त होने का कोई उपाय बताइएआप समझेंगे कि मैं अब समय के पार होने की कोई बात कहूंगाहुजूर मुझे इसके आर का ही रास्ताबता दीजिए।।।(अप्रमेय)...
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  June 1, 2017, 6:03 pm
लकड़ी जल गईक्योंकि वह सूखी थीलाश जल गईक्योंकि उसमें चर्बी थी,जिंदा रहना रोग हुआमौत उसके बरक्स औषधि थी,आँख है तो उठ गईदेख कर झुख पाईयह उसकी फितरत थी,हमको मिली जिंदगी या चाहे जो कुछ भीकुछ हाथ में रही कुछ फिसल गई  यह किस्मत थी ।(अप्रमेय)...
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  June 1, 2017, 6:03 pm
एक शाश्वत अकेलेपन का विस्तार है आदमीअपनी चुप्पी के बरक्स अपनी हत्या के लिए हथियार है आदमीसदियों से अपने ही हमशक्लको देखते-देखते परीशां है आदमी ।(अप्रमेय)...
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  June 1, 2017, 6:00 pm
मैंने कल उससे बात की एक बच्चे की तरह और समझा एक-एक चीज झरती हैं कैसे उसकी आँखों से, वह रो नहीं रहा होतापुकार रहा होता हैअस्तित्व की सबसे प्रबल भाषा मेंपर तुम्हारे लिए यह अवसर नहीं कि तुम समझ सको उसकी भाषा,मैंने कल उसके पास बैठ करधरती की गर्माहट को महसूस कियाऔर...
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  June 1, 2017, 6:00 pm
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