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मधुबन

       परीक्षा का मौसम सर पर है, इसीलिए पंकज जी काफी शाम गए कोचिंग से नहीं लौटते हैं | पढने में तो बचपन से ही होशियार रहे हैं पंकज जी | उनके घरवाले को उन पर पूरा भरोसा है - "पिंटू एक दिन जरूर कुछ न कुछ करेगा" | घर में उन्हें सब पिंटू ही बुलाता है | पापा के भरोसे को सही ठहराने क...
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  March 22, 2014, 9:11 pm
       परीक्षा का मौसम सर पर है, इसीलिए पंकज जी काफी शाम गए कोचिंग से नहीं लौटते हैं | पढने में तो बचपन से ही होशियार रहे हैं पंकज जी | उनके घरवाले को उन पर पूरा भरोसा है - "पिंटू एक दिन जरूर कुछ न कुछ करेगा" | घर में उन्हें सब पिंटू ही बुलाता है | पापा के भरोसे को सही ठहराने क...
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  March 22, 2014, 9:11 pm
(कहानी में तारतम्यता बनाए रखने के लिए कृपया सर्वप्रथम "राम-श्याम किरण-1"पढ़े http://vivekmadhuban.blogspot.in/2013/12/1.html       राम-श्याम का घर फिल्ड के बगल में ही था और वहीं किरण का भी घर था, इसीलिए दिन में चार पाँच बार तो दोनों भाई को चंद्रमुख का नियमित दर्शन लाभ मिल ही जाया करता था | किरण किसी ...
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  February 3, 2014, 7:32 pm
        हमारी खिड़की के बाहर का जो क्रिकेट मैच हुआ करता था बड़ा ही रोमांचकारी | हरेक उम्र के खिलाड़ी, छोटा सा फिल्ड, नए-नए नियम जो प्रायः प्रतिदिन बदलते रहते और उसके दर्शकगण जोकि खिलाड़ियों के पारिवारिक कुटुंब ही थे, के कारण मैच का रोमांच चरम स्तर का चुम्बन करने लगता |ह...
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  December 22, 2013, 12:19 pm
        पंकज जी ने फटाक से दरवाजा बंद कर लिया और यहाँ तक कि उस दिन खोला ही नहीं | अगले दिन जब पंकज जी के समक्ष यही प्रसंग पुनः खोदा गया तो वो मुस्कुरा भर दिए | उन्होंने फिर खुद ही बताया कि किरण ने ग्याहरवीं में नवोदय छोड़कर दरभंगा में ही रहने का फैसला किया है - "यहाँ मेडिक...
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  December 9, 2013, 9:07 pm
        आजकल पंकज जी का गेट अधिकांशतः बंद ही रहता है, कहते हैं कि पढाई का टेंसन हो गया है इसीलिए वो सीरियस रहते हैं और हमलोग उनके सीरियसपन को देखकर टेंसनाइज हो गए हैं |            मुझे क्या पता कि किरण छुट्टी में भी इतना सीरियस रहने वाली लड़की है | ग्यारहवीं में एडमि...
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  November 24, 2013, 7:38 pm
(कहानी में तारतम्यता बनाए रखने के लिए कृपया सर्वप्रथम - "बुद्धिमान के लिए ईशारा काफी (1)"पढ़ें http://vivekmadhuban.blogspot.in/2013/10/1_23.html )                माँ उतर रही है धीरे - धीरे अपने सैंडिल से सीढियों को पुचकारते हुए | चाल और चेहरा दोनों में गर्व झलक रहा है | किरण दीवाल की ओट से नि...
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  November 8, 2013, 8:16 pm
        "किरण को जो आप देख लो एक बार बिल्कुल्ले बदल गई गई है, शकल - सूरत से लेकर चाल-व्यवहार तक पहचाने में नहीं आती" - बगल वाली शर्मा आंटी अंकल से कह रही थी "नमस्ते भी किया इस बार, पहले तो कैसे अकड़ी रहती थी …लगता है नवोदय में अच्छी पढाई होती है तभी तो, हमारा दुनू में से एक क...
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  October 24, 2013, 11:30 am
        किरण को यह पहली बार उसी विद्यालय में पता चला कि लड़की - लड़के भी आपस में दोस्त हो सकते हैं, जैसे लड़की - लड़की या लड़का - लड़का | किरण को यह भी वहीं पता चला कि आँख मारना कभी - कभी ईशारा करना से भी आगे की बात होती है| यह आगे की बात का पता तब चलता है जब किसी खास के आँख का मा...
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  October 8, 2013, 10:54 am
         कोई पूछता नाम, नाम क्या है आपका? फ़िल्मी स्टाईल में वो बोलती "किरण, किरण भारद्वाज" | पंकज जी तो एकदम शाहरुख़ बन जाते "क क क किरण, वो है मेरी किरण" |        कान्वेंट स्कूल की छात्रा, फर्राटेदार अंग्रेजी, ग्यारहवीं में बायलोजी, डॉक्टर बनने की चाहत, अपनी से ज्याद...
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  October 3, 2013, 8:49 pm
     वो दरभंगा नवोदय विद्यालय की छात्रा थी, जो दरभंगा टाउन में नहीं था और ये सीएम साइंस कॉलेज का छात्र था, जो दरभंगा टाउन में था । उसका दरभंगा टाउन में घर था,  लेकिन वो टाउन से बाहर रहती थी, जबकि इसका घर तो गाँव में था लेकिन पढने दरभंगा आया था । उसने दसवीं की परीक्षा द...
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  September 26, 2013, 11:49 am
मौसम में कुछ बदलाव सा आभास हो रहा है| गर्मी का महीना धीरे – धीरे बूढा होता जा रहा है| वातावरण में नमी की कमी महसूस होने लगी है| इस मौसम में शरीर की त्वचा भी वातावरण से सांठ – गांठ करते हुए खुश्क हो जाती है| यह अजीब सा रूखापन शरीर के साथ मन को भी चिड़चिड़ा कर देता है| नमी के ...
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  September 20, 2013, 2:15 pm
   कुछदिनपीछेहीवैष्णोदेवीकीयात्रासम्पन्नकरकेवापसदिल्लीपहुँचाहूँ।वहाँमैंनेदेखाआस्थाओं काएकऐसासैलाबजोउमड़करदूरनिर्जनपहाड़ोंमेंअपनेविश्वासकीअटूटताकोकायमरखनेकेलिएवैष्णोदेवीकीछोटीसीशिलापिंडकेदर्शनहेतुबड़ी-बड़ीशिलाओंकोपारकरतेहैं।उसआस्थाक...
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  September 16, 2013, 11:54 am
फूलों की कोमल पत्ती को तोड़ न ले जाए माली,दिन-रात यहाँ करता रहताहूँ इसीलिए पहरेदारी |विश्राम मैं कभी करू नसहूँ मैं झंझों के झोके,खड़ा हमेशा रहता हूँआहत का क्रंदन उर लेके|यह पौध हमें क्यों पाल रहायह कठिन परीक्षा साल रहा,पांडव जैसा हो गया गतिलुट गयी हजारों द्रौपदी,आते ...
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  September 3, 2013, 1:45 pm
 जब कभी मैंनेनए रिश्ते बनाए हैंसपनों के महल सजाएं हैं  पूर्णिमा के चाँद की तरह खुशियाँ दमकने लगती है भाग्य बुलबुल की तरह मन की खिड़कियों पर चहकने लगती हैकिन्तु, उसी क्षण चाँद बनता हैकाले बादलों का ग्रास हमारी अपेक्षाएँ बढती है और रिश्तों में आ जा...
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  April 3, 2013, 10:06 am
कुछ तुम बोलो कुछ  मैं बोलूँक्यों मध्य पड़ी गहरी गाँठेकर आगे कर मिलकर खोलूँकुछ तुम बोलो कुछ मैं बोलूँ ।क्यों छोटा गड्ढा जन्म लियाधीरे - धीरे यह क्यों पसरायह पता नहीं तुम क्यों बिफरेयह भी न पता मैं क्यों अकड़ा,गड्ढे का कीचड़ चादर परआओ मिलकर उसको धो लूँ ।कुछ तुम बोलो क...
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  February 26, 2013, 6:45 pm
राहें सूनी है दूर - दूर सब छोड़  मुसाफिर चले गए,और सज्जनता उपहास बना जब - तब देखो हम छले गए ।अनजान डगर पर निकले थे,थे दिल के  हम भोले - भाले,वह चोर लुटेरा ठग निकला जिस - जिसको समझे रखवाले,सब करते रहे कंदुक - क्रीडा मच्छर की भाँति मले गए ।यह सज्जनता और भोलापन ...
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  February 16, 2013, 6:33 pm
अरे हिमालय बता मुझेये क्या होता है?गंगा यमुना बहती है,या तू रोता है?गंगा धार बनी है किसकी याद बता,किसकी यादें रही अभी तक तुझे सता,तुम किस आशा में चिरकालों से हुए खड़े,झंझा - तूफान, गर्जन - तर्जन से लड़े - अड़े,किस विरहा में धीरे - धीरे घुले जा रहे,किसकी यादों में स्वंय भूले ...
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  February 5, 2013, 12:34 pm
बादल उमड़ा,मुझे किसी ने याद किया क्या?बादल गरजा,विरह की मारी याद किया क्या?बरसा बादल,मुझे लगा वह मीरा बनकर नाच रही है,विह्वलता में प्रेम गहनता जाँच रही है,बूंद बरस कर मिट्टी के तन पोर-पोर में समा गया है,सोंधी खुशबू भूली नेह को जगा गया है,हरी दूब जो झुलस गयी थी हरा हो गया,मी...
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  August 9, 2012, 12:15 pm
मेरे टूटे कंधो पर अपना मस्तिष्क टिका दो मेरी सूनी अंखियों में तारों सी ज्योति जगा दो,विश्वास नहीं टूटे ये मोरों का नभ के ऊपरबिजली चमकी बरसो हे अम्बर के बादल भू पर|जब हवा चली सन-सन से खन-खनके हुआ मन कंगना संकेत मिला आओगे लीपा खुद से ही अंगना, अंतर की सृष्टि हलचल कर द...
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  June 27, 2012, 12:21 pm
अंजुली भर-भर जल राशिसूरज को समर्पित क्यों करूँ?मूर्ति के चरण पर भोग भी क्योंकर धरूँ?प्यासों के मुख में जल भर केक्षुधा तृप्ति करूँ भूखे नर के,बादल हे अनंत अम्बर के,जहाँ तुम्हारी नहीं जरूरत तुम ज्यादातर वहीँ पे बरसे|मैं लक्ष्मी पूजन क्यों करूँ?हंसारुढ़ा का वंदन भी क्यों...
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  May 12, 2012, 1:52 pm
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