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-वीर विनोद छाबड़ाहमारे एक सहकर्मी हुआ करते थे - ओमबाबू। निहायत विचित्र किस्म के। जब भी किसी भी समारोह में मिलते परिवार के ढाई दर्जन सदस्यों के साथ। गिफ़्ट का लिफ़ाफ़ा १०१ या १५१ से अधिक कभी नहीं रहा। जाएंगे ज़रूर। चाहे बर्थडे पार्टी हो या मुंडन संस्कार। तिलक हो या लेडीज़ संग...
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  April 27, 2017, 11:01 am
-वीर विनोद छाबड़ाघर से निकलने से पहले मैं सब चेक कर लेता हूं कि जेब में सब व्यवस्थित है। चश्मा, रुमाल, मोबाइल, पर्स और कंघी। एटीएम कार्ड नहीं रखता। बहुत कम इस्तेमाल करता हूं। डर लगता है कि कोई हैकर पीछे न लगा हो। बहरहाल, कभी-कभी ध्यान हटने पर जाता है तो कुछ न कुछ भूल जाता हूं...
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  April 26, 2017, 9:40 am
- वीर विनोद छाबड़ासत्तर के दशक का शुरुआती दौर हमारे यूनिवर्सिटी दिन थे। पढाई कम, सपनों में टहलना और लफंटगिरी ज्यादा।आवागमन के तीन ही साधन, बस, रिक्शा या साईकिल। स्कूटर और मोटरसाइकिल वाले और कारों वाले बहुत कम थे।   मगर पौ-बारह रहती थी इनकी। लड़कियों खूब लिफ्ट लेती थीं...
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  April 25, 2017, 11:18 am
  - वीर विनोद छाबड़ाDevika Raniदिलीप कुमार ने अपना कैरियर 1944 में बॉम्बे टॉकीज़ से शुरू किया था। उन दिनों उन्हें बारह सौ रूपये महीना पगार मिलती थी। बढ़िया नौकरी थी। काम सिर्फ़ एक्टिंग करना था। शुरुआती दो महीने तो उन्हें काम ही नहीं दिया गया। मुफ़्त की खाते रहे। कहा गया, बस देखते र...
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  April 24, 2017, 2:00 pm
- वीर विनोद छाबड़ाट्रेन छूट जाने के कारण हम अपने चाचा के बेटे राजीव की शादी में नहीं जा पाये थे। अगली बार छह-सात महीने बाद दिल्ली जाना हुआ। पहुंचते ही चाची ने बतियाना शुरू कर दिया। घर-बाहर, अड़ोस-पड़ोस और अपने-पराये सब का हाल पूछ डाला। काफ़ी वक़्त गुज़र गया बतियाते। इस बीच एक लड़...
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  April 23, 2017, 11:57 am
-वीर विनोद छाबड़ाजब कभी दफ्तर के दो-चार पुराने यार मिल कर बैठते हैं तो महेश चंद्र सिन्हा की याद ज़रूर आती है। यारों के यार थे वो। ऑफिस के ज्ञानी-ध्यानी ऑफिसर्स में गिनती थी उनकी। कई मामलों में वो हमारे आदर्श थे। सीनियर होने के नाते किसी खास मुद्दे पर उनसे सलाह लेना हमेशा फ...
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  April 22, 2017, 11:06 am
- वीर विनोद छाबड़ाहमारे एक साथी हैं, साधुराम जी। जैसा नाम, वैसा ही स्वभाव और दिल भी। कहते है, ज़िंदगी में हंसी और शांति से बड़ी कोई नेमत नहीं। बावजूद इसके कि साधुराम की एक छोटी सी परचून की दुकान थी, ज़िंदगी में जो चाहा उन्होंने पाया। अच्छी पत्नी उर्मिला। एक नन्ही प्यारी बेटी ...
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  April 21, 2017, 1:30 pm
- वीर विनोद छाबड़ामेमसाब उस दिन शाम वो बाजार करके लौट रही थीं। कंधे पर लटके झोले में भरे सामान से लदी-फंदी। कुछ सामान हाथों में भी था। इसमें एक पोलीथीन बैग में दर्जन भर केले और दूसरे हाथ में मिठाई का डिब्बा। अचानक पीछे से एक बंदर आया और उसने केले वाला बैग उनके हाथ से छीना औ...
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  April 20, 2017, 11:02 am
- वीर विनोद छाबड़ाउन दोनों का प्रेम विवाह था। लेकिन पहले ही दिन से दोनों में झगड़ा शुरू हो गया। दरअसल पत्नी को शक़ था कि उसके पति के संबंध कई लड़कियों से हैं।  तीस साल गुज़र गए। मगर झगड़ा करने और शक़ करने की बीमारी गयी नहीं। उनके झगडे से परेशान होकर उनका एकमात्र बेटा अपनी पत्नी...
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  April 19, 2017, 9:15 am
-वीर विनोद छाबड़ाहमारे घर में हर समय कोई न कोई बिल्ली मौजूद रहती है। आजकल भी है। यह बिल्ली कौन है? कहां से आयी? मालूम नहीं। दोपहर में आती है। देख कर म्याऊं म्याऊं करती है। हम भी जवाब में म्याऊं म्याऊं करते हैं। फिर वो पसड़ कर गलियारे में बैठ जाती है। कभी कबाड़ की तरह खड़े स्कूट...
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  April 18, 2017, 9:12 am
- वीर विनोद छाबड़ाहमारी गली में एक कुतिया ने एक साथ छह पिल्ले जने। देखने वाले बच्चों की तो मौज हो गई। पिल्ले थोड़ा चलना सीखे तो इधर-उधर कूदने लगे। दो पिल्ले एक  स्कूल बस के नीचे आ गए। बेचारी कुतिया उनके पास कुछ देर तक बैठ कर कातर दृष्टि से उन्हें देखती रही। फिर वहां से वो च...
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  April 17, 2017, 10:07 am
-वीर विनोद छाबड़ासैकड़ों रिटायर्ड कर्मी परेशान हैं। उन्हें पेंशन देर से मिलती है। मेडिकल का भुगतान नहीं होता। तमाम एरियर का भुगतान बाकी है। आज मुख्यालय पर अपनी विपदा सुनाने के लिए जमा हैं। बमुश्किल गिरते-पड़ते दूर-दूर से आये हैं। किसी के घुटने में दर्द है तो किसी के सर म...
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  April 16, 2017, 9:40 am
-वीर विनोद छाबड़ाहम जब भी गुड़हल के पेड़ को देखते हैं हम तीस साल पीछे डाउन मेमोरी लेन में चले जाते हैं। हम शहर से बाहर एक नए मकान में शिफ़्ट हुए हैं। पत्नी ने मायके से लाकर लॉन में एक गुड़हल का पौधा रोपती है। पेड़-पत्ती के मामले में हम हमेशा पॉजिटिव रहे हैं। कुछ महीनों बाद में वो...
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  April 15, 2017, 9:13 am
- वीर विनोद छाबड़ाएक ज़माना था सफ़ारी का भी। शुरुआत में कोई इक्का-दुक्का। हमारे चेयरमैन साहब अक्सर सफ़ारी पहन कर आते थे। बड़े लोग, बड़ा पहनावा। लेकिन धीरे-धीरे इसका चलन इस कदर फैला कि हर तीसरा-चौथा बंदा सफ़ारी ओढ़े दिखने लगा।हमारे दफ़्तर में तो सफ़ारीधारियों की बाढ़ सी आ गई। कुछ ल...
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  April 14, 2017, 8:49 am
- वीर विनोद छाबड़ा12अप्रैल 1917को जन्मे महान हरफनमौला वीनू मांकड़ आज अगर होते तो सौवां साल मना रहे होते। यों तो कई हैरतअंगेज़ कारनामे उनके नाम हैं, लेकिन सबसे ऊपर है 1952का लॉर्ड्स टेस्ट,जो इतिहास में 'मांकड़ बनाम इंग्लैंड'ने नाम दर्ज है। मजे की बात यह है कि मांकड़ टूरिंग भारतीय टी...
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  April 13, 2017, 9:48 am
- वीर विनोद छाबड़ाGandhiकोई पैंतीस बरस पहले १९८२ में इंग्लैंड से आये जाने-माने एक्टर और फ़िल्म मेकर रिचर्ड एटनबरो ने एक फ़िल्म बनाई थी - गांधी। भारत सरकार का पैसा लगा था उसमें। हमने एक बार नहीं दो तीन मरतबा देखी वो फ़िल्म। दो राय नहीं कि गांधी बहुत अच्छी फ़िल्म थी और दस्तावेज़ी कह...
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  April 12, 2017, 12:19 am
-वीर विनोद छाबड़ाव्ही शांताराम ने 1937 में एक फिल्म बनाई थी - दुनिया न माने। शायद यह लीक से हट कर बनी पहली फ़िल्म थी। इस फिल्म ने शांताराम को ही नहीं मराठी सिनेमा को भी विश्व पटल पर विशेष दर्जा दिलाया था।Shanta Apteमूलतः यह फिल्म मराठी में 'कुंकु'और हिंदी में 'दुनिया न माने'के नाम से स...
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  April 11, 2017, 1:08 am
- वीर विनोद छाबड़ापिछले दिनों एक बढ़िया खबर आई थी। धोबी घाट, धोबी और गधों के दिन बस गिनती भर के ही बचे हैं। विदेशी वैज्ञानिकों ने ऐसे कपडे तैयार कर लिए हैं कि पानी में डालो और निकालो। हो गए साफ़। फिर धूप दिखाई नहीं कि सूख गये।यह तो चमत्कार हो गया। हमारे जैसे अनेक निठल्लों के ...
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  April 9, 2017, 11:28 pm
- वीर विनोद छाबड़ाजब मच्छर भनभनाते हैं तो हमें अपने बालपन और किशोरावस्था के कुछ संस्मरण याद आते हैं। साठ और सत्तर के दशक में शहर की घनी जनसंख्या वाले कुछ ऐसे वाले इलाके होते थे जहाँ एक भी मच्छर नहीं था। एक साहब ने बहुत रिसर्च करके इसकी वजह यह बताई - अमां मियां यहां इंसानों...
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  April 8, 2017, 11:58 pm
- वीर विनोद छाबड़ास्वभाव से अति सोशल हमारे एक मित्र बहुत परेशान हैं। कारण यह है कि अभी कल तक उन्हें जो कार्ड मिल रहा था, उसमें लेडीज़ संगीत, तिलक, रिंग सेरिमनी, सेहरा-बंधी, बारात प्रस्थान, जनवासे में आवभगत, बारात की विवाहस्थल हेतु रवानगी, द्वारचार, जयमाल, डिनर समारोह, विदाई औ...
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  April 8, 2017, 12:09 am
- वीर विनोद छाबड़ामुंशीपुलिया पर एक केमिस्ट हैं। आये दिन जाना होता है। आज सुबह भी जाना हुआ। एक साहब पहले से वहां मौजूद मिले। केमिस्ट से किसी का अड्रेस पूछ रहे थे। केमिस्ट ने मुझे देखा तो बोले - इनसे पूछ लो। यहीं रहते हैं। कॉलोनी में सबको जानते हैं और कॉलोनी वाले इनको। बल्...
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  April 7, 2017, 12:12 am
- वीर विनोद छाबड़ाकई बरस हुए। तब हम पैदल हुआ करते थे यानि बेकार थे। अब चूंकि बेकार थे तो स्वयं को व्यस्त रखने के लिए ऐवें ही डबल एमए करे थे। एक अदद नौकरी की बड़ी शिद्दत से तलाश थी। कभी हिंदी-इंग्लिश टाईप का ज्ञान था, लेकिन प्रैक्टिस बिलकुल नहीं थी।  एक लेखक बंधु थे, हमारे हम...
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  April 6, 2017, 12:26 am
-वीर विनोद छाबड़ाउस दिन एक पार्टी में हमें जाने का न्यौता मिला। लगभग तीन साल पहले सेवानिवृत मोहन बाबू से मुलाक़ात हो गयी। वो स्टेनो-टाईपिस्ट हुआ करते थे।  हमें याद आया कि कैरियर के आख़िरी आठ दस-सालों में उन्होंने बहुत शारीरिक बड़ा कष्ट झेला था। जहाँ भी उनकी पोस्टिंग हुई, ...
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  April 5, 2017, 12:23 am
-वीर विनोद छाबड़ाहमारे ऑफिस के एक सहकर्मी मित्र रामेश्वर ने भाई की शादी के उपलक्ष्य में प्रीतिभोज का आयोजन रखा। हमें भी सपरिवार शामिल होने का न्यौता मिला। बच्चे खुश कि बढ़िया-बढ़िया पकवान मिलेंगे खाने को। पत्नी खुश कि आज खाना बनाने से फ़ुरसत। हम पहली बार जा रहे थे उनके घर...
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  April 4, 2017, 12:15 am
- वीर विनोद छाबड़ासर विलियम जोंस (1746से 1794) एक विख्यात भाषाविद थे। उन्हें 13 भाषाओँ में महारत हासिल थी। इसके अलावा 28 अन्य भाषाओँ के बारे में जानकारी थी। तीन वर्ष के थे वो जब पिता का साया सर से उठा था। मां ने ही उनका लालन-पोषण किया। भाषाओँ के बारे में जानने की अदम्य इच्छा शक्ति ब...
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  April 3, 2017, 12:09 am
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