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- वीर विनोद छाबड़ापति-पत्नी के मध्य सुबह-सुबह की बहस। एक पत्रिका में पढ़ी। पसंद आई। रोचक बनाने के लिए थोड़ा तड़का लगा कर पेश कर रहा हूं।पति तैयार हो कर मॉर्निंग वॉक पर निकलने को था।   पत्नी ने आदतन पूछा - जनाब, सुबह- सुबह कहां चल दिए?पति सहज भाव से बोला - वही डेली का रूटीन, मॉर...
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  June 23, 2017, 12:55 pm
- वीर विनोद छाबड़ा कुछ महीने पहले की बात है। हमारे एक पुराने सहकर्मी दिवंगत हो गए। कारण अत्यधिक दारू से पूर्णतया ख़राब हो गया लीवर। वो खुद तो चले गए लेकिन पीछे छोड़ गए कई यक्ष प्रश्न। उनमें प्रमुख था कि अनुकंपा के आधार पर नौकरी किसे दी जाये? दरअसल, उनकी दो पत्नियां थीं। पह...
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  June 22, 2017, 10:26 am
- वीर विनोद छाबड़ाआमतौर पर जिसकी नई-नई शादी हुई होती है वो बंदा दो-तीन हफ्ते तक दफ़्तर देर से पहुंचता है। और जल्दी चला भी जाता है। दफ्तर के आस पास रहने वाले तो लंच पर घर भी चले जाते हैं और कम से कम दो घंटे बाद लौटते हैं। भी लंबा लेते हैं। बॉस लोग कुछ नहीं बोलते। सब चलता है। आख़ि...
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  June 21, 2017, 1:13 pm
- वीर विनोद छाबड़ाछोटा कद व गठीला बदन। बड़ी-बड़ी आंखें, आमंत्रित करते होंट और चेहरे पर टपकता चुलबुलापन। नलिनी जयवंत बरबस ही किसी का भी ध्यान आकर्षित कर लेती थी। वो एक जगह टिक कर बैठ नहीं सकती थी। सेट पर भी इधर से उधर डोला करती थी। मगर अंदर ही अंदर उसे अकेलेपन का गम खाता रहा। उ...
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  June 20, 2017, 1:22 pm
- वीर विनोद छाबड़ापत्नी गंभीर रूप से बीमार है। ब्लड कैंसर है। बेइंतहा प्यार करने का दम भरने वाले पति ने सारे जतन कर डाले । दिल्ली, मुंबई, चेन्नई आदि तमाम बड़े शहरों के स्पेशलिस्ट से चेक-अप कराया। लंदन, जर्मनी और न्यूयार्क भी हो आये। होमियोपैथी, आयुर्वैदिक, यूनानी और हक़ीम स...
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  June 19, 2017, 1:34 pm
-वीर विनोद छाबड़ाआज सब अपने पिता को अलग अलग तरीकों से याद कर रहे है। जिनके पिता हैं, उनको बच्चे गिफ़्ट दे रहे हैं। जिनके नहीं हैं वो वक़्त की मोटी धूल को हटा रहे हैं। किसी-किसी की आंख से दो बूंद भी टपकते दिख जाती है। हमे तो पिताजी का ज़न्नाटेदार थप्पड़ भी याद आ रहा है। सच तो यह है...
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  June 18, 2017, 11:09 am
- वीर विनोद छाबड़ावो लड़का अनाथ और बहुत ग़रीब था। उस दिन वो बहुत उदास था। वो पढ़ना चाहता था। उसने कई जगह मदद की गुहार लगाई। लेकिन सफलता नहीं मिली। उसने फ़ैसला किया कि वो अपने कपड़े और जितना भी उसके पास सामान है, सब बेच देगा। उसे विश्वास है कि इससे इतने पैसे निकल आएंगे कि महीने भर...
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  June 17, 2017, 11:34 am
- वीर विनोद छाबड़ाएक ज़ोरदार दारू पार्टी चल रही थी। इंजीनियर, बाबू, अकाउंटेंट, ठेकेदार आदि हर प्रोफेशन के लोग जमा थे। उनमें हिंदू भी थे और मुसलमान भी, सिख और ईसाई भी, यानि हर धर्म और जाति के लोग थे। दारू ने सारे भेद-भाव मिटा दिए। पुरषोत्तम जी भरी महफ़िल में अपनी ईमानदारी के जो...
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  June 15, 2017, 1:46 pm
-वीर विनोद छाबड़ाआज के शोर-शराबे और हर तरफ़ ट्रैफ़िक जाम के दौर की तुलना में गुज़रा ज़माना ख़्वाब जैसा लगता है। पहले मोटरकार होती थी। अब मोटर ग़ायब है, सिर्फ़ कार रह गयी है। अब कार रसूखदारों और बड़ों की बपौती नहीं है, बड़ी आसानी से आम आदमी की पहुंच में है। शुरुआत मारूति ने की थी और ...
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  June 14, 2017, 12:19 pm
-वीर विनोद छाबड़ाहमारे पड़ोस में एक डॉक्टर हैं, पक्के एमबीबीएस। लेकिन बहुत ही ख़तरनाक, उनके लिए जिन्हें उनकी दवा सूट नहीं करती। कभी इमरजेंसी में हमने भी उनसे दवा ली है। लेकिन एक से ज्यादा ख़ुराक कभी नहीं खा पाये। बहुत सस्ती दवा देते हैं। गरीबों के लिए तो यों समझिए मसीहा हैं...
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  June 13, 2017, 12:54 pm
- वीर विनोद छाबड़ावो सब्ज़ी वाला फेरी लगाता है। हमारी गली में रोज़ आता है। हरी-भरी ताज़ी सब्ज़ी होती हैं। हमें दूर मंडी से सब्ज़ी लाने की ज़हमत से बचाता है। हमने कई बार आजमाया है कि मंडी के मुक़ाबले भाव भी सही हैं। किसी-किसी आईटम पर शक़ होता है कि तीन-चार परसेंट ज्यादा चार्ज कर रहा ...
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  June 12, 2017, 10:58 am
- वीर विनोद छाबड़ाबचपन में पढ़ी एक कहानी की धुंधली याद आ रही है। शायद पाठ्य क्रम का हिस्सा होती थी। आज की पीढ़ी ने शायद यह कहानी नहीं पढ़ी सुनी है। एक थे बाबा भारती। बड़े दयालु और ज्ञानी। उनके पास एक सफ़ेद घोडा था। जान से भी ज्यादा प्यारा। उसका नाम था सुल्तान। हष्ट-पुष्ट, बलिष्...
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  June 11, 2017, 12:28 pm
- वीर विनोद छाबड़ा वो ज़माना मोबाईल और ऑनलाईन सिस्टम का नहीं था। बाहर के अखबारों में लेख प्रकाशनार्थ प्रेषित करने का एक ही जरिया था - पोस्ट ऑफिस। कई बार पैकेट खो भी जाता था और कभी-कभी पहुंचते पहुंचते विलंब हो जाता। कारण दो तीन छुट्टियां पड़ गयीं। या पोस्टमैन बीमार पड़ गया।...
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  June 10, 2017, 10:12 am
-वीर विनोद छाबड़ाजब होश संभाला था तो उन दिनों हर तरफ मुझे सिगरेट पीने वाले ही नज़र आये। घर में पिताजी को धूंआधार सिगरेट पीते देखा।  दादाजी और अन्य रिश्तेदार भी सिगरेट के लती थे। दादाजी को तो मुट्ठी में दबाकर कैवेंडर पीते देखा। स्कूल में भी टीचर्स रूम में कई अध्यापक कश ख...
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  June 9, 2017, 11:58 am
- वीर विनोद छाबड़ाकुछ अपवादों को छोड़ दें तो सरकारी नौकरी में कोई किसी का सगा नहीं होता। सबको अपने प्रमोशन का ख्याल होता है। होना भी चाहिए। लेकिन दुःख होता है कि संकट के समय सब दूर चले जाते हैं। कोई डूब रहा होता है तो उसे बचाने की बजाए एक धक्का और दे दिया, जा जल्दी से पूरा ही ...
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  June 8, 2017, 12:54 pm
-वीर विनोद छाबड़ा आजकल मार्केटिंग का ज़माना है। बढ़िया पैकिंग। किसी विदेशी कंपनी की मुहर। आर्डर दें या न दें, आपके द्वारे पर आ जायेंगे। ये मेक इन जापान और ये जर्मनी। बाज़ार में किसी बड़े शो रूम से खरींदेंगे तो दस हज़ार में मिलेगा। लेकिन हम तीन हज़ार में ही दे देंगे। ज़बरदस्त क...
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  June 7, 2017, 1:28 pm
-वीर विनोद छाबड़ाजेठ महीने का चौथा और आख़िरी बड़ा मंगल। क़रीब पांच-छह हज़ार भंडारे आयोजित होंगे। पूड़ी और आलू सब्जी और कहीं सूजी का हलवा और चावल के साथ कढ़ी। लखनऊ वालों और लखनऊ में आज पधारे मेहमानों के मौज। जम कर सेवन करें। जुगाली करने वालों की भी मौज है। इसी बहाने दो-तीन दिन के...
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  June 6, 2017, 12:59 pm
-वीर विनोद छाबड़ाकई साल पहले की बात है। हम एक बीमार सहकर्मी का हाल जानने अस्पताल जा रहे थे। अपने अधिकारी से दो घंटे का अवकाश मांगा। उन्होंने सहर्ष आज्ञा दे दी। हम निकलने को ही थे कि एक महिला सहकर्मी ने रोका। हम भी चलें। हम थोड़ा अचकचाये, थोड़ा झिझके। कुछ पल सोच में गुज़र गए। ...
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  June 5, 2017, 8:31 am
- वीर विनोद छाबड़ाअस्सी के मध्य का ज़माना था। मस्ती भरा दौर था। कम आमदनी में भी जनता खुश थी, ज़रूरतें जो कम थीं। हमारे बड़े बाबू इलाहाबाद के रहने वाले थे। उन्हें अपने घर और ज़मीन से बहुत लगाव था। यों बाबू के बैग में बहानों की कोई कमी तो रहती नहीं है। फिर हमारे बड़े बाबू के डीएनए ...
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  June 4, 2017, 12:07 pm
- वीर विनोद छाबड़ाआज फ़ोन आया है, कज़िन सिस्टर का। बेटी की शादी है, अक्टूबर की फलां तारीख़ को। आने-जाने का रिज़र्वेशन आज ही करवा लो भैया। अभी तो क़रीब चार महीना बाकी है। लेकिन अब ज़माना बदल गया है। ट्रेन में बर्थ के लिए मारामारी है। कई कई दिन पहले रिजर्वेशन करना पड़ता है। हमें वो ज़...
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  June 3, 2017, 1:49 pm
-वीर विनोद छाबड़ाएक बादशाह अपनी ईमानदारी और रहम दिल होने के लिए बहुत मशहूर हुआ करते थे।उनके दरबार से कभी कोई खाली हाथ नहीं लौटा। उसने रोज़ाना सैकड़ों दीन-दुखियों की सेवा की और हुनरमंदों को नौकरी और ईनाम से नवाज़ा। अहंकार तो उसे छू तक नहीं पाया। यही नहीं उसने कभी दूसरों से स...
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  June 1, 2017, 3:26 pm
-वीर विनोद छाबड़ामंत्री मंडल में वो सबसे अधिक शिक्षित, बुद्धिमान और योग्य मंत्री था। इसी कारण से वो राजा का प्रिय और विश्वासपात्र भी था। राज्य हित में जो भी निर्णय लिए जाते थे, उसमे मंत्री की सलाह अवश्य ली जाती थी। इससे राजा के साथ-साथ मंत्री की भी जय-जयकार होती थी। यह बात...
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  May 31, 2017, 11:43 am
-वीर विनोद छाबड़ाआज जेठ महीने का तीसरा बड़ा मंगल है। अपने शहर लखनऊ में जेठ का हर मंगल बड़े मंगल के रूप में मनाया जाता है। शहर में करीब चार हज़ार भंडारे सजते हैं। प्रसाद के रूप में आलू-पूड़ी आदि लोग ग्रहण करते हैं। इस दिन शहर में कोई भूखा नहीं रहता। बाहर से आये मेहमान भी इसी प्र...
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  May 30, 2017, 11:27 am
-वीर विनोद छाबड़ा आजकल ७५वां जन्मदिन मनाने की धूम है। हम भी कोई साल भर पहले एक ७५वीं सालगिरह में शरीक हुए थे। वो पेशे से कपडे के थोक व्यापारी हैं। अथाह धन दौलत और साधनों के मालिक हैं। भरा-पूरा संयुक्त परिवार है। आये दिन किसी का जन्म दिन, किसी का मुंडन और किसी की छठी। ज़बरद...
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  May 29, 2017, 6:22 am
- वीर विनोद छाबड़ामैंने पूछा - भाई साहेब, सुना है आपका मकान फिर खाली है। वो बोले - हां। कोई अच्छा किरायेदार हो तो बताइयेगा। मैंने कहा - है तो। उनकी आंखें चमकी - क्या है वो? मेरा मतलब, उसकी जाति और धर्म क्या है? मुझे मालूम था कि वो कैसा किरायेदार चाहते हैं। मुसलमान नहीं हो। हिन्...
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  May 28, 2017, 12:09 pm
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