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हथौड़ा

फेसबुकपर रहने के अपने फायदे-नुकसान हैं। पर, फेसबुक पर न रहने के भी अपने फायदे-नुकसान हैं। तकरीबन दो साल फेसबुक से दूरी बनाकर यह मैंने करीब से महसूस किया है। बताता हूं...।दो साल में मैंने फेसबुक पर अपने दो खाते बनाए और बाद में उन्हें थोड़े-थोड़े अंतराल में हमेशा के लिए हटा द...
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  December 31, 2017, 5:16 pm
क्यासमाज खुद से हार चुका है? क्या समाज के सुधरने की उम्मीद खत्म हो चुकी है? अक्सर ऐसे प्रश्न हमारे सामने मुंह खोले खड़े रहते हैं। इन प्रश्नों के उत्तर या तो हमारे पास होते नहीं या फिर हम खुद को इनसे बचाने की कोशिश में लगे रहते हैं। लेकिन कब तक? कभी न कभी तो हमें इनसे रू-ब-रू ह...
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  December 23, 2017, 11:27 am
इसेसमय के साथ समझौता कह लीजिए या कुछ और मगर अब हमें गलत दिशा में चलना भाने-सा लगा है। हम अपनी चाल के शहंशाह बने रहना चाहते हैं। विडंबना यह है कि हमें हमारी गलत चाल के लिए अगर कोई टोकता भी है तो उसे हम तुरंत अपना विरोधी घोषित कर डालते हैं। एक पल को ठण्डे दिमाग से सोचने की जह...
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  December 22, 2017, 10:10 am
हररोज हम कितनी तरह के संकल्प लेते हैं, इस बारे में शायद ठीक से हमें भी नहीं पता होगा! किसी मुद्दे पर जब सब संकल्प ले रहे होते हैं तो फॉर्मिल्टी निभाने के लिए हम भी लाइन में लग जाते हैं। अखबारों में लगभग हर रोज छपने वाली तस्वीरों में भीड़ नजर आती है जो संकल्प की मुद्रा में हा...
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  December 22, 2017, 10:05 am
सोशल मीडियाके खेल निराले हैं। यहां कब कौन-सा मुद्दा गेंद की तरह हवा में उछलकर वायरल हो जाए कोई नहीं जानता। वायरल होते ही उस मुद्दे को सोशल मीडिया पर तब तक भुनाया जाता है जब तक उसकी आत्मा सड़-गल नहीं जाती। कमाल ये है कि सोशल मीडिया पर कोई मसला लंबा नहीं चलता। जिस तेज उफान क...
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  November 9, 2017, 9:44 am
गौरी लंकेश...!‘असहमति’ के एक और स्वर को ‘निर्ममता’ से कुचल दिया गया। सत्ता के खिलाफ जाने और लिखने का ‘हश्र’ गौरी लंकेश को अपनी जान देकर चुकाना पड़ा। यों तो हम एक बहुत बड़े लोकतांत्रिक मुल्क हैं- ऐसा कहते हम कभी थकते नहीं- मगर पत्रकार या लेखक की आवाजें जब सत्ताओं के कानों ...
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  September 20, 2017, 9:41 am
इसेविडंबना नहीं दोगलापन ही कहा जाएगा कि हम हिंदी की चिंता के लिए 'हिंदी दिवस'को चुनते हैं। पूरे साल इस बात से हमें कोई मतलब नहीं रहता कि हिंदी में क्या खास हो रहा है? हिंदी का विस्तार कितना और कहां तक हुआ? किस दिशा में हिंदी जा रही है? कहां तक हिंदी को लेकर जाना है? आदि।स्पष...
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  September 14, 2017, 10:06 am
समाजको हम किस ओर लिए जा रहे हैं यह हमें भी नहीं मालूम। बस चले जा रहे हैं। एक होड़ या कहूं एक जिद-सी है हमारे भीतर एक-दूसरे को ‘मात’ दे आगे निकल जाने की। आगे निकल जाने की यह घुड़-दौड़ हमसे कितना कुछ छीनती जा रही है, शायद हमें इसका अहसास भी नहीं। अगर अहसास हो तो भी हम उसे ‘महसू...
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  September 12, 2017, 9:42 am
चोटियांकाटी जा रही हैं। कौन काट रहा है? क्यों काट रहा है? किस उद्देश्य के लिए काट रहा है? इन प्रश्नों के जवाब किसी के पास नहीं। फिर भी, खबरें निरंतर चोटियां काटे जाने की आ रही हैं।समाज में जितने मुंह, उतनी बातें हैं। चोटी काटने को कोई कोरी अफवाह करार दे रहा है। तो कोई टोने-...
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  August 10, 2017, 10:15 am
उस रोजएक और आतंकी हमला हुआफिर कुछ जानेंअपनी जानों से हाथ धो बैठींखबर पाते ही सोशल मीडियाके भद्र (वीर) लोग अपने-अपने फेसबुक-टि्वटर के पेजों-पोस्टों परतरह-तरह की लानतें भेजने में जुट गएकिसी ने सरकार को गलियायाकिसी का खून आतंकवादियों की नापाक हरकत पर खौलानेता लोग एक-एक क...
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  July 24, 2017, 7:29 am
आभासी दुनियामें व्यंग्य पर ‘दंगल’ जारी है। फेसबुक अखाड़ा है। व्यंग्य का हर तगड़ा और दियासलाई पहलवान अखाड़े में उतर आया है एक-दूसरे से ‘मुचैटा’ लेने को। दोनों तरफ के पहलवान अपने-अपने दांव चलते रहते हैं। मंशा केवल एक ही है, सामने वाले को चारों-खाने चित्त करना। तरह-तरह क...
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  May 22, 2017, 7:49 am
इसपर यकीन करने के लिए कि ‘भारत कम खुशहाल देश है’ दिमाग पर अतिरिक्त लोड डालने की जरूरत नहीं। हालिया सर्वे ने इस बात की साफ पुष्टि कर दी है। जिक्र तो हालांकि हर किताब और ग्रंथ में यही मिलता है कि भारत या भारत के लोगों से खुशहाल इस दुनिया में कोई मुल्क नहीं है। किंतु 21वीं सद...
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  March 30, 2017, 10:05 am
विरोधअब ‘जमीन’ पर कम, ‘सोशल मीडिया’ पर अधिक नजर आता है। एक तरह से- विरोध के नाम पर- यहां आपस में ‘ज़बानी दंगल’ छिड़ा ही रहता है। विरोध के बीच विचारधाराएं कोई जगह नहीं रखतीं। या यों कहिए कि सोशल मीडिया किसी प्रकार की विचारधारा को नहीं मानता। यहां विरोध के तरीके इतने अजीब...
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  January 24, 2017, 9:52 am
जबलोगों के पास करने को कुछ खास नहीं होता, तब वे विरोध-प्रदर्शन करते हैं। खूब, खूब, खूब विरोध करते हैं। सड़क से लेकर संसद तक विरोध की नदियां बहा देते हैं। विरोध की उस नदी में न जाने कितने चले आते हैं, अपने-अपने हाथ-पैर-मुंह धोने। हालांकि कईयों को यह तक पता नहीं होता कि विरोध ...
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  December 15, 2016, 10:46 am
विश्वके बड़े क्रांतिकारी कम्यूनिस्ट नेता फिदेल कास्त्रो नहीं रहे। 90 साल की लंबी पार खेलकर अंततः उन्होंने दुनिया को ‘अलविदा’ बोल दिया। कास्त्रो के न रहने पर क्यूबा और उसके नागरिकों के गम का अंदाजा लगा पाना मुश्किल है। क्यूबा के वो पूर्व राष्ट्रपति ही नहीं बल्कि एक प...
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  November 27, 2016, 9:41 am
फिलहाल, पानी के मसले ने हमें पानी-पानी कर रखा है। आकाश से लेकर पताल तक पानी के लिए 'हाहाकार'मचा है। आलम यह है कि एक दिन पानी मिलने के बाद अगले दिन मिलेगा या नहीं; कुछ नहीं पता। लंबी-लंबी लाइनों में लोग पानी के लिए यों इंतजार करते दिखते हैं मानो कोई राशन की दुकान हो। अभी तक पा...
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  May 12, 2016, 7:39 am
कभी-कभीमुझे अपना ही शहर 'अनजाना'-सा लगता है। मेरा शहर अब पहले जैसा 'छोटा'नहीं रहा। बढ़ गया है। निरंतर बढ़ता ही चला जा रहा है। एक ही शहर के लोग पुराने शहर को छोड़कर नए शहर में बसने को उतावले हुए बैठे हैं। अपने ही लोगों से इतनी दूर जाकर बस जाना चाहते हैं, जहां पहुंच पाना हर किस...
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  April 23, 2016, 7:54 am
प्यारे कन्हैया,फिलहाल, अंतरिम जमानत पर जेल की सलाखों से बाहर आने की तुम्हें बधाई। हालांकि बधाई देने के लायक तो नहीं तुम फिर भी इसलिए दे रहा हूं, शायद तुम्हारे दिमाग पर पड़ा 'अतिवाद'का जाला हट जाए।इसमें कोई शक नहीं कि तुम अब भगत सिंह से कहीं बड़े क्रांतिकारी बनकर उभरे हो...
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  March 4, 2016, 6:27 am
क्या ऐसानहीं लगता आपको कि बदलते समय के साथ हम और भी असंवेदनशील और आराजक हो गए हैं? हमारे भीतर से- गैरों की जाने दीजिए- अपनी ही आलोचना को सुनने का 'साहस'नहीं बचा अब। हर ऐरी-गैरी बातों-मुद्दों पर आपस में यों भिड़ जाते हैं मानो लड़ना ही हमारी नियति हो!दूसरे को अपने अनुरूप बनान...
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  March 3, 2016, 9:45 am
यों भीहमारे बीच से हास्य और हंसी-मजाक निरंतर कम होता जा रहा है, ऐसे में एक कलाकार को एक बाबा की कथित मिमिक्री करने के आरोप में धर लेना, कोई हैरत का विषय नहीं। मिमिक्री या मजाक को ही अगर व्यक्तिगत मान-हानि मान लिया जाएगा फिर तो लोगों का आपस में हंसना-मुस्कुराना तक मुसीबत क...
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  January 24, 2016, 6:56 am
काफी देरसे मैं उन्हें देख रहा था। वे अत्यंत चिंतित मुद्रा में थे। कभी दाएं टहल लगाते, तो कभी बाएं। कभी दोनों हाथ सिर पर रखकर मन ही मन बुदबुदाते- 'हाय! अब क्या होगा। ये बहुत गलत हुआ।'उनके इस अजीबो-गरीब करतब-व्यवहार को देखकर मुझसे रहा न गया तो आखिरकार मैंने पूछ ही लिया- 'भाई स...
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  January 10, 2016, 8:22 pm
आजादी के मायने अब थोड़ा बदल गए हैं। आजादी देश पर मर-मिटने की नहीं, आजादी किस्म-किस्म के प्रॉडेक्ट पर 'डिक्साउंट'पाने की है। आजादी बाजार के साथ, बाजार के लिए खड़े होने की है। कंपनियां आजादी वाले दिन दिल में देश के प्रति कुछ कर गुजरने का उत्साह नहीं जगातीं बल्कि उनके प्रॉड...
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  August 15, 2015, 7:04 am
प्यारेलाल। सचमूच वो प्यारेलाल ही हैं। लंबा-चौड़ा कद। हमेशा हंसता-मुस्कुराता चेहरा। तीखी और कड़क आवाज 'मलाई...कुल्फी'। मिनट भर में ढेरों बच्चे उनके आसपास। अंकल दो वाली मुझे... पांच वाली मुझे। दस वाली मुझे। बच्चों के बीच हल्की-फुल्की 'धींगा-मुश्ती'। फिर सब 'मस्त'। प्यारेला...
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  June 30, 2015, 8:04 am
समयबदलता है तो सबकुछ बदलता है। विचार, व्यवहार, सरोकार सब। खासकर, विचारों की अभिव्यक्ति के प्लेटफोर्म पर हम पहले से ज्यादा 'खुले'हैं। स्वतंत्र विचारों के दम पर चीजों-बातों को और 'जीवंत'बनाया है। साहित्य, कला, फिल्म, फैशन, रचना और रचनाकार के भीतर भी बदलाव आए हैं।कल तक जो बा...
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  June 15, 2015, 9:54 am
हालांकिट्वीट कर तसलीमा नसरीन ने यह साफ कर दिया है कि 'हालात सामान्य होते ही वे भारत लौट आएंगी।'यह सुकून भरी खबर है। मगर सबसे अधिक 'दुर्भाग्यपूर्ण'है उनका विषम परिस्थितियों में भारत छोड़कर अमेरिका जाना। यह कितना अजीब है कि अमेरिका ने तसलीमा की सुरक्षा की जिम्मेदारी ली ...
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  June 8, 2015, 9:43 am
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  हमारीवाणी पर ब्लॉग-पोस्ट के प्रकाशन के लिए 'क्लिक कोड' ब्लॉग पर लगाना आवश्यक है। इसके लिए पहले लोगिन करें, लोगिन के उपरांत खुलने वाले प...
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