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प्रार्थना : View Blog Posts
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प्रार्थना

श्रीकृष्णरसविक्षिप्त-मानसा रतिवर्जिताः।अनिर्वृतालोकवेदे ते मुख्याः श्रवणोत्सुकाः॥(१)भावार्थ:- भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में पूर्ण मन से लीन रहने वाले, अन्य आकर्षणों से विरक्त रहने वाले, लौकिक और पारलौकिक चर्चाओं से दूर रहने वाले, श्रवण की इच्छा रखने वाले श्रोताओं...
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रवि कान्त शर्मा
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  December 20, 2014, 11:31 am
यच्च दुःखं यशोदाया नन्दादीनां च गोकुले।गोपिकानां तु यद्‌-दुःखं स्यान्मम क्वचित्‌॥(१)भावार्थ:- गोकुल में श्रीकृष्ण से वियोग होने पर यशोदा जी, नन्द जी और गोप-गोपियों को जैसा दुःख हुआ था, वैसा ही दुःख मुझको भी प्राप्त हो जाये।(१)गोकुले गोपिकानां च सर्वेषां व्रजवासिनाम्...
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रवि कान्त शर्मा
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  August 5, 2014, 10:33 am
गङ्गा तरङ्ग रमणीय जटा कलापं, गौरी निरन्तर विभूषित वाम भागं।नारायण प्रियमनङ्ग मदापहारं, वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधम्॥(१)वाचामगॊचरमनॆक गुण स्वरूपं, वागीश विष्णु सुर सॆवित पाद पद्मं।वामॆण विग्रह वरॆन कलत्रवन्तं, वाराणसी पुरपतिं भज विश्वनाधम्॥(२)भूतादिपं भुजग भूष...
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रवि कान्त शर्मा
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  May 26, 2014, 3:43 pm
चिन्ता कापि न कार्या निवेदितात्मभिः कदापीति।भगवानपि पुष्टिस्थो न करिष्यति लौकिकीं च गतिम्॥(१)भावार्थ:- किसी भी प्रकार की चिंता न करते हुए पूर्ण श्रद्धा के साथ भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में स्वयं को समर्पित कर देना चाहिये और विश्वास रखना चाहिये कि भगवान अपनी भक्...
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रवि कान्त शर्मा
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  May 24, 2014, 11:42 am
श्रीभगवानुवाच अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत् परम्। पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥(१)भावार्थ:- श्री भगवान कहते हैं - सृष्टि के आरम्भ होने से पहले केवल मैं ही था, सत्य भी मैं था और असत्य भी मैं था, मेरे अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं था। सृष्टि का अन्त होन...
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रवि कान्त शर्मा
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  May 21, 2014, 3:00 pm
अन्तःकरण! मद्वाक्यं सावधानतया श्रुणु।कृष्णात्परं नास्ति देवं वस्तुतो दोषवर्जितं॥ (१)भावार्थ:- हे मेरे अन्तःकरण! मेरे शब्दों को सावधान होकर सुन, इस संसार में वास्तव में श्रीकृष्ण से बढ़कर अन्य कोई दोष-रहित देवता नहीं है। (१)चाण्डाली चेद्राजपत्नी जाता राज्ञा च मानिता...
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रवि कान्त शर्मा
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  May 17, 2014, 4:51 pm
ब्रह्ममुरारि सुरार्चित लिङ्गं, निर्मलभासित शॊभित लिङ्गम् ।जन्मज दुःख विनाशक लिङ्गं, तत्-प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् ॥ 1 ॥दॆवमुनि प्रवरार्चित लिङ्गं, कामदहन करुणाकर लिङ्गम् ।रावण दर्प विनाशन लिङ्गं, तत्-प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् ॥ 2 ॥सर्व सुगन्ध सुलॆपित लिङ्गं, बुद्धि ...
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रवि कान्त शर्मा
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  May 12, 2014, 5:12 pm
मुनीन्दवृन्दवन्दिते त्रिलोकशोकहारिणी, प्रसन्नवक्त्रपंकजे निकंजभूविलासिनी।व्रजेन्दभानुनन्दिनी व्रजेन्द सूनुसंगते, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥ (१)भावार्थ : समस्त मुनिगण आपके चरणों की वंदना करते हैं, आप तीनों लोकों का शोक दूर करने वाली हैं, आप प्रसन्नच...
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रवि कान्त शर्मा
Tag :श्री राधा स्तुति
  October 13, 2012, 9:50 pm
कस्तूरी तिलकं ललाट पटले वक्ष: स्थले कौस्तुभं।नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले वेणु: करे कंकणं॥भावार्थ:- हे श्रीकृष्ण! आपके मस्तक पर कस्तूरी तिलक सुशोभित है। आपके वक्ष पर देदीप्यमान कौस्तुभ मणि विराजित है, आपने नाक में सुंदर मोती पहना हुआ है, आपके हाथ में बांसुरी है और कलाई ...
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रवि कान्त शर्मा
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  December 9, 2011, 3:21 pm
सुन्दर गोपालं उरवनमालं नयन विशालं दुःख हरं,वृन्दावन चन्द्रं आनंदकंदं परमानन्दं धरणिधरं।वल्लभ घनश्यामं पूरण कामं अत्यभिरामं प्रीतिकरं,भज नंद कुमारं सर्वसुख सारं तत्वविचारं ब्रह्मपरम॥ (१)सुन्दरवारिज वदनं निर्जितमदनं आनन्दसदनं मुकुटधरं,गुंजाकृतिहारं विपिनवि...
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रवि कान्त शर्मा
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  April 21, 2011, 8:25 pm
शरीरं सुरुपं तथा वा कलत्रं यशश्चारू चित्रं धनं मेरुतुल्यम्।मनश्चेन्न लग्नं गुरोरंघ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥ (1)भावार्थ : जिस व्यक्ति का शरीर सुन्दर हो, पत्नी भी खूबसूरत हो, कीर्ति का चारों दिशाओं में विस्तार हो, मेरु पर्वत के समान अनन्त धन हो, लेकिन गु...
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रवि कान्त शर्मा
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  March 9, 2011, 4:19 pm
(१)नमामि यमुनामहं सकल सिद्धि हेतुं मुदा, मुरारि पद पंकज स्फ़ुरदमन्द रेणुत्कटाम।तटस्थ नव कानन प्रकटमोद पुष्पाम्बुना, सुरासुरसुपूजित स्मरपितुः श्रियं बिभ्रतीम॥(२)कलिन्द गिरि मस्तके पतदमन्दपूरोज्ज्वला, विलासगमनोल्लसत्प्रकटगण्ड्शैलोन्न्ता।सघोषगति दन्तुरा समध...
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रवि कान्त शर्मा
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  February 13, 2011, 2:20 pm
करारविन्देन पदार्विन्दं, मुखार्विन्दे विनिवेशयन्तम्।वटस्य पत्रस्य पुटेशयानं, बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि॥ (१)श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेव।जिव्हे पिबस्वा मृतमेव देव, गोविन्द दामोदर माधवेति॥ (२)विक्रेतुकामाखिल गोपकन्या, मुरारी पादार्पित ...
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रवि कान्त शर्मा
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  January 24, 2011, 9:25 am
श्री कृष्ण चन्द्र कृपालु भजमन, नन्द नन्दन सुन्दरम्।अशरण शरण भव भय हरण, आनन्द घन राधा वरम्॥सिर मोर मुकुट विचित्र मणिमय, मकर कुण्डल धारिणम्।मुख चन्द्र द्विति नख चन्द्र द्विति, पुष्पित निकुंजविहारिणम्॥मुस्कान मुनि मन मोहिनी, चितवन चपल वपु नटवरम्।वन माल ललित कपोल मृद...
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रवि कान्त शर्मा
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  January 14, 2011, 8:50 pm
कृष्णप्रेममयी राधा राधाप्रेममयो हरिः।जीवनेन धने नित्यं राधाकृष्णगतिर्मम ॥ (१) भावार्थ :श्रीराधारानी, भगवान श्रीकृष्ण में रमण करती हैं और भगवान श्रीकृष्ण, श्रीराधारानी में रमण करते हैं, इसलिये मेरे जीवन का प्रत्येक-क्षण श्रीराधा-कृष्ण के आश्रय में व्यतीत हो। (१)कृष...
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रवि कान्त शर्मा
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  December 24, 2010, 12:34 pm
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले,गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्।डमड्डमड्ड्मड्ड्मन्निनादवड्ड्मर्वयं,चकार चण्डताण्डवं तनोतु न: शिव:शिवम्॥ (1)जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी, विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्ध्दनि।धगध्दगध्दगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके, ...
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रवि कान्त शर्मा
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  December 4, 2010, 8:34 am
भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनं, स्वभक्तचित्तरंजनं सदैव नन्दनन्दनम्। सुपिच्छगुच्छमस्तकं सुनादवेणुहस्तकं, अनंगरंगसागरं नमामि कृष्णनागरम्॥ (१)मनोजगर्वमोचनं विशाललोललोचनं, विधूतगोपशोचनं नमामि पद्मलोचनम्। करारविन्दभूधरं स्मितावलोकसुन्दरं, महेन्द्रमानदार...
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रवि कान्त शर्मा
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  August 13, 2010, 2:39 pm
श्रावण स्यामले पक्षे एकादश्यां महानिशि।साक्षात् भगवता प्रोक्तं तदक्षरश उच्यते॥ (१)भावार्थ : श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि की महारात्रि के समय स्वयं भगवान श्रीकृष्ण द्वारा मुझसे जो बचन कहे गए हैं उन बचनों को मैं उसी प्रकार से कहता हूँ। (१)ब्रह्म सम्बंध करणा...
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रवि कान्त शर्मा
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  August 7, 2010, 11:22 am
यथा भक्तिः प्रवृद्धा स्यात्तथोपायो निरूप्यते।बीजभावे दृढ़े तु स्यात्यागाच्छ्रवणकीर्तनात्‌॥ (१)भावार्थ : जिस विधि से भक्ति वृद्धि को प्राप्त होती है, उस विधि का निरूपण किया जाता है, सांसारिक आसक्ति के त्याग से, कृष्ण कथा सुनने से और कृष्ण नाम के कीर्तन से ही भक्ति रू...
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रवि कान्त शर्मा
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  August 1, 2010, 7:54 am
सर्वदा सर्वभावेन भजनीयो व्रजाधिपः।स्वस्यायमेव धर्मो हि नान्यः क्वापि कदाचन॥ (१) भावार्थ : प्रत्येक क्षण सम्पूर्ण मन-भाव से ब्रज के अधिपति भगवान श्रीकृष्ण का ही स्मरण करना चाहिए, मनुष्य के लिए इसके अतिरिक्त और कुछ भी कर्म नहीं है, केवल यही एक मात्र धर्म है। (१) एवं सदा स...
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रवि कान्त शर्मा
Tag :
  July 25, 2010, 11:55 am
सर्वदा सर्वभावेन भजनीयो व्रजाधिपः।स्वस्यायमेव धर्मो हि नान्यः क्वापि कदाचन॥ (१) भावार्थ : प्रत्येक क्षण सम्पूर्ण मन-भाव से ब्रज के अधिपति भगवान श्रीकृष्ण का ही स्मरण करना चाहिए, मनुष्य के लिए इसके अतिरिक्त और कुछ भी कर्म नहीं है, केवल यही एक मात्र धर्म है। (१) एवं सदा स...
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रवि कान्त शर्मा
Tag :
  July 25, 2010, 11:55 am
सर्वमार्गेषु नष्टेषु कलौ च खलधर्मिणि।पाषण्डप्रचुरे लोके कृष्ण एव गतिर्मम॥ (१)भावार्थ : हे प्रभु! कलियुग में धर्म के सभी रास्ते बन्द हो गए हैं, और दुष्ट लोग धर्माधिकारी बन गये हैं, संसार में पाखंड व्याप्त है, इसलिए केवल आप भगवान श्रीकृष्ण ही मेरे आश्रय हों। (१) म्लेच्छा...
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रवि कान्त शर्मा
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  July 23, 2010, 7:24 am
तत्ज्ञानं प्रशमकरं यदिन्द्रियाणां, तत्ज्ञेयं यदुपनिषत्सुनिश्चितार्थम्।ते धन्या भुवि परमार्थनिश्चितेहाः, शेषास्तु भ्रमनिलये परिभ्रमंतः॥ (१)भावार्थ :ज्ञान वही होता है, जिससे इन्द्रियों की चंचलता शांत होती है, जानने योग्य वही होता है जिसका अर्थ उपनिषदों द्वारा स...
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रवि कान्त शर्मा
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  July 17, 2010, 7:30 am
नमामि भक्त वत्सलं, कृपालु शील कोमलं।भजामि ते पदांबुजं, अकामिनां स्वधामदं॥ (१)भावार्थ : हे प्रभु! आप भक्तों को शरण देने वाले है, आप सभी पर कृपा करने वाले है, आप अत्यंत कोमल स्वभाव वाले है, मैं आपको नमन करता हूँ। हे प्रभु! आप कामना-रहित जीवों को अपना परम-धाम प्रदान करने वाले ...
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रवि कान्त शर्मा
Tag :
  July 7, 2010, 7:54 pm
वेदो नित्यमधीयताम्, तदुदितं कर्म स्वनुष्ठीयतां, तेनेशस्य विधीयतामपचितिकाम्ये मतिस्त्यज्यताम्।पापौघः परिधूयतां भवसुखे दोषोsनुसंधीयतां, आत्मेच्छा व्यवसीयतां निज गृहात्तूर्णं विनिर्गम्यताम्॥ (१)भावार्थ : वेदों का नियमित अध्ययन करें, उनमें कहे गए कर्मों का पालन ...
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रवि कान्त शर्मा
Tag :
  July 3, 2010, 10:10 pm
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