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Blog: रचना डायरी

Blogger: Padmnabh
डिब्रूगढ़ मे मदारी का खेल देख कर एक तरफ होता था नेवलाएक तरफ सांप और मदारी की हांककरेगा नेवला सांप के टुकड़े सातखाएगा एक छै ले जाएगा साथकभी नहीं छूटा रस्सी से नेवलाऔर पिटारी से सांपललच कर आते गए लोग, ठगा कर जाते गए लोगखेल का दारोमदार था इस एक बात पर उब कर बदलते रहें तमाशाई... Read more
clicks 159 View   Vote 0 Like   4:03pm 28 Sep 2013 #
Blogger: Padmnabh
जिस घड़ी चाह करकुछ कर नहीं सकता हूँ मैं,बन जाता हूँ एक जोड़ी झपकती हुई आँखें,निर्लिप्त, निर्विकारमुझे देख चीखता है हड़ताली मजदूर, और गूँजता है आसमान में नारा”प्रबंधन के दलालों कोजूता मारो सालों को”-तब बस एक जोड़ी आँखें ही तो होता हूँ मैं,भावहीन, झपकती हुई आँखेंजिस समय ... Read more
clicks 166 View   Vote 0 Like   11:19am 24 Sep 2013 #
Blogger: Padmnabh
इस डेढ़ पंखों वालीतितली की मृत्यु का प्रातःकाल है यहवायु उन्मत्त, धूप गुनगुनीवह जो है मेरा सुख पीठ के बल पड़ी इस तितली का दुख है वहयोजन से कम नहींअधकटे पंख की दूरी उसके लिए,वह जो है मेरे लिए बस एक हाथनहीं होगी शवयात्रा इसकी/शवयात्राएं तो होती हैंउन शवों कीजिनसे निकलती ... Read more
clicks 160 View   Vote 0 Like   6:25am 22 Sep 2013 #
Blogger: Padmnabh
एक नई कविता.... जहाँ दूर-दूर तक नज़र आते हैं लोगों के हुजूम,माचिस की शीत खाई तीलियों की तरह, ...खुशकिस्मत हो कि अब भी बाकी है तुम्हारे पास कुछ आंचबचा कर रखो उस बहुमूल्य ताप कोजो अब भी बचा हुआ हैतुम्हारे अंदरवो चाहते हैं कि चीखो तुम, चिल्लाओ और हो जाओ पस्तपहुंच से बाहर खड़ी बि... Read more
clicks 145 View   Vote 0 Like   2:51pm 5 Sep 2013 #
Blogger: Padmnabh
http://lekhakmanch.com/%e0%a4%aa%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ad-%e0%a4%97%e0%a5%8c%e0%a4%a4%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%8f%e0%a4%82.html... Read more
clicks 179 View   Vote 0 Like   12:47pm 1 Sep 2013 #
Blogger: Padmnabh
उत्तर पूर्व मे रहते हुए रचना कर्म करने वाले 33 कवियों की कविताओं के संकलन "अवगुंठन की ओट से सात बहने" (प्रकाशक- बोधि प्रकाशन, जयपुर )मे संग्रहित कुछ कविताएँ ...  1. जगत रासमुँह अंधेरे उठती है वहऔरउसके पैरों की आहट से हड़बड़ाकर कर जागा कलगीदार मुर्गाबाँग दे कर बन जाता ह... Read more
clicks 168 View   Vote 0 Like   3:15pm 30 Jul 2013 #
Blogger: Padmnabh
http://kathakram.in/jan-mar13/Poetry.pdf1. मौसमसर्दियों की आहट सुनते हीबुनना शुरू कर देती हैवह मेरा स्वेटर हर साल,लपेट कर उंगलियों मेंसूरज की गुनगुनी किरनें,एक उल्टा-दो सीधाया ऐसा ही कुछबुदबुदाते हुए,हजार कामों मेंफंसी-उलझीबुन पाती है रोज इसेबस थोड़ा ही,पर अभीआहिस्ता-आहिस्ताउसकी उंगलियाँब... Read more
clicks 162 View   Vote 0 Like   3:42pm 10 Mar 2013 #
Blogger: Padmnabh
मार्गदर्शक  पत्र  प्रतिक्रियाएँ .........कविता से इतने वर्षों दूर रहने के बाद भी ये नहीं खोईं.......यह एक कवि के लिए सबसे बड़ी खुशी एक प्रतिक्रिया होती है ..इसलिए महत्वपूर्ण ....और तब ये पोस्ट कार्ड पर चल कर आती थीं मीलों-मील ...आज की तरह क्लिक पर सवार नहीं  ...-------------------------------------------------------... Read more
clicks 162 View   Vote 0 Like   4:30pm 20 Oct 2012 #
Blogger: Padmnabh
कांधे पर रखकरकविताओं का खाली थैलानिकल पड़ा हूँ मैंनजरें चुराताउस पहाड़ से,जो ताकता है मुझेअपने ठीहे से दिनरातऔर जिसे मैंअपनी  बालकनी से,जो भरता हैमेरा खालीपनउतरकर मेरे अन्दर,तब भी, जब किसो चुकी होती है सारी दुनियामेरे रतजगे से बेपरवाह,और जब रात के चौथे पहरखोजता हू... Read more
clicks 148 View   Vote 0 Like   1:01pm 11 Oct 2012 #
Blogger: Padmnabh
दृष्टि चाहिए उनके लिएऔर वे भी चाहती हैं दृष्टिबुन-छींट करउगाई नही जा सकती हैं वेफसलों की तरह,उन्हें तो केवल भर कलेजासूँघ सकते हैं हमखदकते अदहन में डलेभात की गमक साया पढ़ सकते हैं ताजी गही धान केललछर-मटिहर रंग मेंवे जो हैं हमारे इर्द-गिर्दहमेशा से मौजूदअभी उस दिन देखा ... Read more
clicks 159 View   Vote 0 Like   9:54am 5 Oct 2012 #
Blogger: Padmnabh
2004 मे प्रकाशित संग्रह "कुछ विषम सा"की गज़लें ...(1)शांति के आलाप मे रणनाद कैसासंधि ध्वज के शीर्ष पर उन्माद कैसाभस्म हो यदि होलिका विस्मय नहीं हैपर स्वतः जल जाए वह प्रहलाद कैसालो पिघल कर बह चली जलधार खारीअश्रुओं को हर्ष क्या अवसाद कैसाखो चुकी ध्वनि लौट कर आनी नहीं हैवीतराग... Read more
clicks 153 View   Vote 0 Like   4:53pm 3 Oct 2012 #
Blogger: Padmnabh
जी भर करसींच भी नहीं पाया थाआंसुओं से जिसेबीजने के बाद,ना जाने कैसेजी गया है एक दुःखअपने ही हाथोंसिरजा हुआआज अचानकआ खड़ा हुआ है सामनेशरारत भरीमुस्कान के साथ,दरवाजे कीसांकल पकड़े,एक पैर थपकतेज़मीन पर,अनजाने नम्बर से आईकिसी बरसों पुरानेदोस्त कीआवाज़ की तरहपह... Read more
clicks 147 View   Vote 0 Like   1:35pm 29 Sep 2012 #
Blogger: Padmnabh
दुनिया से अलगसात बहनों केकुटुंब की है जोजीवन रेखा,इन दिनोंलोहित है नाराज़।पाँच दिनों से अँधेरे  में हैं हम,और कोने में पड़ा  इन्वर्टरबता रहा है कंधे उचका करहमारे लिए विज्ञान की सीमा।नाराज लोहित ने भी तोदिखाई है हमेप्रकृति की सीमा हीबंद हैइन दिनों डिब्रूगढ -आलंग ... Read more
clicks 163 View   Vote 0 Like   1:51pm 27 Sep 2012 #
Blogger: Padmnabh
कुछ पुरानी पत्रिकाएँ जो अरुणाचल मे मिल पायीं , उनमें प्रकाशित कविताएँ - पोखरी खदान मे कोयला बीनते मारे गए बच्चे के लिए. (प्रगतिशील वसुधा-66 जुलाई-सितम्बर 2006)लड़ रहा था  वह योद्धा उस पोखरी खदान मे भूख, समय और सर पर छतरी बन कर तने ईश्वर से, कई लड़ाइयाँ एक साथ उठा ... Read more
clicks 154 View   Vote 0 Like   1:37pm 27 Sep 2012 #
Blogger: Padmnabh
                               बैकुण्ठपुर में समकालीन साहित्य से जुड़े लोगों का अड्डा था 'ककउआ होटल'। जैसा कि नाम से ही अंदाज़ा लगा सकते हैं, यह कोई बड़ा होटल नहीं बल्कि केवल एक चाय-पकौड़ों की दुकान भर थी। पुराने बस स्टैंड में एक पुरानी खपरैल वाली दुकान, जिसक... Read more
clicks 159 View   Vote 0 Like   1:08pm 25 Sep 2012 #
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