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Blog: ख़ुदा के वास्‍ते

Blogger: Alaknanda singh
आइनाखुद को इतना ऊंचा भी न उठान पाल खुदाई का फ़ितूरये इम्‍तिहान तेरा है, कि दे अपने  होने का भी सबूतकैसा खुदा है तू कि ना तोबचा पाता है लाज किसीकीन रख पाता है नाजो-ताज़हरसूं बस नज़र आते रहना ही तो,काम खुदा का नहीं होतासंभल जा अब भी वक्‍त हैज़मीं की पेशानी पर पड़ रहे हैं ब... Read more
clicks 155 View   Vote 0 Like   6:06am 2 Sep 2013 #खुदा
Blogger: Alaknanda singh
मां, बाबा, भाई, सब कहते थे..चुपकर रहो अभी तुम, क्‍योंकि -शरीर उसका सुख उसकाकैद उसकी उसी की रिहाई...तो फिर तेरा क्‍यामैं भी गढ़ती रही- इस सच को, किजो भी हैं वो चंद बातेंचंद रातें- चंद अहसास- चंद सांसें-जब सब ही उसके हैं .....तो फिर मेरा क्‍यापायलों की रुनझुनचूड़ियों की खनखनकलम की ... Read more
clicks 169 View   Vote 0 Like   6:02am 29 Aug 2013 #अंधेरा
Blogger: Alaknanda singh
सोचों की कब्र से यूंधूल झाड़कर उठते नया जन्‍म लेते रिश्‍तेकभी देखे हैं तुमनेनहीं ना, तो...फिर अब देखोमांस के लोथड़ों पर टपकतीपल पल ये लारें, ये निगाहेंकिस तरह पूरे वज़ूद कोबदल देती हैं एक ज़िंदा कब्र मेंफिर कोई रिश्‍ता नहीं जन्‍मता ,बंजर सोच की ज़मीन में।- अलकनंदा सिंह... Read more
clicks 151 View   Vote 0 Like   1:09pm 26 Aug 2013 #graveyard
Blogger: Alaknanda singh
''सखी, मैं तुम्‍हारे शहर से होकर गुजरूंगा...''  जब भी ये शब्‍द उसके कानों में पड़ते तभी उसे अहसास हो जाता कि कितनी छोटी है ये दुनिया। गोल गोल घूम कर उसके ही गिर्द अपना घेरा कस लेती है हर बार।  अरे, ये भी कोई बात हुई...भला कोई कहीं से भी गुजरे...शहर की सड़क तो साझा होती है सबकी...ज... Read more
clicks 148 View   Vote 0 Like   7:09am 20 Aug 2013 #मन
Blogger: Alaknanda singh
कि...कोई नहीं समझ पाया हैबाईं ओर उसी छाती में दर्द का इक सैलाब आया हैरिश्‍तों की जकड़न कैसी थी कि...कोई नहीं समझ पाया हैतितली के पंखों से झड़करटपक रही थी जो तेरी आहेंउनका सदका यूं मैंने पाया कि...कोई नहीं समझ पाया हैआइने से मुझ तक पहुंचीउसकी आवाज़ सुनी जैसे हीखुश्‍बू तैर ग... Read more
clicks 150 View   Vote 0 Like   2:00pm 16 Aug 2013 #तितली
Blogger: Alaknanda singh
नहीं जानते क्‍या सखा तुम.. जिस धड़कन में तुम बसते होनित नये बहानों से डसते होदिल के टुकड़े टुकड़े करते हो..छाती की वो उड़ती किरचेंनभ को छूने जाती हैंसखाभाव से जिनको तुमने थाम लिया था सांसों में,पायल और तुम्‍हारी साजिशखूब समझ आती है सखावो चुप हैं.. तुम हंसते होक्‍या घोला ... Read more
clicks 135 View   Vote 0 Like   11:09am 31 Jul 2013 #
Blogger: Alaknanda singh
हे जनता के ईश्‍वर !  क्‍या तुम अब भी यहीं हो ...इसी धरती परक्‍या तुम भी लेते हो श्‍वास...इसी धरती परतो, क्‍या तुम देख नहीं पा रहेये चीत्‍कार ये कोलाहल..इच्‍छाओं काये घंटे-- ये घड़ियाल--ये व्रत--ये उपवास,छापा टीका वालों का नाद निनादकाश ! तुम पढ़ पाते वे कालेकाले अक्षरजो पुराणो... Read more
clicks 175 View   Vote 0 Like   12:00pm 16 Jul 2013 #
Blogger: Alaknanda singh
निश्‍छल है वो छलिया,क्‍या बोलूं मैं अब.. शब्‍द कहां बचते हैं ....इस तरह रोम रोम जब बतियाता है कान्‍हां से...मेरे हैं वो मेरे हैं ....ये कहकर भ्रम हम पाले रहते हैं ....उसकी एक झलक को हम सबकुछ बिसराये रहते हैं ....यही तो हैं कृष्‍ण प्‍यारे फिर राधा का क्‍या दोषउसको तो हम यूं ही ठगनीमान... Read more
clicks 163 View   Vote 0 Like   3:01pm 7 Jun 2013 #
Blogger: Alaknanda singh
वसुधैव कुटुम्‍बकमकी मूल अवधारणा के साथ चलने वाले इस देश में जीवन को मात्र 'ये दिन' 'वो दिन' में बांटकर उसकी समग्रता का अहसास कैसे किया जा सकता है । ये हमारा जीवन है कोई गुड़ की डली नहीं जिसे तोड़कर बांटा जा सके मगर ऐसा हो नहीं पा रहा संभवत: इसीलिए कुछ आयातित शब्‍दों के सहा... Read more
clicks 159 View   Vote 0 Like   10:10am 12 May 2013 #Mothers'Day
Blogger: Alaknanda singh
बीन रही हूं चिंदी चिंदी उसी शाख के नीचेजिस पर सोये थे सपने अपनी आंखें मींचेवही शाख जो मन पर मां के आंचल सी बिछ जातीआज उसी ने झाड़ दिये हैंयादों के सब पत्‍ते नीचेमिट्टी मिट्टी में घुल जायेवही मुहब्‍बत बसती है मुझमेंजो सर से पांव तक दौड़ रही हैकोई शिकवों के फिर द्वार ना ख... Read more
clicks 169 View   Vote 0 Like   6:06am 2 May 2013 #dreams of tree
Blogger: Alaknanda singh
courtesy-googleक़तरा क़तरा सांसों में बहती घुली महक वो भीनी सी हैफूटे जिस ज़र्रे से आलम क्‍यों वही इबारत झीनी सी हैउसकी आंखें बता रही हैंरात की बाकी नरमी सी हैजुगनुओं की रोशनी से भी अब यूं चुंधिया रहे हैं रिश्‍तेमत बांधो चमकीले पर उनके  उनसे ही तो रफ्ता रफ्ताचटक रही रोशनी सी ह... Read more
clicks 167 View   Vote 0 Like   1:35pm 1 May 2013 #
Blogger: Alaknanda singh
courtsey : Googleकोई काल कोठरी तो नहींवो दीवारें थीं मेरे घर की, जिस पर छपे हुये थे पंजे प्रेम और वियोग...केस्‍वागत और विदाई... केजन्‍म और बधाई... केये तो उन्‍हीं ईटों की दराजें हैं जिनमें रहता था अम्‍मा के घर का राशन तीन पुश्‍तों के मुकद्दमे की रद्दीसमाये हुये घर का इतिहासपर आज सभी अ... Read more
clicks 146 View   Vote 0 Like   6:40am 17 Apr 2013 #farewell
Blogger: Alaknanda singh
चित्र : साभार-गूगलरूठने की तरकीबें तुम्‍हेंखूब आती हैं सखा...नहीं रखो तुम मान मेराये कैसे मैं होने दूंगीमत भूलो तुम, मेरे होतेरूठकर बैठ नहीं सकतेयूं ही तुम्‍हारी कोशिशें परवान नहीं चढ़ने दूंगीअम्‍बर की हर शै से जाकरचुन कर लाऊंगी वो पलमेरे और तुम्‍हारे धागे कीगिरह कभ... Read more
clicks 184 View   Vote 0 Like   2:43pm 16 Apr 2013 #abstract.
Blogger: Alaknanda singh
तंद्रारहित  रात्रि   के   अंधकार मेंमुझे  बुला  रहा  है  कोई एक-तेजपूर्ण  शून्‍य सारश्‍मियों को बिखेरताधमनियों  में रेंगता साबढ़ रहा है  मेरी  ओर,मानो मन: अभिसार के लिए,पलक मूंद  मैं उसे-देख रही थी उसकी ऊंची तान मुरली की -  त्रियक हुआ जाता था शरीर ... Read more
clicks 148 View   Vote 0 Like   1:44pm 10 Apr 2013 #alaknanda.
Blogger: Alaknanda singh
कोई आवाज सुनाई देती है मेरे आइने कोदिख रहा जो अक्‍स मुझसे वो बेगाना क्‍यों है,रूह से निकल बर्फ होते जा रहे वज़ूद काउसकी आवाज़ से रिश्‍ता पुराना क्‍यों है,थामी है उसकी याद किसी हिज़्र की तरहहथेलियों में वक्‍त इतना सहमा सा क्‍यों है,थरथराते कदम और उखड़ते हुये लम्‍हों ने... Read more
clicks 170 View   Vote 0 Like   10:39am 9 Apr 2013 #
Blogger: Alaknanda singh
प्रश्‍नों में घिरी है आस्‍था  आजक्‍योंकि-इस सूचनाई जमात में,सभ्‍यता के सूरज को -हथेली में छुपाकर,ज्ञान को बाजार मेंबदलने चली हैहमारी आपकी नई पीढ़ी ।इसीलिए अपनों कीसंवेदना को 'बार' मेंऔर 'बार' को,संस्‍कार में घोलने चली हैहमारी आपकी नई पीढ़ी। -अलकनंदा सिंह... Read more
clicks 173 View   Vote 0 Like   1:02pm 7 Apr 2013 #
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