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कविता मंच

अगर औरत बिना संसार होता।वफ़ा का ज़िक्र फिर बेकार होता।ये किस्से हीर लैला के न मिलते।हर एक आशिक़ यहाँ बेजार होता।क़लम ख़ामोश रहता शायरों का बिना रुजगार के फ़नकार होता।नहीं फिर जिक्र होठों पर किसी के नयन जुल्फ-ओ-लब-ओ-रुख़्सार होता।न करता कोई बातें ग़म ख़ुशी की किसी को ...
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  January 12, 2018, 4:00 am
अगर उदास है वो तो कोई मजबूरी हैकोई वज़ह है अगर दो दिलों में दूरी है।आज जी भर के चाँदनी को अपनी देखेंगेहमारे पास अभी एक रात पूरी है।आप जाँये तो मुस्करा के यहाँ से जाँयेइस ग़ज़ल में ये शेर भी बहुत ज़रूरी है।आप दे लाख दलीलें, हजा़र तहरीरेंसही है वो जिसे समाज की मंज़ूरी है।...
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  January 11, 2018, 4:00 am
                          अगर आदमी ख़ुद से हारा न होता ,                          ख़ुदा को किसी ने पुकारा न होता !                          कहां आसमां पर ख़ुदा बैठ जाता ,&n...
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  January 10, 2018, 4:00 am
अंधेरा मिटता नहीं है मिटाना पड़ता हैबुझे चराग़ को फिर से जलाना पड़ता है।ये और बात है घबरा रहा है दिल वर्नाग़मों का बोझ तो सब को उठाना पड़ता है।कभी कभी तो इन अश्कों की आबरू के लिएन चाहते हुए भी मुस्कुराना पड़ता है।अब अपनी बात को कहना बहुत ही मुश्किल हैहर एक बात को कितना ...
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  January 9, 2018, 4:00 am
अंगारों पर चलकर देखेदीपशिखा-सा जलकर देखेगिरना सहज सँभलना मुश्किलकोई गिरे, सँभलकर देखेदुनिया क्या, कैसी होती हैकुछ दिन भेस बदलकर देखेजिसमें दम हो वह गाँधी-सासच्चाई में ढलकर देखेकर्फ़्यू का मतलब क्या होताबाहर जरा निकल कर देखे ...
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  January 8, 2018, 4:00 am
अंगारों के तकिए रखकरहम बारूदों के घर सोयेसन्नाटों के जल में हमनेबेचेनी के शब्द भिगोयेटी-हाऊस में शोर-शराबाजंगल में सन्नाटा रोयेएक कैलेंडर खड़ा हुआ हैतारीख़ों का जंगल ढोयेहाथ में आए शंख-सीपियाँहमने दरिया खूब बिलोयेदिन का बालक सुबह-सवेरेधूप के पानी से मुँह धोयेचौर...
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  January 7, 2018, 4:00 am
अँधेरे चारों तरफ़ सायं-सायं करने लगेचिराग़ हाथ उठाकर दुआएँ करने लगे तरक़्क़ी कर गए बीमारियों के सौदागर ये सब मरीज़ हैं जो अब दवाएँ करने लगेलहूलोहान पड़ा था ज़मीं पे इक सूरज परिन्दे अपने परों से हवाएँ करने लगे ज़मीं पे आ गए आँखों से टूट कर आँसूबुरी ख़बर है फ़रिश्ते ख़त...
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  January 6, 2018, 12:00 pm
अँधेरा जब मुक़द्दर बन के घर में बैठ जाता हैमेरे कमरे का रोशनदान तब भी जगमगाता है।किया जो फ़ैसला मुंसिफ़ ने वो बिल्कुल सही लेकिनख़ुदा का फ़ैसला हर फ़ैसले के बाद आता है।अगर मर्ज़ी न हो उसकी तो कुछ हासिल नहीं होताकिनारे पर लगे कश्ती तो साहिल डूब जाता है।खिलौने का मुक़द्...
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  January 5, 2018, 12:00 pm
छोड़ो मोह! यहाँ तो मन को बेकल बनना पड़ता हैमस्तों के मयख़ाने को भी मक़तल बनना पड़ता हैसारे जग की प्यास बुझाना, इतना आसाँ काम है क्या?पानी को भी भाप में ढलकर बादल बनना पड़ता हैजलते दिए को लौ ही जाने उसकी आँखें जानें क्या?कैसी-कैसी झेल के बिपता, काजल बनना पड़ता है'मीर'कोई था ...
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  January 4, 2018, 12:00 pm
'आए भी वो गए भी वो'--गीत है यह, गिला नहींहमने य'कब कहा भला, हमसे कोई मिला नहीं।आपके एक ख़याल में मिलते रहे हम आपसेयह भी है एक सिलसिला गो कोई सिलसिला नहीं।गर्मे-सफ़र हैं आप तो हम भी हैं भीड़ में कहींअपना भी काफ़िला है कुछ आप ही का काफ़िला नहीं।दर्द को पूछते थे वो, मेरी हँसी थम...
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  January 3, 2018, 11:34 am
सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"  की पुत्री सरोज की मृत्यु 18 वर्ष की उम्र में हो गयी। सरोज स्मृति नामक इस रचना में कवि ने अपनी पुत्री की स्मृतियों को संजोया है। ऊनविंश पर जो प्रथम चरणतेरा वह जीवन-सिन्धु-तरण;तनये, ली कर दृक्पात तरुणजनक से जन्म की विदा अरुण!गीते मेरी, तज रूप-न...
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  January 2, 2018, 12:00 pm
आमों पर खूब बौर आए भँवरों की टोली बौराए बगिया की अमराई में फिर कोकिल पंचम स्वर में गाए। फिर उठें गंध के गुब्बारे फिर महके अपना चंदन वन नव वर्ष तुम्हारा अभिनंदनगौरैया बिना डरे आए घर में घोंसला बना जाए छत की मुंडेर पर बैठ काग कह काँव-काँव फिर उड़ जाए मन में मिसिरी घुलती जा...
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  January 1, 2018, 12:00 am
वह आता--दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,चल रहा लकुटिया टेक,मुट्ठी भर दाने को-- भूख मिटाने कोमुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता--दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाये,बायें से वे मलते हुए पेट को चलते,और दाहिना ...
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Tag :सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला".
  December 31, 2017, 12:00 pm
ठोकर खाकर हमनेजैसे ही यंत्र को उठाया,मस्तक में शूं-शूं की ध्वनि हुईकुछ घरघराया।झटके से गरदन घुमाई,पत्नी को देखाअब यंत्र सेपत्नी की आवाज़ आई-मैं तो भर पाई!सड़क पर चलने तक कातरीक़ा नहीं आता,कोई भी मैनरया सली़क़ा नहीं आता।बीवी साथ हैयह तक भूल जाते हैं,और भिखमंगे नदीदों क...
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  December 30, 2017, 12:00 pm
मृषा मृत्यु का भय हैजीवन की ही जय है ।जीव की जड़ जमा रहा हैनित नव वैभव कमा रहा हैयह आत्मा अक्षय हैजीवन की ही जय है।नया जन्म ही जग पाता हैमरण मूढ़-सा रह जाता हैएक बीज सौ उपजाता हैसृष्टा बड़ा सदय हैजीवन की ही जय है।जीवन पर सौ बार मरूँ मैंक्या इस धन को गाड़ धरूँ मैंयदि न उचित ...
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Tag :मैथिलीशरण गुप्त
  December 29, 2017, 12:00 pm
लौट आना उस शहर मेंदोबाराजहाँ मेरी सांसें  अंतिमकहलाईं जहां धुंध-धुंध जलती रही मैंऔर दिल बर्फ़-सा रिसता रहानष्ट होता वजूद मेरा,कहानियां​ कहता  रहा।वो खेतों से गुज़रतीनन्हीं  पगडंडियां..!!वो पनघट की उतरती-चढ़ती सीढ़ियां ।जहाँ  अक्सर  तुम मेरेअधरो की मौन भाषा...
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Tag :नव वर्ष 2018 पर विशेष
  December 28, 2017, 12:00 pm
सिकत नाव चलाता हूँकिससे कहूँ क्या छिपाउँसब कुछ अब बेपरदा हैलव सिले हैं वदन मौन हैक्यों आगोश में जलजला है?डूब रही है कश्ती मेरीखींच रहा भँवर इस कदरक्या मिट जाएगी हस्ती मेरी?मैंने तो गुलसिताँ सजाया था सपनों कातेरे आँसुओं के सैलाब मेंक्यों उजड रही है बस्ती मेरी?पैगंबर ...
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  December 27, 2017, 12:00 pm
अतरंगी सा रंग रहा सतरंगी सँसार सहस्त्र रंग का हो रहा निश दिन कारोबार ! हर रंग खिल खिल कहे काहे पँख पसारे नाय बेरंगी सँसार को पल मै रंग दे आय ! पवन बहे परवाज़ रंग नदी निरन्तरता नीर पाहन चढ़ चट्टान को रंग देते कर्मठ वीर ! दुख सुख और अवसाद के होते रंग हज...
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Tag :डॉ. इन्दिरा गुप्ता
  December 26, 2017, 12:00 pm
कविता मंच: फिर शहर जला दिया ......डॉ.विमल ढौंडियाल...
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  December 25, 2017, 3:49 pm
आज फिर तुमने शहर जला दियाहरि भूमि राह देख रहीमृत्यु ताण्डव झेल रहीआस की हर साँस मेंपाञ्चजन्य पुकार रहीकृष्ण की इस धर्मधरा परक्यों फिर रक्त बहा दियाआज फिर तुमने शहर जला दिया |चीर फिर लहरा रहाभीम उर को चीर रहाकौरव हैं निस्तब्ध नि:शब्दपाण्डव बिगुल बजा रहादुशासन के हाथ ...
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Tag :मेल से
  December 25, 2017, 12:00 pm
इस दिल से तल्ख़ यादों को मिटा दे हसरतों को तू कोई और जगह दे इंसान की काठी कमजोर बहुत है मिटटी में इसकी कुछ और मिला दे हसरतों की बरातों को जगह नहीं है शैतानो की बस्ती को शमशान बना दे ऐ औरों के खुदा "अहमद"की तमन्ना है जो कर सके प्यार, वो इंसान बना दे-बदरुल अहमद...
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Tag :बदरुल अहमद
  December 24, 2017, 12:00 pm
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहींहै अपना ये त्यौहार नहींहै अपनी ये तो रीत नहींहै अपना ये व्यवहार नहींधरा ठिठुरती है सर्दी सेआकाश में कोहरा गहरा हैबाग़ बाज़ारों की सरहद परसर्द हवा का पहरा हैसूना है प्रकृति का आँगनकुछ रंग नहीं , उमंग नहींहर कोई है घर में दुबका हुआनव वर्ष का य...
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  December 23, 2017, 12:30 pm
अक्सर माँ डिब्बे में भरती रहती थी कंभी मठरियां , मैदे के नमकीन तले हुए काजू ..और कंभी मूंगफली तो कभी कंभी बेसन के लड्डू आहा ..कंभी खट्टे मीठे लेमनचूस थोड़ी थोड़ी कटोरियों में जब सारे भाई बहनों को एक सा मिलता न कम न ज्यादा तो अक्सर यही ख्याल आता माँ ..ना सब ना...
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Tag :निधि सिंघल
  December 22, 2017, 12:00 pm
मुझे आज इतना दिलासा बहुत है..कि उसने कभी मुझको चाहा बहुत है ;उसी की कहानी उसी की हैं नज़्में...उसी को ग़ज़ल में उतारा बहुत है ;बड़ी सादगी से किया नाम मेरे...तभी दिल मुझे उसका प्यारा बहुत है ;उठाओ न ख़ंजर मेरे क़त्ल को तुम...मुझे तो नज़र का इशारा बहुत है ;किसी और से कोई पहचान क्या हो...सित...
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Tag :तरुणिमा
  December 21, 2017, 12:00 pm
नियति के क्रूर हाथों नेला पटका खुशियों से दूर,बहे नयन से अश्रु अविरलपलकें भींगने को मजबूर।भरी कलाई,सिंदूर की रेखाहै चौखट पर बिखरी टूट केकाहे साजन मौन हो गयेचले गये किस लोक रूठ केकिससे बोलूँ हाल हृदय केआँख मूँद ली चैन लूट केछलकी है सपनीली अँखियाँरोये घर का कोना-कोनाह...
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Tag :श्वेता
  December 20, 2017, 12:00 pm
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