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पनघट (PANGHAT)

सरिता के जून माह के दूसरे अंक में मेरी एक कविता का प्रकाशन हुआ। अच्छा लगा। ...
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  July 17, 2014, 2:13 am
जिंदगी के एक मोड़ पे मिल गए यूं आपसे, दिल हमारा सजाने लगा मीठे-मीठे से ख्वाब से।हाय ये शर्मो-हया, सादगी, ये शोखियांआंखों में तुम्हारी सनम हैं हजारों मस्तियां।जिस पल देखूं मैं तुम्हें दिखते हो तुम चांद से। आपकी आंखों की मय से मौसम शराबी हो गया,कली फूल बन गई फिजा का रंग...
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  October 5, 2013, 2:59 am
उस शाख पे गुले दिल खिलाऊं कैसे? रूठा है वो माली, मैं मनाऊं कैसे?बूंद होती है हर प्यासे की किस्मत में मगर, उस दिले दरिया से कोई बूंद चुराऊं कैसे?कर सके जो रोशन शब-ए-गम मेरा,वो चरागे मोहब्बत मैं जलाऊं कैसे?होता नहीं नसीब यहां उंगली का सहारादामने यार का सहारा मैं पाऊं कैसे...
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  October 5, 2013, 2:35 am
तेरे लवों की तबस्सुम पर नाम लिखा है मेरा,मैंने आंखों में अपनी चेहरा छुपा रखा है तेरा। मेरे वजूद को जनाब इस कदर न ठुकराइए, बिखर जाएगा ये मोहब्बत का घरौंदा मेरा।   तूने मेरे नाम पर कभी ली न हो अंगड़ाई, जज्बात के इस मोड़ पर आईना झूठा है तेरा। पियूं तो पियूं कैसे इन ...
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  October 5, 2013, 2:09 am
मैं क्‍या करूं कि मेरे दिल पे आ गई है,पगली सी एक बदली सेहरा पे छा गई है।छलके है उनकी आंखों से मय के हजार प्‍याले मेरा कोई कुसूर नहीं, साकी पिला गई है।अब अपने दामन को छुड़ाइये न हमसे,मेरी हसरतों के चराग आंधी जला गई है।                                        &n...
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  September 1, 2013, 1:20 am
एक शाम जब मैं उदास थामैं रो रहा थालेकिन तब मेरे आश्‍चर्य की कोई सीमा न रहीजब मैंने देखा, मेरे आंसू मुझ पर ही हंस रहे हैं।मैं रो रहा था और आंसू हंस रहे थे।कैसी विंडबना है ये जो जिसके लिए रोता हैवही उस पर हंसता है।मैं यही झुठलाने के लिएरो रहा था।परंतु असफल रहा।मैं न...
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  September 1, 2013, 1:07 am
मैं कहता हूं किआखिर क्‍योंहम नदी के किनारोंकी तरह रहते हैंकिनारों के बीचबहता पानी बनोक्‍योंकि, रवानीउसी में होती हैजिंदगानीउसी में होती है।...
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  September 1, 2013, 12:43 am
बारिश के इस मौसम में हर किसी का मन-मयूर नाच उठता है। प्रकृति के इस आनंद उत्‍सव में हरियाली की चादर भी है और फुहारों की छुअन भी। ऐसे में किसी गीत का जन्‍म होना स्‍वाभाविक है...आज घिर आई है बदरिया इश्‍क की मेरी छत पर बरसी हैं लडि़यां पैगाम-ए-महबूब की मेरी छत पर। बाद-ए-सबा ने झू...
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  August 22, 2013, 12:37 pm
प्‍याज ने ऐसा मारा पंचकि हम हो गए टंचटमाटर भी खड़ा गुर्रा रहा हैमोहन के मौन पर थर्रा रहा है। लाल-पीला होकरअब लाल हो गया हैहर सब्‍जी के दाम में धमाल हो गया है। रुपया रोज गिर रहा राजनीति की तरहहुई इसकी हालत रिकी बहल की सताई परणीति की तरह सोने के दाम भी खरे हो गए हैंमुझ गरीब ...
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  August 18, 2013, 2:39 am
कहानी 'एक टुकड़ा धूप का' का अंतिम भाग...
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  August 10, 2013, 1:19 pm
कहानी 'एक टुकड़ा धूप का'का अंतिम भाग...
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  August 10, 2013, 1:19 pm
मेरी यह कहानी 'एक टुकड़ा धूप का' इसी ब्‍लॉग पर टेक्‍स्‍ट के रूप में प्रकाशित है लेकिन यह एक समाचार पत्र में प्रकाशित हुई थी। मैं प्रकाशित कहानी को पोस्‍ट कर रहा हूं। ...
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  August 10, 2013, 1:14 pm
तेरी यादें, तेरा बंधनज्यों तुलसीदल और चंदन।तू ही शिव है, तू ही सुंदरतू ही सत्य और शिव का संगम।बता इसके सिवाय मैं तेरीक्या आराधना करूं?सांस आती है, सांस जाती हैउलझनें तमाम सिल जाती हैं।तब तेरी अलकें, पलकें, बाहें जुल्फेंएक मखमली चादर तन जाती है।बता इसके सिवाय मैं तेरीक...
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  January 19, 2012, 4:11 pm
दिवाकर पाण्डेय नजाने क्यों, आज बिस्तर से उठने का मन नहीं कर रहा था। लेकिन तभी कहीं से एक गोरैया ने आकर भोर का गीत सुनाना शुरू कर दिया। सामने खिड़की की जाली से एक धूप का टुकड़ा मेरे सिरहाने आकर मुझसे अठखेलियां करने लगा, ऐसा लगा जैसे जिंदगी ने दस्तक दी हो। मैं नहा-धोकर नाश...
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  December 4, 2011, 4:51 pm
हरिशंकर परिसाई ने जब साहित्य में निंदा रस की परिभाषा कुछ जुदा तरीके से गढ़ी तो उनके इस आविष्कार पर हर कोई मुदित हुआ। निंदा करने वाला भी और सुनने वाला भी। श्रीलाल शुक्ल ने एक और राग का आविष्कार किया- राग दरबारी। मैं कोई आविष्कार तो नहीं कर रहा हूं (औकात ही नहीं) लेकिन एक आ...
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  August 19, 2011, 1:37 am
वक्तकापहियाकितनावक्तगुजरगयाफागनहींगायाबरसातमेंकागजकीनावनहींबनाईछिपकरटॉफीनहींखाईबागमेंअमरूदनहींतोड़ेनीमकीछांवमेंगुलेलनहींबनाईनुक्कड़परछोटूकीइतनीचायपीमांकेहाथोंकीचीनीनहींमहसूसीकितनावक्तगुजरगयाकोईमेहमाननहींआयामुंडेरपरआकरकागानहींबोला...अबद...
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  June 30, 2011, 2:20 am
सुनो,मैंकुछकहनाचाहताहूंछोड़ो,शायदमैंकुछनहींकहपाऊंगामैंजानताहूं,कितुमसमझगईहोगी।...
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  June 30, 2011, 2:00 am
शेर-ओ-सुखनतुमचाहकरभीमुझेभुलानहींसकते,कुछभीतुम्हेंयादनहींअबमेरेसिवा। -१जिंदारहनेकीनिकलआएगीकोईसूरतअपनीआंखोंमेंकोईख्वाबसजाकरदेखो। -२हमभीजानतेहैंमोहब्बतमेंमिटजानेकाहुनरयूंहमनेएकरूठेहुएशख्सकोमनायाथाकभी। -३बदलडालेंगेहमहरएकचेहरेकीरंगतपत्थरभीपिघलत...
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  June 29, 2011, 1:26 am
तुम्हारीखामोशीमैंजानताहूंकितुमकुछकहनाचाहतीहोमगरतुमखामोशहीरहनातुमबोलोगीतोअधरोंकोजुम्बिशलेनीहोगीतुम्हारीहसींखामोशीकानूरचाँदचुरालेगामैंठगा-सारहजाऊंगातुम्हेंतोमैंमुस्कुराकरआइसक्रीमदेतेहुएदिसइजफॉरयूकहतेहुएचूमलूंगामगरचाँदकोनहींबहलापाऊंगाइसल...
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  June 29, 2011, 1:09 am
जिंदगीबता दे हम किधर जाएंजिंदगीबता दे हम किधर जाएंटूटी हर आस और दिल घबराएआंसू की धार आंखों से फूटेसाहिल भी छूटा सागर भी छूटेरिश्तों की रहगुजर पर अब हम हैं अकेलेलगता है यूं कि सांसों की डोर टूटेबड़ी दूर है मंजिल बंजर हुई हैं राहें।जिंदगी बता दे हम किधर जाएं।वक्त हम पे ...
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  June 29, 2011, 12:59 am
धरती और आसमांमैंने पढ़ा था किमां धरती औरपिता आसमां होता हैमैं खुश था कि पूरे आसमां पर मैं सितारों में टूटकर बिखर जाऊंगाउसके सीने मेंअपनी रोशनी भर दूंगा एक तमन्ना सूरज बनने की भी उठी थीक्योंकि मैं आसमां का ताप अपने सीने में भर लेना चाहता थामगर चाह आह बन बन गई आसमां को ग...
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  June 29, 2011, 12:30 am
मांकास्थानईश्वरसेऊपरहोताहै।वहजननीहै।इसलिएहमउसकेऋणीहैं।यहजीवनऔरहरसांसउसकीहै।मैंनेभीअपनेतरीकेसेमांकोपुष्पांजलिदेनेकीकोशिशकीहै.. कवितामांकोकुछनहींआतामेरेघरमेंगैसनहींथी,मांस्टोवपरखानापकातीथीउसकीधांय-धांयकरतीआवाजकोअनसुनाकरबड़ेचावसे, जतनसेरोटिय...
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  June 29, 2011, 12:18 am
आजकल बात चांद पर घर बनाने और मंगल पर परचम लहराने की हो रही है। स्थानों के बीच दूरी कम हो रही है लेकिन इस सबके इंसा की इंसा से दूरी बढ़ी है। इसी को उकेरा है इस गजलमेंअब हम उस मकाम पर आ गए हैंहमारी शक्ल से आईने शर्मा गए हैं।जब तक बजे गीत मेरे, मैं सुनता रहाउसने छेड़ी तान तो हम ...
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  June 29, 2011, 12:14 am
हम अखबारों की कतरनों और समाचार चैनलों की सुर्खियों में अक्सर पढ़ते-देखते हैं कि रिश्तोंकी गर्माहट कम हो रही है। अलबत्ता वातावरण का तापमान बढ़ रहा है। इसीको रेखांकित कवितारिश्तोंकातापमानमानाकितापमानलगातारबढ़रहाहैपारा४५डिग्रीसेल्सियसकोछूरहाहैअधिकतमऔरन्यून...
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  June 28, 2011, 11:38 pm
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