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Blog: चाँद पुखराज का

Blogger: parul
ऐसा नहीं कि उन से मोहब्बत नहीं रही जज़्बात में वो पहले-सी शिद्दत नहीं रही सर में वो इंतज़ार का सौदा नहीं रहा दिल पर वो धड़कनों की हुक़ूमत नहीं रही कमज़ोरी-ए-निगाह ने संजीदा कर दिया जलवों से छेड़-छाड़ की आदत नहीं रही अल्लाह जाने मौत कहाँ मर गई 'ख़ुमार'अब मुझको ज... Read more
clicks 143 View   Vote 0 Like   6:39am 12 Oct 2014 #ख़ुमार बाराबंकवी
Blogger: parul
दिल में अब यूँ तेरे भूले हुये ग़म आते हैंजैसे बिछड़े हुये काबे में सनम आते हैंइक इक कर के हुये जाते हैं तारे रौशनमेरी मन्ज़िल की तरफ़ तेरे क़दम आते हैंरक़्स-ए-मय तेज़ करो, साज़ की लय तेज़ करोसू-ए-मैख़ाना सफ़ीरान-ए-हरम  आते हैंऔर कुछ देर न गुज़रे शब-ए-फ़ुर्क़त से कहोदि... Read more
clicks 112 View   Vote 0 Like   2:11pm 8 May 2014 #फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
Blogger: parul
 बड़े शहर की भूलभुलैया सड़कें गोल चक्कर घूमकर बारहा  एक ही मोड़ पर खुल रही थीं.एक ही रास्ता  मानो  उनके नक्शें में दर्ज़ था.एक ही इमारत के इर्द-गिर्द वे लगा रही थीं  फेरा.  पीठ घुमा लो या चेहरा  ओट कर लो... पुल उतरते ही अतीत में सोयी कोई   दोपहर मुंह बाए ... Read more
clicks 140 View   Vote 0 Like   3:48pm 5 Apr 2014 #क़िस्से
Blogger: parul
वही पलकों का झपकना वही जादू तेरेसारे अंदाज़ चुरा लाई है ख़ुशबू तेरे।तुझसे मैं जिस्म चुराता था मगर इल्म न थामेरे साये से लिपट जाएँगे बाज़ू तेरे ।तेरी आँखों में पिघलती रही सूरत मेरी।मेरी तस्वीर पे गिरते रहे आँसू तेरे।और कुछ देर अगर तेज़ हवा चलती रहीमेरी बाँहों में... Read more
clicks 100 View   Vote 0 Like   4:48am 8 Feb 2014 #
Blogger: parul
चिड़िया  के पंख समूचे दिन काँपते हैंहवाएं बिखेरती हैं शाख़ों से फूलदुःख जमा है मन मेंठंड जैसे सीने मेंभाप,गरारा पान पत्र का सेंकविफलतमाम उपायदेहखोजती है  धूपधूप गुमशुदा  कोहरे मेंधूप सानहीं  कोई नाम , कोई चेहराधूप से लोगरस्ते ,चौराहों से नदारदरस्ते , चौराहों प... Read more
clicks 84 View   Vote 0 Like   2:56pm 15 Jan 2014 #
Blogger: parul
सुनते ..सहेजते जगजीत  सिंह की आवाज़ में अली सरदार जाफ़री की ख़ूबसूरत नज़्म ... जो कई दिन से ज़ेहन में रची-बसी है ... मेरे दरवाज़े से अब चाँद को रुख़्सत कर दोसाथ आया है तुम्हारे जो तुम्हारे घर सेअपने माथे से हटा दो यह चमकता हुआ ताजफेंक दो जिस्म से किरनों का सुनहरी ज़ेवरतुम ही ... Read more
clicks 128 View   Vote 0 Like   10:32am 7 Dec 2013 #जगजीत सिंह
Blogger: parul
पत्तियों  कीओटसेनीबू केवृक्षमें एक-आधबचाहुआ  पकाफलझांकरहाहै.  हडबडाईमंझलेकदकीलड़कीसमेटरहीहैमुंडेरसे   सूखतेकपड़े .राहचलतापथिकदोघड़ीआसरापानेकीमंशासे  दबे पाँव दाख़िल हो रहा है बगल  केसहनमें.ये विदाहोती मानसूनी फुहारे  हैं  ... Read more
clicks 101 View   Vote 0 Like   7:33am 30 Sep 2013 #
Blogger: parul
जो अब तक मेरे ही पते पर पड़ा रह गया ,  बीते मार्च  लिखा ये  डायरी का एक पन्ना  है और  दोस्त के ख़त का जवाब भी   ...हमारी पहली बातचीत के वक़्त तुम्हारे गिर्द अलाव जल रहे थे ,गर्म रजाइयों का दौर और थोड़ी थोड़ी बारिश थी . अब जबकि मौसम में गर्मियों की आहट है , बीथिय... Read more
clicks 106 View   Vote 0 Like   2:47pm 4 Aug 2013 #ख़त
Blogger: parul
दुःख की मौन  गुहारों पर द्वार-द्वार बारते  ज्ञान का दीप,बटोरते  पीड़ा की गठरियाँ , तथागत   एक दिवस वैशाली के निकट आम्रवन में आ ठहरे . अनेक व्यवस्थित भवन,प्रासाद,कूटागार,उपवन और पुष्कर्नियों से जगमगाता वैशाली नगर ,  उन दिनों धन-धान्य पूर्ण  लिच्छिवी गणतंत्र था  . नगर सज्... Read more
clicks 137 View   Vote 0 Like   5:57am 11 May 2013 #आम्रपाली
Blogger: parul
जब पीला पत्ता झरता हैहरा पत्ता हँसता नहींवह सिर्फ़ थोड़ा-सा काँप उठता हैउस फ़ौजी की तरहजो देख रहा हैगोली खाकर गिरते अपने पड़ोसी को।सर्दी की बर्फ़ीली छुअन सेजब फूलने लगती हैं उसकी नसेंध्यान आता है उसेनियति का रंग है पीलाऔर वह हो जाता है सुन्न।और पीला पत्ता सड़ता है व... Read more
clicks 136 View   Vote 0 Like   4:42am 16 Apr 2013 #के . सच्चिदानंद
Blogger: parul
 गुमसुम  दोपहर चैत्र की   बुहार लाई है  उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा खाँ  की आवाज़  ...याद  दिलाती कि  वसंत  ढले   कई  दिन  बीते , फागुन बुझे कई  रोज़  .... वो जो हम में तुम में करार  था तुम्हें याद हो के न याद होवही यानी वादा निबाह का तुम्हें याद हो के न याद होवो नये गिले वो शिकायतें ... Read more
clicks 143 View   Vote 0 Like   8:50am 31 Mar 2013 #मोमिन
Blogger: parul
कौन तरह से तुम खेलत होरी .  स्वर - बसवी  मुखर्जी चित्र -गूगल साभार... Read more
clicks 147 View   Vote 0 Like   4:06am 24 Mar 2013 #होरी .
Blogger: parul
ग़ज़ल सुनते ,सहेजते ... स्वर - उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा खाँ बहुत बेचैन है दिल तुम जहाँ भी हो चले आओसितारों की सजी महफ़िल न उठ जाए चले आओतुम्हारी बेरुख़ी ने  यूँ  हमारा दिल बहुत तोड़ाउसी दिल ने  तुम्हे आवाज़ दी है तुम चले आओउदासी की हदें अब छू रहे है याद के नगमेंकहीं हम बन क... Read more
clicks 114 View   Vote 0 Like   5:19pm 15 Mar 2013 #ग़ुलाम मुस्तफ़ा खाँ
Blogger: parul
सुनते,सहेजते ... दादरा ... स्वर- रसूलन बाई कंकर लगन की कछु डर नाहीं...चित्र-गूगल ... Read more
clicks 121 View   Vote 0 Like   6:10am 9 Mar 2013 #दादरा
Blogger: parul
अगवानी शहर के ऊपर  नीले साफ़  आसमान का शामियाना , मन में बिना पंख उड़ने की चाह , फ़िज़ा   में घुले रफ़ाक़त के किस्से और हवा में उड़ती  गुड़ पकने की सोंधी गंध कर रही है मुखबिरी  कि खुश्क ,ठिठुरते मौसम का मिज़ाज  बदलने  कोई निरंतर बढ़ा आ रहा  है  हमारी जानिब .खिड़की से  दे... Read more
clicks 119 View   Vote 0 Like   11:36am 12 Feb 2013 #अहा ज़़िंदगी
Blogger: parul
एक कविता जो ठहर गयी पास ...एक धुन जो पिछली कई शामों से लगातार आस-पास  बज  रही है  .      नदी-तट ,साँझ और मेरा प्रश्न" आह देखो,नदी का तट बहुत सुन्दर है -                                        बहुत सुन्दर "( किन्तु यह तो नहीं है  उत्तरउस प्रश्न काजो मैंने किया थाजो कुरेदे जा रहा है प्रतिक्षणमन की ... Read more
clicks 264 View   Vote 0 Like   2:59pm 28 Jan 2013 #प्रयागनारायण त्रिपाठी
Blogger: parul
पिछले दिनों पढ़ी गई बहुत सी अच्छी कविताओं में   "मृत्युंजय प्रभाकर"  जी की ये कविता साथ रह गयी . इसे यहाँ सहेज रही हूँ कि   मन चाहने पर दोबारा देखा - पढ़ा जा सके ...तितली तितली हो जाना चाहूँगा मैं किसी सुबहजब लगेगा कि बाहर धूप निकल आई हैतितली होना सिर्फ तितली होना नहीं है... Read more
clicks 128 View   Vote 0 Like   12:48pm 14 Jan 2013 #मृत्युंजय प्रभाकर
Blogger: parul
पारिजात जिस घड़ी  निःशब्द   झरते हैं  धरती की गोद में गोपियां  पैर की झांझर उतार कर दबे पाँव लौटती हैं  रास से . रात की तारों जड़ी ओढ़नी सिमटती देख कहीं कोई योगी  ध्यानस्थ होता है  और सूर्य यात्रा पूर्व करता है  गंगा स्नान .  ठीक उसी पहर मेरे गिर्द गूँजते हैं   "राग सोहन... Read more
clicks 104 View   Vote 0 Like   8:38am 13 Dec 2012 #अहा ज़़िंदगी
Blogger: parul
सघन वर्षा वन  के अन्दर जैसे चुपके से उतरता है धूप का एक नन्हा टुकड़ा  और  ख़ामोशी से उसके  चप्पे-चप्पे पर  फेरने लगता है अपनी   इन्द्रधनुषी कूची  .  रेंगकर  जगाता है उनींदी पगडंडियों को और सुनहले  वर्क सा आच्छादित हो जाता है उसमें सोये ताल-तलैय्यों,जीव-जंतुओं ,फूलों , शैव... Read more
clicks 109 View   Vote 0 Like   1:35pm 9 Nov 2012 #डायरी
Blogger: parul
पढ़ते - सुनते मुनीर नियाज़ी  / ग़ुलाम अली ...चमन में रंग-ए-बहार उतरा तो मैंने देखा| नज़र से दिल का ग़ुबार उतरा तो मैंने देखामैं नीम शब आस्मां की वुसअत   को देखता था, ज़मीं पे  वो हुस्न ज़ार उतरा तो मैंने देखा|ख़ुमार-ए - मय में वो चेहरा कुछ और लग रहा था, दम -ए-सहर जब ख़ुमार उतरा त... Read more
clicks 106 View   Vote 0 Like   11:19am 11 Sep 2012 #मुनीर नियाज़ी
Blogger: parul
घोषित सूखाअघोषित बाढ़शीत ताप,बरखादरकिनारकल होने न होने से बेपरवाहपूरी शिद्दतसमूचा  हौसला  लिए चोंच को  नन्ही  सुई कियेअथक,अविराम पत्तों की ईंटकाठ  की नींव   परधुन -धुन गुन-गुनघास का गारातिनकों की साँकलदेख-परख कांट-छांट  जमाते हैंकम मज़बूतबहुत कम टिकाऊ पंछी  मजूर अ... Read more
clicks 100 View   Vote 0 Like   5:25am 22 Aug 2012 #मेरे फ़ितूर
Blogger: parul
  अधछलके मेघआँगन से   उड़ गएबाट  तकत  नैनडयोढ़ी पर जड़ गएनभरीता    पंछियों   सेतितलियों  सेपात    कुंज  सूना   कोयलों सेजुगनुओं सेरात                                                                  पुष्प परभंवरे का  गुंजनसो गयाराह से धूमिल हुएलौटते पदचिन्हक्वाँरे ...     ***  चित्र-गूगल ... Read more
clicks 94 View   Vote 0 Like   1:10pm 28 Jul 2012 #मेरे फ़ितूर
Blogger: parul
वो   ह़र बार अपने ही किसी छूटे  हिस्से के लिए उदास होती रही  ...माँ की कोख में सोयी थी  जब गूँजते  थे गिर्द वे  रूमानी नग्में   या शायद माँ ही गुनगुनाती   थीं अपने एकांत में कहीं दूर जब दिन  ढल  जाये""  और उसके  मन में  गूँथ देती  थीं  किसी   डूबती साँझ की लालिमा  जो बाद  में ... Read more
clicks 93 View   Vote 0 Like   3:22pm 18 Jul 2012 #याद
Blogger: parul
सावन के सुहाने मौसम में एक रूप की रानी याद आई वो बाग़ का मंज़र याद आया झूलों की कहानी याद आई मदहोश फ़ज़ा मस्ताना  समां  बादल का वो झुकना खेतों पर यूं मस्त हवा लहराने लगी चुनरी कोई धानी याद आई कोयल की मल्हारें मतवाली मोरों के तराने  मस्ताने रिमझिम का वो आलम क्या कहिये वो ... Read more
Blogger: parul
आम पकने   के दिनों  मन बेचैन रहता है . खोजी आँखें  बागान में रेंगती ....दुखती हैं .अँधेरे-उजाले... पेड़ से आम गिरने की आवाज़ कानों को   भरती रहती  है . आम कोयल की कूक से गिर पड़ते हैं , हवा की छुअन  से , आँधी आने से , उनकी ओर निहारने भर से और कभी-कभी  घिरती ख़ामोशियों की  महीन आहट से ... Read more
clicks 134 View   Vote 0 Like   5:47am 20 Jun 2012 #डायरी
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