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अग्निगर्भा अमृता : View Blog Posts
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अग्निगर्भा अमृता

ओ नदी.....बेचैन आत्‍मा सी भागती कहां जा रही हो....ये तीव्र आकुलताऔर ये पथरीला रास्‍ता....तुम्‍हारे रेशमी दुपट्टे में लगे हैंं घाव कितने....पांव आहत हृदय भीगा भग्‍न....किस ठौर ठहरेगी, रूकेगी....पांचाली तुम्‍हारी बेचैन आत्‍मा....कब सूखेंगें...वैदेहीतुम्‍हारे पथराये नयनों के अश्र...
अग्निगर्भा अमृता...
Tag :
  October 13, 2016, 6:42 pm
समय की वॉल पर आईना....देखने का वक्त है यह....चेतावनियों और चुनौतियों का समय है....जब क़ीमती है तुम्हािरी बस एक चाल....तब ख़ामोश बैठने....परंपराओं के समय के साथ जानेयाउनको बदलने के लिए ख़ुद को बदलने के समयचुप बैठने से नहीं चलने वाला काम....चुप्पी को तोड़नेझकझोरने के वक्तल...सही को च...
अग्निगर्भा अमृता...
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  April 10, 2016, 10:15 pm
सुलगती दोपहरों में....सोने की चमक....के साथ...नीले धुले आसमान की छाती पर खिल उठा मौसम.....अमलताश.....अमलताश....लो, फिर आ गया वसंत.....अनुजा10.05.14...
अग्निगर्भा अमृता...
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  February 17, 2016, 12:31 pm
पिता मेरेमैं अब तक नहीं समझ पाता हूँक्यों टूट जाते हैं तारे अचानकआकाश गंगा को चमकता हुआ छोड़ करक्यों टूटता है वही ताराजिसके इर्द-गिर्द हम बुन लेते हैं कितनी ही कहानियाँ और स्वप्नउसे हम बरसों ध्रुव तारा समझते रहते हैंझुलसता रहता है सूर्य किसी दूर के देश मेंरात की चाद...
अग्निगर्भा अमृता...
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  April 20, 2015, 11:56 am
अकेले आना----------------पहले ही पेड़ के नीचे छोड़ देना झोलीदूसरे के नीचे कमंडल रख देनाआगे भी बहुत पेड़ हैं, सामान भी बहुतकुछ छोड़ देना, कुछ छूट जाएगाजाने से पहले कहा फकीर ने--जो गया अकेला होकर---।छोड़ देना पेड़ भी वहीं रास्‍ते परपहुंचने तक रखना रास्‍तों कोऔर साथ लिए हुए मत आना कोई रास्‍...
अग्निगर्भा अमृता...
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  April 17, 2015, 10:41 am
सितारे हों बुलन्दी पर अक्सर यूं भी होता है लगी हो आग जब तब भी शरारे बात करते हैं।।हो उनकी बात का मौसम कि उनकी आंख का जादू हमारा क्या अगर हंसकर इशारे बात करते हैं ।।उफ़क की लाल आंखें हों कि शब का सांवला आंचलकोर्इ हो वक्‍़त लेकिन ये नज़ारे बात करते हैं।।हो मौजों की रवा...
अग्निगर्भा अमृता...
Tag :
  April 8, 2015, 10:14 pm
बरसों के बाद मिली वो एक स्‍त्री....उससे मिलने के बाद...(1)उसने चुना था....घर......पति....बच्‍चे.....औरएक हरियाली दुनिया....औरछोड़ी थी उसनेइस संसार के लिए.....अपनी सबसे खूबसूरत ख्‍वाहिश.....औरअपने सबसे मीठे और सुरीले गले का साथ.....।(2)एक स्‍त्री रम गयी हैजि़न्‍दगी के उस सुहाने सफ़र में.....जो उस...
अग्निगर्भा अमृता...
Tag :
  April 7, 2015, 12:17 pm
आदमी ने उसे घर दिया...रहने के लिए...रसोई दी....खाना पकाने के लिए... गुसलखाना दिया नहाने के लिए.... छत दी... केशों को सुखाने के लिए... सोने का कमरा दिया बिस्‍तर दिया बच्‍चे दिए.... बिना उससे पूछे..जि़न्‍दगी दी... जीने के लिए.... सब कुछ बिना उससे पूछे.... बिना यह जाने किवह क्‍या चा‍‍हती है... कैस...
अग्निगर्भा अमृता...
Tag :
  April 6, 2015, 11:10 am
जुदाई का हर निर्णय संपूर्ण और अंतिम होना चाहिए, पीछे छोड़े हुए सब स्‍मृतिचिन्‍हों को मिटा देना चाहिए, और पुलों को नष्‍ट कर देना चाहिए, किसी भ्‍ाी तरह की वापसी को असंभव बनाने के लिए।हर पीड़ायुक्‍त निर्णय को क्रियान्वित करने के लिए हमें उसे दैनिक जीवन का स्‍वाभाविक अंग ...
अग्निगर्भा अमृता...
Tag :
  April 5, 2015, 10:44 pm
अर्चना, नन्दिनी, जया और उन जैसी तमाम स‍ाथियों के लिए....जिनके जज्‍़बे और साहस को सलाम करता है अासमान...तुम्‍हारे ही लिए मेरी साथी....उफ... !लड़कियों ने छू लिया अासमान....अब क्‍या होगा.... !!!!!!उफ...ये क्‍या किया तूने ऐ लड़की...बना ली अपनी छोटी सी दुनिया...वैसे हीजैसे तू चाहती थी....।उफ....ये ...
अग्निगर्भा अमृता...
Tag :मेरी कविताएं....
  March 8, 2015, 2:23 pm
http://www2c.cdc.gov/podcasts/BestPractices.asp...
अग्निगर्भा अमृता...
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  January 30, 2015, 7:39 pm
गर्म माथे पर रखा हुआ हाथ वोसर्द कब हो गया कुछ पता न चला...सब भिगोते रहे आंसुओं से ज़मींवो चला कब गया कुछ पता न चला...एक मुद्दत रहा सायबां की तरहकब हवा हो गया कुछ पता न चला...उसकी नाराज़गी को न समझा कोईक्‍यूं ख़फ़ा हो गया कुछ पता न चला....उम्र भर तो कोई भी उसे न मिलासब मिले जब उसे क...
अग्निगर्भा अमृता...
Tag :
  October 4, 2014, 6:53 pm
अब कहो... वो चरित्रहीन थी... चरित्रको जोड़ दो देह से... बहुत आसान हैऔरत को जोड़ देना चरित्र से... औरचरित्र को देह से.... अनुजा28.08.1998 भोर : 5: 00 ...
अग्निगर्भा अमृता...
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  March 10, 2014, 6:44 pm
सदियों का सफ़र तय करकेधरती अब भी हैअपने उसी बिन्‍दु पर....जहांताप शाप रस के लिएताकना पड़ता हैउसेआसमान का मुहं....अनुजा03.05.1998...
अग्निगर्भा अमृता...
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  March 10, 2014, 6:34 pm
जब पूरी दुनिया को बांटे जा रहे थेचांद ... सूरज... सितारे... पहाड़... नदियां... समुद्र... दरख्‍़त... आकाश... रंग... झरने... तब भी ढूंढ रही थी आधी दुनिया अपने अंधेरे उजाले.... अनुजा 03.05.1998...
अग्निगर्भा अमृता...
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  March 10, 2014, 6:21 pm
औरतें जायदाद नहीं होतीं...कि जितना चाहो उतना फैलें और जब चाहो सिमट जाएं.... कि उनके रखने, न रखने देने या लेने उठने-गिरने बनने-बिगड़ने सहेजने या बांटने जाने या रहने पर उनकी मर्जी का कोई वश न हो..... औरतें कमाई नहीं जातीं.... कि जैसे चाहो उड़ा लो.... औरतें युद्ध नहीं होत...
अग्निगर्भा अमृता...
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  March 6, 2014, 7:36 pm
कितना अच्‍छा होता है एक दूसरे को जाने बगैरपास-पास होना और उस संगीत को सुनना जो धमनियों में बजता है उन रंगों में नहा जाना जो बहुत गहरे चढ़ते-उतरते हैं।शब्‍दों की खोज शुरू होते ही हम एक-दूसरे को खोने लगते हैं ,और उपके पकड़ में आते ही एक-दूसरे के हाथों से मछली की तरह फ...
अग्निगर्भा अमृता...
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  February 21, 2014, 1:47 pm
हमसफ़र होता कोई तो बांट लेते दूरियां राह चलते लोग क्‍या समझें मेरी मजबूरियां।। मुस्‍कुराते ख्‍़वाब चुनती ये नज़र किस तरह समझे मेरी कि़स्‍मत की नामंजूरियां।। हादसों की भीड़ है चलता हुआ ये कारवां जि़न्‍दगी का नाम है लाचारियां मजबूरियां।। फिर किसी ने आज छेड़ा जि़क्र-...
अग्निगर्भा अमृता...
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  February 11, 2014, 6:25 pm
छोड़ना मत तुम उम्‍मीद... एक दिनबादल का एक छोर पकड़कर वासन्‍ती फूलों की महक में लिपट... धरती गायेगी वसन्‍त का गीत.... सब दु:ख...सारे भय... सब आतंक... सारी असफलताएं ......सारा आक्रोशपिघलकर बह जाएगा सूरज के सोने के साथ....ओढ़ लेंगी सब दिशाएं गुलाबी बादलों की चूनर....मौसम गायेगारंग के गीत.... ...
अग्निगर्भा अमृता...
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  February 4, 2014, 7:28 pm
मेरी इस अस्मिता से सहम क्यों जाते हो तुम मानव होने के मेरे उद्घोष को पचा क्यों नहीं पाते तुमतुम्हें पता है किइसके बाद वस्तु नहीं रह जाउंगी मैंजिसे तुम इस्तेमाल करो और फेंक दोतुम्हें पता है कि तकिया भर नहीं रह जाउंगी मैंजिसकी छाती में मुहं छिपाकर रो लो तुम और फिर लतिया ...
अग्निगर्भा अमृता...
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  January 16, 2014, 10:47 am
मैं क्या हूं.....सूरज की एक किरनफूल की एक पंखुड़ीओस की एक बूंदहवा में उड़ता कोई आवारा पत्ताआंधी का एक झोंकाआग की एक लपटयाजीवन की एक धड़कनमुझे आज कुछ भी नहीं पता अपनाअपने आप से अनजान मैंअपनी ही तलाश में हूं इस सफर मेंमैं अग्निशिखा अमृताअब किसी अग्निपरीक्षा के लिए नहीं हू...
अग्निगर्भा अमृता...
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  January 15, 2014, 7:30 pm
न.....।बीते दिनों से लौटने को मत कहो..... उनकी यादों को संजो लो....समय ने बहुत सी सीपियां....सीपियों में मोतीतुम्‍हारे लिये छुपा रखे हैं....अपनी हथेलियों में.....उन्‍हें खोजो.....समेटने को  हथेलियां खोल दो.....।अनुजा.... 12.01.14...
अग्निगर्भा अमृता...
Tag :
  January 12, 2014, 7:39 pm
इतने विशाल साम्राज्‍य का स्‍वामी...इतने व्‍यापक समुदाय का राजाहासिलएक छोटी सीनसेनी....एक चिंगारीऔर तब्‍दील हो गया लपटों में .... ....छू लिया सारा आकाश....हम विदा नहीं देंगे....राख नहीं होने देंगे...जीना होगाहर चेतना में एक चुनौती की तरहघेर लेना होगा सारा आकाश....अनुजा30.10.13...
अग्निगर्भा अमृता...
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  October 30, 2013, 6:45 pm
कुछ बरस पहले......शायद 2005-06 की बात है.... उन दिनों मैं दिल्‍ली में थी, कथाकार विजय के साथ ऐसे ही चर्चा चल रही थी। चर्चा में कहीं राजेन्‍द्र यादव की चर्चा भी आयी...'सारा आकाश'से लेकर 'हासिल'तक की उनकी यात्रा, गाहे ब गाहे उनकी बेलाग टिप्‍पणियां, उनकी मान्‍यताएं, साहित्‍य की राजनीति ...
अग्निगर्भा अमृता...
Tag :
  October 29, 2013, 10:33 am
सूखे पत्तों की खरकन के बीचतलाशएक कोंपल की...एक चिनगी की...एक नर्म कली की...एक बूंद ओस की...चुटकी भर आस की...एक गुलमोहरी सपने की...अंजुरी भर चांदनी की...कुछ ज़्यादा तो नहीं ना !जीवन सासपने साया फिरटूटती उम्मीद सा...!अनुजा08.07.07...
अग्निगर्भा अमृता...
Tag :
  October 25, 2013, 3:36 pm
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