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मसि-कागद : View Blog Posts
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मसि-कागद

दोनों परिवारों में दोस्ती बहुत पुरानी या गहरी तो नहीं थी लेकिन वक़्त बीतने के साथ-साथ बढ़ती जा रही थी। महीने में कम से कम एक बार दोनों एक दूसरे को खाने के बहाने, मिलने के लिए अपने घर आमंत्रित कर ही लेते थे, इस बार दूसरे वाले ने किया था। सुरक्षा के उद्देश्य से दोनों की ही बि...
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दीपक 'मशाल'
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  February 6, 2015, 10:19 pm
कई दिनों बाद गुनगुनी धूप निकली थी। मैं आराम कुर्सी पर आँगन में बैठ अन्याय के विरोध में लिखी गई चेखव की एक प्रसिद्द कहानी का हिन्दी अनुवाद पढ़ रहा था कि तभी डाकिए ने दरवाज़े पर आवाज़ देते हुए पिछले महीने का मोबाइल का बिल मेरी तरफ़ उछाल दिया। हवा में ही बिल को ...
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दीपक 'मशाल'
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  December 28, 2014, 5:59 am
 साँझ ढलने के साथ-साथ उसकी चिड़चिड़ाहट बढ़ती जा रही थी, मनसुख को लगा कि - दिन भर की भूखी-प्यासी है और ऊपर से थकी-माँदी… इसीलिए गुस्सा आ रहा होगा, ये करवाचौथ का व्रत होता भी तो बहुत कठिन है। राजपूताना रेजीमेंट में ड्राइवर की नौकरी पर तैनात मनसुख आज ड्यूटी ख़त्म होते ही सीध...
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दीपक 'मशाल'
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  December 18, 2014, 10:56 am
मुआवज़ा सत्तर से ऊपर बुजुर्गों से पता चला कि इससे पहले क़स्बे में ऐसी बाढ़ उन्होंने सिर्फ तब देखी थी जब वो खुद बच्चे या फिर किशोर थे। हफ्ते भर की मूसलाधार बारिश और नजदीकी बाँध को कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा काट दिए जाने ने समूचे जिले को प्रलय का नमूना दिखा दिय...
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दीपक 'मशाल'
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  December 16, 2014, 9:54 am
रेलिंग का सहारा लेकर उसने किसी तरह धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ीं और साक्षात्कार कक्ष के बाहर जा पहुँची। अभी भी बारह मिनट शेष थे। पहले बैंच पर बैठकर दो मिनट को सुस्ताया फिर एक हाथ से बैग से पानी की बोतल निकाली और दूसरे से रूमाल, लगभग एक साथ ही माथे पर आये पसीने को पों...
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दीपक 'मशाल'
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  December 14, 2014, 10:05 am
कितनी ही महँगी जूतियाँ आज़मा चुके थे पर 'बात'ना बनी, चलने पर चुर्र-चुर्र की आवाज़ ही ना आती.जबसे किसी ने उन्हें बताया कि-जूतियों की ये ख़ास आवाज़ व्यक्ति के आत्मविश्वास को दर्शाती है तब से उन्हें गूँगी जूतियाँ रास ना आतीं. आज ही मिली पगार में से दो हज़ार रुपये चपरासी को द...
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दीपक 'मशाल'
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  December 11, 2014, 6:22 pm
  भले भूल जाएं संस्कार ज्यों हों वो नाम सालों पहले मिले कुछ अप्रभावी व्यक्तियों के   संस्कृति कर्पूर सी उड़ जाए  या जादूगर के टोप से निकले खरगोश की तरह हो जाए गायब फिर हवा में चाहे भाषा स्वयं को विस्मृत कराने पर आ तुले एक-एक शब्द छीन लिया जाए...
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दीपक 'मशाल'
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  December 10, 2014, 8:27 pm
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दीपक 'मशाल'
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  April 26, 2014, 7:49 pm
जनसत्ता में पृष्ठ १०, सम्पादकीय के 'दुनिया मेरे आगे'स्तम्भ में० ...
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दीपक 'मशाल'
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  April 8, 2014, 2:54 am
जनसत्ता में पृष्ठ १०, सम्पादकीय के 'दुनिया मेरे आगे'स्तम्भ में ...
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दीपक 'मशाल'
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  April 4, 2014, 12:28 pm
1- सार्वभौमिक खालीपन/ दीपक मशाल कोई असल में वो नहीं होता  जो वो अक्सर दिख जाया करता है राह चलते मुस्कुराते, खिलखिलाते हाथ मिलाते गले लगाते नहीं होता कोई वो जो आसानी से सामान्य अवस्था में रहता है बल्कि कोई वो होता है जिसकी झलक वो दिखला जाता है कभी-कभार भावावेश में अतिअन...
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दीपक 'मशाल'
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  March 31, 2014, 12:05 am
समय बिगबैंग का एक उत्पाद शेष सभी उत्पत्तियों को जकड़ लिया जिसने अपने बाहुपाश में जिसकी देखरेख में पनपीं कितनी उत्पत्तियाँ आकाशगंगायें सूर्य तारे सितारे ग्रह उपग्रह सबने समय की अंगुली पकड़ सीखा चलना दौड़नाधुरी पर घूमना फेरे लगाना  भभक कर मिट जाना ...
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दीपक 'मशाल'
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  January 28, 2014, 4:20 pm
ठेस / दीपक मशाल - फ़िल्म तो अच्छी थी लेकिन इस एक्टर के बजाय किसी मस्क्युलर हीरो को लेते तो ये और बड़ी हिट होती शो ख़त्म होने पर सिने कॉम्प्लेक्स का एग्जिट गेट धकेलकर बाहर निकलते हुए प्रेमी ने प्रेमिका पर अपना फ़िल्मी ज्ञान झाड़ा - हम्म, हो सकता है प्रेमिका ने धीरे से क...
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दीपक 'मशाल'
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  January 22, 2014, 9:01 pm
दो कवितायें १- शहर में भेड़िया / दीपक मशालअनुभव नया थाएक जीते-जागते भेड़िये को देखनाऔर देखना क़रीब सेजिज्ञासा से फिर छूकरमुँह खुलवाकर जानना उसके दाँतों का पैनापनउसके बालों को सहलाकरउसके साथ तस्वीर खिंचवा कर देखनाहज़ार साल पुराना रूप धरे वो मेला तम्बुओं में बिकतीउसके ज...
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दीपक 'मशाल'
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  December 17, 2013, 6:25 pm
क़यामत पूरी नहीं आती फुटकर-फुटकर आती है ज़िंदगी के कुकून को इत्मिनान के साथ नाज़ुक कीड़े में तब्दील होते देखने में मज़ा आता है उसेक़यामतसिर्फ देखती है लगातार टुकुर-टुकुर बिना अतिरिक्त प्रयास के जानती है ये खुद ही खा जायेंगे खुद को इसलिए अलसा जा...
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दीपक 'मशाल'
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  September 23, 2013, 3:32 pm
ये मानोगे तुम एक उम्र के बादये दुनिया वो नहीं थी जो देखी तुमनेबिन सूरज वाली आँखों की खुद की रौशनी में ये दुनिया वो नहीं थी जो सोची तुमने देकर के जोर दिल पेये मानोगे तुम एक उम्र के बादअगर नहीं है ये शोर से, उमस और पसीने की बू से भरी रेलगाड़ी तो आसमानों के बिजनेस क्लास का क...
मसि-कागद...
दीपक 'मशाल'
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  June 17, 2013, 2:26 pm
 सर्दियों ने लन्दन को अपने आगोश में लेना शुरू कर दिया है लेकिन 5 नवम्बर की शाम लन्दन के कुछ इलाकों ने ठण्ड की सत्ता के आगे समर्पण करने से इनकार कर रखा था। जी हाँ इस शाम के वक़्त में भी लन्दन की राजनीति का केंद्र 'हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स' गुनगुनी धूप की गर्मी में अपने आप को सेंक रहा...
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दीपक 'मशाल'
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  November 9, 2012, 5:58 am
जाने किस जद्दोजेहद में मर गयापरिंदा था सियासी ज़द में मर गयाहुआ जो भी ऊँचा इस आसमाँ सेअपने आप ही वो मद में मर गयामशाल...
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दीपक 'मशाल'
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  October 17, 2012, 4:13 pm
1- चोर-सिपाही-वजीर-बादशाह चार पर्चियां बनाई गईं.. उन पर नाम लिखे गएचोर, सिपाही, वजीर और बादशाहउन्हें उछाला गया, चार हाथों ने एक-एक पर्ची उठाई. फिर उनमे से एक सीना चौड़ा करके गरजा-बोल-बोल, मेरा वजीर कौन?-मैं जहाँपनाह-ह्म्म्म.. इन दोनों में से चोर सिपाही का पता लगाओवजीर दो मिनट ...
मसि-कागद...
दीपक 'मशाल'
Tag :
  October 9, 2012, 8:04 pm
मेरे प्रश्नतुम्हारे विरोध में नहींमगर अफ़सोस किनहीं कर पाते हैं ये समर्थन भीये प्रश्न हैंसिर्फ और सिर्फ खालिस प्रश्नजो खड़े हुए हैंजानने को सत्यये खड़े हुए हैं धताने को उस हवा कोजो अफवाह के नाम से ढंके है जंगलये सर्दी, गर्मी, बारिशऔर तेज़ हवा में डंटे रहेंगेतब तकजब ...
मसि-कागद...
दीपक 'मशाल'
Tag :
  October 2, 2012, 5:55 pm
१- अपराध का ग्राफ''मारो स्सारे खों.. हाँथ-गोड़े तोड़ देओ.. अगाऊं सें ऐसी हिम्मत ना परे जाकी. एकई दिना में भूखो मरो जा रओ थो कमीन.. हमायेई खलिहान सें दाल चुरान चलो... जौन थार में खात हेगो उअई में छेद कर रओ.. जासें कई हती के दो रोज बाद मजूरी दे देहें लेकिन रत्तीभर सबर नईयां...'' कहते ह...
मसि-कागद...
दीपक 'मशाल'
Tag :
  September 1, 2012, 8:09 pm
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