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Blog: वंदे मातरम्

Blogger: abhishek shukla
पहाड़ों को ज़मीन अच्छी लग रही थी। ज़मीनों को समंदर। समंदर पठार बनना चाहता था; पठार अपने भीतर के घाव से जूझ रहा था। पठार की कुंठा थी कि हाय! न हम समंदर बने, न समतल रहे, न पहाड़ों में गिनती हुई। जिसका जो यथार्थ था, वही उसे काटने दौड़ रहा था। ईश्वर उलाहने, ताने सुनकर क्षुब्ध था, स... Read more
clicks 4 View   Vote 0 Like   9:55am 17 Jun 2021 #
Blogger: abhishek shukla
  जो लौट गए क्या आयेंगे?थी राह अपरिचित कूच कियेकिस हेतु चले कुछ ज्ञान नहीं, रुक सकते थे पर नहीं रुकेअनहोनी का भी भान नहीं,थोड़े रूठे, फिर रूठ गयेहम उन्हें मना क्या पायेंगे?जो लौट गये...क्या आयेंगे?दोनों बुआ के साथ शायद आखिरी तस्वीर यही है.राहें तय थीं, तिथियां तय थींहम ... Read more
clicks 24 View   Vote 0 Like   7:44pm 1 Apr 2021 #
Blogger: abhishek shukla
जब हम हद से ज़्यादा बोलते हैं, तब हमें अंदाज़ा भी नहीं होता कि हम कितना ग़लत बोल गए हैं. बोलना ग़लत नहीं है, लेकिन इतना ज़्यादा बोलना, हर बात पर बोलना, बिना सोचे-समझे बोलना, सही भी नहीं है. सोचने में वक़्त लगता है, बोलने में मुंह खोलने की देर होती है, शब्द ख़ुद-ब-ख़ुद आने लगते ... Read more
clicks 18 View   Vote 0 Like   7:49pm 4 Feb 2021 #
Blogger: abhishek shukla
 शेली, किट्स और ब्राउनिंग कभी पसंद नहीं आए। पसंद आई तो विलियम वर्ड्सवर्थ की फंतासी। नौवीं में पहली बार पढ़ी और अब तक पढ़ रहा हूं लूसी ग्रे।  मैथ्यू अर्नाल्ड भी पसंद आए।  टेनिसन को पढ़ा तो नींद आई। और भी होंगे, जिन्हें पढ़ा लेकिन जाना नहीं। कुछ याद रखने लायक लगा ही नहीं... Read more
clicks 13 View   Vote 0 Like   7:33pm 5 Jan 2021 #
Blogger: abhishek shukla
कभी-कभी न ख़्याल आते हैं न ख़्वाब। ऐसा क्यों होता है, इसकी कोई वाजिब वजह पता नहीं। शायद पता भी न चले।ज़िन्दगी अनसुलझी पहेली है, हम कई दफ़ा सुन चुके हैं। सुनते रहे हैं, या शायद सुनते रहेंगे। लेकिन हर पहेली, सुलझती है, धीरे-धीरे वक़्त के साथ। सबका कोई एक जवाब होता है। पर ज़िन... Read more
clicks 23 View   Vote 0 Like   3:03pm 30 Oct 2020 #
Blogger: abhishek shukla
 ब्लॉग का फ़ीचर इमेज बनाया है Mir Suhail ने.अप्रिय कुपत्रकारों और संपादकों!गंजेड़ी, भंगेड़ी और नशेड़ी जैसी कुछ विशिष्ट उपमाओं से आप विभूषित हैं। दैव कृपा से आचरण में भी उपमायें परिलक्षित होती हैं।आपका अलौकिक ज्ञान, सोमरस और प्रभंजनपान के उपरांत ही बाहर निकलता है।हे अग्नि... Read more
clicks 27 View   Vote 0 Like   10:41am 7 Sep 2020 #
Blogger: abhishek shukla
गांव में पहली बार दो तल्ले का घर तैयार हुआ. झोपड़ियों वाले गांव में पहली बार ईंट-गारा का पक्का मकान देखकर लोग हैरान रह गए. जब घर बन रहा था तब सुबह-शाम लोग यह देखने आते कि कैसे घर तैयार किया जाता है. जब घर बन गया तो ढींगुर दो तल्ले पर बड़का रेडियो पर गाना गवाते. जो घर देखने आता ... Read more
clicks 62 View   Vote 0 Like   4:35am 24 Jul 2020 #
Blogger: abhishek shukla
31 दिसंबर 2018। दुनिया नए साल के स्वागत की तैयारी कर रही थी, मैं अम्मा(दादी) की अस्थियों को गंगा में विसर्जित करने वाराणसी जा रहा था, भवानी चाचा के साथ। साल बीत रहा था, साथ ही अम्मा की स्मृतियां भी।रात के 12 बजे ट्रेन में हैप्पी न्यू ईयर बोल रहे थे लोग लेकिन मेरे लिए कुछ अच्छा नह... Read more
clicks 44 View   Vote 0 Like   8:22am 31 Dec 2019 #
Blogger: abhishek shukla
भारत विश्वगुरु था. भारत को विश्व गुरु एक बार फिर से बनाना है. मगर कैसे...इसका जवाब शायद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनकी कैबिनेट और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पास भी नहीं है. मोदी सरकार के त्रिमूर्तियों के बयान सुनिए, उनके बयानों से लगता है कि अगले 5 साल में ही भारत विश्व ग... Read more
clicks 51 View   Vote 0 Like   4:29pm 6 Dec 2019 #
Blogger: abhishek shukla
पतझर जैसे क्यों दिन हैंसिसकी वाली सब रातें,उलझन को अंक समेटेकितनी अनसुलझी बातें।क्या समझ हमें आयेगानगरों का यह कोलाहल,हा! कौन यहां पीयेगाजगती की पीर हलाहल।जीवन भर का आडम्बरआडम्बर ही जीवन भर,मन कहे चलो अब छोड़ोकुछ शेष बचा है घर पर।इक खटिया है दो रोटीजी भर पीने को पानी,भ... Read more
clicks 31 View   Vote 0 Like   8:50pm 9 Sep 2019 #
Blogger: abhishek shukla
अच्छे दिनों की बुराई इतनी सी है कि उनका प्रभाव बहुत क्षणिक होता है. बुरे वक़्त से दो दिनों के लिए ही भेंट हो जाए तो महीनों के अच्छे दिन निष्प्रभावी हो जाते हैं. दुख के दो दिन, महीनों, वर्षों के अच्छे दिनों पर भारी पड़ जाते हैं.मन बस यही कहता है कि कब दिन बहुरेंगे.अब दु:ख सहा ... Read more
clicks 42 View   Vote 0 Like   6:00pm 8 Sep 2019 #
Blogger: abhishek shukla
जून में अम्मा की वार्षिकी थी. मैं घर गया था. अम्मा को गए हुए 6 महीने बीत गए थे. पाले काका से मिलने उनके पास गया. काका, जीवन में पहली बार बीमार लगे थे. बहुत असहाय भी. इतने असहाय कि जैसे भगवान भी उनकी पीड़ा न हर सकें. उन पर रौब जंचता था, लेकिन काका डरे-डरे से लगे.ऐसा लगा कि जैसे नियत... Read more
clicks 33 View   Vote 0 Like   8:41am 6 Jul 2019 #
Blogger: abhishek shukla
रूप के उपमान आकुल हो गए हैंदर्प भी उन्माद जितना छा गया है,हम परागों के निषेचन में फंसे हैंफूल के प्राणों पे संकट आ गया है।सूख जाना फूल की अन्तिम नियति हैपर भंवर को कब हुआ है भान इसका,प्यास अधरों की रहे बुझती परस्परलालसा में सच कहो क्या दोष किसका?जीविका है या गले की फांस ह... Read more
clicks 54 View   Vote 0 Like   5:00pm 14 May 2019 #
Blogger: abhishek shukla
झरने इंतज़ार में थेकोई उन्हें रुकने को कहेगाबूंदें चाहती थींधरती पर न गिरेंसूरज स्वार्थी होना चाहता थाएक दिन के लिएचांद चाहता थाउसे न मिले उधार की रोशनी,पेड़ की बहुत इच्छा थीकिइक रोज़ वह अपना फल खाएगाय अपना ही दूध पीने के लिएकई दिनों से तड़प रही थीनदियों की इच्छा थीकि एक ... Read more
clicks 78 View   Vote 0 Like   10:06pm 29 Mar 2019 #
Blogger: abhishek shukla
 यार! अब मन न कहीं लगे।अपलक देखूँ, व्योम निहारूँ,आतुर होकर तुम्हें पुकारूँ;अहो! हुए तुम इतने निष्ठुर,तुम्हारी, चुप्पी क्यों न खले?सारे वचन तोड़ बैठे हो,अपने नयन फोड़ बैठे हो;किसने प्रियतम मति है फेरीअकिंचन, हम रह गए ठगे!कल तक सब कुछ उत्सवमय था,जीवन कितना सुमधुर लय था;हुए प... Read more
clicks 55 View   Vote 0 Like   3:39pm 24 Mar 2019 #
Blogger: abhishek shukla
जिन्हें चम्बल में रहना था वे अब संसद में रहते हैं।किसी ने ठीक ही कहा है।हमारे जनप्रतिनिधि ऐसे हैं। इन्हें जनता ने अपना प्रतिनिधि बनाकर संसद और विधानसभा में भेजा है।अब वक़्त आ गया है इन्हें जेल भेजा जाए। अपने-अपने कार्यों के अनुरूप। लोकतांत्रिक देश में ये आज़ाद घूमने ल... Read more
clicks 67 View   Vote 0 Like   12:21pm 6 Mar 2019 #
Blogger: abhishek shukla
हमारा वक्त बिक चुका है. एक-एक पल किसी ने खरीद रखा है. किसी की आधीनता के बदले हमें कागज के कुछ टुकड़े मिलते हैं, जिनसे हमारी थोड़ी बहुत जरूरतें पूरी होती हैं. बस पेट पालने भर तक.पेट सागर है....भर नहीं सकता. आजीवन रिक्त रहता है. ऐसा मैं नहीं 'कड़जाही काकी'कह के गई है.कई बार लगता है... Read more
clicks 50 View   Vote 0 Like   6:01pm 3 Mar 2019 #
Blogger: abhishek shukla
अम्मा(दादी) वादा तोड़ गई। अम्मा ने कहा था कि अभी कहीं नहीं जाने वाली। जिस दिन अम्मा ने हमें छोड़ा उस दिन सुबह अम्मा से वीडियो चैट भी हुई थी। अम्मा ने कहा था, 'लाला ते परेशान न हो, हम कहूं जाब नाहीं। हमार तबियत बहुत ठीक है। घबरा न।'भाभी ने रात में मैसेज किया था कि अम्मा की तबि... Read more
clicks 73 View   Vote 0 Like   4:36am 8 Jan 2019 #
Blogger: abhishek shukla
कई बार भाग जाने का मन करता है। अकेलापन काटने दौड़ता है, किसी का साथ होना चुभता है।लोग साथ हों तो बेचैनी, न हों तो अजीब सी चुभन। ठहाके हर बार अच्छे नहीं लगते, अपनी हंसी भी कई बार ख़राब लगती है।ख़ुश होना चाहते हैं लेकिन हो नहीं पाते। सच है जो गया है उसे लाया नहीं सकता, फिर भी मन क... Read more
clicks 87 View   Vote 0 Like   12:54pm 15 Nov 2018 #
Blogger: abhishek shukla
हादसों की आदत हो गई है. हादसे हर बार आंखों में ढेर सारा आंसू देकर चले जाते हैं.अमृतसर हादसे में जिन लोगों की मौत हुई है उनकी तस्वीरें देखकर दिल थमा सा जा रहा है.इतनी विभत्स तस्वीरें शायद ही पिछले दिनों में देखने को मिली हों.बहुत डरावनी तस्वीरें हैं भीतर से कंपकंपा देने व... Read more
clicks 64 View   Vote 0 Like   6:17pm 19 Oct 2018 #
Blogger: abhishek shukla
वही कविताएं सबसे ख़ूबसूरत होती हैं जो कवि के मन में पलती हैं। जिन्हें कोई और नहीं सुन पाता। जिनकी तारीफ़ कवि ख़ुद ही करता है, जिन्हें वह ख़ुद लिखकर मिटा देता है।उसकी नज़रों में अपनी अनगढ़ कविताएं सबसे ख़ूबसूरत होती हैं लेकिन दुनिया के लिए वह उन्हें छंदों की बेड़ियों में जकड़ता ... Read more
clicks 61 View   Vote 0 Like   11:01pm 16 Oct 2018 #
Blogger: abhishek shukla
सहज भाषा के नाम पर हमने, भाषा का वास्तविक सौंदर्य बोध खो दिया है।नई पीढ़ी कितना कुछ क्लिष्ट कहकर अनदेखा कर देगी। कितने अध्याय अनछुए रह जाएंगे। भाषाई सरलीकरण के नाम पर कितने शब्दों की निर्मम हत्या हुई है। उन्हें याद रखने वाली पीढ़ी अंग्रेज़ी में भविष्य तलाश रही है। एक... Read more
clicks 95 View   Vote 0 Like   9:18pm 20 Sep 2018 #
Blogger: abhishek shukla
एक लड़की अपने प्यार के साथ भागने के लिए कैसे भी तैयार हो जाती है, बिना कुछ सोचे-समझे लेकिन लड़के बहुत सोचते हैं। उनके लिए बेड सेफ़ साइड है, लिव-इन या शादी मुश्किल। मां-बाप शादी के लिए तैयार भी हों तो भी, लड़के अकसर बचते हैं। वजह बेहतर की तलाश हो, या कुछ और लेकिन अकसर ऐसा होता है। ... Read more
clicks 74 View   Vote 0 Like   4:11pm 18 Sep 2018 #
Blogger: abhishek shukla
राखी वाले दिन कलाई का सूना रह जाना अखरता है। बेहद ज़्यादा। तब और भी जब आपके पास ढेर सारी बहनें हों, जिनके पास जाने के लिए आपको कम दूरी तय करनी हो।मन लाख समझाए कि बहनों का आशीर्वाद हमेशा साथ रहता है भले ही वे कलाई पर राखी बांधे या न बांधे लेकिन दिल नहीं मानता। तब तक, जब तक कि व... Read more
clicks 56 View   Vote 0 Like   4:09pm 26 Aug 2018 #
Blogger: abhishek shukla
कोई छह-सात वर्ष हो गए थे झूला झूले हुए. बारहवीं पास करने के बाद जो त्योहार छूटे, सावन में भी उनमें से एक था. मुझे सावन  त्यौहार ही लगता है. महीने भर का त्यौहार. कजरी, आल्हा और गीतों का महीना. जिधर से गुज़रो कहीं न कहीं से किसी की खनकती आवाज़ में कोई गीत कानों तक पहुंच ही जाता ... Read more
clicks 61 View   Vote 0 Like   7:00pm 12 Aug 2018 #
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