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वंदे मातरम् : View Blog Posts
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वंदे मातरम्

तुम अलग युग की कहानीहम अलग युग की कथा हैं,व्यक्त जिनको कर न पाएमूकवत मन की व्यथा हैं ।।तुम किसी मरुभूमि में से मेघ का संधान हो क्या?साधना की ही नहीं परईश का वरदान हो क्या??- अभिषेक ...
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  November 14, 2016, 4:02 pm
पापा! मेरे नम्बर भले ही इस बार कम आए  हों लेकिन मुझे एक दिन मेरे सारे टीचर्स पढ़ेंगे। हरिराम आचार्य जी ने इस लेटर में जो मेरी शिकायत लिखी है न एक दिन मेरी बड़ाई करेंगे, तब मैं उन्हें बिलकुल भी भाव नहीं दूंगा।पापा हमेशा की तरह मेरी बात पर मुस्कुराते हुए  आगे बढ़ जाते।मुझे ...
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  November 9, 2016, 6:35 pm
सुन रहा हूँ आहटों को  नींद आंखों से परे है,सिसकियां दर्शन में उतरीं  मौन होठों को धरे है,इस अलग रणक्षेत्र में तुम  काव्य का आह्वान हो क्या?साधना की ही नहीं पर  ईश का वरदान हो क्या??...
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  October 27, 2016, 12:21 pm
शहर की ऊंची दीवारों में कैद हो गया मेरा बचपन,चिमनी भट्टी,शोर-शराबा कैंटीन में चौका बरतन ।।दिनभर सारा काम करुं तो खाने भर को मिलजाता है,कुछ पैसे मैं रख लेता हूँ कुछ मेरे घर भी जाता है।।फटे हुए कपड़े मुन्नी के मां को नहीं दवाई मिलतीअपना भी तन मैं ढक पाऊँ इतनी कहाँ कमाई मिल...
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  October 23, 2016, 2:04 pm
काश! ऐसा मुमकिन होता कि वैज्ञानिक कोई ऐसा टाइम मशीन बनाने में सफल हो जाते जिसमें बैठकर मैं अपने बचपन में पहुंच जाता। तब, जब मैं घर में खूब उत्पात मचाता था।उस वक़्त जब मैं स्कूल नहीं जाना चाहता था। उस वक़्त जब दशहरे की छुट्टी दशहरे से चार-पांच दिन पहले ही हो जाती थी और हम ल...
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  October 12, 2016, 12:05 am
अंतरिक्ष को पात्र बनाकर नेह का सागर लाई नानीजिसमें सारी दुनिया तर हो वैसी ही गहराई नानी,हमको हर-पल यही लगा की पग पग पर है साथ हमारेकई दिनों से ढूंढ रहे हैं जाने कहाँ हेराई नानी?आँखों में जब आँसू आते झट से विह्वल हो जाती थीअब रो-रो कर बुरा हाल है कैसे हुई पराई नानी?पल-पल क्ष...
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  October 7, 2016, 5:31 pm
बीते सप्ताह एक किताब हाथ लगी ''आज़ादी और आदिवासी''।इस किताब के लेखक हैं पत्रकार अमरेंद्र किशोर। प्रकृति पुत्रों की बनैली संस्कृति और उनके भाग्य में मढ़ी गयी विसंगति तथा समाज के साथ उनके संघर्ष पर अब तक लिखी गई सबसे सटीक किताबों में से एक किताब आज़ादी और आदिवासी भी है।आम तौ...
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  October 1, 2016, 1:53 pm
शहर के तंग गलियों में टूटे हुए सपनों की एक लंबी कहानी है. एक अज़ीब सी कुंठा में लोग जीते हैं.कभी कई दिन भूखा रह जाने की कुंठा तो कभी दिहाड़ी न मिलने की कुंठा, कभी सभ्य समाज की गाली तो कभी दिन भर की कमाई को फूंकने से रोकने के लिए शराबी पति की मार, कभी पति का पत्नी को जुए में हार ज...
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  September 24, 2016, 1:45 pm
हा! भारत! हा! जन-गण-मन!क्यों दग्ध ह्रदय को लिए फिरे?क्या प्रत्यंचाएं टूट गईंया गाण्डीव रह गए धरे?धिक! धिक! जन गण मन नायक!क्यों पुनः यही आभास हुआहोकर मदान्ध तुम नहुष हुएफिर भारत का उपहास हुआ।।क्यों शर फिर सीना तान रहा?क्यों सिमटा मेरा वितान रहा?क्यों सहानुभूति उपजे मन मेंज...
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  September 19, 2016, 11:14 am
नयन में उतर रहे कुछ स्वप्नसार जिनका मुझसे अनभिज्ञआज और कल की ऊहापोहअब कहाँ रहा मेरा मन विज्ञ ?कई युग बीत गए हैं मित्रयथावत रहा कहाँ संसार,नित्य परिभाषाएं बदलींहुआ केवल मन का अभिसार.यही है जीवित मन की शक्तियही मानव मन का उद्गार,एक ही कर्म मनुज के योग्यजीत लो जग का निश्छ...
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  September 12, 2016, 5:14 pm
लोक भाषाएँ लोक संस्कृतिओं की संवाहक होती है.विभिन्न प्रकार की लोक भाषाएँ और लोक संस्कृतियां भारत की विभिन्नता में एकरूपता की अवधारणा को पुष्ट करती हैं.भारत की यही विशिष्टता है विभिन्नता में एकरूपता.इन्हीं लोक भाषाओँ में एक सुमुधर और चिर पुरातन भाषा है अंगिका.अंगिक...
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  September 5, 2016, 6:59 pm
जिन हाथों में कलम चाहिए उन हाथों मेंबर्तन हैकैसे सबका कहना मानूँ दया जगत कादर्शन है,कुछ सपने मैंने भी देखे थे पढ़ने औरलिखने केअब नसीब में मेरे केवल चौका,पोंछाबर्तन है।कुछ उम्मीदें दुनिया से हैं कुछ अधिकारहमें भी दे दो,सबको तो दुलराते रहते थोड़ा प्यारहमें भी दे दो ,मुझे ...
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  August 30, 2016, 1:41 pm
क्या लिखूँ?? कुछ सूझ नहीं रहा है। कुछ दिनों से लिखना चाह रहा हूँ फिर भी नहीं लिख पा रहा। जब लिखने का मन होता है तब क्लास चलती है, क्लास के बाद लाइब्रेरी फिर मेट्रो। वहां धक्का-मुक्की में अंदर का साहित्यकार कभी राहुल सांकृत्यायन बनता है तो कभी निराला।इस चक्कर में अभिषेक क...
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  August 23, 2016, 4:08 pm
देश नहीं कहता तुमसे तुम राष्ट्रवाद के प्रेत बनोसम्प्रभुता के बागी बनकर उग्रवाद की भेंट चढ़ो,वाद विवाद से हो सकता जो शासन का निपटारातो संसद का अधिपति होता लोकतंत्र का हत्यारा,हथियारों की भाषा केवल सीमित है सीमाओं परलेकिन घर में हुई बगावत क्या गुजरेगी माँओं पर?कितनों क...
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  August 5, 2016, 4:33 pm
मन बावला है, मन बावला हैसोचे ये कुछ भी अजब मामला है।।मुझको ख़बर है किख़्वाहिश हुई है कुछ तो मोहब्बत सीसाज़िश हुई है कोई है गुम-सुम ख़्यालों मे ख़ुद के लगता है चाहत की बारिश हुई है...मन बावला है,मन बावला हैसोचे ये कुछ भी अजब मामला है।।उसने कहा कुछमैंने सुना कुछ सपने मे उसने शायद ...
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  July 16, 2016, 5:01 pm
भटक रहे हो मार्ग केशव! यहां से आगेनहीं है राधामचा है मन में कैसा कलरव तुम्हारेपथ में अनंत बाधा,सहज से मन का मधुर सा भ्रम है कि तुम सुपथ को कुपथ समझतेजहां-जहां तक ये दृष्टि जाए वहां-वहां तक दिखेगी राधा।।जो तुमको लगता है प्रेम सब कुछ तो प्रेमसा कुछ नहीं है राधाजगत का उपक्र...
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  July 9, 2016, 7:21 pm
पर्वत -पर्वत भटक रहा हूँहे शिव तुमको पाने को,वन-वन भटका विहग बन रहाद्वार तुम्हारे आने को,किंतु तुम्हारे पग चिह्नों परश्वेत-श्वेत सा दिखता क्या है?जो तुम ढ़क लेते हो खुद कोबोलो इससे मिलता क्या है??पैर भले असमर्थ हो रहेदृष्टि भले असहाय हुई हैलेकिन तुम तक आना मुझकोभक्ति नह...
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  July 7, 2016, 9:36 pm
कल कालेज का आख़िरी दिन था आज। पांच साल कब बीते कुछ पता ही नहीं चला। मम्मी बिना मैं एक दिन भी नहीं रह पाता था लेकिन मेरठ में पांच साल बिता गए , बिना रोये, कुछ पता ही नहीं चला।पता भी कैसे चलता मौसी जो पास में थीं। मौसा दीदी, हिमानी सब तो थे..घर की याद भी कैसे आती?वीरू भइया और मैं .......
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  June 24, 2016, 1:28 pm
जब अखबारों में भूले-भटके नाममेरा आ जाता हैजब मेरा कोई लिखा हुआ गीत घर मेंमिल जाता हैजब सूरज के जगने से पहले फोन मेराघर जाता हैपापा कितना खुश होते हैं??दिन भर की भाग दौड़ से जब पापाथक जाते हैंमुकदमों की माथापच्ची छोड़ घर मेंजब आते हैंजब मम्मी अपने हाथों से चायबना कर लाती...
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  June 20, 2016, 5:40 pm
अच्छाई विरूपता है और बुराई व्यक्ति का मूल स्वाभाव। अच्छाई सिखाई जाती है और बुराई जन्म से व्यक्ति में विद्यमान होती है। स्वाभाव से हर व्यक्ति उद्दण्ड होता है किन्तु विनम्रता ग्रहण या अनुकरण करने की विषय-वस्तु होती है।विरूपता सीखी जाती है। वास्तव में किसी भी शिशु के व...
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  June 5, 2016, 9:48 am
सावन लग गया है लेकिन पता नहीं चल रहा है।आज गाँव की बहुत याद आ रही है। मेरे मन मेंजो छोटा सा कवि बैठा है न वो इस महीने मेंकुछ ज्यादा ही सक्रिय हो जाता था गाँवमें। जब बारिश होती थी तो अक़्सर मैं भीगतेहुए निकल पड़ता था खेतों की ओर....बादलोंसे बात करने। मेरे खेत के आस-पास खूब सा...
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  August 7, 2015, 8:39 pm
मेरे देश के नेताओं की तथाकथित धर्मनिरपेक्षता, अहिंसा के नाम पर किसी भी हद तक जाकर आतंक और आतंकवाद का समर्थन कर स्वयं को उदारवादी या अहिंसक कहना, मार्क्सवाद की कुछ घटिया और  बक़वास किताबें पढ़ कर ईश्वर को झूठ और देश को कुरुक्षेत्र समझने की परम्परा ने देश को सबसे अधिक न...
वंदे मातरम्...
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  July 31, 2015, 3:15 pm
इतनी जल्दी नहीं जाना था सर आपको, सुरक्षित नहीं है आज भी भारत....आपकी जरुरत थी इस देश को...आपके अनुभव और मार्गदर्शन में भारत अभी और ऊँचाई छूता...नए कीर्तिमान स्थापित करता....आप चले गए तो डर लग रहा है..आपकी कमी हमेशा खलेगी क्योंकि राष्ट्र को जीवन समर्पित करने वाले लोग अब गिनती के...
वंदे मातरम्...
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  July 27, 2015, 9:46 pm
हम खड़े हैं यहाँ हाथ में जानलिएबुझ रहे हैं घरों में ख़ुशी केदिए,देश रौशन रहे हम रहे नरहेआखिरी साँस तक हम तोलड़ने चले,हम तो परवाने शमां  में जलनेचले।हम को परवाह हो क्यों जानकी?हम तो बाजी लगाते हैं प्राणकी,मोहब्बत हमें अपने माटी से है,है शपथ हमको अपने भगवान्की।हाथ मे...
वंदे मातरम्...
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  July 16, 2015, 2:30 pm
जब ज्ञान का दीपक बुझने लगेजब तम की ऐसी आँधी हो,जब विपद विपत् सा लगने लगेमन ही मन का अपराधी हो,तब बंद कपाटों को खोलोऔर रश्मि धरा पर आने दो,जो तिमिर उठे अंतर्मन मेंउनका अस्तित्व मिटाने दो।निशा घेर ले जिस मन कोउसे शान्ति कहाँ मिल पाती है?दिशा हीन सा मन भटकेपर मुक्ति नहीं मि...
वंदे मातरम्...
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  July 12, 2015, 10:59 pm
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