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Voice of Silence

गम तो दिए हैं जिंदगी ने लेकिन उम्मीद है कि दीदारे-यार होगा बहाने बहुत हैं जीने के लेकिन जीता हूँ कि विसाले-यार होगा होती है जब हवाओं में जुंबिश लगता है तू आस-पास होगा रात की तन्हाइयाँ डराती नहीं किसी सुबह तू मेरे साथ होगा ...
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  December 19, 2015, 8:54 pm
इस रात का सबेरा नहीं है तू मिलेगा आसरा नहीं है मन्दिर मस्जिद आरती अजानें सब कुछ है, आस्था नहीं है टूटे मिथक सभी जिंदगी के साँसें हैं लालसा नहीं है मौसम का ये कैसा मिजाज चंदा नहीं है, सूरज नहीं है ...
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  December 19, 2015, 8:34 pm
अम्बे तेरी वंदना, करता हूँ दिन-रात मिल जाए मुझको जगह, चरणों में हे मात चरणों में हे मात, सदा तेरे गुण गाऊँ चरण-कमल-रज मात, नित्य ही शीश लगाऊँ अर्पित हैं मन-प्राण, दया करिए जगदम्बे शब्दों को दो अर्थ, मात मेरी हे अम्बे  ...
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  December 18, 2015, 8:40 pm
तुम्हारे घर सुना सबेरा बहुत है यहाँ रात बीती अँधेरा बहुत है समय की हैं बातें सबेरे-अँधेरे कहीं नींद, कहीं रतजगा बहुत है तुम्हें मिलते हैं साथी बहुत से हमें तन्हाई का सहारा बहुत है याद करना और आँसू बहाना वक्त बिताने का बहाना बहुत है कभी तो निकलोगे रस...
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  December 18, 2015, 8:28 pm
थोड़ा बरस के थम गए वो बादल कहाँ के थे आँखों में नमी शेष है आँसू यहाँ पे थे इस माहौल को देखते सोचता हूँ एक बात आदम यहां हैं तो अहरमन कहां पे थे कई बरस हो गए कोई शोर नहीं हुआ लगता है क्या आपको गांधी यहां पे थे अब तो मिसालें भी न रहीं कुछ कहने के लिए बातों को यूं समझ लें वो सम...
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  December 16, 2015, 10:03 pm
भरती खातिर आये लल्ला, सीना झट से दिया फुलाय। नाप सको तो नापो सीना, पसली पसली दिया दिखाय।। पेट पीठ सब एक हो गयी, दम ऐसा कुछ दिया लगाय। प्रत्यंचा सी देह तन गयी, तन कुछ ऐसा दिया लचाय।। गर्दन अकड़ी सीना फूला, पाछे हाथ दिया फैलाय। सूरत जैसे आम चुसा हो, अँखिया भीतर कोटर नाय।। ...
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  December 16, 2015, 9:59 pm
खेल ऐसा ये अनोखा हम सभी को भा गया देश का हर खेल छूटा, यह विदेशी छा गया खेल की दीवानगी है, रंग ऐसा चढ़ गया छोड़ के सब काम अपने, मन इसी में रम गया आड़ में इस खेल की बाजार अब सजने लगे बोलियां अब लग रहीं, ईमान अब बिकने लगे लोभियों ने यूं डसा है, दंश अब चुभने लगे अब नियंता खेल के, इस खे...
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  December 16, 2015, 9:58 pm
सिखावा रे हमहूं का, अइसा जतन कछु हम होइ जाई अब, पास ई भरती मा। मोट ताज लोग सब, आय तो इहां बाटेन कइसे होइ पइबै, पास ई भरती मा। जाने किता चौड़ा चाहे, सीना पुलिस खातिर थक गय फुलाय के, छाती ई भरती मा। तनि गय शरीर ई, तीर कमान जइसे तबहूं न ई भइले, खुश ई भरती मा। राम जाने कौन गति, होइह...
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  December 16, 2015, 9:58 pm
पास न उम्मीद कोई रह गयी उम्र भी बस आह बनकर बह गई रात सारी कट गयी बस कैद में आस कोई अब न दिल की रह गयी अब मेरे जिस्म में साँस चलने लगी तू मुझे याद आने की कोशिश न कर जब ये गम की अँधेरी घटा छा गयी बेवजह मुस्कुराने की कोशिश न कर ...
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  December 3, 2015, 12:26 pm
अब किसी भी बात का जो इल्म होता नहीं खो गए इस वजह से अब तक किनारे कई रंग की पिचकारियों से खेलती है किरन जो छूटते हैं बाग में रंगीन फव्वारे कई कोयलों की कूक गायब ये सबा खुश्क सी साँप, गोजर और बिच्छू घूमते हैं कई ...
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  December 1, 2015, 12:27 pm
इस तप्त माहौल में भी तुम बांसुरी की तान में मग्न हो यह बांसुरी इस माहौल को ठंडा नहीं करेगी सुनो, शिखरों पर जमी बर्फीली चट्टानों के दरकने की आवाज़ बर्फ पिघल रही है पिघल रही हैं सड़कें पिघल रहे हैं शरीर मोम के पुतले की तरह सैलाब उमड़ रहा है इस सैलाब में बहते जा रहे हैं पेड़, पत्...
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  October 3, 2015, 9:41 pm
हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिए हम लड़ेंगे साथी, ग़ुलाम इच्छाओं के लिए हम चुनेंगे साथी, ज़िन्दगी के टुकड़े हथौड़ा अब भी चलता है, उदास निहाई पर हल अब भी चलता हैं चीख़ती धरती पर यह काम हमारा नहीं बनता है, प्रश्न नाचता है प्रश्न के कन्धों पर चढ़कर हम लड़ेंगे साथी क़त्ल...
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  April 12, 2015, 11:47 pm
मेरे पास उत्तेजित होने के लिए कुछ भी नहीं है न कोकशास्त्र की किताबें न युद्ध की बात न गद्देदार बिस्तर न टाँगें, न रात चाँदनी कुछ भी नहीं बलात्कार के बाद की आत्मीयता मुझे शोक से भर गयी है मेरी शालीनता – मेरी ज़रूरत है जो अक्सर मुझे नंगा कर गयी है जब कभी जहाँ कहीं जात...
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  April 12, 2015, 2:09 pm
उसे मालूम है कि शब्दों के पीछे कितने चेहरे नंगे हो चुके हैं और हत्या अब लोगों की रुचि नहीं – आदत बन चुकी है वह किसी गँवार आदमी की ऊब से पैदा हुई थी और एक पढ़े-लिखे आदमी के साथ शहर में चली गयी एक सम्पूर्ण स्त्री होने के पहले ही गर्भाधान कि क्रिया से गुज़रते हुए उसने जान...
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  April 12, 2015, 1:43 pm
- चण्डीदत्त शुक्ल जरूरी नहीं है कि, आप पढ़ें इस सदी की, यह निहायत अश्लील कविता और एकदम संस्कारित होते हुए भी, देने को विवश हो जाएं हजारों-हजार गालियां। आप, जो कभी भी रंगे हाथ धरे नहीं गए, वेश्यालयों से दबे पांव, मुंह छिपाए हुए निकलते समय, तब क्यों जरूरी है कि आप पढ़ें अश्ली...
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  April 11, 2015, 1:00 pm
          "अपने प्रेम की परिधि हमें इतनी बढ़ानी चाहिए कि उसमे गाँव आ जाएँ, गाँव से नगर, नगर से प्रान्त, यों हमारे प्रेम का विस्तार सम्पूर्ण संसार तक होना चाहिए।"                                                      -बापू           ''कोई भी जो इतिहास की कुछ जानकारी रखता है वो ये जानता है कि महान सामाजिक ब...
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  April 9, 2015, 9:41 pm
        - W. B. Yeats (1865-1939) SWAYED upon the gaudy stern The butt-end of a steering-oar, And saw wherever I could turn A crown upon the shore. And though I would have hushed the crowd, There was no mother's son but said, 'What is the figure in a shroud Upon a gaudy bed?' And after running at the brim Cried out upon that thing beneath --It had such dignity of limb-- By the...
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  November 19, 2014, 10:08 pm
        - W. B. Yeats (1865-1939) HY should I blame her that she filled my days With misery, or that she would of late Have taught to ignorant men most violent ways, Or hurled the little streets upon the great, Had they but courage equal to desire? What could have made her peaceful with a mind That nobleness made simple as a fire, With beauty like a tightened bow, a kind That is not ...
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  November 19, 2014, 10:07 pm
मेरे इस जीवन की है तू सरस साधना कविता, मेरे तरु की है तू कुसुमित प्रिये कल्पना-ज्ञतिका; मधुमय मेरे जीवन की प्रिय है तू कमल-कामिनी, मेरे कुंज-कुटीर-द्वार की कोमल-चरणगामिनी, नूपुर मधुर बज रहे तेरे, सब श्रृंगार सज रहे तेरे, अलक-सुगन्ध मन्द मलयानिल धीरे-धीरे ढोती, पथश्रान्त त...
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  October 3, 2014, 11:18 am
कैकेयी के मोह को पुष्ट करता मंथरा की कुटिल चाटुकारिता का पोषण आसक्ति में कमजोर होते दशरथ फिर विवश हैं मर्यादा के निर्वासन को बल के दंभ में आतुर ताड़का नष्ट करती है जीवन-तप  सुरसा निगलना चाहती है श्रम-साधना एक बार फिर धन-शक्ति के मद में चूर रावण के सिर बढ़ते ही जा रह...
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  September 7, 2014, 11:49 am
- शकील बदायूनी              अपनी आज़ादी को हम हरगिज़ मिटा सकते नहीं सर कटा सकते हैं लेकिन सर झुका सकते नहीं हमने सदियों में ये आज़ादी की नेमत पाई है सैंकड़ों कुर्बानियाँ देकर ये दौलत पाई है मुस्कुरा कर खाई हैं सीनों पे अपने गोलियाँ कितने वीरानों से गुज़रे हैं तो जन्नत ...
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  August 31, 2014, 10:32 pm
24 अगस्त 2014 को कैफ़ी आज़मी सभागार, निशातगंज, लखनऊ में जनवादी लेखक संघ की लखनऊ इकाई के तत्वाधान में वरिष्ठ लेखक एवं संपादक डॉ गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव की अध्यक्षता एवं डॉ संध्या सिंह के कुशल सञ्चालन में कवि बृजेश नीरज की काव्यकृति ‘कोहरा सूरज धूप’ एवं युवा कवि राहुल देव के ...
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  August 29, 2014, 12:12 pm
अकबर इलाहाबादी हंगामा है क्यूँ बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है ना-तजुर्बाकारी से, वाइज़[1] की ये बातें हैं इस रंग को क्या जाने, पूछो तो कभी पी है उस मय से नहीं मतलब, दिल जिस से है बेगाना मक़सूद[2] है उस मय से, दिल ही में जो खिंचती है वां[3] दि...
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  August 18, 2014, 11:03 pm
जैसे हम हैं वैसे ही रहें,  लिये हाथ एक दूसरे का  अतिशय सुख के सागर में बहें। मुदें पलक, केवल देखें उर में,- सुनें सब कथा परिमल-सुर में,  जो चाहें, कहें वे, कहें। वहाँ एक दृष्टि से अशेष प्रणय देख रहा है जग को निर्भय,  दोनों उसकी दृढ़ लहरें सहें। ...
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  August 9, 2014, 7:48 pm
      बृजेश नीरज जी की काव्य कृति ‘कोहरा सूरज धूप’ अपने नमानुकूल ही छाप छोड़ती है। जिस प्रकार सर्दी मे कोहरा छाया होता है और सूरज के निकलते ही धीरे-धीरे छटने लगता है और चारों ओर अच्छी धूप फैल जाती है यह धूप जनमानस को राहत पहुँचाती है। उनकी कृति यथार्थ का सम्पूर्ण चित्रण कर...
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  June 11, 2014, 7:55 pm
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