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Blog: अनूप सेठी

Blogger: अनूप सेठी
साल का अंत आते आते सत्‍ता का चेहरा इतना पत्‍थर हो गयाकि पता नहीं वो पुलिस का था पाषाण का था तराशा हुआ राजसी ठाठ में लोग थे और भी लोग थे हाड़ मांस के जीते जागते आक्रोश और क्रोध से भरे हुए सत्‍ता ने बंद कर लिए अपने नेत्र जो वहां थे ही नहीं द्वार भी जो दरअसल कभी बने ही नहीं वहा... Read more
clicks 216 View   Vote 0 Like   5:02pm 1 Jan 2013 #कविता
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धीरोदात्त नायक की प्रतीक्षा करती और साथ ही उत्तेजक उत्तर-आधुनिकतावादी नारीवादी विमर्श करती पद्मिनी नायिकाकथादेश में पवन करण और अनामिका की कविताओं पर जारी बहस में कात्‍यायनीका लेख. इस बहस में आप पहले प्रभु जोशीका लेख पढ़ चुके हैं.  रजा,  हाल में मुंबई में लगी प्रदर्... Read more
clicks 183 View   Vote 0 Like   1:40pm 9 Dec 2012 #समकालीन कविता
Blogger: अनूप सेठी
छायांकन - हरबीरयह लेख कुछ वर्ष पहले शिखर संस्‍था द्वारा हिमाचल की युवा रचनाशीलता पर आयोजित संगोष्‍ठी‍ में पढ़ा गया था. हाल में यह स्‍वाधीनता के शारदीय विशेषांक में छपा है. इस बीच आत्‍मारंजन का काव्‍यसंग्रह पगडंडियां गवाह हें भी आ गया है और अजेय के संग्रह की घोषणा हो च... Read more
clicks 162 View   Vote 0 Like   2:29pm 10 Nov 2012 #हिमाचल
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  कुछ समय पहले मुंबई में कहानीकार लखनऊ से हरिचरण प्रकाश और कानपुर से अमरीक सिंह दीप आए हुए थे। कथाकार ओमा शर्मा, आर.के. पालीवाल और हरियश राय मुंबई में हैं ही। कवि विनोद दास भी अब मुंबई में ही हैं। ओमा ने इनसे मिलाने का प्रोग्राम बनाया।'चिंतन दिशा'  के संपादक हृदयेश मयं... Read more
clicks 225 View   Vote 0 Like   6:33pm 27 Oct 2012 #बातचीत
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        जैसा कि आप जानते हैं, मुंबई से प्रकाशित पत्रि‍का चिंतनदिशा में विजय बहादुर सिंह और विजय कुमार की चिट्ठियों के जरिए समकालीन कविता पर बहस शुरू हुई थी. अगले अंकों में इन चिट्ठियों पर विजेंद्र और जीवन सिंह; राधेश्‍याम उपाध्‍याय, महेश पुनेठा, सुलतान अहमद और मेरी प्... Read more
clicks 218 View   Vote 0 Like   7:01am 17 Oct 2012 #समकालीन कविता
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  हिंदी दिवस पर हिंदी की सेवा में प्रस्‍तुत  लिपि का विकास शायद आद्य बिंबों की तरह हुआ है। अक्षर,वर्ण,व्यंजन आदि के रूप सैकड़ों हजारों वर्षों की यात्रा करके स्थिर हुए हैं। अक्षरों के रूपाकार या रेखाओं के पैटर्न में प्रकृति और प्राणिजगत प्रतिबिंबित होता है। भौगोलिक ... Read more
clicks 250 View   Vote 0 Like   6:30pm 13 Sep 2012 #हिंदी
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इधर हिंदी साहित्‍य जगत में बात-बात में बहसें क्‍या उठ खड़ी हो जा रही हैं, मानो पानी को उबाल कर गाढ़ा करने का खेल चल रहा हो. पत्रि‍काओं के चूल्‍हे पर जहां पतीलियों में पानी चढ़ाया जाता है, वहां इंटरनेट का पंखा आग को हवा देने की ड्यूटी संभाल लेता है. सब जानते हैं पानी गाढ़ा न... Read more
clicks 226 View   Vote 0 Like   11:26am 7 Sep 2012 #समकालीन कविता
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सिद्धार्थ की गायमेरी पिराबलम बोले तो मालूम क्या है? मैं हर टैम फील करती है कि आदमी लोक की बस्‍ती में रहती है तो आदमी लोक का हेल्‍प करने का. आदमी लोक के वास्‍ते कुछ करने का. मैं एक बात बोलती है, ध्‍यान से सुन. एक रोज मैं मेरो को बोली. रोज पेपर खाती है, आज पेपरशन करेगी. पेट का अं... Read more
clicks 211 View   Vote 0 Like   8:20am 18 Aug 2012 #जुगाली उर्फ गऊ चिंतन
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तू लिक्‍खकागज को घोच मतअच्‍छी कविता लिक्‍ख ... Read more
clicks 215 View   Vote 0 Like   5:54pm 29 Jun 2012 #समकालीन कविता
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जब से खबर मिली है, भगवत रावत नहीं रहे, उनकी छवि रह रह के आंखों के सामने तैर जाती है. जिंदादिल, आत्‍मीय और मुस्‍कुराता चेहरा. शायद 1991 की बात है, राजेश जोशी ने शरद बिल्‍लोरे पुरस्‍कार समारोह के सिलसिले में भोपाल बुलाया. उन दिनों मैं और सुमनिका दोनों ही आकाशवाणी में थे. नई नई श... Read more
clicks 207 View   Vote 0 Like   3:31pm 27 May 2012 #समकालीन कविता
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जगदीश्‍वर चतुर्वेदी इधर अपने ब्‍लागमें समसामयिक विषयों पर नियमित टिप्‍पणियां कर रहे हैं. सत्‍यमेव जयते पर उनकी टिप्‍पणी आप भी पढि़ए. सत्यमेव जयते सीरियल की इन दिनों खूब चर्चा है। सामाजिक समस्याओं पर समाज का ध्यान खींचने वाले इस सीरियल को लोग विभिन्न चैनलों पर देख र... Read more
clicks 253 View   Vote 0 Like   5:36pm 22 May 2012 #विमर्श
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मैं बचपन में गांव में था तो स्कूल की कोई याद नहीं है, कब लगता था कब छूटता था। बस आना जाना भर याद है। रास्ते में एक खड्ड पड़ती थी। जंगल था। झाड़ियां थीं। उनमें फल होते थे। जंगली बेर होते थे। यही सब याद है। घर में ट्रक के टायर से निकाले हुए रबड़ के सख्त चक्के को 'गड्डा' कहकर दौ... Read more
clicks 214 View   Vote 0 Like   9:31am 29 Apr 2012 #टिप्पणी
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शायद दो साल पहले की बात है. सुबह तैयार हो कर दफ्तर के लिए निकला तो हवा खुशगबार थी. यूं वक्‍त का दबाव हमेशा बना रहता है लेकिन उस दिन हवा में कुछ अलग तरह की तरंग थी. जैसे सुबह और शाम के संधिकाल का स्‍वभाव दिन और रात के स्‍वभाव से अलग होता है, वैसा ही शायद मौसमों के बदलने के दौरा... Read more
clicks 195 View   Vote 0 Like   12:52pm 1 Apr 2012 #हिमाचल मित्र
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इस बार सर्दी का मौसम बड़ा लंबा चल रहा है. कहते हैं कि लोहड़ी वाले दिन सर्दी लंबी छलांग लगाती है. लेकिन यहां तो होली भी एक तरह से सर्दियों मे ही आई. शिमला में बर्फ गिरी, मुंबई सर्द गर्म चल रही है. पिछले दिनों ठियोग से मोहन साहिलने बर्फ के ये फोटो भेजे. भेखल्‍टी गांव की तरफभेख... Read more
clicks 252 View   Vote 0 Like   8:14am 10 Mar 2012 #छायाचित्र
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