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दृष्टिपात

June 2015समय साक्षी हैसमय को समझोसमय के साथ चलोअपने हठ को छोड़ोपरिवर्तन करो समाज का निर्माण करो नये समाज काविकास के लिए देश का।समय साक्षी हैसमय को समझोसमय की भाषा को समझोसमय के इशारे को समझोपरिवर्तन करो समाज कानिर्माण करो नये समाज काविकास के लिए देश का।समय साक्षी हैहठ ...
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  August 4, 2015, 11:38 pm
समय साक्षी हैसमय किसी को नहीं छोड़ता।समय को झुठलाने का हम जितना भी प्रयास करेंवह धोखा ही होगा।हमेशा हम धोखा खाते हैंदूसरे को धोखा देते हैं।धोखा देने के लिएनाम तो कुछ भी हो सकता है- लोकतंत्र,राजतंत्र,जनतंत्र,लाठी तंत्र,धर्मतंत्र... आदिइत्यादि।समय साक्षी है-चलता तो लाठ...
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  June 28, 2015, 11:06 pm
अप्रैल 2015 अंक जिस व्यक्ति के आचार.विचार में, आचरण में, व्यवहार में, दैनिक जीवन में स्वच्छता का भाव नहीं हो वह पूर्ण सभ्य नहीं हो सकता। सभ्य व्यक्ति से ही सभ्य समाज का निर्माण संभव है। जिस समाज और देश के जेहन में जितनी सफाई के भाव होंगे वह उतना ही सभ्य समाज कहलाने का अधिक...
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  June 25, 2015, 10:30 pm
drishtipat march 2015नैतिकता और आत्मानुशासन ही व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को समृद्धशाली और स्वाभिमानी बनाते हैं। इन तत्त्वों के बिना समाज और राष्ट्र का जीवन अधूरा है। लेकिन हम मनुष्य नेकी की जगह अहंकार में जीने के आदि हो गये हैं। दिन-रात अनैतिक कार्य करने के लिए अपने को झोंक दिया है...
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  May 4, 2015, 11:46 pm
फ़रवरी 2015इतिहास गवाह है कि विदेशी आक्रमणकारी अपने-अपने तरीके से भारत को हजारों वर्षों तक लूटते-खसोटते रहे। भारतीय सभ्यता और संस्कृति को दुष्ट आतताइयों ने नष्ट-भ्रष्ट करने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। लेकिन देश के वीर सपूतों ने- उनके सारे नापाक मनसूबों पर पानी फेर दिय...
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  March 18, 2015, 7:47 pm
जनवरी 2015 अंक अब भारत के बेटे को भारत की मिट्टी की सोंधी महक अपनी ओर खिंचती हुई दिखाई नहीं देती। अब कोई सपूत भारत माता पर न्योछावर होने को तत्पर नहीं दिखाई नहीं देता! शायद ही अब कोई माता-पिता यह चाहता है कि उसका बच्चा भारत माता की सेवा में अपनी भारत-भूमि पर कार्य करे। अब अ...
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  February 19, 2015, 9:18 pm
दृष्टिपात दिसम्बर -2014हम अपने जीवन के कभी भी पूरा सच बोलना या जानना नहीं चाहते। दुनिया का गजब दस्तूर है। अब देखिए न भला, यह सिð हो चुका है कि सूर्य अपनी धुरी  पर स्थिर रहता है, पृथ्वी घूमती है, लेकिन हम हैं कि मानने के लिए तैयार ही नहीं। जिसके कारण समाज में कई प्रकार की भ्रा...
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  January 20, 2015, 10:52 pm
दृष्टिपात नवम्बर 14 पूरी दुनिया बेचैन है। गरीब से अमीर तक सभी बेचैनी में जी रहे हैं। हमारे मन और प्राण पर भूख का भूत सवार है। भूख पेट तक ही सीमित होती तो कोई बात होती। भूख असीमित है। धन  की भूख, सुन्दर तन की भूख, मन की भूख, ओहदे की भूख, अहंकार की भूख, दुनिया को गुलाम बना लेन...
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  December 20, 2014, 8:52 pm
अक्टूबर 2014 अंक हर देश और हर काल में मनुष्य की बुनियादी जरूरतें रोटी, कपड़ा और मकान ही हैं। इन्हीं जरूरतों की पूर्ति के लिए मनुष्य अपनी मनुष्यता को धीरे-धीरे छोड़ता जा रहा है। जैसे ही रोटी, कपड़ा और मकान की जरूरतें पूरी होती हैं दिमाग में खुराफात का जन्म शुरू हो जाता है...
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  October 15, 2014, 3:45 pm
सितम्बर 2014 शायद पूरी दुनिया भ्रष्टाचार से त्रास्त है। सुबह के अखबार हों या मीडिया रिपोर्ट- भ्रष्टाचार की महामारी के समाचार सुर्खियों में होते हैं। पियून से लेकर जज तक के भ्रष्टचार में लिप्त होने की खबरें आये दिन हमें सुनने को मिलती हैं। क्या हो रहा यह सब! समझ में से प...
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  October 14, 2014, 11:57 pm
दृष्टिपात को सारस्वत साहित्य संकल्प सम्मान हिन्दी दिवस के अवसर पर राउरकेला की साहित्यिक संस्था 1966 में स्थापित ‘संकल्प संस्थान ने राँची की बहुआयामी पत्रिका दृष्टिपात और उसके संपादक अरुण कुमार झा को सारस्वत संकल्प शिरोमणि सम्मान प्रदान किया गया है। 14 सितम्बर को ...
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  September 15, 2014, 9:22 pm
पूरी दुनिया दहशत में है। डरा हुआ व्यक्ति हर वह काम कर जाता है, सभ्य समाज जिसके लिए इजाजत नहीं देता। डरे हुए व्यक्ति से समाज की भलाई की अपेक्षा नहीं की जा सकती। डरे हुए व्यक्ति देशभक्त कदापि नहीं हो सकता। अग्स्त 2014 हम यहाँ भारत की बात कर रहे हैं। भारतीय समाज के लोग डरे ...
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  September 9, 2014, 7:28 pm
दृष्टिपात का जुलाई 2014 अंक अब पावस रितु में झूले बहुत ही कम लोग डालते  हैं। झूले कौन लोग डालते है? यह प्रश्न सबसेअहम है। झूले पहले भी झूले जाते थे, अब भी झूले जाते हैं लेकिन झूले कौन से, यह भी अहम है। कदंब के झूले, मेले वाले झूले, या बड़े लोगों के घर के झूले। अब झूले के मायन...
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  August 12, 2014, 11:11 pm

अब पावस द्दतु में झूले बहुत ही कम लोग डालते  हैं। झूले कौन लोग डालते है? यह प्रश्न सबसेअहम है। झूले पहले भी झूले जाते थे, अब भी झूले जाते हैं लेकिन झूले कौन से, यह भी अहम है। कदंब के झूले, मेले वाले झूले, या बड़े लोगों के घर के झूले। अब झूले के मायने और मिजाज भी बदल गये हैं। ग...
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  August 12, 2014, 9:47 pm
दृष्टिपात जून 2014अब भी भारतीय समाज दब्बू, पिछलग्गू और धर्मभीरू है। इसी के कारण निर्मल बाबा, आसाराम बापू न जाने कितने उनके जैसे लोगों के दुष्प्रभाव में आकर अपना सर्वस्व गँवा बैठता है। भारतीय समाज में अनपढ़-गँवार को कौन कहें, पढ़े-लिखे लोग भी भेड़ चाल चल रहे हैं। समाज के प...
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  July 16, 2014, 8:55 pm
मई 2014सोलहवीं लोकसभा चुनाव संपन्न हुआ। परिणाम भी आ गये। सोलहवीं लोकसभा चुनाव ऐतिहासिक रहा। ऐतिहासिक इस मायने में कि किसी एक आदमी ने अपने दम पर पार्टी को ऐतिहासिक जीत दिलाई। यह विलक्षण प्रतिभा का द्योतक है। इस चुनाव में जिस प्रकार से एक व्यक्ति ने जाति, भाई-भतीजावाद, वर...
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  May 24, 2014, 11:45 pm
दृष्टिपात अप्रैल 2014प्रकृति ने हमें सब कुछ  दिया है। लेकिन कुछ धूर्त लोगों ने लालच और स्वार्थ के वशीभूत होकर प्रकृति के सारे उपादानों को अपने पक्ष में करने के लिए तरह-तरह के उपाय ढूंढ लिए- अधिसंख्यक को गुलाम बनाने के उपायों की व्यवस्था के तहत। उन्हीं में से एक है ...
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  May 10, 2014, 9:19 pm
प्रकृतिबड़ीउदारहै।लेकिनमनुष्यउतनाउदारनहींबनपाया।ऐसानहींहैकिमनुष्यजन्मसेअनुदारहै।ऐसाहोभीनहींसकता, क्योंकि  प्रकृतिनेमनुष्यकोअपनीतरहहीरचाहै।परन्तुज्ञानएवं बुद्धि कीअधिकता केकारणमनुष्यप्रकृतिकोहरदमधेखादेनेकीकोशिश में संलग्नरहताहै।प्...
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  March 21, 2014, 7:38 pm
फ़रवरी 2014 अंक    इसधरतीपरजितनेभीजीव-जन्तुहैं, सभीकाजीवनसंघर्षमयहै।यहकहनाकिमनुष्यहीसंघर्षकरताहै, ऐसानहींहै।हाँ, संघर्षकेविषयऔररास्तेजरूरअलग-अलगहैं।मनुष्यसबसेपहलेपेटकेलिएसंघर्षकरताहै, फिरकपड़ाऔरमकानकेलिए, उसकेबादनानाप्रकारकेसंघषोंकासिलसिलाचलतार...
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  March 7, 2014, 6:54 pm
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