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आर्जव

सब कुछ स्वयं में ही विरोधाभासी है । जो है, उसी में उसका विरोध है , विपरीत है । सच में झूठ है, झूठ में सच है , मौत में जीवन है , जीवन में मौत है, जो अच्छा है , वही क्षण के एक बिन्दु के बाद बुरा है , बुरा है वही स्थान की एक अलग विमा में अच्छा है ! और सबसे रहस्यमय हैं इन विपरीतताओं के संध...
आर्जव...
Tag :prose
  June 23, 2013, 2:57 pm
दिर्घापांग* ! जाने दो , गया , जो गया अब क्या लेना उससे ! ढ़ूढ लो तुम कण्व आश्रम में नये पते , नये वृन्त , नये पुष्प !बस जब स्मृति संस्पर्श से महत्तम हो व्यथा के समापवर्त्य बैठ द्वारे कण्व कुटि केउन धान के पौधों को निहारना जिन्हें शकु रोप छॊड़ चली गयी है ! खड़े होंगे वे वैसे ही अभी ज...
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Tag :dirghapang
  June 10, 2013, 11:42 pm
दीर्घापांग* ! जाने दो , गया , जो गया अब क्या लेना उससे ! ढ़ूढ लो तुम कण्व आश्रम में नये पते , नये वृन्त , नये पुष्प !बस जब स्मृति संस्पर्श से महत्तम हो व्यथा के समापवर्त्य बैठ द्वारे कण्व कुटि केउन धान के पौधों को निहारना जिन्हें शकु रोप छॊड़ चली गयी है ! खड़े होंगे वे वैसे ही अभी ज...
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Tag :dirghapang
  June 10, 2013, 11:42 pm
अनाम दिन किसी शाम को छोड़ आये थे जो तुम उस अजान पेड़ से बतियाने में भूलकर उसपर थोड़ा सा गौरैया के छोटे बच्चे सा प्यार वह प्यार के दो चमकीले मोती बन अबदो सीपी सी आंखों में बस गया है ! उस दिन हवा की कॊठरी में टहलते वक्त कच्ची दोपहर को गीली हवा के ताखॊं पर रख आये थे तुम प्यारी सपनी...
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Tag :प्यार
  May 27, 2013, 11:33 pm
तुम मैं --दो तरगें अनुनाद में ! ...
आर्जव...
Tag :deep
  May 17, 2013, 1:00 am
सूरज की डायरी का एक पन्ना –- एक दिन !पन्नों में तीन चार रंगों के शेड  !किशोरवय सूरज जब किसी और अन्तरिक्ष मण्डल में था ,रहस्यमयी प्रौढ़ निहारिकाओं से घिरा हुआ , तब की स्मृतियां !सूरज के दहकते मनः प्रिज्म से होकर दिन के पन्नें पर सात रगों के बहाने हजारों रंगों की फुहारें फुहर...
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Tag :प्रकृति
  May 10, 2013, 2:11 am
घने जगंलों में मैं बहुत दूर निकल आया था ।बहुत दूर ।जगंलों के भीतर बहुत भीतर बेतरतीब बिखरे खोये हुये उन रास्तों के पार जिनपर कभी कोई पथिक गया ही नहीं वहां आदमी के पास अपने सीधे साधे जंगलीपन के गुल्म में लिपटी नवजात धवल आदमीयता के अलावा कुछ और था ही नहीं, वहां घने अंधेरों ...
आर्जव...
Tag :
  April 1, 2013, 10:25 am
घने जगंलों में मैं बहुत दूर निकल आया था ।बहुत दूर ।जगंलों के भीतर बहुत भीतर बेतरतीब बिखरे खोये हुये उन रास्तों के पार जिनपर कभी कोई पथिक गया ही नहीं वहां आदमी के पास अपने सीधे साधे जंगलीपन के गुल्म में लिपटी नवजात धवल आदमीयता के अलावा कुछ और था ही नहीं, वहां घने अंधेरों ...
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Tag :nature
  April 1, 2013, 6:47 am
सब ओर बादल हैं. बादलों में पहाड़ हैं . पहाड़ॊं में जंगल हैं . और जंगलों में बस जंगल. घाटी में सफेद – नीली धुन्ध के बीच पहाड़ों का उपरी सिरा एक लाईन बनाता है।ऐसा लगता है जैसे उस रस्सी पर पहाड़ टंगे हुये हैं और धुन्ध में सूख रहे हैं ।   ...
आर्जव...
Tag :Inscape
  March 12, 2013, 6:13 pm
समस्या तब शुरू होती है जब हम अपने आप को वह समझने लगते है जो हम नहीं है या कुछ अथक प्रयासोपरान्त हममे जो होने की संभावना है , वह . हमारे आप पास ऎसी कई चीजें है जो हमें इस  भ्रम में डालती हैं . ईश्वर  द्वारा रचें गए कुछ बड़े षडयंत्रों में से यह एक है की गहन प्रेम और वास्तविक ज्...
आर्जव...
Tag :विचार
  March 12, 2013, 12:25 pm
कवि हो जाने के बाद एक बार ठीक से दुबारा कवि न हो पाना वापस मुश्किल है बहुत ही  शायद असंभव भी !  शुक्र है मैं कवि नहीं हूं !  ईश्वर सभी कवियों की आत्मा को शान्ति दे  !...
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Tag :poem
  February 17, 2013, 12:47 pm
सुर्ख़ लाल दहकते कोयले जैसा प्यारतुम्हें करने की हुलस कर अधूरी रह गयी बलवती इच्छा .........! ! याद आयीं अभी  काट कर लटकाये गये मांस के लोथ से टपकती अदृश्य दर्द की बूंदे !!!...
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Tag :poem
  February 14, 2013, 12:07 am
कभी कभी रंग होता है हवाओं में भीऔर बोलती है धूप की पीली चिड़िया भी अगर हो आखों मेंप्यार किसी का अनबोला ,अनचीन्हा सा !       ...
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Tag :kavitaa
  January 21, 2013, 6:48 pm
छलकतीहैपहाड़ॊंकेपीछेपिघलीचांदीकीनदी छोटीछॊटीपंक्तियोंमेंलगीसफेदबादलकीमेड़ॊंपरपड़रहीछीटें !  आसमानकीक्यारियांहोरहीभोरकेउल्लासमेंनीलीपीली ! इस तरफ की गहरी धुन्ध भरी घाटी में बाकी है बिखरी रात की स्याही आकर जिसे अभी लीप देगी जलती चांदी की नदी में तैरती सूरज के ...
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Tag :
  January 20, 2013, 11:47 am
तुम्हारे बायें कपोल पर ठीक कान के पास से  नव्य हरित लतिका प्रतान सी एक हल्की सी रेखा ठुड्डी के  पीछे से शुरू हो कर बिलकुल वहां तक जाती है जहां से गार कर अमावस की एक भरी-पूरी प्रौढ़ रात निचोड़े गये दो चार बूंद कजरारे रंग रंगे तुम्हारे केश शुरू होते हैं !  शायद वो कोई नस है ...मध...
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Tag :kavita
  January 11, 2013, 11:33 pm
हल्की नीली जीन्स पर ब्राऊन कलर के मोन्टे कार्लॊ जैकेट में प्योर वूलेन ऐरॊ का टहकार काला मफलर डाले इस साफ सर्द दुपहर में तुम सफेद झक झक फूलॊं की एक पंक्ति पर झुकी हुयी थोड़े दूर खड़े मुझ को कुछ दिखाने की कोशिश में बड़े खुश-से हो ! खरगोश कहीं के ! ! !  मैं देखता हूं , और बस देखता हू...
आर्जव...
Tag :
  January 7, 2013, 11:08 pm
आज फिर पहाड़ों पर हुयी होगी सांझ,लेकिन नहीं था मैं वहां ! सांझ हर एक ,हर एक रात सदियों का एक, एक कदम !! ! आज फिर गहरी काही सिलवटों में उलझी पहाड़ॊं की तलहटी में नीली धुन्ध के फाहों की पांख लिये बूढ़े अपरान्ह के उदास पीले परिन्दे उतरे होगें और रात को जन्म देकर गर्भवती सांझ सदा ...
आर्जव...
Tag :chare
  December 24, 2012, 1:27 am
त्रास ! ..............मूल्य , अस्मिता और संवेदनायेंवर्षों पहले पुते चूने की पपड़ी-से झरते दिखते होंगे तुम्हेहास्पीटल के उस कमरे में जहां तुम्हारी क्लान्त आत्मा अपनी क्षत-विक्षत देह की गुदड़ी लपेटे समय के वेन्टिलेटर पर पड़ी होगी !  तुम्हारी भीगी सूखी  बन्द पलकों के अन्धियारों में...
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Tag :girl
  December 22, 2012, 7:11 pm
मन ,जैसे काई हो ...जम गया होसमय की चिकनी फर्श परछितरा हुआ .......
आर्जव...
Tag :ठहराव
  August 12, 2012, 2:29 am
नये वाले मोबाइल के भीकान्टैक्ट में सेव हैं कुछ पुराने, बन्द पड़े , आऊट आफ़ सर्विस,नम्बर  !अपरिचित अन्धेरों और असम्बद्ध सन्नाटॊं से त्रस्त किसी रात टेबल पर बैठा , कलम खुट खुट करता, लैम्प की रोशनी पढता , मन दिनों बाद न जाने कब मोबाइल पर चला जाता है और यह जानते हुये भी किइन नम...
आर्जव...
Tag :past
  July 6, 2012, 9:14 pm
(यह समयान्तर में छ्प चुकी एक पुरानी कविता है)चलो छॊड़ो जाने दो अब वह बड़ा वाला प्रेम , वो सच्चा और गहरा वाला प्रेम ,वो निर्मल वर्मा और अज्ञेयवाला प्रेम ,वो इमली ब्रान्टॆ और लारेन्स वाला प्रेम ,चलो छोड़ो , रहने भी दो वह तो हो चुका अब हमसे ।आओ चलो ! शाम को टहलते हुये क़ाफी पीने ...
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Tag :प्रेम
  April 8, 2012, 12:26 am
अन्नाकोसमयनेरचाहै।वहबहरानहींहै।संस्कृतियोंकेमेलेसेछांटकरसमय अपनीउत्तुंगप्राचीरपर टांकताहैअव्ययमूल्योंके कुछक्षीणभित्ति-चित्र !समुदायकेसामूहिकबौद्धिकनैतिकह्रासकेप्रतिपक्षमेंअन्वेषितकीजातीहैविनयवअहिंसामण्डितपुनर्नवाआस्था ! अन्नाकोसमयनेरचाहै...
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Tag :kavita
  September 6, 2011, 5:57 pm
दर्दठीकहोगयातोबचीरहगयीअगलीखुराक ,मेजपरपड़ीहैधूलफांकती,किसीदिनफेंकदीजायेगी एक अर्थहीन निर्मम सहानुभूति के साथ ।कुछ ऐसे ही पुरानी कापियों के पिछले पन्नों में आधी ढरक कर बिना पूरा हुये हीचुप हो , ठहर कर सूख गयी है कई तरह तरह की विचित्र और अद्भुत कविताएं  ! किसी दिन अ...
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Tag :रेचन
  July 30, 2011, 11:38 pm
खुदहीसबकुछछोड़आयेहैंफिरभीएककतराबेजुबानसीउम्मीदहैकहींकि वहांसेआवाजआयेगीफिरकोई !सबकोपहचानतेथेबखूबीरंगरंगसेवाकिफथेउनकेफिरभीसबकेसामनेकरदियाइन्कारकिसीएककोभीपहचाननेसे(वह’एक’ ही’कई’ होकरआयाथा !)तबभीएकबातबेबातसीहैमनमेंकिवेआयेंगेबुलानेहमकोफिरकभी !दर...
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Tag :कविता
  May 13, 2011, 11:05 pm
समय बच गया था, अनवरत गुजरते हुये हर द्वार पर से बिना प्रतीक्षा किये किसी की भी कुछ की भी !अहर्निश गतिशील रहते हुये भी समय बच गया था धुले गये बरतन किनारे छुपी रह गयी चिकनायी की तरह ,टॆबल ग्लास पर पोछे जाने के बाद भी चुपचाप बिछी रह गयी एक पतली परत धूल की तरह समय बच गया था , अनबी...
आर्जव...
Tag :समय
  March 23, 2011, 2:31 am
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