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देर रात के राग : View Blog Posts
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देर रात के राग

(इस लेख का एक संक्षिप्त और संपादित रूप 'रविवार डाइजेस्ट'के अगस्त'2017 अंक में मेरे स्तम्भ 'रहगुज़र'के अंतर्गत प्रकाशित हुआ है । पूरा लेख यहाँ दे रही हूँ । )--कविता कृष्णपल्लवीहसन नाम जानलेवा हो सकता हैअमृत यह नाम भी निरापद नहीं रहाबहुत सुरक्षित नहीं हैं आपमहंगू नाम के साथ ब...
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  September 15, 2017, 3:04 pm
(रविवार डाइजेस्‍ट के अगस्‍त,2017 अंक में 'रहगुज़र'कॉलम में प्रकाशित मेरी टिप्‍पणी)-- कविता कृष्णपल्लवी कथित गोरक्षकों की भीड़ द्वारा अखलाक और पहलू खान की हत्या के बाद हरियाणा में बल्लभगढ़ रेलवे स्टेशन पर इस वर्ष 22 जून को पंद्रह साल के जुनैद को एक भीड़ ने चाकुओं से गोदक...
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  September 15, 2017, 2:20 pm
(रविवार डाइजेस्‍ट के सितम्‍बर, 2017 के 'रहगुज़र'कालम में प्रकाशित मेरी टिप्‍पणी)-- कविता कृष्णपल्लवी मजदूर स्त्रियाँ यदि संगठित नहीं की जायेंगी तो स्त्री मुक्ति की बौद्धिक आवाजें नक्कारखाने में तूती की आवाज बनी रहेंगी और शहरी मध्यकवर्गीय दायरों तक सीमित तमाम आन्दोर...
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  September 15, 2017, 2:11 pm
आधुनिक उद्योग ने खेती में और खेतिहर उत्पादकों के सामाजिक सम्बन्धों में जो क्रांति पैदा कर दी है, उसपर हम बाद में विचार करेंगे। इस स्थान पर हम पूर्वानुमान के रूप में कुछ परिणामों की ओर संकेत भर करेंगे। खेती में मशीनों के प्रयोग का मजदूरों के शरीरों पर फैक्ट्री-मजदूरो...
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  September 4, 2017, 11:07 pm
 ज़माने ने नगर से यह कहा किग़लत है वह , भ्रम है हमारा अधिकार सम्मिलित श्रम और छीनने का दम है !शायद है , ज़िंदगी की , मन की तसवीरें फ़िलहालइससमय हम नहीं बना पायेंगे अलबत्ता पोस्टर हम लगा जायेंगे । हम धधकायेंगे । मानो या मानो मत आज तो चंद्र है , सविता है , पोस्टर ही कविता है !!वेदना ...
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  August 25, 2017, 10:42 am
 ('रविवार डाइजेस्‍ट'के जून अंक में रूसी क्रांति के सौ बरस पूरे होने पर तीन लेख छपे हैं। यह दूसरा है : क्रांति का संक्षिप्त मूल्यांकन)-- कविता कृष्‍णपल्लवी रूस की अक्टूबर क्रान्ति की शतवार्षिकी (नये कैलेण्‍डर के हिसाब से यह 7 नवम्बर, 1917 को हुई थी) के अवसर पर पूरी दुनिया में ...
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  August 25, 2017, 9:37 am
बुनियादी बातों पर विद्वानों में परस्पर सहमति हुआ करती थीऔर गौण बातों पर ढेरों असहमतियाँ जिनपर लंबी बहसें हुआ करती थीं ।उनके विचारों के बीच सदा होता था शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व ,निरंतर जारी रहती थी शांतिपूर्ण प्रतिस्पर्धाऔर वे एक-दूसरे में शांतिपूर्ण संक्रमण कर ज...
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  May 24, 2017, 10:47 pm
एक शाम : एक दृश्यचित्र(मुक्तिबोध और शमशेर को एकसाथ समर्पित)ढल चुकी है शामअँधेरे में गर्क हो चुकी है पश्चिमी क्षितिज पर लालिमा । ज़िंदगी पर झुका हुआ हैगहराता हुआ फासिस्ट अँधेराजिससे बेफ़िक्र बच्चे अभी भी खेल रहे हैंइस विशाल पार्क के खुलेपन में ।काले जल के किनारेझुरमु...
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  May 24, 2017, 10:07 pm
कल फेसबुक पर सुशील कुमार की एक कविता पढ़ी , जिसकी कई कवियों-आलोचकों ने यह कहकर प्रशंसा की है कि यह अशोक वाजपेयी जैसों की जुगुप्सा पैदा करने वाली देहभोगवादी कविताओं से एकदम अलग भावभूमि पर यौन-प्रतीकों का भाष्य प्रस्तुत करती हैं । पहले उस कविता को पढ़ें, फिर उसपर कुछ विचार ...
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  May 24, 2017, 9:49 pm
सूरज तब रोज़ की तरह काला उगा था,घर से निकाल डी टी सी की बस में बैठा वह आदमी अस्पताल जा रहा थावहाँ भर्ती अपने बच्चे के पास |पूरी रात जागी थी पत्नी वहाँ, अब पारी उसकी थी |गंतव्य से आधी दूरी तय करने तक पढ़ चुका था लगभग पूरा अखबार,बुंदेलखंड में कुपोषण से बच्चों की मौतों,उजाड़े गए आ...
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  May 18, 2017, 2:23 pm
"कविता को करुणा, विराग या किसी सृष्टिकर्ता (?) से रुदन भरी शिकायत मत बनाओ। इसमें पराक्रम एवं साहस की आग भरो। इसे युद्ध का पैना हथियार बनाओ ।"मेरे कामरेड शशि भूषण शर्मा लिखते हैं.मेरी समझ है कि कविता की कोई तय सीमा नहीं है. सामन्य जन अपनी पीड़ा, तबाही और अहसासों को अपनी चेतना ...
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  September 27, 2016, 7:36 pm
इसमें संदेह नहीं कि जो कविता पथान्‍वेषी और मौलिक होती है, वह अपनी भाषा और शिल्‍प ईजाद करती है, कलात्‍मक रूढ़ि‍यों के सभी मठों और गढ़ों को तोड़ने के जोखिम मोल लेती है और अभिव्‍यक्ति के ख़तरे उठाती है।यह काम निराला ने, त्रिलोचन और नागा‍र्जुन ने, मुक्तिबोध ने अपने-अपने ढं...
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  September 26, 2016, 10:10 pm
खाते-पीते सुसंस्‍कृत-शालीन लोगों की पाचन शक्ति बहुत कमजोर होती है। स्‍वयं वे व्‍यवस्‍था के लिए सहज-सुपाच्‍य होते हैं।रचनाओं में जो हरदम क्षोभ से भरे होते हैं, जीवन में वे प्राय: सुखी-सन्‍तुष्‍ट-सुरक्षित पाये जाते हैं।हरदम नाराज़ और क्षुब्‍ध रहने वाला व्‍यक्ति अपनी ...
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  June 25, 2016, 2:15 pm
- हम अपनी समस्‍याओं को उसी सोच के साथ खत्‍म नहीं कर सकते, जिस सोच के साथ हमने उन्‍हें पैदा किया।- मूर्खता और बुद्धिमता में यह फर्क है कि बुद्धिमता की एक सीमा होती है।- दो चीज़ें अनन्‍त हैं: ब्रह्माण्‍ड और मनुष्‍य की मूर्खता, और मैं ब्रह्माण्‍ड के बारे में दृढ़ता से नहीं क...
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  June 14, 2016, 11:13 am
- गुरुत्‍वाकर्षण लोगों के प्‍यार में गिरने के लिए ज़ि‍म्‍मेदार नहीं होता।- अगर आप किसी सुन्‍दर लड़की को चुम्‍बन देते हुए सुरक्षित ड्राइव कर रहे हैं तो इसका मतलब यह है कि आप चुम्‍बन पर उतना ध्‍यान नहीं दे रहे हैं जितना कि देना चाहिए।- एक पुरुष को कभी पता नहीं होता कि 'गुड ...
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  June 14, 2016, 11:08 am
'अन्वेषा'की ओर से देवीप्रसाद मिश्र के रचनापाठ और बातचीत के कार्यक्रम में देवीप्रसाद मिश्र के सृजनकर्म पर कविता कृष्णपल्लवी का वक्तव्य:हम इतिहास के एक वैसे ही अँधेरे दौर में जी रहे हैं, जैसे दौर के बारे में ब्रेष्ट ने कहा था :''सच है कि मैं अँधेरे वक्तों में जीता हूँजब एक ...
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  May 20, 2016, 11:39 am
... मार्क्‍स सबसे पहले एक क्रांतिकारी थे। जीवन में उनका वास्‍तविक उद्देश्‍य पूँजीवादी समाज तथा जिन राजकीय संस्‍थाओं को उसने कायम किया था, उनका अन्‍त करने में किसी न किसी रूप में मदद पहुँचाना था। उनका वास्‍तविक जीवनोद्देश्‍य आधुनिक सर्वहारा वर्ग के मुक्ति आंदोलन में ...
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  May 14, 2016, 10:08 am
पैरों से रौंदे गये आज़ादी के फूलआज नष्‍ट हो गये हैंअँधेरे के स्‍वामीरोशनी की दुनिया का ख़ौफ देखखुश हैंमगर उस फूल के फल नेपनाह ली है जन्‍म देने वाली मिट्टी में,माँ के गर्भ में,आँखों से ओझल गहरे रहस्‍य मेंविचित्र उस कण ने अपने को जिला रखा हैमिट्टी उसे ताकत देगी, मिट्टी उ...
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  May 14, 2016, 10:01 am
कुछ जिम्‍मेदारियाँ हैंकविता जिन्‍हें पूरा नहीं कर पा रही है।कुछ विचार हैंकविता जिन्‍हें बाँध नहीं पा रही है।कुछ गाँठें हैंकविता जिन्‍हें खोल नहीं पा रही है।कुछ स्‍वप्‍न हैंकविता जिन्‍हें भाख नहीं पा रही है।कुछ स्‍मृतियाँ हैंकविता जिन्‍हें छोड़ नहीं पा रही है।क...
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  May 14, 2016, 10:00 am
तुम पूछोगे, क्‍यों मेरी कविता बताती हैपत्तियों और हरी नदियों के बारे मेंऔर सुबह की इस बारिश मेंपीछे लौटती लहरों पर फिरकी मारतेऔर गोते लगाते और धारा के साथ बहतेबत्‍तखों के उस कुनबे के बारे में।कहाँ हैं बेरोज़गार लोग? -- तुम पूछते हो,कहाँ हैं तमाम कूड़ा-कचरा, टूटी हुई खिड...
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  May 14, 2016, 9:58 am
विश्व सर्वहारा के शिक्षक और सिद्धान्तकार तथा सोवियत क्रांति के महान नेता लेनिन के जन्मदिन (22अप्रैल) के अवसर परसुनिए, बेर्टोल्ट ब्रेष्ट के सहयोगी, सर्वहारा संगीत के महान पुरोधा हान्स आइस्लर की सुप्रसिद्ध संगीत-रचना 'लेनिन' (1935)...
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  April 21, 2016, 12:38 pm
महान घटनाएँजो घट चुकी थींउदाहरण बनीं।स्मृतियों में बनी रहतींचुपचाप, बेहतर होता,घसीटकर नहीं लायी जातींउदाहरण के तौर परपाठशालाओं में।जो भी उदाहरण दिये जाते रहेघट रही और सम्भावितक्रियाओं-घटनाओं के,वे अतीत में घटित हुए थे।महानतम अतीत के साँचे में भीअँट नहीं पाता भवि...
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  February 13, 2016, 1:41 pm
गिद्धों नेनालन्दा के परिसर में स्थायी बसेरा बना लिया है।पुस्तकालय में गिद्ध,अध्ययन कक्षों और सभागारों में गिद्ध,छापाखानों में गिद्ध, सूचना केन्द्रों में गिद्ध,नाट्यशालाओं और कला-वीथिकाओं में गिद्ध।गिद्ध नालन्दा से उड़ते हैंबस्तियों की ओरवहाँ वे जीवित संवेदनाओं...
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  February 5, 2016, 12:55 pm
वह कठिन समय का जलता सच था।गंध चिरांयध फैल रही थीलाशों की बदबू फैली थीआसपास उन्मादी नारे गूँज रहे थे।मैंने इस सच को कविता में रखना चाहा।हृदय व्यग्र था, उत्तेजित था।कविता बनी, मगर कविता मेंकविता कम थी, सच्चाई कासीधे-सीधे कथन अधिक था।कवि ने देखा, मुँह बिचकायाधिक्कारा उस...
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  February 5, 2016, 12:51 pm
(कुछ खुदरा विचार...)प्रतिरोधों को ख़रीद लेने की ताक़त सत्ता की सबसे बड़ी ताक़त होती है। सम्पत्ति-संचय से पैदा होने वाला अपराध-बोध और भय धनी लोगों को दान देने के लिए प्रेरित करता है। कुछ दिन कम्युनिस्ट रह लेने के बाद एन.जी.ओ. सेक्टर में भविष्य उज्ज्वल हो जाता है। मृतक...
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  February 5, 2016, 12:42 pm
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