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Blog: The Heritage

Blogger: अनिरुद्ध मिश्र
*चार महीने बीत चुके थे, बल्कि 10 दिन ऊपर हो गए थे, किंतु बड़े भइया की ओर से अभी तक कोई ख़बर नहीं आई थी कि वह पापा को लेने कब आएंगे. यह ... Read more
clicks 0 View   Vote 0 Like   10:08am 15 Sep 2019 #
Blogger: अनिरुद्ध मिश्र
मैं यादों का      किस्सा खोलूँ तो,      कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं,मैं गुजरे       पल को सोचूँ  तो,       कुछ दोस्त बहुत याद &#... Read more
clicks 5 View   Vote 0 Like   5:45pm 4 Aug 2019 #
Blogger: अनिरुद्ध मिश्र
गायत्री निवासबच्चों को स्कूल बस में बैठाकर वापस आ शालू खिन्न मन से टैरेस पर जाकर बैठ गई. सुहावना मौसम, हल्के बादल और पक्ष... Read more
clicks 4 View   Vote 0 Like   1:47pm 1 Aug 2019 #
Blogger: अनिरुद्ध मिश्र
जिनलोगों के पास नहीं होती रोशनीअक्सरवही ढूंढ़ लेते हैंरात का मुकाम पोस्टजिन लोगों के पास नहीं होती चाॅ॑दनीअक्सरवही ... Read more
clicks 40 View   Vote 0 Like   12:27pm 16 Apr 2019 #
Blogger: अनिरुद्ध मिश्र
धूप !तुम धूप सी महका करोतनिक झुक जाओइतनी मत तना करोधूप !तुम पीठ पर रेंगोरेशमी छुअन बनबिच्छू बन दंश न् दिया करोधूप !तुम दिसंबरी बनोजेठ की  कामना मत बनोधूप !तुम हर उस जगह जरूर पहुंचोजहां नमी है , सीलन भीउगाओ कुछ धरती के फूलमत झुलसाओबहार ले आओराघवेंद्र,अभी-अभी... Read more
clicks 77 View   Vote 0 Like   9:48am 22 Aug 2017 #
Blogger: अनिरुद्ध मिश्र
मैं नहीं रहूँगा तो तुम्हारी दुनियाकितनी सूनी और बेरौनक हो जाएगी ।इसकी सारी चहल पहलइसका सारा जगर मगर मेरे होने से है ।एक मेरे उदास होने सेदूर का चाँद उदास होता हैएक मेरे खोने सेतुम्हारा सूरज भी आस खोता है ।एक दिन सब यकीन करेंगेकि कोई बागड़ बिल्ला नहींकोई अवतार और उसका ... Read more
clicks 75 View   Vote 0 Like   9:22am 22 Aug 2017 #
Blogger: अनिरुद्ध मिश्र
तमाशा हो रहा हैऔर हम ताली बजा रहे हैंमदारीपैसे से पैसा बना रहा हैहम ताली बजा रहे हैंमदारी साँप कोदूध पिला रहा हैंहम ताली बजा रहे हैंमदारी हमारा लिंग बदल रहा हैहम ताली बजा रहे हैंअपने जमूरे का गला काट करमदारी कह रहा है-'ताली बजाओ जोर से'और हम ताली बजा रहे हैं।बोधिसत्व, म... Read more
clicks 166 View   Vote 0 Like   4:12pm 20 Aug 2017 #
Blogger: अनिरुद्ध मिश्र
भले रोक दे राज्य तुम्हारा रथ फिर भी,भले रोक दे भाग्य तुम्हारा पथ फिर भी,जीवन  कभी नहीं  रुकता है, चाहे वक्त ठहर जाए।जीवन तो  पानी  जैसा  है, राह  मिली  बह जाएगा,चाहे जितना कठिन सफ़र हो, राह  बनाता जाएगा,कोई सुकरात नहीं मरता है, चाहे  ज़हर उतर जाए।काट  फेंक  दे &n... Read more
clicks 107 View   Vote 0 Like   3:21pm 20 Aug 2017 #
Blogger: अनिरुद्ध मिश्र
हम बस आपसे निवेदन करते हैं,कि प्रत्येक शहर में एक लाइब्रेरी होती हैऔर हमारे शहर इलाहाबाद में भी एक लाइब्रेरी हैजो अब कबूतरों और धूल का अड्डा बन चुकी हैकभी गुलजार रहने वाले उनके बगीचे अब घास और झाड़ियों से अटे पड़े हैंऔर साइकिल स्टैण्ड जुआरियों और नशेडियों की पनाहगाह।ऐ... Read more
clicks 88 View   Vote 0 Like   6:12am 5 Jun 2017 #
Blogger: अनिरुद्ध मिश्र
कुछ अजीब सा माहौल हो चला है,मेरा रायपुर अब बदल चला है….ढूंढता हूँ उन परिंदों को,जो बैठते थे कभी घरों के छज्ज़ो परशोर शराबे से आशियानाअब उनका उजड़ चला है,मेरा रायपुर अब बदल चला है…..होती थी ईदगाह भाटा सेकभी तांगे की सवारी,मंज़िल तो वही हैमुसाफिर अब आई सिटी बस मेंचढ़ चला हैमेरा... Read more
clicks 100 View   Vote 0 Like   3:12pm 10 Jan 2017 #
Blogger: अनिरुद्ध मिश्र
महाश्वेता देवी जी की एक बहुत अच्छी कविता ***आ गए तुम ?द्वार खुला है अंदर आ जाओपर ज़रा ठहरोदहलीज़ पर पड़ेपॉयदान परअपना अहम् झाड़ आनामधु मालती लिपटी हैमुंडेर सेअपनी नाराज़गीउस पर उंडेल आनातुलसी के क्यारे मेंमन की चटकन चढ़ा आनाअपनी व्यस्तताएँबाहर खूँटी पर टाँग आनाजूतों के सा... Read more
clicks 128 View   Vote 0 Like   11:52am 11 Sep 2016 #
Blogger: अनिरुद्ध मिश्र
न मैं हँसी, न मैं रोईबीच चौराहे जा खड़ी होईन मैं रूठी, न मैं मानीअपनी चुप से बांधी फाँसीये धागा कैसा मैंने कातान इसने बांधा न इसने उड़ायाये सुई कैसी मैंने चुभोईन इसने सिली न उधेड़ीये करवट कैसी मैंने लीसाँस रुकी अब रुकीये मैंने कैसी सीवन छेड़ीआँतें खुल-खुल बाहर आईंजब न ... Read more
clicks 119 View   Vote 0 Like   11:42am 11 Sep 2016 #
Blogger: अनिरुद्ध मिश्र
यह एक पीठ हैकाली चट्टान की तरहचौड़ी और मजबूतइस पर दागी गयींअनगिनत सलाखेंइस पर बरसाये गयेहज़ार-हज़ार कोड़ेइस पर ढोया गयाइतिहास कासबसे ज़्यादा बोझयह एक झुकी हुई डाल हैपेड़ की तरहउठ खड़ी होने को आतुर - एकांत श्रीवास्तवसौजन्य : जय प्रकाश मानस... Read more
clicks 110 View   Vote 0 Like   11:36am 11 Sep 2016 #
Blogger: अनिरुद्ध मिश्र
बाढ़ के बीच उस आदमी की हिम्मतटँगी है आकाश में और धरती डूबती जा रही हैपाँव के नीचे बचाने के लिएअब उसके पास कुछ नहीं है सिवाय अपनेवह बचा हुआ हैबचाने को बाढ़बाढ़ बची रहेगीतो बाढ़ से घिरे आदमी के फ़ोटू बचे रहेंगे - डॉ. श्याम सुंदर दुबेसौजन्य : जय प्रकाश मानस ... Read more
clicks 95 View   Vote 0 Like   11:32am 11 Sep 2016 #
Blogger: अनिरुद्ध मिश्र
रात चूसती, दिन दुत्कारेदुख-दर्दों के वारे-न्यारे।परसों मिली पगार हमें हैऔर आज जेबें खट्-खालीचौके की हर चुकती कुप्पीलगती भारी भरी दुनालीकिल्लत किच-किच में डूबे हैंअपने दुपहर, साँझ, सकारे।पिछला ही कितना बाक़ी हैऔर नहीं देगा पंसारीसूदखोर से मिलने पर भीसुनना वही राग-द... Read more
clicks 85 View   Vote 0 Like   11:26am 11 Sep 2016 #
Blogger: अनिरुद्ध मिश्र
(सभी महिलाओ को समर्पित)बेटी से माँ का सफ़र बेफिक्री से फिकर का सफ़ररोने से चुप कराने का सफ़रउत्सुकत्ता से संयम का सफ़रपहले जो आँचल में छुप जाया करती थी  ।आज किसी को आँचल में छुपा लेती हैं ।पहले जो ऊँगली पे गरम लगने से घर को उठाया करती थी ।आज हाथ जल जाने पर भी खाना बनाया करत... Read more
clicks 81 View   Vote 0 Like   6:22am 7 May 2016 #
Blogger: अनिरुद्ध मिश्र
नये साल में फिर से याद आयी कविता ---------------------------------------एक बार हमारी मछलियों का पानी मैला हो गया थाउस रात घर में साफ़ पानी नहीं थाऔर सुबह तक सारी मछलियाँ मर गई थींहम यह बात भूल चुके थेएक दिन राखी अपनी कॉपी और पेंसिल देकरमुझसे बोलीपापा, इस पर मछली बना दोमैंने उसे छेड़ने के लिए काग... Read more
clicks 95 View   Vote 0 Like   7:18am 7 Mar 2016 #
Blogger: अनिरुद्ध मिश्र
पता नहीं क्योंअक्सर जी करता हैयाद करूँबचपन के उस क्षण कोकाका ने लिवाया था मुझेएक नया जूता का जोड़ा ।नए जूते की महक कोपहली बार जाना थाकाला जूता, चमकीलापूरे मन को भा गया थाकाका की हामी ने मेरा दिल भर दिया थाजैसे मेरे लिए ही बना था यह जूताक्यूँ न याद करूँ उस क्षण कोपहली बा... Read more
clicks 117 View   Vote 0 Like   7:10am 7 Mar 2016 #
Blogger: अनिरुद्ध मिश्र
चाहे हाड़ तोड़कर - चाहे हाथ जोड़कर सबसे अंतिम में पाँव पकड़कर इन सबसे पहले गुल्लक फोड़करले ही आते हैं अनाज पीठ लादकरसबसे मनहूस - अंधेरी गलियों मेंदिन ढ़लने से पहले जो पिता होते हैं जो पिता होते हैं वे कभी नहीं थकतेपालनहार देवता, उनके पिता ईश्वर थक हार भले मुँह छुपा लेंव... Read more
clicks 112 View   Vote 0 Like   6:57am 7 Mar 2016 #
Blogger: अनिरुद्ध मिश्र
हमारे भीतर होता था खिलखिलाता मनमन के बहुत भीतर सबसे बतियाता घरघर के भीतर उजियर-उजियर गाँव गाँव के भीतर मदमाते खेतखेत के भीतर बीज को समझाती माटी माटी के भीतर सुस्ताते मज़ूर और सिर-पाँवपाँव के भीतर सरसों, गेहूँ, धान की बालियाँबालियों के भीतर रंभाती गायगाय के भीतर हंकड़... Read more
clicks 98 View   Vote 0 Like   6:51am 7 Mar 2016 #
Blogger: अनिरुद्ध मिश्र
जल बचा था दिखना बचा हुआ थाकहीं-न-कहीं कम-से-कम कोई तालाब तालाब बचा था दिखना बचा हुआ थाकभी-न-कभी कम-से-कम कोई घाटघाट बचा था दिखना बचा हुआ थाकुछ-न-कुछ कम-से-कम कोई चित्र चित्र बचा था दिखना बचना हुआ थाकैसे-न-कैसे कम-से-कम कोई मित्र एक दिन जब मित्र न बचा था न दिखना बचा हुआ था चित्... Read more
clicks 87 View   Vote 0 Like   6:39am 7 Mar 2016 #
Blogger: अनिरुद्ध मिश्र
कुहरे की चादर कोभूरी एक चिड़िया ने नोकदार चोंच सेकाटा पहले,फिर चीरती चली गईदूर आसमान से सूरज ने अचानक अपना ररक्तवर्णी चेहराउठाया आसमान मेंलड़ते हुए कुहरे सेनदी ने खुली बाँहों मेंभर लिया सूरज कोफिर सूरज चिड़िया से,नदी से,काव्य पाठ करता रहामैंने सिर्फ़ सूरज का काव्य ... Read more
clicks 100 View   Vote 0 Like   5:40am 3 Mar 2016 #
Blogger: अनिरुद्ध मिश्र
जिन पेड़ों पर बैठे बगुलेउन पेड़ों के दिन गिनती के।कैसे-कैसे लोग पालतेकैसी-कैसी आकांक्षाएँएक-एक कर टूट रही हैंइंद्रधनुष की प्रत्यंचाएँजिन नातों के नेह अचीन्हेउन नातों के दिन गिनती के।फसलें उजड़ गईं खेतों कीघर-आँगन छाया सन्नाटागाय बेच,गिरवी जमीन रखहरखू तीर्थाटन से लौ... Read more
clicks 97 View   Vote 0 Like   5:27am 3 Mar 2016 #
Blogger: अनिरुद्ध मिश्र
सतपुड़ा जब याद करे, फिर आनाआना जी नर्मदा बुलाए जबधवल कौंच पंक्ति गीत गाएँ जबचट्टाने भीतर ही भीतर जब सीझ उठेंआना जब सुबह शाम झरनों पर रीझ उठेछरहरी वन तुलसी गंधिल आमंत्रण देंआना, जब झरबेरी लदालद निमंत्रण देंमहुआ की शाखें जब याद करें. फिर आना । घुंघची का पानी जब दमक उठेअं... Read more
clicks 110 View   Vote 0 Like   5:24am 3 Mar 2016 #
Blogger: अनिरुद्ध मिश्र
मैं कुछ झूठा, वह कुछ सच्चाना मैं पूरा झूठाना वह पूरा सच्चा मैंने चाहा पर हो न सका पूरा-पूरा झूठाउसने चाहा पर हो न सका पूरा-पूरा सच्चाकुछ झूठा हूँ मैं मतलब कुछ मुझमें भी सच्चाईकुछ सच्चा है वह मतलब कुछ उसमें भी झूठाईहम दोनों ही करते हैं हर पल - हर क्षण - हरदम लड़ाईकरे कोई अगव... Read more
clicks 105 View   Vote 0 Like   5:23am 3 Mar 2016 #
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