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Blog: सत्याग्रह

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रानी पद्मावती पर बनती फिल्म पर हंगामा अकारण नहीं था। बात सिर्फ अभिव्यक्ति की नहीं थी। यह बात समझनी चाहिए। विसुअल मीडिया इतिहास और मान्यताओं को बदल कर रख देता है। जो सही नहीं, वह सही बन जाता है। इस पॉइंट को समझना चाहिए। मुगले आज़म बनी थी। अनारकली और सलीम का प्रेम सदा ... Read more
clicks 60 View   Vote 0 Like   1:17pm 24 Mar 2017 #
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थैंक यू फॉर 90 वोट्स।इरोम को हारना तो था ही। आज नहीं तो कल। भावनाओं पर एक बार-दो बार चुनाव जीते जा सकते हैं, इससे ज्यादा नहीं।पीछे कंस्ट्रक्टिव वर्क का आधार रहने से सम्भावना बनती है। यहाँ तो यह भावनाएं भी अनशन तोड़ने से और विवाह कर लेने से टूट चुकी थीं। ऐसा ही है संसार।बात ... Read more
clicks 59 View   Vote 0 Like   1:14pm 24 Mar 2017 #
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आज उस ऐतिहासिक नरम दल के सापेक्ष सभी अनायास ही खड़े हैं क्योंकि सिर्फ चुनावी राजनीति पर विश्वास नरम दलीय ही बनाता है। अपने आइकॉन बनाने की छूट तो हर काल में थी। भले अपने आइकॉन गरम दल वालों को बना लें, आज उस समय के हिसाब से हर दल नरम दलीय है। अम्बेडकर ने तो किसी भी प्रकार क... Read more
clicks 63 View   Vote 0 Like   1:13pm 24 Mar 2017 #हेजेमनी
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शायद आज आइंस्टीन से सम्बंधित तिथि है। उनके "साइंस, फिलोसोफी, और रिलिजन"आर्टिकल को पढ़ना चाहिए। नील्स बोह्र से उनकी क्यों नहीं बनती थी, यह बात दर्शन के अंदर घुस कर ही पता चल सकती है। बहरहाल दो पुरानी पोस्ट.... भारत से सम्बंधित।गांधी के निंदक (आलोचक नहीं ) आइंस्टीन की गांधी के... Read more
clicks 64 View   Vote 0 Like   1:11pm 24 Mar 2017 #
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फतवा अलग क्यों लगता है ? एक मध्ययुगीय प्रणाली! फतवे के विषयवस्तु को लेकर उठते सवाल जरुरत हैं, जायज हैं, मगर पूरी अवधारणा पर ही प्रश्न !जब मजहब और सो कॉल्ड साइंस का डाइवोर्स नहीं हुआ था तब ऐसी ही अवधारणाएं समाज को एक सूत्र में बांधकर सुचारू रूप से चलाने का काम करती थीं। हुआ ... Read more
clicks 63 View   Vote 0 Like   1:10pm 24 Mar 2017 #
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हर्बर्ट स्पेंसर को अपने "सर्वाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट"कांसेप्ट के लिए जाना जाता है। डार्विन को इस बात से बल मिला। यह थ्योरी इनके द्वारा लिखित "प्रिंसिपल्स ऑफ़ बायोलॉजी"से ग्रहण की गई है । पर इसी किताब में इन्होंने यह भी लिखा है कि "फ्लैट-चेस्टेड गर्ल्स"जिनपर शिक्षा का अत्यधि... Read more
clicks 61 View   Vote 0 Like   1:09pm 24 Mar 2017 #
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1923 में एक कमिटी बनी थी-मोहम्मद उस्मान कमिटी। यह मद्रास इन्क्वायरी कमिटी के नाम से जानी जाती है। इस कमिटी ने पारंपरिक स्थानीय मेडिकल प्रैक्टिशनर के पक्ष को "साइंटिफिक"यूरोपीय एलोपैथिक प्रणाली के समक्ष प्रश्नोत्तर शैली में खड़ा किया था। "यदि हम अपने चिकित्सा विज्ञा... Read more
clicks 61 View   Vote 0 Like   1:08pm 24 Mar 2017 #
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जड़ से साफ़ न करो तोपीपल के कोमल पौधेदरख्त बन दीवारों को तोड़ जाते हैं।अगर सर्जरी न करो तोमरहम से मिटाया घाववक्त के नासूर बन जाते हैं।कोई मुद्दा छोटा-पुराना नहीं होता।प्राथमिकता बनाना अलग बात है, फिर भी,दबाये गए मुद्दे फिर उभर आते हैं।वक्त के साथ इनकी फितरत भी है बदलती।य... Read more
clicks 59 View   Vote 0 Like   1:06pm 24 Mar 2017 #
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बिहार की सबसे बड़ी खूबी प्रतिरोध की संस्कृति के होने में रही है। ये प्रतिरोध सफल भी रहे। उदाहरण भरे पड़े हैं।एक राजा के रूप में उस समय छाये हुए प्रवृतिवाद से मुक्त हो निवृति का मार्ग दिखानेवाले विदेह जनक हों या स्वयं उनकी पुत्री सीता जिनके पुत्रों ने राम के अश्वमेघ अश्व... Read more
clicks 54 View   Vote 0 Like   1:03pm 24 Mar 2017 #
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राम किसी भी संस्कृति, किसी भी समूह-समुदाय से परे हैं। वह तुलसी के राम हैं और नहीं भी हैं। उनका जन्म अयोध्या में होकर भी नहीं हुआ । उनके पिता दशरथ हैं भी और नहीं भी। अभिमन्यु का प्रसंग स्मृति में आता है । अभिमन्यु मर चुका था। अर्जुन से इस दुःख के कारण लड़ा नहीं जा रहा था। कृष... Read more
clicks 57 View   Vote 0 Like   1:02pm 24 Mar 2017 #
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अक्सर सुना जाता है कि पहले हम भी अच्छा सोंचते थे, अच्छी बातों पर टिके रहते थे लेकिन अब सामनेवाले को देखकर बदल गए। वो नहीं सुधरते तो हम क्यों अच्छे बने रहें।एक तरह से सही लगता है। आसान भी है ऐसा सोंचना और करना।सांख्य दर्शन कहता है कि दूध में ही दही के गुण छुपे होते हैं या य... Read more
clicks 59 View   Vote 0 Like   1:00pm 24 Mar 2017 #
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ठेकेदारी लेने की होड़ है। कोई विचारों के नाम पर हस्तक्षेप बरदाश्त नहीं करता तो कोई उत्सर्ग में अपने अस्तित्व का कारण ढूंढता है। मेरी समझ से विचार के आधार पर हस्तक्षेप न सहन करनेवाले अधिक दोषी हैं। विचार किसी को महान तो बना सकते हैं ,मगर युगप्रवर्तक नहीं। उत्सर्ग का भ... Read more
clicks 61 View   Vote 0 Like   12:59pm 24 Mar 2017 #
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यक्ष-युधिष्ठिर संवाद में एक प्रसंग है-तर्कों अप्रतिष्ठः श्रुति र्विभिन्नानैको मुनिर्यस्य वचनं प्रमाणम् ।तर्क को उसकी सीमा दिखाता यह श्लोक बहुत कुछ कह जाता है। हालाँकि इस प्रसंग को उद्धरित करना एक तरह से आस्था है जिसे स्वीकार करना चाहिए। फिर भी प्रश्न तो उठते ही है... Read more
clicks 63 View   Vote 0 Like   12:58pm 24 Mar 2017 #
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"पहले हम उनके समान गोरे नहीं थे और अब हम इनके समान काले नहीं हैं। "..... कहानी साउथ अफ्रीकन इंडियन की।1994 साउथ अफ्रीका के लिए अपारथाइड समाप्ति को लेकर आया। ख़ुशी की लहर थी। वहां के भारतीय मूल के निवासी भी इस ख़ुशी में शरीक थे। अपारथाइड को उन्होंने भी झेला और उसके विरुद्ध संघर्... Read more
clicks 74 View   Vote 0 Like   10:26am 19 Jun 2016 #
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रूस ( तब का USSR)में कभी एक वैज्ञानिक हुआ था। नाम था लयसेंको(Trofim Lysenko) । जनाब बायोलॉजिस्ट और अग्रोनॉमिस्ट थे। इनकी खोजी तकनीक आज भी vernalisation के नाम से जानी और पढ़ाई जाती है ( ठन्डे तापमान के प्रभाव से फ्लोवेरिंग पीरियड बढ़ जाता है और इसके कारण ग्रेन फिलिंग अधिक होती है। फलतः उपज मे... Read more
clicks 79 View   Vote 0 Like   3:54am 3 Feb 2016 #लयसेंको
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इस दीवार में दरारें हैंकटी फटी बेतरतीब सी।एक सीध से उनमे आती-जाती-खोदतीचींटियों की कतारें हैं।उस नन्हे पौधे को एक दिनदरख़्त बनना है।जम आई मिट्टी परफैलती सिकुड़ती उसकी जड़ों कोचींटियों की लाश तक से नमी सोखना है।एक घोसला भी दिखने लगा है।चींटियों को चुगती एक चिड़ी नज... Read more
clicks 77 View   Vote 0 Like   3:49am 3 Feb 2016 #
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किसके गांधी ?आज विरोधियों पर लिख नहीं रहा। विरोधियों से डर नहीं लगता साहब , समर्थकों से लगता है।आज संघी भी गांधी को अपनाने को तैयार बैठे हैं। वामपंथी कब के मजबूरीवश अपना चुके। आज़ादी के पहले अल्पसंख्यकों के लिए अछूत हो चुके गांधी आज़ाद भारत में उनके लिए सहारा हो गए , कम ... Read more
clicks 175 View   Vote 0 Like   3:34am 3 Feb 2016 #महात्मा गाँधी
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मैं गोलियाँ बेचता हूँ, गोलियाँ, बंदूक वाली नहीं, सपनों की. तरह-तरह के रंग-बिरंगे अच्छे लगनेवाले सपनों की, वो भी बिल्कुल मुफ्त. पूछोगे मुफ्त क्यों ? मैं कहूँगा कि भई तुम्हारे सपने से मुझे भी सुकून मिलता है. मैं भी नये जोश और ताजगी से भर उठता हूँ. फिर पूछोगे कि यह कैसे होता ह... Read more
clicks 151 View   Vote 0 Like   9:04am 19 Mar 2013 #
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बड़ा ही जटिल प्रश्न है कि आखिर क्यों उत्तर प्रदेश और बिहार विकास की दौड़ में पिछड़ गये. गंगा-यमुना से सिंचित विश्व की सबसे ज्यादा उर्वर मिट्टी; राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, कबीर,सुफ़ीओं आदि के संस्कारों से सजी संस्कृति; और कभी अखिल भारत की राजधानी रही धरती.......क्... Read more
clicks 156 View   Vote 0 Like   9:00am 19 Mar 2013 #
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            कहना प्रासंगिक हो चला है कि अब देश में पुनः सामाजिक सुधारकों और सांस्कृतिक संघटनों की आवश्यकता बढ गई है. आज़ादी के बाद बहुत कुछ बदल चुका है. पर अगर पूछा जाये तो सबसे ज्यादा बदलाव जनता की मानसिकता में दिखता है.भारत का स्वतंत्रता संघर्ष विश्व के पटल पर अप्रतिम स... Read more
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बैगन, नाम ही काफी है दहशत फैलाने के लिये. खाने की थाल में देख कई अच्छों के पसीने छूट जाते हैं, कई रुआंसे हो जाते हैं. बैंगन इनके लिये आतंक का पर्याय बन चुका है. हाँ, कई वीर ऐसे भी हैं जिन्हें खतरों से खेलना अच्छा लगता है. निश्चय ही यह बैंगन उन्हें प्रिय है.नाम कई, आकार कई, प्रक... Read more
clicks 188 View   Vote 0 Like   4:32pm 9 Dec 2012 #
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एक प्रश्न उठा था जेहन में - देश ने मेरा क्या किया? देश ने मुझको क्या दिया? बात उस समय की है जब मैं अपने कुछ मित्रों के साथ आज से 5-6 साल पहले एक फिल्म देखने सिनेमा हॉल गया हुआ था. राष्ट्र गान से शुरुआत हुई. सभी उठ खड़े हुए. अचानक नजर पड़ी तो पाया कि एक बंदा बैठा आराम से पॉपकॉर्न ... Read more
clicks 159 View   Vote 0 Like   10:06am 22 Oct 2012 #
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सन 2013, नोबेलपुरस्कारोंकीघोषणाकामहीनाचलरहाथा. भौतिकी, रसायनशास्त्र, चिकित्साइत्यादिमेंमिलेनामविश्व-पटलपरआचुकेथे. एकदिनअर्थशास्त्रकेनामकीउद्घोषणाभीहोगयी.कलरातके 12 बजनेवालेथे. दिनभरकीथकानकेबादहमारेश्रीसुनसोहनसिंहजीसोनेकीतैयारीमेंजुटेथे. बिस्तरपरगयेज्... Read more
clicks 155 View   Vote 0 Like   2:07pm 15 Oct 2012 #
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बात उन दिनों की है जब मैं बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का छात्र हुआ करता था. पढ़ते-लिखते, खेलते, मस्ती करते दिन अच्छे बीत रहे थे. एक अखिल भारतीय अंतर-विश्विद्यालयीय सांस्कृतिक उत्सव का आयोजन होने वाला था बंगलोर में. भिन्न-भिन्न विधाओं के लिये प्रतियोगियों का चयन होने ल... Read more
clicks 180 View   Vote 0 Like   9:11pm 18 Sep 2012 #
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बड़ा ही जटिल प्रश्न है कि आखिर क्यों उत्तर प्रदेश और बिहार विकास की दौड़ में पिछड़ गये. गंगा-यमुना से सिंचित विश्व की सबसे ज्यादा उर्वर मिट्टी; राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, कबीर,सुफ़ीओं आदि के संस्कारों से सजी संस्कृति; और कभी अखिल भारत की राजधानी रही धरती.......क्या हो गया आखि... Read more
clicks 183 View   Vote 0 Like   7:49pm 17 Sep 2012 #
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