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Blog: कदाचित

Blogger: sangam pandey
राजेन्द्र चंद्रकांत राय द्वारा अनूदित पुस्तक ‘स्लीमेन के संस्मरण’से गुजरते हुए सबसे पहला अहसास जो होता है वह यह कि हम अपने इतिहास को कितना कम जानते हैं। ऐसा लगने की वजह है कि स्लीमेन इनमें बात की अंतर्कथाओं और उनके उत्स को सामने लाते हैं, और हमें अपनी जानकारियाँ अधूर... Read more
clicks 0 View   Vote 0 Like   12:11pm 18 Jan 2020 #
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पहले यथार्थ पर व्यंग्य करने के लिए प्रहसन लिखे जाते थे, फिर जब यथार्थ खुद ही प्रहसन जैसा हो गया तो नुक्कड़ नाटक लिखे जाने लगे। नुक्कड़ नाटक के व्यंग्य में प्रहसन की तरह की वक्रता नहीं होती, वह बिल्कुल सीधा और दो टूक होता है। असगर वजाहत के नए-पुराने नुक्कड़ नाटकों की पुस... Read more
clicks 0 View   Vote 0 Like   11:42am 16 Jan 2020 #
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  देबूदा पुरानी दिल्ली की बस्ती हिम्मतगढ़ में रहते थे। अजमेरी गेट की तरफ से जाने वाली बहुत सी गलियों में से एक गली थी। गली के एक नुक्कड़ पर वो पुराने वक्त की एक हवेली थी, जिसके खड़े और किंचित अंधेरे में डूबे जीने से होकर देबूदा के यहां पहुंचा जा सकता था। हवेली में देब... Read more
clicks 0 View   Vote 0 Like   8:58pm 3 Dec 2019 #
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मोहनकृष्ण बोहरा की किताब ‘तसलीमा- संघर्ष और साहित्य’ को तसलीमा के जीवन और लेखन का एक गजट या टीका कह सकते हैं। बोहरा ने इसमें तसलीमा की पुस्तकों की विषयवस्तु को पूरे विस्तार में समेटते हुए उसका जायजा लिया है। इस क्रम में आत्मकथा-पुस्तकों से तसलीमा का जीवन खुलता ह... Read more
clicks 0 View   Vote 0 Like   8:59am 19 Nov 2019 #
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हिंदी के बड़े लेखकों में कृष्णा सोबती के यहाँ एक दुर्लभ विविधता है। ‘मित्रो मरजानी’से लेकर ‘डार से बिछुड़ी’, ‘दिलो दानिश’और ‘हम हशमत’तक। संपादक छबिल कुमार मेहेर ने अपनी पुस्तक ‘कृष्णा सोबती एक मूल्यांकन’में उनके लेखन की बुनावट को समझने के लिए 28समीक्षकों के लेखों क... Read more
clicks 0 View   Vote 0 Like   3:02pm 17 Oct 2019 #
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जाने-माने रंगकर्मी और नाटककार आत्मजीत ने अपने नाटकों में अक्सर कई दुर्लभ विषयों को उठाया है। उनका नाटक ‘लाल मसीहा’केन्या की आजादी के एक गुमनाम नायक मक्खन सिंह के जीवन पर आधारित है। मक्खन सिंह अहिंसावादी थे, फिर ट्रेड यूनियन नेता बने और फिर अंग्रेजों की आँख की किरकिर... Read more
clicks 11 View   Vote 0 Like   4:55am 27 Jul 2019 #
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एक लंबी टिप्पणी की शक्ल में लिखी गई पुस्तक 'एक था डॉक्टर एक था संत'में विषयवस्तु थोड़ा बेतरतीब ढंग से प्रस्तुत है। बात अंबेडकर-गाँधी से शुरू होकर कभी मलाला युसूफजई और सुरेखा भोतमाँगे के संघर्षों की ओर मुड़ती है तो कभी पंडिता रमाबाई के प्रसंग तक और फिर प्राचीन हिंदू सं... Read more
clicks 14 View   Vote 0 Like   4:39am 21 Jul 2019 #
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बलत्कार की पीड़ा का बयानज्ञानप्रकाश विवेक का उपन्यास ‘डरी हुई लड़की’सामूहिक बलात्कार की शिकार हुई एक लड़की की मनोदशा की कहानी है।  एक सुबह वह उपन्यास के ‘मैं’को बदहाल दशा में सड़क के किनारे पड़ी मिली। बैचलर ‘मैं’उसे अपने फ्लैट पर ले आया। इस तरह दो-तीन कमरों के दायर... Read more
clicks 28 View   Vote 0 Like   10:45am 28 Feb 2019 #
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युवा रंग-निर्देशक प्रवीण गुंजन ने अभिनेता की एनर्जी को एक मुहावरे की तरह बरतने की एक दिलचस्प शैली विकसित की है। उनका अभिनेता मंच पर इस कदर सक्रिय होता है कि देखने वाले में गर्मजोशी आ जाए। मुझे उनकी ‘गबरघिचोर’ और ‘मैकबेथ’ जैसी प्रस्तुतियाँ याद हैं जिनमें देहगतियों की... Read more
clicks 22 View   Vote 0 Like   6:52pm 17 Feb 2019 #
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व्योमेश शुक्ल की नई प्रस्तुति ‘बरनम वन’ का कलेवर मैकबेथ की तमाम होती रही प्रस्तुतियों में काफी मौलिक और नया है। यह खाली-मंच पर पश्चिमी ऑपेरा की मानिंद एक कास्ट्यूम ड्रामा है। अभिनेतागण यहाँ पारंपरिक एंट्री-एग्जिट के बजाय अचानक किसी भी छोर से नमूदार पाए जाते हैं। म्य... Read more
clicks 44 View   Vote 0 Like   5:45am 21 Jul 2018 #
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रिहर्सल के बाद मंच के पास बनी कुटिया में सुबह देर तक सोए कलाकारअगर संगीत नाटक अकादमी में जुझारू लोगों के लिए कोई पुरस्कार हो तो वो सबसे पहले नौजवान विश्वनाथ पटेल को मिलना चाहिए। विश्वनाथ का गाँव महलवारा दमोह से 40 किलोमीटर दूर है। मध्यप्रदेश ड्रामा स्कूल से पास होकर न... Read more
clicks 40 View   Vote 0 Like   10:06am 19 Jun 2018 #
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चंपत बुंदेला के खिलाफ लड़ाई में शाहजहाँ का खानखाना नाम का एक फौजी सरदार मारा गया। लापरवाही में बादशाह ने उसकी जगह कोई दूसरा नियुक्त नहीं किया। उन दिनों दरबार में एक सेनापति था जिसके दादे-पड़दादे तैमूरलंग की लड़ाइयों में लड़े थे। वह एक काबिल आदमी था, और बादशाह उसकी सला... Read more
clicks 42 View   Vote 0 Like   9:57am 19 Jun 2018 #
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कथक नृत्यांगना प्रतिभा सिंह निर्देशित प्रस्तुति ‘राम की शक्तिपूजा’ में सबसे ज्यादा जो चीज दिखती है वो है मनोयोग। उनके नाट्यग्रुप ‘कलामंडली’ में शास्त्र-निपुण कलाकारों से लेकर दिल्ली की कठपुतली कालोनी के उजाड़ दिए गए परिवारों के प्रशिक्षु युवा तक शामिल हैं। करीब 45... Read more
clicks 52 View   Vote 0 Like   5:06am 18 Jan 2018 #
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विकास बाहरी के नाटक ‘खिड़की’ में कथानक के भीतर घुसकर उसकी पर्तें बनाने और खोलने की एक युक्ति है। यह मंच पर मौजूद मुख्य पात्र के भ्रम और यथार्थ का एक खेल है, जिसमें दर्शक फँसा रहता है। यह पात्र एक लेखक है, जो अपनी खिड़की से सामने की खिड़की में मोबाइल पर बात करती एक लड़की क... Read more
clicks 52 View   Vote 0 Like   5:00am 18 Jan 2018 #
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पद्मावती मलिक मुहम्मद जायसी के प्रबंधकाव्य ‘पद्मावत’ की नायिका है, जिसका कथानक ये है— अद्वितीय सुन्दरी पद्मावती सिंहलदेश के राजा गंधर्वसेन की पुत्री थी। उसके पास हीरामन नाम का एक तोता था, जो किसी बहेलिये के हाथों पकड़ा जाकर चित्तौड़ के राजा रत्नसेन के यहाँ ज... Read more
clicks 76 View   Vote 0 Like   3:56pm 29 Nov 2017 #
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1990 के आसपास सोवियत संघ और उससे जुड़े देशों में कम्युनिस्ट व्यवस्थाओं के एकाएक ढह जाने का सबसे प्रकट कारण वहाँ की अर्थव्यवस्थाओं का जड़ हो जाना था। इस स्थिति को मार्क्सवादी सिद्धांत, जो निजी लाभ की प्रेरणा को सामूहिक हित के लक्ष्य में रूपांतरित करता है, की विफलता के तौ... Read more
clicks 99 View   Vote 0 Like   2:05pm 12 Jun 2017 #
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रीवा में मनोज मिश्रा ने एक बैंक्वेट हॉल को प्रेक्षागृह की शक्ल दे दी है। मशक्कतों से तैयार किया गया इसका स्टेज अच्छा-खासा किंतु अस्थायी है। शादियों के सीजन में उसे उखाड़ देना पड़ता है। रंग-अलख नाट्य उत्सव में इसी स्टेज पर मंडप आर्ट्स की प्रस्तुति ‘एक विक्रेता की मौत’ ... Read more
clicks 91 View   Vote 0 Like   11:08am 2 Jun 2017 #
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ग्वालियर के नाट्य मंदिर प्रेक्षागृह में जाने से लगता है मानो आप वक्त के किसी लंबे वक्फे का हिस्सा हों। यहाँ की दीवारों, कुर्सियों, पंखों तक में कई दशक पुराना माहौल आज भी अक्षुण्ण है। प्रेक्षागृह का स्वामित्व आर्टिस्ट कंबाइन नाम की जिस 75 साल पुरानी संस्था के पास है उसक... Read more
clicks 90 View   Vote 0 Like   11:07am 2 Jun 2017 #
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जबलपुर के दिनेश ठाकुर स्मृति प्रसंग में वसंत काशीकर की प्रस्तुति ‘खोया हुआ गाँव’ देखी। वसंत काशीकर में आंचलिकता की अच्छी सूझ है। उनकी पिछली प्रस्तुति ‘मौसाजी जैहिंद’ में तो फिर भी पड़ोस के बुंदेलखंड का परिवेश था, पर इस बार तो बिल्कुल ही बेगानी जगह कश्मीर को दिखाया ग... Read more
clicks 85 View   Vote 0 Like   11:01am 2 Jun 2017 #
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मल्लाह टोली=========नीलेश दीपक की प्रस्तुति ‘मल्लाह टोली’ एक बस्ती का वृत्तचित्र है। ‘कैमरा’ यहाँ ठहर-ठहरकर कई घरों के भीतर जाता है, और एक छोटे से परिवेश में तरह-तरह के किरदारों से बनी एक दुनिया को दिखाता है। यह मिथिलांचल के तीन बड़े कथाकारों में से एक राजकमल चौधरी की कहानी... Read more
clicks 87 View   Vote 0 Like   10:58am 2 Jun 2017 #
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रायपुर में 20 से 23 मई तक आयोजित ‘रंग-जयंत’ में शामिल प्रस्तुतियों में ‘सखाराम बाइंडर’ सबसे नई थी। यह इसका दूसरा ही शो था। निर्देशक जयंत देशमुख ‘आधे अधूरे’ के बाद एक बार फिर इसमें मंच-सज्जा की एक विशद विवरणात्मकता के साथ मौजूद थे। सखाराम के घर में दो कमरे हैं। छोटा कमरा र... Read more
clicks 90 View   Vote 0 Like   10:52am 2 Jun 2017 #
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हिंदी नाटक में आधुनिकता के कई चरण रहे हैं। पिछली शताब्दी के पूर्वार्ध में एक ओर जहाँ विपरीत ध्रुवों पर खड़े प्रसाद और भुवनेश्वर दिखाई देते हैं, वहीं उनसे भी थोड़ा पहले 1916 में लक्ष्मण सिंह चौहान ‘कुली प्रथा’ जैसा गठा हुआ यथार्थवादी नाटक लिख चुके थे। लेकिन बीस... Read more
clicks 103 View   Vote 0 Like   5:05am 3 Apr 2017 #
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इस संस्मरण के लेखक जॉन लैंग  (1816-1864) का जन्म सिडनी में हुआ था। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई करने के कुछ साल बाद सन 1842 में वह भारत आ गया। यहाँ आगरा कोर्ट में सन 1851 में ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ कंपनी के ही एक कॉन्ट्रैक्टर रहे लाला जोती प्रसाद के मुकदमे में बतौर ... Read more
clicks 134 View   Vote 0 Like   5:51pm 26 Jan 2017 #
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अल्बेयर कामू के नाटक ‘जस्ट एसेसिन’ उर्फ ‘जायज़ हत्यारे’ को परवेज़ अख्तर ने ‘न्यायप्रिय’ शीर्षक से मंचित किया है। नाटक कामू के प्रिय विषय ‘एब्सर्ड’ की ही एक स्थिति पेश करता है, और शायद समाधान भी। इसकी थीम 1905 के दौरान सोवियत क्रांतिकारियों के एक ग्रुप से... Read more
clicks 180 View   Vote 0 Like   7:54am 26 Dec 2016 #
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तोलस्तोय को हमारे देश में अक्सर गांधी के प्रसंग से याद किया जाता है। गांधी अपने आरंभिक दौर में उनसे गहरे प्रभावित रहे और दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने एक तोलस्तोय आश्रम भी बनाया। ईश्वर, अहिंसा, निजी संपत्ति और शाकाहार पर गांधी के विचार लगभग वही थे जो तोलस्तोय के थे। इस ... Read more
clicks 106 View   Vote 0 Like   5:24pm 24 Dec 2016 #
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