| आओचलोहमभीकुछबवालमचातेहैं,अमन-ओ-सुकूंकोआवाज़लगातेहैं !बड़ेदिनहोगएकोईहरकतनहींकी,यारोंआजसारीहीकसरमिटातेहैं l कलतकजोबोलेतोअनसुनेरहें,अबचुपचापहमदास्ताँकहजातेंहैं l तेरीइनायतभीक्याखूबबरसतीहै,'काफ़िर' कहलाएवोजोसवालउठातेहैं l 'ताइर' कीबेफ़िक्रीपेशकक्योंह... |
| इस हालात-ए-देश की बात क्या करूँ मैं गुस्सा हूँ, शर्मसार हूँ और फ़िर डरूं ?यहाँ रोज़ होता है मासूमों से खिलवाड़तबाह कर ज़िंदगियाँ गुनहगार जिए आज़ादजिस 'औरत' को देवी बना के पूजा जाता हैउसी को हवस से सरेआम रौंदा जाता हैसंस्कृति और तहज़ीब का दावा होता हैपर आवाज़ जो उठ... |
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December 23, 2012, 2:57 pm |
| ना तहज़ीब की बात करेंगे ना मज़हब की,होगी जो बात, अब होगी हम सब की lछोटे छोटे टुकडो में बाँट लेना खुद को,फितरत-ए-इन्सा देखो चल रही गज़ब की l मकसद लापता और राह चले गुमराह,इबादत भी ऐसी भला किस मतलब की।है अगर मौजूद वोह हर एक शेय में,मारते जिसे तुम वो भी औलाद है रब की।शामिल ना कर... |
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December 5, 2012, 12:25 am |
| अब उसे किस्तों में क्यों बाँट दिया हैदेश को 'बेच खाना' जब तय कर लिया है?कभी कच्चा तेल कभी ऍफ़डीआई रिटेल कभी पानी के नाम पर घोटाला किया है !सुनेहरे सपनों के झाल में यूँ उलझायामहंगाई का ज़हर सबने सब्र से पिया है l 'आम आदमी' की सरकार क्या खूब चलीहर एक 'भारतवासी' मर मर के जिय... |
| इस तरह हर रोज़, नीलाम हो रहा सरेआम,वजूद-ए-हिन्दोस्ताँ मिट जाएगा, रहेगा सिर्फ नाम !जनता आम और ज़िन्दगी कोडियों के दाम,भ्रष्टाचारी और लाचारी, है सरकार का काम !एक होने की बात पर, एक एक कर बंट जाए,खुद का मतलब निकलते ही, हो जाए नियत हराम !सदियों पुरानी ग़लती बड़े फक्र से दोहराई ... |
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September 23, 2012, 3:30 am |
| सरकार 'लाचार' हैंदेश को लूटें बगैर चल नहीं सकतीजनता 'बीमार' हैंबातें करती हैं पर लड़ नहीं सकती !सभी देशभक्त है यहाँ परखुद का फ़ायदा हो तब तकसभी ईमानदार है यहाँ परकिंमत छोटी हो तब तक !देश की चिंता सबको हैसिर्फ काम ना सूझे तब तकइज्ज़त सबकी सलामत हैकिस्सा ना खुले तब तक ! ... |
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September 14, 2012, 1:51 am |
| आज फिर एक बार चर्चे होंगे महान इतिहास केआज फिर रंगो से देशभक्ति ज़ाहिर होगीआज घर के बड़े, बच्चों को आज़ादी का पाठ देंगेमीडिया वाले नए 'फ्रीडम फाइटर्स' ढूंढ निकालेंगे !फिर भगतसिंह-सुखदेव की दास्ताँ कहेंगेफिर गाँधी के सत्याग्रह की दुहाई आज देंगेफिर सरदार के संकल्प की ... |
| सुबह सुबह देखो अखबार के पन्नेगुनाहों का जैसे कोई ग्रन्थ होकहीं भ्रष्टाचार कहीं डकैतीकहीं खून तो कहीं बलात्कारकहीं आतंकी हमलाकहीं युद्ध का डंकाअच्छा कुछ पढने कोनया कुछ सिखने कोनज़र दौड़े भी तो कहाँ तक?मन में कभी व्यथा तो कभी खौफ़हावी हो जाते है इसकदरकी सवाल इतना ही ... |
| एक बिल्डिंग से निकल करवेहिकल पे थोड़ी दूर चल करएक बड़ी सी बिल्डिंग मेंघूस जाते है शौपिंग के बहानेया मूवी का लुत्फ़ उठानेऔर कुछ भी न सूझे तो खाना दबाने!वैसे तो कट जाता हैपर सोचो तो शहर का जीवनबहोत ही लगता है पकाने!पूरा हफ्ता कमाई में गुज़रेऔर वीकेंड फ़िज़ूल खर्ची करने ... |
| ऐसा भी नहीं की हमनें अब तक कुछ किया नहीं,पर बात ये भी है, जीना चाहिए जैसे, जिया नहीं।कभी दर्द कभी तनहाई कभी जश्न के बहाने पीया,पर ढूंढते रहे जिसको वो सुकून में ही पीया नहीं।कहने को तो जहाँ से किसी बात की कमी नहीं,दिल ने क्या कर ली उंस की ख्वाहिश, दिया नहीं।शुक्र कर खुदा 'ताइ... |
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January 26, 2012, 1:20 pm |
| अक्सरयूँहोताहैज़िन्दगीमेंकीहमजिनकेसाथरहनाचाहतेहोउनसेदूरहोनापड़ताहै l सफ़र चलता रहता हैं, लोग मिलते रहते हैं और बिछड़ते रहते हैं l वैसे तो आज कल 'सोसिअल नेटवर्किंग' और मोबाइल ने इन टच रहना बड़ा आसन कर दिया है...फिर भी साथ बने रहने का मज़ा अलग ही होता हैं l पर कभी कभी ऐसा ... |
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November 17, 2010, 8:38 pm |
| एक लम्बे विराम के बाद फिर से ब्लॉग पर लिखाई की और लौटा हूँ । एक नयी ग़ज़ल, हज़ल की तरह पेश है...एक पूरा ही 'फ्यूज़न वर्ज़न'...सोच से लेकर लफ़्ज़ों तक...उम्मीद है पसंद आएगा आपको ।इस दौर में सबकुछ तो फ्यूज़न हो रहा हैं,तभी, एक-दूजे की समज का कंफ्यूज़न हो रहा हैं !इस असर से कुदरत भी कहाँ ... |
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October 24, 2010, 12:55 pm |
| पैसा...एक बिमारी कह लो या ज़रूरत...एक नशा कह लो या आदत...तुम चाह कर भी उस से मुह फेर नहीं सकते...और पा कर भी उसे हासिल कर नही सकते...क्यों की कमाते भी है तो उसे खर्च करने के लिए !और लोग क्या क्या नहीं करते उसके लिए...हर रोज़ कोई ना कोई नया करीना जान ने को मिलता हैं...और ये ही सब दिमाग में ... |
| कल रात घर से थोडी दूरी पर एक विस्तार में एक छोटे से मन्दिर को ले कर बवाल मच गया। गुजरात हाई कोर्ट ने कुछ दिन पहले उस मन्दिर को हटाने का हुक्म जारी कर दिया था। पर जिनकी आस्था उस मन्दिर से जुड़ी हैं, उनको मंज़ूर नहीं। अब दो अलग अलग गुट हो गए, एक मन्दिर हटाने के समर्थन वाले और एक... |
| रात को देर तक जागना, तनहाई की मेहफिल सजाना, सन्नाटों से बातें करना...कभी दुनियादारी से भागने का सबक था ये...और अब आदत...इसी आदत पर कुछ दिन पहले ये ग़ज़ल कही थी...हर रात जागती हैं मेरी तनहाई, ना जाने क्यों?संग होती रहती हैं मेरी रुसवाई, ना जाने क्यों?यूँ तो उजाले भर पीछा नहीं छोड़... |
| एक लंबे अरसे के बाद ब्लॉग्गिंग की और फिर से रुख हुआ हैं...एक नई ग़ज़ल पेश हैं...दुनिया, भीड़ भी अब तेरी तन्हा सी लगती हैं,हर तरफ़ बाज़ार में कहाँ इन्सान की हस्ती हैं?आदमी इसकदर गुलाम हो चुका पैसे का,की हर शै से ज़्यादा अब ज़िन्दगी सस्ती हैं।दिल में ही घूँट जाए जज्बात बयाँ हुए बि... |
| For last few days, everybody has been watching and reading about what is going on there in Australia. Media has put light on few cases now. But there may be lots of other incidents which might have gone un-noticed. Australian government is giving statements like they just don’t care about what’s happening over there. They are not even accepting that it’s all racism. Our government is not even able to put any pressure on the Australia. They are just making statement to media. Nothing concrete is coming out. Around 95000 students in Australia are feeling helpless at the moment. Parents are worried sitting here in India and calling their children back from down under. And this is happenin... |
| दिल अपनी कशमकश ख़ुद ही ना जाने,यूँ ही अपनें आप से हम हुए बेगाने।ना सजती हैं हसीं ना बहते हैं आंसू अब,हो क्या इलाज जब वजूद लगे ठुकराने? दुनिया की परवाह नहीं बस तेरा है ग़म,बिच सफर साथ छोड़ क्यों बने अंजाने ?क्या दिल को ख्वाहिश का भी हक नहीं कोई?या कहो शिकायत के बस मिल गए बहान... |
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December 22, 2008, 2:08 pm |
| काफ़ी समय के बाद कुछ रोमानी अंदाज़ की ग़ज़ल लिखी हैं...दिन ढलते ढलते याद आया तो होगा,तुम्हे मेरा ख़याल सताया तो होगा!बेअसर ना गुजरी होगी रात तन्हाई की,नींद ने भी ख्वाब, दिखाया तो होगा!फिर सुबह आईने में देख ख़ुद को,मुझे भी निगाह में पाया तो होगा!तसव्वुर जब हर पहर सताने लगे,बेकर... |
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December 12, 2008, 1:34 pm |
| पिछले हफ़्ते मुंबई में हुए आतंकवादी हमले ने सबके दिलो को देहला दिया। उस वक्त बेंगलोर में था मैं । हमले के दुसरे दिन एक सिटी बस में ट्रेवल कर रहा था। बस में रेडियो चल रहा था। कन्नड़ में कुछ अन्नौसमेंट हुआ और उसके बाद गाना आया...'कर चले हम फ़िदा जानो तन साथियो'... और एकदम से सन्न... |
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December 3, 2008, 1:07 pm |
| कैसे कैसे हसीन ख्वाब दिखा जाते हो,खूब है अंदाज़, दिल तोड़ के बहलाते हो।मांग कर मुस्कान हमसे हाल-ए-बीमार में,नाचारी का एहसास क्यों बार बार दिलाते हो?मकाम-ए-ज़िन्दगी यहाँ थमा हुआ है कब से,और तुम हो की एक दफ़ा लौट कर ना आते हो।सहारा ना बने लेकिन मशवरा ज़रूर ... |
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