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लफ्ज़-ए-ताइर

Barring Bahubali 2 (which wasn't an original Hindi film), 2017 has been a very dull year for Bollywood so far. Biggest names of the industry have garnered some of the weakest numbers, be it Tubelight, Jagga Jasoos or JHMS. Halls are running empty. So is this really surprising or alarming?There may be many factors and reasons for this dull show till date. But what I feel is, this is a healthy scenario which should have happened much earlier than this. Audiences were being taken for granted for last so many decades and till before few years, they had to accept whatever was offered to them. But things have changed drastically within last year or two. First there were smartphones and then c...
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  August 11, 2017, 7:01 pm
आजकल देश की सेना पर रोज़ लगभग रोज़ हमले हो रहे हैं।  शायद देश को 'शहादत'की खबरों की इतनी आदत हो गई है की ज़्यादातर लोग अब इस बात पर गौर भी नहीं करते।  लेकिन सवाल ये है की आखिर कब तक हम यूँ ही सुनते रहे और सहते रहे? क्यों हमारे जवानों की ज़िन्दगी की अहमियत हम समझते नहीं? क्यों ह...
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  May 2, 2017, 1:11 pm
We are a nation highly obsessed with politics. Politics is what we eat, drink and breathe. It runs into our blood. People of our great nation turn to news channels for entertainment more than the real news. Checkout the shows!!! Starting from government forming to decision making at home, everything is filled with politics. We rarely think of something as 'for all'. Most of our thoughts are based upon what is there for me?Yes, it's human nature to think and behave for self benefit. But to become a great nation, we must rise above this. The people of great nations on this planet have taught us that, time and again.We are a nation surprisingly sentimental about things that matter less on a lar...
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  April 7, 2017, 4:20 pm
हम उस दौर में जी रहें हैं जहाँ टेक्नोलॉजीने हमारी ज़िन्दगी जितनी आसान कर दी है उतनी ही लाचार भी हैं। हम चीजों को आसान बनाने के चक्कर में शायद इतने उलझ गए की रुकना कहाँ है शायद हम समझ नहीं पा रहे।  और एक आम इंसान पर इसका फायदा जो हुआ है उतना ही नुकसान।मेरे हम उम्र लोग इस ...
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  April 2, 2017, 2:20 pm
करेंसी बैन ने जीवन परिवर्तन कर दिया। २ दिन से जहाँ देखो वहाँ बस कतारें ही नज़र आ रही है। यह स्थिति किसी के लिए बड़ी दर्द दायीं है तो कोई इस हाल का लुत्फ़ उठा रहा है। मैंने अपनी समझ के हिसाब से इसे शब्द देने की कोशीश की...लगी है ऐसी कतारेंबैंक और डाक खानों परसन्नाटा चींख रहा है...
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  November 13, 2016, 7:58 pm
कितना हसीन ये मौसम लगता हैजब बादलों की रजाई ओढ़ेसूरज आसमान में सो जाता हैऔर पत्ते शाखों पर पहली बारिश में नहा करपूरे रंग से जब लहराते हैंपंछी चहचहाने लगेभीनी धरती से महेक उठेऔर हवाएँ मद्धम सी बहेतब गरम चाय की चुस्कियाँयारों की वो मस्तियाँसब यादें ताज़ा हो जाएऔर वो बा...
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  July 18, 2016, 9:37 am
वो जो मेरी नाकामी की दुआएँ माँगते थे,सुना है अब खुदा पे ही यकीन नहीं रखते!इतनी खुराफ़ाती भी अच्छी नहीं है दिल,लोग बुरा मान जातें है, बेपर्दा जो मिल।मुनासिब कहाँ की सरेआम, हम ले नाम,दोस्तों का काम था, सो कर गए तमाम!थोड़ा 'हरामीपन'भी ज़रूरी है,साफ़ दिल, दुनिया समझे मज़बूरी है!रिश...
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  June 6, 2016, 7:21 pm
पुणे में गुज़ारे ज़िन्दगी के कुछ यादगार सालों में एक सबसे अहम बात जो हुई वो थी 'अन्ना की टपरी'। ये गाना मेरे अज़ीज़ दोस्त अभय के भेजे की उपज थी और एमआईटी के हर स्टूडंट (?) की पसंद। यहाँ सबसे पहले उसी गाने की विडीओ लिंक है और उसके बाद… अन्ना की टपरी -२. अन्ना की टपरी -२अन्ना ...
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  January 8, 2014, 9:01 pm
अब भी तुझसे कोई रिश्ता सा बना है,हाथ में हाथ नहीं, तू यादों से जुड़ा है। ख़त्म करने कि बात तू करना ना मुझसे,वजूद मेरा सिर्फ तेरे एहसास पे टिका है।  कोई बात नहीं गर तू वाक़िफ़ नहीं मुझसे,करता कहाँ कुबूल हर दुआ खुद है !अब भी अपने आप से घबराते है कितना,वो हर सुबह पत्थर से करते ...
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  December 22, 2013, 2:07 am
आओचलोहमभीकुछबवालमचातेहैं,अमन-ओ-सुकूंकोआवाज़लगातेहैं !बड़ेदिनहोगएकोईहरकतनहींकी,यारोंआजसारीहीकसरमिटातेहैं l कलतकजोबोलेतोअनसुनेरहें,अबचुपचापहमदास्ताँकहजातेंहैं l तेरीइनायतभीक्याखूबबरसतीहै,'काफ़िर' कहलाएवोजोसवालउठातेहैं l 'ताइर' कीबेफ़िक्रीपेशकक्योंह...
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  June 3, 2013, 11:19 pm
इस हालात-ए-देश की बात क्या करूँ मैं गुस्सा हूँ, शर्मसार हूँ और फ़िर डरूं ?यहाँ रोज़ होता है मासूमों से खिलवाड़तबाह कर ज़िंदगियाँ  गुनहगार जिए आज़ादजिस 'औरत' को देवी बना के पूजा जाता हैउसी को हवस से सरेआम रौंदा जाता हैसंस्कृति और तहज़ीब का दावा होता हैपर आवाज़ जो उठ...
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  December 23, 2012, 2:57 pm
ना तहज़ीब की बात करेंगे ना मज़हब की,होगी जो बात, अब होगी हम सब की lछोटे छोटे टुकडो में बाँट लेना खुद को,फितरत-ए-इन्सा देखो चल रही गज़ब की l  मकसद लापता और राह चले गुमराह,इबादत भी ऐसी भला किस मतलब की।है अगर मौजूद वोह हर एक शेय में,मारते जिसे तुम वो भी औलाद है रब की।शामिल ना कर...
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  December 5, 2012, 12:25 am
अब उसे किस्तों में क्यों बाँट दिया हैदेश को 'बेच खाना'जब तय कर लिया है?कभी कच्चा तेल कभी ऍफ़डीआई रिटेल कभी पानी के नाम पर घोटाला किया है !सुनेहरे सपनों के झाल में यूँ उलझायामहंगाई का ज़हर सबने सब्र से पिया है l 'आम आदमी'की सरकार क्या खूब चलीहर एक 'भारतवासी'मर मर के ...
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  October 5, 2012, 1:02 am
अब उसे किस्तों में क्यों बाँट दिया हैदेश को 'बेच खाना' जब तय कर लिया है?कभी कच्चा तेल कभी ऍफ़डीआई रिटेल कभी पानी के नाम पर घोटाला किया है !सुनेहरे सपनों के झाल में यूँ उलझायामहंगाई का ज़हर सबने सब्र से पिया है l 'आम आदमी' की सरकार क्या खूब चलीहर एक 'भारतवासी' मर मर के जिय...
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  October 5, 2012, 1:02 am
इस तरह हर रोज़, नीलाम हो रहा सरेआम,वजूद-ए-हिन्दोस्ताँ मिट जाएगा, रहेगा सिर्फ नाम !जनता आम और ज़िन्दगी कोडियों के दाम,भ्रष्टाचारी और लाचारी, है सरकार का काम !एक होने की बात पर, एक एक कर बंट जाए,खुद का मतलब निकलते ही, हो जाए नियत हराम !सदियों पुरानी ग़लती बड़े फक्र से दोहराई ...
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  September 23, 2012, 3:30 am
सरकार 'लाचार' हैंदेश को लूटें बगैर चल नहीं सकतीजनता 'बीमार' हैंबातें करती हैं  पर लड़ नहीं सकती !सभी देशभक्त है यहाँ परखुद का फ़ायदा हो तब तकसभी ईमानदार है यहाँ परकिंमत छोटी हो तब तक !देश की चिंता सबको हैसिर्फ काम ना सूझे तब तकइज्ज़त सबकी सलामत हैकिस्सा ना खुले तब तक ! ...
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  September 14, 2012, 1:51 am
आज फिर एक बार चर्चे होंगे महान इतिहास केआज फिर रंगो से देशभक्ति ज़ाहिर होगीआज घर के बड़े, बच्चों को आज़ादी का पाठ देंगेमीडिया वाले नए 'फ्रीडम फाइटर्स' ढूंढ निकालेंगे !फिर भगतसिंह-सुखदेव की दास्ताँ कहेंगेफिर गाँधी के सत्याग्रह की दुहाई आज देंगेफिर सरदार के संकल्प की ...
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  August 16, 2012, 3:00 am
सुबह सुबह देखो अखबार के पन्नेगुनाहों का जैसे कोई ग्रन्थ होकहीं भ्रष्टाचार कहीं डकैतीकहीं खून तो कहीं बलात्कारकहीं आतंकी हमलाकहीं युद्ध का डंकाअच्छा कुछ पढने कोनया कुछ सिखने कोनज़र दौड़े भी तो कहाँ तक?मन में कभी व्यथा तो कभी खौफ़हावी हो जाते है इसकदरकी सवाल इतना ही ...
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  June 18, 2012, 9:30 am
एक बिल्डिंग से निकल करवेहिकल पे थोड़ी दूर चल करएक बड़ी सी बिल्डिंग मेंघूस जाते है शौपिंग के बहानेया मूवी का लुत्फ़ उठानेऔर कुछ भी न सूझे तो खाना दबाने!वैसे तो कट जाता हैपर सोचो तो शहर का जीवनबहोत ही लगता है पकाने!पूरा हफ्ता कमाई में गुज़रेऔर वीकेंड फ़िज़ूल खर्ची करने ...
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  March 4, 2012, 1:46 pm
ऐसा भी नहीं की हमनें अब तक कुछ किया नहीं,पर बात ये भी है, जीना चाहिए जैसे, जिया नहीं।कभी दर्द कभी तनहाई कभी जश्न के बहाने पीया,पर ढूंढते रहे जिसको वो सुकून में ही पीया नहीं।कहने को तो जहाँ से किसी बात की कमी नहीं,दिल ने क्या कर ली उंस की ख्वाहिश, दिया नहीं।शुक्र कर खुदा 'ताइ...
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  January 26, 2012, 1:20 pm
अक्सरयूँहोताहैज़िन्दगीमेंकीहमजिनकेसाथरहनाचाहतेहोउनसेदूरहोनापड़ताहै l सफ़र चलता रहता हैं, लोग मिलते रहते हैं और बिछड़ते रहते हैं l वैसे तो आज कल 'सोसिअल नेटवर्किंग' और मोबाइल ने इन टच रहना बड़ा आसन कर दिया है...फिर भी साथ बने रहने का मज़ा अलग ही होता हैं l पर कभी कभी ऐसा ...
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  November 17, 2010, 8:38 pm
एक लम्बे विराम के बाद फिर से ब्लॉग पर लिखाई की और लौटा हूँ । एक नयी ग़ज़ल, हज़ल की तरह पेश है...एक पूरा ही 'फ्यूज़न वर्ज़न'...सोच से लेकर लफ़्ज़ों तक...उम्मीद है पसंद आएगा आपको ।इस दौर में सबकुछ तो फ्यूज़न हो रहा हैं,तभी, एक-दूजे की समज का कंफ्यूज़न हो रहा हैं !इस असर से कुदरत भी कहाँ ...
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  October 24, 2010, 12:55 pm
पैसा...एक बिमारी कह लो या ज़रूरत...एक नशा कह लो या आदत...तुम चाह कर भी उस से मुह फेर नहीं सकते...और पा कर भी उसे हासिल कर नही सकते...क्यों की कमाते भी है तो उसे खर्च करने के लिए !और लोग क्या क्या नहीं करते उसके लिए...हर रोज़ कोई ना कोई नया करीना जान ने को मिलता हैं...और ये ही सब दिमाग में ...
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  August 17, 2009, 1:45 am
कल रात घर से थोडी दूरी पर एक विस्तार में एक छोटे से मन्दिर को ले कर बवाल मच गया। गुजरात हाई कोर्ट ने कुछ दिन पहले उस मन्दिर को हटाने का हुक्म जारी कर दिया था। पर जिनकी आस्था उस मन्दिर से जुड़ी हैं, उनको मंज़ूर नहीं। अब दो अलग अलग गुट हो गए, एक मन्दिर हटाने के समर्थन वाले और एक...
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  August 4, 2009, 2:14 pm
रात को देर तक जागना, तनहाई की मेहफिल सजाना, सन्नाटों से बातें करना...कभी दुनियादारी से भागने का सबक था ये...और अब आदत...इसी आदत पर कुछ दिन पहले ये ग़ज़ल कही थी...हर रात जागती हैं मेरी तनहाई, ना जाने क्यों?संग होती रहती हैं मेरी रुसवाई, ना जाने क्यों?यूँ तो उजाले भर पीछा नहीं छोड़...
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  August 2, 2009, 6:03 am
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