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September 23, 2012, 6:37 am |
| ग़ज़लकुञ्ज: गज़ल-कुञ्ज(गज़ल संग्रह)-(र) बाज)-(२)आतंक (एक अप्रक...: आतंक जैसे उड़ते हुये चील हुए हैं | जनता के भोले लोग अबाब...... |
| पठारों से हृदय के पथरीले मंज़र देखिये |दया, करुणा के लिये ये हुए ये बंजर देखिये || बुलबुलों,मैनाओं ने है विवश समझौता किया -सोने, चाँदी के बड़े मजबूत पिंजर देखिये || Q पंकजों में छुपे भँवरे, तितलियाँ व्याकुल हुये-ताल में घुस आये भूखे कई कुंजर देखिये || मीत बनने के लिये, ... |
Tag :गज़ल(प्रतीकों में एक हकीक़त)
| बंजर दिल की धरती।( ह्कीक़त की एक गज़ल )प्यार का फूटा नहीं है ,एक अंकुर देखिये।दिल की धरती हो गयी है,कितनी बंजर देखिये।।खाद,पानी 'प्रेरणा' के हो गये हैंसब विफल-आचरण की स्थली अब बहुत ऊसर देखिये|| सबके जज्वातों की चोटों का असर मुझ पर हुआ-दर्द का छलका है आँखों में समुन्दर ... |
Tag :गज़ल(प्रतीकात्मक रूपक)
| मधुवनों में शान्ति का होता विभंजन् देखिये | बाजों से कितने डरे हैं, भोले खंजन देखिये || हिरण भागे,शशक दुबके और अब तो थम गये - तितलियों की थिरकनें,भ्रमरों के गुंजन देखिये || न्याय तोले किस तरह, इंसाफ की दूकान में -डगमगाया है 'तराजू' का समंजन देखि... |
Tag :गज़ल(प्रतीकों में आतंक की झलक्)
| ये परिन्दे प्यार के कितने हुए मायूस हैं |उकाबों का डर इन्हें कितना हुआ महसूस है || देखने में बाड़, ऊपर से बड़ी मजबूत है |हकीक़त में यह बड़ी कमज़ोर, गलती फूस है ||अपने घर के लोग अपने घर से ही बागी हुये -बन गये ये शत्रुओं के घरों के जासूस हैं || आ गया कोई जलजला शान्ति के इस सदन म... |
Tag :गज़ल (हकीकत की गज़ल)
| उकाबों की सेहतें,पहले से बेहतर देखिये |डरे, सहमे हकों के हैं कितने तीतर देखिये || 'जुल्म' के पत्थर से करना चोट उनका खेल है -चोट खा कर गिर पड़े कितने कबूतर देखिये || नुमायश करते हैं मीठे बोल की हम आये दिन- पैनी ... |
Tag :गज़ल (प्रतीकात्मक गज़ल)
| खरगोर्शों में ऊदबिलाव |झरबेरी के पास गुलाब || गले मिले जब बन कर यार हुए कँटीले मीठे ख़्वाब || बेदर्दी की हद हो पार -कोमलता पर निठुर दबाव || भोले खंजन पर कर वार-चोंच से घायल करे उकाब ||t हो कैसे दोनों में प्यार !इक शरबत,दूजा तेजाब || अब पछताना है बेकार |किया दोस्त का गलत चुनाव... |
Tag :गज़ल (हकीकत की गज़ल)
| रहे गुलाब दुखी हो बोल |"ऐ झरबेरी धीरे डोल || "तू तो अपनी मौज में है-घायल मेरे अधर कपोल || "चुभते तेरे शूल मुझे -मत कर इतना निठुर किलोल || "तू खुशियों में झूम रही- मेरी खुशियाँ डाबाडोल || "काँटों का दोनों का तन - तेरा मेरा एक न मोल!!"तू घायल कर देता है-लेता जिसका बदन टटोल || "गु... |
| आइये मेरे पड़ोसी को नज़र भर देखिये |देखिये इसकी अदायें, इसके तेवर देखिये || भवन इनका काँच का है, किन्तु वे निश्चिन्त है -फेंकते वे मेरे घर पर कितने पत्थर देखिये ! पत्थरों का हृदय,पत्थर का कलेजा हो गया -अक्ल पर उनके पड़े हैं कितने पत्थर देखिये !! प्यार से भरने हमे... |
| चुभन भरे दर्द मेरे अंक लगे हैं |बिच्छुओं के,ततैओं के डंक लगे हैं || रूपवती,लाजवती सभ्यता के अब-चाँद जैसे चेहरे कलंक लगे हैं || उड़ रहे हैं बेहिसाब दिशा- हीन से-'कामना' के सीमा-हीन पंख लगे हैं || मन हुए हैं बद रंग मैले मैले से - ... |
Tag :गज़ल (हकीक़त की गज़ल)
| -किसने करुणा-सदय-हृदय में पैना शूल चुभोया |किसने फूलों के मधुवन में कंटालों को बोया || स्वतन्त्रताके इन वर्षों में कितने तूफां आये !सोचो पल भर और विचारो,क्या पाया क्या खोया !! संस्कृति और सभ्यता वाली यह भारत की नौका -की पतवारें तोड़ तोड़ कर कि सने इसे डुबोया ? हँसती ... |
Tag :गज़ल (हकीक़तकी गज़ल)
| महकती थीं कभी जिसमें प्रीति की कलियाँ सुमन |उन बसन्ती हवाओं में भर गयी कितनी तपन !!कोमलांगी बेलि,पादप,बल्लरी मुरझा गये -देख लो,जलने झुलसने लगा है सारा चमन || ओ रसीली मधुर पूरब की सुखद पुरबाई सुन!बन न तू तपती हुई लू, जेठ की पछुवा पवन !! ओ शहर,अपने ह्रदय का अब न तुम उगलो ज़हर |हुआ... |
Tag :गज़ल(यथार्थ की गज़ल)
| अन्धेरे में मुस्कराएं,खिलखिलायें |आओ मिल कर दीप हम ऐसे जलायें ||बन गया है शहर काजल कोठरी अब -दाग काले,ह्रदय के कितने दिखायें || भूल कर उद्देश्य मानव-उन्नयन का -स्वर्ण में उलझी हैं सारी संस्थायें || दृष्टिकोणों में न व्यापकता अभी तक -बहुत उथली खोखली हैं भावनायें || ... |
| बहूत पापिन हो गयी हैं ये हवायें |सांस लेने किस गली गुलशन में जायें||किस तरह हम स्वस्थ मन,जीवन सँवारें-विषैली हैं जिस्म की,मन की दवायें || देख कर यह धुआँ ज़हरीला गगन में -हँसें?गायें? मुस्करायें?? खिलखिलाएं ??? सी लिये मुहँ, ओढ़ ली चुप्पी सभी ने-पहेली या प्रश्न किससे हम ब... |
| तुम करते जीवन का सुधार |हे गुरु करते मन का सुधार || हर, मलिन धूल आचरणों की -बरसाते सुबोध रस सु-धार || ईश्वर के तुम जन- प्रतिनिधि हो -हरते व्यवहारों के विकार || तुम 'रजक' भावना वसनों के -मन- चादर का करते निखार || तुम ज्ञान- विवेक के मार्तण्ड-हरते तुम चित् का अन्धकार || यदि त... |
| तुम करते जीवन का सुधार |हे गुरु करते मन का सुधार || हर, मलिन धूल आचरणों की -बरसाते सुबोध रस सु-धार || ईश्वर के तुम जन- प्रतिनिधि हो -हरते व्यवहारों के विकार || तुम 'रजक' भावना वसनों के -मन- चादर का करते निखार || तुम ज्ञान- विवेक के मार्तण्ड-हरते तुम चित् का अन्धकार || यदि त... |
| प्रियतमा जननि !तुमको प्रणाम !!हर सुख दुःख मेरा तेरे नाम !!तेरी हर सरिता सुधा वती |है तेरा सुअंक सुखद धाम || तेरे वन, बाग सुभाग सुभग - इस पर वारी हैं कोटि काम || तेरी गोदी में पले सभी-हो शीत छाँव या तची घाम || सब ने पाया है सुख तुम से -क्या पीर फ़कीर क्या राम श्याम || वर ... |
| हे प्रिय जननी भारती धरा |तेरा तन मन है हरा भरा || वन, बाग, तडाग, नदी,सर में-हर ओर रूप तेरा बिखरा || तैयार तुम्हारी रक्षा को-उत्तर में हिम गिरि दे पहरा ||तन धोता, दे कर मानसून -है तीन ओर सागर गहरा ||आ गया तुम्हारे आँगन जो -उसका बिगरा जीवन सँवरा || तुमने सब को अपनाया है -स... |
| ओ प्रियतमा! ओ प्रियतमा !!जीवों में तुम हो आत्मा !! महिमा तुम्हारी माप ले -ऐसी न कोंई है विमा || परमा शिवा भव-सुन्दरी -सत्या हो तुम हो उत्तमा|| रक्षक विष्णु की लक्ष्मी -शिव की शिवानी तुम उमा || हो ज्योति सूर्य में तुम्हीं -तुम से ही चमका चन्द्रमा || नैराश्य रजनी से जननि!... |
| तुम जाने पहंचानेप्रियतम !पर लगते अनजाने प्रियतम !!यह सारा जग भटक रहा है -प्यार तुम्हारा पाने प्रियतम || कोकिल भ्रमरों ने पाये मृदु -स्वर हैं तुम्हें रिझाने प्रियतम || सह ली विरह -वेदना,फिर भी -गाये मधुर तराने प्रियतम || तुम्हें याद कर बिता दिए हैं -कुछ पल आने ज... |
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