| वेरा पावलोवा (जन्म:१९६३) की कुछ कवितायें आप पहले 'कर्मनाशा' , 'कबाड़ख़ाना' व 'प्रतिभा की दुनिया' केब्लॉगपन्नों पर पढ़ चुके हैं। उनकी कविताओं के मेरे द्वारा किए गए कुछ अनुवादपिछलेदिनों पत्र - पत्रिकाओं में भी प्रकाशितहुए हैं । रूसी कविता की इस सशक्त हस्ताक्षर ने छोटी - छोट... |
|
|
|
February 2, 2013, 11:53 pm |
| इसी संसार में एक बनता हुआ प्रतिसंसार है। कभी - कभी लगता है कि इसे 'बनता हुआ' कहना कहीं खुद को 'बनाना' तो नहीं है ; एक मुहावरे का वाक्य प्रयोग करते हुए स्वयं को भुलावे में रखने जैसा कुछ तो नहीं? अपने आसपास देखता हूँ तो पाता हूँ कि नेट ने कुछ लोगों के लिए एक ऐसा प्रतिसंस... |
|
|
|
January 29, 2013, 9:41 am |
| आज छुट्टी है। आज सर्दी कुछ कम है।आज बारिश का दिन भी है।आज कई तरह के वाजिब बहाने मौजूद हो सकते हैं घर से बाहर न निकलने के। यह भी उम्मीद है लिखत - पढ़त वाले पेंडिंग कुछ काम आज के दिन निपटा दिए जायें और साथ यह विकल्प भी खुला है कि आज कुछ न किया जाय; कुछ भी नहीं। हो सकता है कि ... |
|
|
|
January 18, 2013, 11:00 am |
| अध्ययन और अभिव्यक्ति की साझेदारी के इस वेब ठिकाने पर 'कवि साथी' क्रम में आज प्रस्तुत हैं युवा कवि अंजू शर्मा की दो कवितायें। अपनी सहज सोच और विशिष्ट कहन की त्वरा से उन्होंने इधर बीच हिन्दी के कविता संसार में ऐसी उपस्थिति दर्ज की है जिसे लगातार रेखांकित किया जा रहा ह... |
|
|
|
January 10, 2013, 10:49 pm |
| 'शीतल वाणी' पत्रिका का उदय प्रकाश पर केन्द्रित विशेष अंक किसी तरह डाक की सेवा में घूमता - भटकता -अटकता हुआ मिल (ही) गया। मँझोली मोटाई के सफेद धागे से बँधा लिफाफा बुरी तरह फटा हुआ था । बस किसी तरह इस नाचीज का नाम व पता बचा रह गया था। अभी इसे उलट - पुलट कर देख सका हूँ। ठीकठाक ... |
|
|
|
December 27, 2012, 8:26 am |
| लगभग हर लिखने - पढ़ने वाले व्यक्ति के लिए में डाक में पत्र - पत्रिकाओं का गुम जाना एक दुखदायी प्रसंग है।विचार और संस्कृति का मासिक 'समयांतर' के अक्टूबर 2012 अंक में जगदीश चन्द्र रचनावली की मेरे द्वारा लिखी गई समीक्षा प्रकाशित हुई थी किन्तु वह अंक अब तक नहीं पहुँचा है... |
|
|
|
December 10, 2012, 9:17 am |
| नवंबर के बीतते महीने का आज का दिन + यह रात (भी )। आज ठंड थोड़ी कम -सी है। ऊपर असमान में देखा तो पता चला कि हल्के बादल छाए हुए हैं और उनके बीच से इक्का - दुक्का सितारे भी झाँकने की कोशिश कर रहे रहे है। अभी कुछ ही देर पहले बूँदाबाँदी भी होकर चुकी है। बाहर रात, ठंड और ओस के अतिर... |
|
|
|
November 29, 2012, 11:42 pm |
| विश्व कविता के अनुवादों के अध्ययन -पठन व साझेदारी के जारी क्रम में आज यह सूचना साझा करने का मन है कि 'कल के लिए' पत्रिका के नए अंक में मिस्र की युवा कवयित्री फातिमा नावूत की तीन कवितायें ( 'जब मैं कोई देवी बनूँगी' ,'स्केचबुक' और 'तुम्हारा नाम रेचल कोरी है' ) प्रक... |
|
|
|
November 25, 2012, 5:46 pm |
| बीत गई अब दीपावली। आज छत से पटाखों के खुक्खल और बुझे दिए समेट दिए गए। मोमबत्तियों की खुरचन बुहार कर फेंक दी गई। धनतेरस से शुरु हुआ उत्सव का राग अब लगभग समापन के विराग की ओर अग्रसर है। पता नहीं क्यों मुझे अक्सर समापन से अधिक उपयुक्त और सही शब्द संपन्नता लगता है , कल्... |
|
|
|
November 15, 2012, 10:47 pm |
| इस संसार के भीतर ही एक और संसार भी है - आभासी संसार। यह जितना कुछ बाहर है उतना ही भीतर भी। हमारे संसार में संचार के साधनों की निर्मिति , व्याप्ति और प्रयुक्ति का दाय कितना है ; यह विमर्श का विषय हो सकता है किन्तु हमारे जीवन में वह कैसा है यह लगभग सब देख रहे हैं। न केवल देख ... |
|
|
|
November 10, 2012, 11:15 am |
| इस कविता का एकाधिक स्थानीय संदर्भ है लेकिन इसमें वह है भी और शायद नहीं भी हो सकता है। जिस जगह मैं इस समय रहता हूँ वह पहाड़ की लगभग तलहटी का शहर बनते कस्बे से सटा एक गाँव है। एक ऐसी जगह जहाँ सड़क पर ऊँट का दिखाई दे जाना कोई साधारण बात नहीं है क्योंकि यह इस जगह का रोज क... |
|
|
|
October 30, 2012, 11:15 pm |
| इस पटल पर विश्व कविता के अनुवादों की सतत साझी प्रस्तुति के क्रम में आज प्रस्तुत है सीरियाई कवि ,चित्रकार ,संपादक नाज़ीह अबू अफा (१९४ ६) की यह छोटी - सी कविता। कवि का पहला संग्रह १९६८ में आया था और अब तक उनके तेरह कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें ' द मेमो... |
|
|
|
October 16, 2012, 9:57 am |
| विश्व कविता के अनुवादों के अध्ययन और अभिव्यक्ति की साझेदारी के क्रम में इस ठिकाने पर पिछली पोस्ट के रूप में स्लोवेनियाई कवि बार्बरा कोरुन ( १९६३ ) की दो कवितायें 'चुंबन' और 'गर्मियों की काली रात में' साझा की थी। आज इसी क्रम में प्रस्तुत है बार्बरा की एक और कविता ज... |
|
|
|
October 10, 2012, 8:42 am |
| Let me sink myself into youInto the grace of your gaze....विश्व कविता के अनुवादों के अध्ययन और अभिव्यक्ति की साझेदारी के क्रम में आज प्रस्तुत हैं स्लोवेनियाई कवि बार्बरा कोरुन ( १९६३ ) की दो कवितायें। १९९९ में उनका पहला कविता संग्रह ' द एज़ आफ ग्रेस' प्रकाशित हुआ था जिसे नवोदित कवि के सर्वश्रेष्ठ प... |
| .....illusion, dissolve the frame that says:“I look at you and see no evidence of me.”इस ठिकाने पर विश्व कविता के अनुवादों को साझा करने के क्रम में आज प्रस्तुत है अमरीकी कवि , गीतकार और पोएट लौरिएट सम्मान से नवाजे गए अल यंग ( जन्म : ३१ मई १९३९ ) की एक छोटी - सी कविता , जो मुझे बहुत प्रिय है। अल यंग की कवितायें अपने समकाल की ... |
| कल दो अक्टूबर है महात्मा गाँधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयन्ती का दिवस। कल हमारे आसपास बहुत सारे कार्यक्रम संपन्न होंगे। बहुत सारे लोगों के लिए यह छुट्टी का दिन भी है - राष्ट्रीय अवकाश। आभासी संसार भी कल खूब दो अक्टूबरमय रहेगा - पिछले बरसों की तरह। कल हिन्दी ब्लॉ... |
|
|
|
October 1, 2012, 11:23 pm |
| रातलगभग आधी बीत ही चुकी। लेकिन बात कुछ ऐसी है कि 'रह न जाए बात आधी।' घड़ी का काँटा १२ के डिजिट को विजिट कर उस पार की यात्रा पर निकल गया। अब तो डेट भी बिना लेट किए करवट बदल ली। २७ की अठ्ठाइस हो चुकी। लेकिन बात तो आज ही की है; आज ही की शाम की है.....ये शाम कुछ अजीब थी....आज शाम एक ... |
|
|
|
September 28, 2012, 12:32 am |
| हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि बल्ली सिंह चीमा के साठ वर्ष पूरे पर उनके मित्रों ने ०८ सितम्बर २०१२ को नई दिल्ली के गाँधी शांति प्रतिष्ठान में एक बहुत ही आत्मीय , सादा और गरिमापूर्ण आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम की रपट 'कबाड़ख़ाना' पर पढ़ी जा सकती है। इस अवसर पर एक स्मा... |
|
|
|
September 25, 2012, 2:01 pm |
| इस बीच पत्र पत्रिकाओं में मेरे कविता संग्रह ' कर्मनाशा' की कुछ समीक्षायें आई है / आ रही हैं। सही बात है कि इनसे समीक्षाओं से को देखकर अपने सोचे -सहेजे लिखे को दूसरों के नजरिए से देखने में मदद अवश्य मिलती है।हिन्दी की लिखने - पढ़ने वालों की बिरादरी में पुस्तक समीक्षाय... |
|
|
|
September 20, 2012, 12:37 am |
| तुर्की कवि ओरहान वेली ( १९१४ - १९५०) की कुछ कविताओं के अनुवाद आप 'कबाड़ख़ाना' और 'कर्मनाशा'पर पहले भी पढ़ चुके हैं। ओरहान वेली, हमारे समय का एक ऐसा कवि जिसने केवल ३६ वर्षों का लघु जीवन जिया ,एकाधिक बार बड़ी दुर्घटनाओं का शिकार हुआ , कोमा में रहा और जब तक , जितना भी जीवन जिया सृ... |
|
|
|
September 2, 2012, 12:31 am |
| दैनिक समाचार पत्र 'राष्ट्रीय सहारा' के १९ अगस्त २०१२ के अंक में मेरे कविता संग्रह 'कर्मनाशा' की एक समीक्षा प्रकाशित हुई है। समीक्षक साधना अग्रवाल और 'राष्ट्रीय सहारा' के प्रति आभार सहित वह इस ठिकाने पर सबके साथ साझा करने के उद्यदेश्य से यथावत यहाँ पर प्रस्त... |
| जी करता है जी भर रोऊँ आज की रात।तकिए में कुछ आँसू बोऊँ आज की रात।एक जमाना बीत गया जागे - जागे,तेरी यादों के संग सोऊँ आज की रात।वह एक समय था। वह एक जगह थी। वह एक उम्र थी। तब सब कुछ अपनी ही तरह का था अपना , अपने जैसा या वैसा महसूस करना जैसा कि मन माफिक होना चाहिए। उस वक़्त मै... |
|
|
|
August 18, 2012, 11:52 pm |
| बहुत दिन हुए ब्लॉग पर कुछ लिखा नहीं - कुछ साझा नहीं किया। कुछ व्यस्तता , कुछ मौज, कुछ आलस्य और कुछ बस्स एवें ही। रुटीन आजकल लगभग बँधा - बँधाया है। तीन बजे के आसपास लौटकर लंच का समय लगभ बीत जाने पर लंचन। उसके बाद दोपहर आया हुआ अंग्रेजी का अख़बार उलटते - पुलटते हुए एक झपकी और उ... |
| ब्लोग से छुट्टी कुछ दिन और अभीमौज - मस्ती कुछ दिन और अभीहुक्का और हम , हम और हुक्काकुछ दिन और कुछ दिन और अभीआते हैं जल्द ही करते हैं कुछ काम अभी तो आराम नमस्ते सलाम !... |
| इस बीच कितने - कितने काम रहे। अब भी हैं। लिखत - पढ़त की कई चीजें पूरी करनी हैं। वह सब आधी - अधूरी पड़ी हैं। पहाड़ की यात्रा से लौटकर खूब - खूब गर्मी झेली । इतनी गर्मी कि जिसकी उम्मीद तक नहीं थी। बारिश के वास्ते तन - मन बेतरह तरसता - कलपता रहा। ऐसी ही तपन व उमस में ०२ जुलाई क... |
|
|
|