| चाँदनी रातें
ढल रही हैं
बढ़ रहे हैं फ़ासले,
दो-दो बालिश्तों का
फ़र्क़ है
फिर भी हैं...
[यह नज़्म का सारांश है, पूरा पढ़ने के लिए फ़ीड प्रविष्टी शीर्षक पर चटका लगायें...]... |
| चाँदनी रातें
ढल रही हैं
बढ़ रहे हैं फ़ासले,
दो-दो बालिश्तों का
फ़र्क़ है
फिर भी हैं...
[यह नज़्म का सारांश है, पूरा पढ़ने के लिए फ़ीड प्रविष्टी शीर्षक पर चटका लगायें...]... |
[ Prev Page ] [ Next Page ]