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Blog: अभिव्यंजना-चक्र

Blogger: राकेश चक्र
घाव है ताजा तनाव घट रही है ज़िन्दगी।आजकल तो काँच का घर बन गई है जिन्दगी।।कौन अपना कौन दुश्मन ये समझ आता नहीं।चील के हैं पंख फैले शुक यहाँ गाता नहीं।पत्थरों से दिल लगाकर पिस रही है जिन्दगी।।आदमी निज घर सजाता,गैर से मतलब नहीं।प्यार में भी अर्थ खोजें,मित्र अच्छे अब नही... Read more
clicks 184 View   Vote 0 Like   1:55pm 25 Jun 2012 #गीत
Blogger: राकेश चक्र
सोने की  बैसाखी देकर, पाँव हमारे छीन लिए।नवयुग ने शहरीपन देकर, गाँव हमारे छीन लिए।।होली की फागों से सारा, जीवन ही रँग जाता था,और मल्हारों से सावन भी, मन्द-मन्द मुस्काता था,आपस के नातों की ममता का सागर लहराता था,जाति-धर्म का, ऊँच-नीच का, भेद नहीं भरमाता था,कंकरीट के इस जंगल न... Read more
clicks 201 View   Vote 0 Like   4:08am 25 Jun 2012 #सोने की बैसाखी
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