जब आज है सुंदर सृजन, मन घूमता है क्यों विकल?तम को ह्रदय में बांध जड़, लखता नहीं क्यों ज्योति पल?पलकों तले संसार रचढल गए दो-चार पल, आँखें ठगी-सी रह गयींदेख विधि का कलित छल।एक मीठी रागिनी मेंसुर उठे जब दूर से, बंध गए विश्वास सारेसरगमों में गूंज के।गुनगुनी सी धूप सिमटीसांझ ...
लौट आ, ओ प्रात!बुझ रही है लौ दिये की ताक पर।कृष्ण-पक्ष की रात दोहरी हो रही,चाँदनी किस ओर जाने छिप गयी!क्षीण होती लौ दिये की कांपती,सज रही अर्थी मधुरमय साध की।झर रहा है फूल हरसिंगार का,कर रहा है मन तनिक श्रृंगार-सा!राह से गुजरा पथिक यह सोचता-"आह! यह सुरभित कहाँ डोला चला?"लौट ...