| आज के अखबार में मनेर (बिहार) की "चंचल" (19 वर्षीया युवती) तथा उसकी बहन "सोनम" की कहानी पढ़कर जिस दुःख, जिस गुस्से का अनुभव किया, उसे मैं बयान नहीं कर सकता। दोनों को बीते वर्ष 21 अक्तूबर को तेजाब से जला दिया गया था। खासकर, चंचल उन दरिन्दों के निशाने पर थी- उसका चेहरा बु... |
| (इस लेख को "प्रवक्ता डॉट कॉम" ने प्रकाशित किया: http://www.pravakta.com/5-point-china-policy-a-suggestion ) कहावत है कि विपत्ती कभी अकेले नहीं आती। आज जबकि भारत घरेलू मोर्चों पर बुरी तरह उलझा हुआ है- स्थिति करीब-करीब अराजक-विस्फोटक है, चीन ने लद्दाख में घुसपैठ करके तथा पीछे हटने से मना करके एक नय... |
| आज के अखबार में वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र किशोर लिखते हैं: "इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को अब वही कोई अगला प्रधानमंत्री बनाये रख सकता है, जो दृढ. प्रशासक हो।जिसमें भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता हो और जो विकास को ही अपनी राजनीति का मूल मंत्र बनाये।यदि ... |
| साथियों, जय हिन्द! निम्न आलेख को आज सुबह लिखकर मैंने ब्लॉग में पोस्ट कर दिया था, मगर बाद में पोस्ट को "ड्राफ्ट" बना दिया- कि क्या जरुरत है देश को सुधारने-सँवारने के चक्कर में दीवानगी की हद तक जाने की और इस तरह की उग्र बातें लिखने की? मगर बाद में अखबार (प्रभात खबर) मे... |
| स्वामी विवेकानन्द जी के इस कथन को याद कीजिये- "शिक्षा, शिक्षा और सिर्फ शिक्षा। यूरोप के कई शहरों की यात्रा करके मैंने यह देखा कि वहाँ के गरीब भी शिक्षित हैं और उनकी हालत हमारे यहाँ के गरीबों से बहुत अच्छी है। यह फर्क शिक्षा ने पैदा किया है। शिक्षा आत्मबल देती है।"*** म... |
| आतंकवाद की जो विषबेल है, उसने करीब आधी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है। मुझे ऐसा लगता है (प्रायः सबको लगता होगा) कि इस विषबेल की जो जड़ है, इसका जो 'नाभिक' है, वह पाकिस्तान में है। पाकिस्तान में भी वहाँ की अवाम निर्दोष है- बल्कि आतंकवादियों के तालिबानी फरमान... |
| यकीन कीजिये, मैंने बहुत बार अपनी अन्तरात्मा से पूछा है कि मेरी अन्तरात्मा, यह तो बता कि मैं अपने देश के "वरिष्ठ नौकरशाहों" के 'भी' प्रति सम्मान की भावना क्यों नहीं रख पाता हूँ? (यहाँ, 'भी' का इस्तेमाल इसलिए हुआ है कि "राजनेताओं" के प्रति मेरे मन में कोई सम्म... |
| एक महिला-वकील टीवी परिचर्चा में साफ-साफ कह रही थीं कि हमारी व्यवस्था सिर्फ "अपराधियों-अत्याचारियों" के मानवाधिकार के लिए तत्पर रहती हैं- पीड़ित-भुक्तभोगी के मानवाधिकार की वह जरा भी चिन्ता नहीं करती। उदाहरण में उन्होंने 16 दिसम्बर दुष्कर्म के एक आरोपित का जिक्र कि... |
| एक महिला-वकील टीवी परिचर्चा में साफ-साफ कह रही थीं कि हमारी व्यवस्था सिर्फ "अपराधियों-अत्याचारियों" के मानवाधिकार के लिए तत्पर रहती हैं- पीड़ित-भुक्तभोगी के मानवाधिकार की वह जरा भी चिन्ता नहीं करती। उदाहरण में उन्होंने 16 दिसम्बर दुष्कर्म के एक आरोपित का जिक्र कि... |
| (31 मार्च को इसे मैंने "कभी-कभार" ब्लॉग पर लिख दिया था. अब लग रहा है, इसे "देश-दुनिया" में होना चाहिए था.) हो सकता है, बहुत-से लोग इस नाम से परिचित न हों। गूगल सर्च में Shivdeep Landeटाईप करके देखा जा सकता है कि वे कितने साहसी और ईमानदार पुलिस अफसर हैं। आज की भाषा में उन्हें “सुपर कॉप”... |
| आज के 'प्रभात खबर' से पता चला कि आज- 2 अप्रैल को- वशिष्ठ नारायण जी का जन्मदिन है। मेरा अनुमान कहता है कि शायद ही कोई जागरुक भारतीय होगा, जो इस नाम से अपरिचित हो- भले ही यह नाम उनके 'अवचेतन' मस्तिष्क में दर्ज हो। आज 'प्रभात खबर' (भागलपुर से मुद्रित अररिया संस्करण) ने अपने पहल... |
| कहते हैं कि- खाली दिमाग शैतान का अड्डा! शाम खाली बैठे-बैठे एक ख्याल आया। सोशल मीडिया- खासकर, फेसबुक पर- "राष्ट्रवादी" शब्द पर नरेन्द्र मोदी-समर्थकों ने और "आम आदमी" शब्द पर अरविन्द केजरीवाल-समर्थकों ने एक तरह से अपना-अपना "कॉपीराइट" ठोंक दिया है। &q... |
| बहुत अच्छा लगता है, जब सोशल मीडिया पर लोगों को भगत सिंह और नेताजी सुभाष की तस्वीरों तथा कथनों को साझा करते देखता हूँ- खासकर, 23 जनवरी और 23 मार्च को।मगर सच्चाई यह है कि हम आम भारतीय सौ-दो सौ साल पहले भी कायर, दब्बू, डरपोक, चापलूस थे और आज भी हैं! हमलोग हमेशा यही चाहते हैं कि 'क्र... |
| बच्चियों, किशोरियों, युवतियों, महिलाओं के साथ- यहाँ तक कि विक्षिप्त महिलाओं तथा विदेशी मेहमान महिलाओं के साथ- नित्य होने वाले लोमहर्षक दुष्कर्मों, वीभत्स सामूहिक दुष्कर्मों के बारे में सुन-सुन कर दिमाग भन्ना गया है। दुष्कर्म के बाद आमतौर पर पीड़िता की जघन्... |
| विचार एक तरह की "ऊर्जा" है (हालाँकि यह वैज्ञानिक रुप से साबित नहीं हुआ है), जो "तरंगों" के रुप में बहता है. ये तरंगें दूसरों के विचारों से तो टकराती हैं, साथ ही, "नियति" की रेखा से भी टकराती हैं ("नियति" "समय" की ही रेखा है, जिसके आदि-अन्त को हम नहीं जानते. इसपर भूत-वर्तमान-भविष्य की... |
| विचार एक तरह की "ऊर्जा" है (हालाँकि यह वैज्ञानिक रुप से साबित नहीं हुआ है), जो "तरंगों" के रुप में बहता है. ये तरंगें दूसरों के विचारों से तो टकराती हैं, साथ ही, "नियति" की रेखा से भी टकराती हैं ("नियति" "समय" की ही रेखा है, जिसके आदि-अन्त को हम नहीं जानते. इसपर भूत-वर्तमान-भविष्य की... |
| लम्बे समय से मेरे मन में यह सन्देह पल रहा है कि एक "काली शक्ति" है इस देश में, जिसने गुप्त रुप से यह प्रण ले रखा है कि वह- 1. इस देश को अर्थिक रुप से दिवालिया बनाकर रहेगी; 2. यहाँ राजनीतिक अराजकता या अस्थिरता के हालात पैदा कर के रहेगी; 3. ऊपर से नीचे तक हर भारतीय को भ्रष्ट, बे-... |
| आधुनिक भारत के तीन नायकों से मैं खुद को प्रभावित महसूस करता हूँ: 1. स्वामी विवेकानन्द, 2. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और 3. लाल बहादूर शास्त्री। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर जिनसे मैं खुद को प्रभावित महसूस करता हूँ, वे हैं: 1. कमाल पाशा, 2. नेल्सन मण्डेला और 3. फिदेल कास्त्रो। इसी क... |
| मान लीजिये, कि 'क' और 'ख' दो पड़ोसी नगर हैं, जिनके बीच की दूरी 250 किलोमीटर है। दोनों नगरों के बीच एक फ्लाइ-ओवर का निर्माण किया जाता है, जिसपर "सिर्फ" रेल की पटरियाँ बिछी हैं। किनारों पर इस फ्लाइ-ओवर की ऊँचाई 5 मीटर तथा बीच में 4 मीटर है। 'क' नगर के स्टेशन पर एक ऐसी ट्रे... |
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February 28, 2013, 2:42 pm |
| यूँ तो रामसेतु (एडम्स ब्रिज) को तोड़कर जलजहाजों के लिए रास्ता बनाने की परिकल्पना बहुत पुरानी है (यह कहानी 1860 तक पीछे जाती है), मगर "सेतुसमुद्रम शिपिंग चैनल प्रोजेक्ट" का गठन फरवरी' 1997 में हुआ, जब देवेगौड़ा साहब प्रधानमंत्री थे। इसके सालभर बाद अटलबिहारी वाजपेयी साहब प... |
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February 24, 2013, 9:45 am |
| दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्ष जब आधिकारिक वक्तव्य देते हैं और उनके वक्तव्य के सीधे प्रसारण की व्यवस्था रहती है, तब पटभूमि (बैकग्राउण्ड) का खासा ध्यान रखा जाता है, ताकि टीवी पर देखने वालों को एक भव्यता, एक शान का अनुभव हो... । भव्यता या शानो-शौकत न भी झलके, तो एक प्रकार की "... |
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February 21, 2013, 3:45 pm |
| जरा सोचिये-· प्रधानमंत्री या रक्षामंत्री को "लेह" ले जाने के लिए एक वीवीआईपी हेलीकॉप्टर की जरुरत महसूस की जाती है। · हेलीकॉप्टर ऐसा होना चाहिए, जो 18,000 फीट की ऊँचाई पर उड़ान भर सके। · निविदा जारी की जाती है। पता चलता है कि दुनिया में एकमात्र "यूरोकॉप्... |
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February 21, 2013, 11:02 am |
| जो वैज्ञानिक, इंजीनियर, तकनीशियन, डिजाइनर इत्यादि मिलजुलकर हाइड्रोजन बम बना सकते हैं, सुपर कम्प्यूटर बना सकते हैं, अन्तर्महाद्वीपीय मिसाइल बना सकते हैं, कृत्रिम उपग्रह बना सकते हैं; वे देश की सेनाओं की जरुरतों के मुताबिक तोप, वायुयान, जलपोत वगैरह नहीं बना सकते- ऐ... |
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February 15, 2013, 7:24 am |
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