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रविकर की कुण्डलियाँ : View Blog Posts
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रविकर की कुण्डलियाँ

देह देहरी देहरा, दो दो दिया जलाय ।कर उजेर मन गर्भ-गृह, दो अघ-तम दहकाय ।दो अघ-तम दहकाय , घूर नरदहा खेत पर ।गली द्वार-पिछवाड़, प्रकाशित कर दो रविकर।जय जय लक्ष्मी मातु, पधारो आज शुभ घरी।सुख-समृद्धि-सौहार्द, बसे मम देह देहरी ।।देह, देहरी, देहरा = काया, द्वार, देवालय घूर = कूड़ा...
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  October 17, 2017, 2:14 pm
निज काम से थकते हुए देखे कहाँ कब आदमी।केवल पराये काम से थकते यहाँ सब आदमी।पर फिक्र धोखा झूठ ने ऐसा हिलाया अनवरत्रविकर बिना कुछ काम के थकता दिखे अब आदमी।।...
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  August 26, 2017, 11:40 am
मैया कार्यालय चली, सुत आया के पास।पर्स घड़ी चाभी उठा, प्रश्न पूछती खास।कहीं कुछ रह तो नहीं गया।हाय रे मर ही गयी मया।।अभी हुई बिटिया विदा, खत्म हुआ जब जश्न।उठा लिया सामान सब, बुआ पूछती प्रश्न।।कहीं कुछ रह तो नहीं गया।घोंसला खाली उड़ी बया।।पोती हुई विदेश में, वीजा हुआ समा...
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  August 22, 2017, 2:26 pm
काया को देगी जला, देगी मति को मार।क्रोध दबा के मत रखो, यह तो है अंगार।यह तो है अंगार, क्रोध यदि बाहर आये।आ जाये सैलाब, और सुख शान्ति बहाये।कभी किसी पर क्रोध, अगर रविकर को आया।सिर पर पानी डाल, बदन पूरा महकाया।।फेरे पूरे हो गये, खत्म हुआ जब जश्न।कहो ब्याह का हेतु क्या, दूल्हे...
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Tag :हास्य
  July 31, 2017, 8:51 am
माला महकौवा मँगा, रखे चिकित्सक नेक |उत्सुक रोगी पूछता, कारण टेबुल टेक | कारण टेबुल टेक, केस पहला है मेरा |लेकर प्रभु का नाम, वक्ष चीरूंगा तेरा |पहनूँगा मैं स्वयं, ठीक यदि दिल कर डाला |वरना सॉरी बोल, तुम्हीं पर डालूँ माला ||...
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  July 10, 2017, 10:41 am
रस्सी जैसी जिंदगी, तने तने हालात |एक सिरे पे ख्वाहिशें, दूजे पे औकात |है पहाड़ सी जिन्दगी, चोटी पर अरमान।रविकर झुक के यदि चढ़ो, हो चढ़ना आसान।।चूड़ी जैसी जिंदगी, होती जाये तंग।काम-क्रोध-मद-लोभ से, हुई आज बदरंग।।फूँक मारके दर्द का, मैया करे इलाज।वह तो बच्चों के लिए, वैद्यों की स...
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  July 6, 2017, 10:39 am
चुभे कील बन शख्स जो, रविकर उसे उखाड़।मार हथौड़ा ठोक दे, अपना मौका ताड़।।अधिक आत्मविश्वास में, इस धरती के मूढ़ |विज्ञ दिखे शंकाग्रसित, यही समस्या गूढ़ ||रविकर यदि छोटा दिखे, नहीं दूर से घूर।फिर भी यदि छोटा दिखे, रख दे दूर गरूर।।अपने मुँह मिट्ठू बनें, किन्तु चूकता ढीठ।नहीं ठोक प...
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  July 6, 2017, 10:28 am
चाय नही पानी नही, पीता अफसर आज।किन्तु चाय-पानी बिना, करे न कोई काज।।दिनभर पत्थर तोड़ के, करे नशा मजदूर।रविकर कुर्सी तोड़ता, दिखा नशे में चूर।।बेमौसम ओले पड़े, चक्रवात तूफान।धनी पकौड़ै खा रहे, खाये जहर किसान।।होती पाँचो उँगलियाँ, कभी न एक समान।मिलकर खाती हैं मगर, रिश्वत-धन प...
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  July 6, 2017, 10:22 am
हंस हंसिनी से कहे, छोड़ो पापिस्तान।भरे पड़े उल्लू यहाँ, जल्दी भरो उड़ान।जल्दी भरो उड़ान, रोकता उल्लू आ के।मेरी पत्नी छोड़, कहाँ ले चला उड़ा के।काजी करता न्याय, हारता हंस संगिनी।हो उल्लू की मौज, पीट ले माथ हंसिनी ।दोहाजहाँ पंच मुँह देखकर, करते रविकर न्याय।रहे वहाँ वीरानगी, सज...
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  July 3, 2017, 3:42 pm
 सात्विक-जिद से आसमाँ, झुक जाते भगवान् ।पीर पराई बाँट के, धन्य होय इंसान ।धन्य होय इंसान, मिलें दुर्गम पथ अक्सर । हों पूरे अरमान, कोशिशें कर ले बेहतर ।बाँट एक मुस्कान, मिले तब शान्ति आत्मिक ।रविकर धन्य विचार, यही तो शुद्ध सात्विक ।।बढ़िया घटिया पर बहस, बढ़िया जाए हार |...
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  July 1, 2017, 2:05 pm
जिद्दी बच्चे गिद्ध के, मांगे मानव माँस।मगर सुअर का ही मिला, असफल हुआ प्रयास।असफल हुआ प्रयास, पड़ा जिद्दी से पाला।करता बाप उपाय, सुअर मस्जिद में डाला।होता शुरू फसाद, उड़े रविकर परखच्चे।फिर तो मानव माँस, नोचते जिद्दी बच्चे।।...
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  June 29, 2017, 11:25 am
मदिरा खैनी माँस तज, बढ़े उम्र दस साल।जुड़े जवानी में नही, अपितु बुढ़ापा-काल। अपितु बुढ़ापा काल, ख्वाहिशें खों खों खोवे।होवे धीमी चाल, जीभ का स्वाद बिलोवे।इसीलिए बिन्दास, जवानी जिए सिरफिरा।खाये खैनी माँस, पिये रविकर भी मदिरा ।।विषधर डसना छोड़ता, पड़ता साधु प्रभाव।दुर्जन प...
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  May 15, 2017, 10:57 am
सिर्फ बेटियाँ ही नहीं, जाँय माइका छोड़।गलाकाट प्रतियोगिता, बेटों में भी होड़।बेटों में भी होड़, पड़ा है खाली कमरा ।रैकट बैट गिटार, अजब सन्नाटा पसराजींस शूज़ टी-शर्ट्स, किताबें कलम टोपियाँ।कहे आजकल कौन, रुलाती सिर्फ बेटियाँ।।...
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  April 30, 2017, 2:18 pm
ताले की दो कुंजिका, कर्म भाग्य दो नाम।कर्म कुंजिका तू लगा, भली करेंगे राम।भली करेंगे राम, भाग्य की चाभी थामे।निश्चय ही हो जाय, सफलता तेरे नामे।तू कर सतत प्रयास, कहाँ प्रभु रुकने वाले।भाग्य कुंजिका डाल, कभी भी खोलें ताले।।...
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  February 27, 2017, 10:10 am
इंसानी छलछंद को, करते अक्सर मंद।हास्य-व्यंग्य सुंदर विधा, रचे प्रभावी छंद।रचे प्रभावी छंद, खोट पर चोट करे है।प्रवचन कीर्तन सूक्ति, भजन संदेश भरें हैं।सुने-गुने धर-ध्यान, नहीं है रविकर सानी।किन्तु दृष्टिगत भेद, दिखे फितरत इंसानी।।...
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  February 19, 2017, 1:19 pm
रिश्ते को तितली समझ, ले चुटकी में थाम।पकड़ोगे यदि जोर से, भुगतोगे अंजाम।भुगतोगे अंजाम, पंख दोनो टूटेंगे ।दो थोड़ी सी ढील, रंग मोहक छूटेंगे।भर रिश्ते में रंग, चुकाओ रविकर किश्तें।तितली भ्रमर समेत, भरेंगे रंग फरिश्ते।...
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  February 13, 2017, 10:22 am
सामाजिक मुखड़े पे मुखड़े चढ़े, चलें मुखौटे दाँव |शहर जीतते ही रहे, रहे हारते गाँव |रहे हारते गाँव, पते की बात बताता।गया लापता गंज, किन्तु वह पता न पाता।हुआ पलायन तेज, पकड़िया बरगद उखड़े |खर-दूषण विस्तार, दुशासन बदले मुखड़े ||जौ जौ आगर विश्व में, कान काटते लोग।गलाकाट प्रतियोगित...
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  February 8, 2017, 4:53 pm
मुखड़े पे मुखड़े चढ़े, चलें मुखौटे दाँव |शहर जीतते ही रहे, रहे हारते गाँव |रहे हारते गाँव, पते की बात बताता।गया लापता गंज, किन्तु वह पता न पाता।हुआ पलायन तेज, पकड़िया बरगद उखड़े |खर-दूषण विस्तार, दुशासन बदले मुखड़े ||...
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  February 8, 2017, 11:09 am
अभ्यागत गतिमान यदि, दुर्गति से बच जाय।दुख झेले वह अन्यथा, पिये अश्रु गम खाय।पिये अश्रु गम खाय, अतिथि देवो भव माना।लेकिन दो दिन बाद, मारती दुनिया ताना।कह रविकर कविराय, करा लो बढ़िया स्वागत।शीघ्र ठिकाना छोड़, बढ़ो आगे अभ्यागत।।...
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  February 7, 2017, 10:05 am
रोमन में हिन्दी लिखी, रो मन बुक्का फाड़।देवनागरी स्वयं की, रही दुर्दशा ताड़।रही दुर्दशा ताड़, दिखे मात्रा की गड़बड़।पाश्चात्य की आड़, करे अब गिटपिट बड़ बड़।सीता को बनवास, लगाये लांछन धोबन।सूर्पनखा की जीत, लिखें खर दूषण रोमन।।तप गृहस्थ करता कठिन, रविकर सतत् अबाध।संयम सेवा सहि...
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  January 12, 2017, 3:50 pm
दाढ़ी झक्क सफेद है, लेकिन फर्क महीन।सैंटा देता नोट तो, मोदी लेता छीन।मोदी लेता छीन, कमाई उनकी काली।कितने मिटे कुलीन, आज तक देते गाली।हुई सुरक्षित किन्तु, कमाई रविकर गाढ़ी।सुखमय दिया भविष्य, बिना तिनके की दाढ़ी।।...
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  December 27, 2016, 2:41 pm
(1)विनती सम मानव हँसी, प्रभु करते स्वीकार।हँसा सके यदि अन्य को, करते बेड़ापार।करते बेड़ापार, कहें प्रभु हँसो हँसाओ।रहे बुढ़ापा दूर, निरोगी काया पाओ।हँसी बढ़ाये उम्र, बढ़े स्वासों की गिनती।रविकर निर्मल हास्य, प्रार्थना पूजा विनती।।(2)बानी सुनना देखना, खुश्बू स्वाद समेत।पाँ...
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  December 26, 2016, 10:44 am
पानी भर कर चोंच में, चिड़ी बुझाये आग ।फिर भी जंगल जल रहा, हंसी उड़ाये काग।हंसी उड़ाये काग, नहीं तू बुझा सकेगी।कहे चिड़ी सुन मूर्ख, आग तो नहीं बुझेगी।किंतु लगाया कौन, लिखे इतिहास कहानी।मैं तो रही बुझाय, आग पर डालूं पानी ।।...
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  December 19, 2016, 2:58 pm
क्षरण छंद में हो रहा, साहित्यिक छलछंद।किन्तु अभी भी कवि कई, नीति नियम पाबंद।नीति नियम पाबंद, बंद में भाव कथ्य भर।शिल्प सुगढ़ लय शुद्ध, मिलाये तुक भी बेह'तर।लो कुंडलियां मान, निवेदन करता रविकर।मिला आदि शब्दांश, अंत के दो दो अक्षर।।...
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  December 13, 2016, 10:29 am
लादें औलादें सतत, मातायें नौ माह।लात मारती पेट में, फिर भी हर्ष अथाह।फिर भी हर्ष अथाह, पुत्र अब पढ़ने जाये।पेट काट के बाप, उसे नौकरी दिलाये।पुन: वही हालात, बची हैं केवल यादें।किन्तु मार के लात, रुलाती अब औलादें।।...
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  October 24, 2016, 1:33 pm
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