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Blog: रविकर की कुण्डलियाँ

Blogger: dinesh chandra gupta ravikar
अगर तुम देखते हो स्वप्न सारे,- मातृभाषा में।अगर तकलीफ़ में माँ को पुकारे,- मातृभाषा में।कहो क्यों कर रहे फिर तुम विदेशी सास की सेवा-दिखी क्या खोट माँ में और प्यारे ! मातृभाषा में।।कभी पकड़ने क्यों पड़ें, तुम्हें गैर के पैर।पकड़ो गुरु का हाथ तो, रविकर सब्बा खैर।।जिसपर अंधों ... Read more
clicks 46 View   Vote 0 Like   10:15am 14 Sep 2018 #
Blogger: dinesh chandra gupta ravikar
कुंडलियाँ छंद (5)बेला वेलंटाइनी, नौ सौ पापड़ बेल ।वेळी ढूँढी इक बला, बल्ले ठेलम-ठेल । बल्ले ठेलम-ठेल, बगीचे दो तन बैठे ।बजरंगी के नाम, पहरुवे तन-तन ऐंठे।ढर्रा छींटा-मार, हुवे न कभी दुकेला ।भंडे खाए खार, भाड़ते प्यारी बेला ।।रोज रोज के चोचले, रोज दिया उस रोज |रोमांचित विनिमय ... Read more
clicks 57 View   Vote 0 Like   9:52am 13 Feb 2018 #
Blogger: dinesh chandra gupta ravikar
अभ्यागत गतिमान यदि, दुर्गति से बच जाय।दुख झेले वह अन्यथा, पिये अश्रु गम खाय।पिये अश्रु गम खाय, अतिथि देवो भव माना।लेकिन दो दिन बाद, मारती दुनिया ताना।कह रविकर कविराय, करा लो बढ़िया स्वागत।शीघ्र ठिकाना छोड़, बढ़ो आगे अभ्यागत।।... Read more
clicks 55 View   Vote 0 Like   4:36am 5 Feb 2018 #
Blogger: dinesh chandra gupta ravikar
सोते सोते भी सतत्, रहो हिलाते पैर।दफना देंगे अन्यथा, क्या अपने क्या गैर।।दौड़ लगाती जिन्दगी, सचमुच तू बेजोड़ यद्यपि मंजिल मौत है, फिर भी करती होड़                                                              रस्सी जैसी जिंदगी, तने-तने हालात. एक स... Read more
clicks 82 View   Vote 0 Like   7:31am 15 Dec 2017 #
Blogger: dinesh chandra gupta ravikar
देह देहरी देहरा, दो दो दिया जलाय ।कर उजेर मन गर्भ-गृह, दो अघ-तम दहकाय ।दो अघ-तम दहकाय , घूर नरदहा खेत पर ।गली द्वार-पिछवाड़, प्रकाशित कर दो रविकर।जय जय लक्ष्मी मातु, पधारो आज शुभ घरी।सुख-समृद्धि-सौहार्द, बसे मम देह देहरी ।।देह, देहरी, देहरा = काया, द्वार, देवालय घूर = कूड़ा... Read more
clicks 84 View   Vote 0 Like   8:44am 17 Oct 2017 #
Blogger: dinesh chandra gupta ravikar
निज काम से थकते हुए देखे कहाँ कब आदमी।केवल पराये काम से थकते यहाँ सब आदमी।पर फिक्र धोखा झूठ ने ऐसा हिलाया अनवरत्रविकर बिना कुछ काम के थकता दिखे अब आदमी।।... Read more
clicks 75 View   Vote 0 Like   6:10am 26 Aug 2017 #
Blogger: dinesh chandra gupta ravikar
मैया कार्यालय चली, सुत आया के पास।पर्स घड़ी चाभी उठा, प्रश्न पूछती खास।कहीं कुछ रह तो नहीं गया।हाय रे मर ही गयी मया।।अभी हुई बिटिया विदा, खत्म हुआ जब जश्न।उठा लिया सामान सब, बुआ पूछती प्रश्न।।कहीं कुछ रह तो नहीं गया।घोंसला खाली उड़ी बया।।पोती हुई विदेश में, वीजा हुआ समा... Read more
clicks 129 View   Vote 0 Like   8:56am 22 Aug 2017 #
Blogger: dinesh chandra gupta ravikar
काया को देगी जला, देगी मति को मार।क्रोध दबा के मत रखो, यह तो है अंगार।यह तो है अंगार, क्रोध यदि बाहर आये।आ जाये सैलाब, और सुख शान्ति बहाये।कभी किसी पर क्रोध, अगर रविकर को आया।सिर पर पानी डाल, बदन पूरा महकाया।।फेरे पूरे हो गये, खत्म हुआ जब जश्न।कहो ब्याह का हेतु क्या, दूल्हे... Read more
clicks 96 View   Vote 0 Like   3:21am 31 Jul 2017 #हास्य
Blogger: dinesh chandra gupta ravikar
माला महकौवा मँगा, रखे चिकित्सक नेक |उत्सुक रोगी पूछता, कारण टेबुल टेक | कारण टेबुल टेक, केस पहला है मेरा |लेकर प्रभु का नाम, वक्ष चीरूंगा तेरा |पहनूँगा मैं स्वयं, ठीक यदि दिल कर डाला |वरना सॉरी बोल, तुम्हीं पर डालूँ माला ||... Read more
clicks 87 View   Vote 0 Like   5:11am 10 Jul 2017 #
Blogger: dinesh chandra gupta ravikar
रस्सी जैसी जिंदगी, तने तने हालात |एक सिरे पे ख्वाहिशें, दूजे पे औकात |है पहाड़ सी जिन्दगी, चोटी पर अरमान।रविकर झुक के यदि चढ़ो, हो चढ़ना आसान।।चूड़ी जैसी जिंदगी, होती जाये तंग।काम-क्रोध-मद-लोभ से, हुई आज बदरंग।।फूँक मारके दर्द का, मैया करे इलाज।वह तो बच्चों के लिए, वैद्यों की स... Read more
clicks 86 View   Vote 0 Like   5:09am 6 Jul 2017 #
Blogger: dinesh chandra gupta ravikar
चुभे कील बन शख्स जो, रविकर उसे उखाड़।मार हथौड़ा ठोक दे, अपना मौका ताड़।।अधिक आत्मविश्वास में, इस धरती के मूढ़ |विज्ञ दिखे शंकाग्रसित, यही समस्या गूढ़ ||रविकर यदि छोटा दिखे, नहीं दूर से घूर।फिर भी यदि छोटा दिखे, रख दे दूर गरूर।।अपने मुँह मिट्ठू बनें, किन्तु चूकता ढीठ।नहीं ठोक प... Read more
clicks 91 View   Vote 0 Like   4:58am 6 Jul 2017 #
Blogger: dinesh chandra gupta ravikar
चाय नही पानी नही, पीता अफसर आज।किन्तु चाय-पानी बिना, करे न कोई काज।।दिनभर पत्थर तोड़ के, करे नशा मजदूर।रविकर कुर्सी तोड़ता, दिखा नशे में चूर।।बेमौसम ओले पड़े, चक्रवात तूफान।धनी पकौड़ै खा रहे, खाये जहर किसान।।होती पाँचो उँगलियाँ, कभी न एक समान।मिलकर खाती हैं मगर, रिश्वत-धन प... Read more
clicks 82 View   Vote 0 Like   4:52am 6 Jul 2017 #
Blogger: dinesh chandra gupta ravikar
हंस हंसिनी से कहे, छोड़ो पापिस्तान।भरे पड़े उल्लू यहाँ, जल्दी भरो उड़ान।जल्दी भरो उड़ान, रोकता उल्लू आ के।मेरी पत्नी छोड़, कहाँ ले चला उड़ा के।काजी करता न्याय, हारता हंस संगिनी।हो उल्लू की मौज, पीट ले माथ हंसिनी ।दोहाजहाँ पंच मुँह देखकर, करते रविकर न्याय।रहे वहाँ वीरानगी, सज... Read more
clicks 87 View   Vote 0 Like   10:12am 3 Jul 2017 #
Blogger: dinesh chandra gupta ravikar
 सात्विक-जिद से आसमाँ, झुक जाते भगवान् ।पीर पराई बाँट के, धन्य होय इंसान ।धन्य होय इंसान, मिलें दुर्गम पथ अक्सर । हों पूरे अरमान, कोशिशें कर ले बेहतर ।बाँट एक मुस्कान, मिले तब शान्ति आत्मिक ।रविकर धन्य विचार, यही तो शुद्ध सात्विक ।।बढ़िया घटिया पर बहस, बढ़िया जाए हार |... Read more
clicks 83 View   Vote 0 Like   8:35am 1 Jul 2017 #
Blogger: dinesh chandra gupta ravikar
जिद्दी बच्चे गिद्ध के, मांगे मानव माँस।मगर सुअर का ही मिला, असफल हुआ प्रयास।असफल हुआ प्रयास, पड़ा जिद्दी से पाला।करता बाप उपाय, सुअर मस्जिद में डाला।होता शुरू फसाद, उड़े रविकर परखच्चे।फिर तो मानव माँस, नोचते जिद्दी बच्चे।।... Read more
clicks 78 View   Vote 0 Like   5:55am 29 Jun 2017 #
Blogger: dinesh chandra gupta ravikar
मदिरा खैनी माँस तज, बढ़े उम्र दस साल।जुड़े जवानी में नही, अपितु बुढ़ापा-काल। अपितु बुढ़ापा काल, ख्वाहिशें खों खों खोवे।होवे धीमी चाल, जीभ का स्वाद बिलोवे।इसीलिए बिन्दास, जवानी जिए सिरफिरा।खाये खैनी माँस, पिये रविकर भी मदिरा ।।विषधर डसना छोड़ता, पड़ता साधु प्रभाव।दुर्जन प... Read more
clicks 104 View   Vote 0 Like   5:27am 15 May 2017 #
Blogger: dinesh chandra gupta ravikar
सिर्फ बेटियाँ ही नहीं, जाँय माइका छोड़।गलाकाट प्रतियोगिता, बेटों में भी होड़।बेटों में भी होड़, पड़ा है खाली कमरा ।रैकट बैट गिटार, अजब सन्नाटा पसराजींस शूज़ टी-शर्ट्स, किताबें कलम टोपियाँ।कहे आजकल कौन, रुलाती सिर्फ बेटियाँ।।... Read more
clicks 86 View   Vote 0 Like   8:48am 30 Apr 2017 #
Blogger: dinesh chandra gupta ravikar
ताले की दो कुंजिका, कर्म भाग्य दो नाम।कर्म कुंजिका तू लगा, भली करेंगे राम।भली करेंगे राम, भाग्य की चाभी थामे।निश्चय ही हो जाय, सफलता तेरे नामे।तू कर सतत प्रयास, कहाँ प्रभु रुकने वाले।भाग्य कुंजिका डाल, कभी भी खोलें ताले।।... Read more
clicks 118 View   Vote 0 Like   4:40am 27 Feb 2017 #
Blogger: dinesh chandra gupta ravikar
इंसानी छलछंद को, करते अक्सर मंद।हास्य-व्यंग्य सुंदर विधा, रचे प्रभावी छंद।रचे प्रभावी छंद, खोट पर चोट करे है।प्रवचन कीर्तन सूक्ति, भजन संदेश भरें हैं।सुने-गुने धर-ध्यान, नहीं है रविकर सानी।किन्तु दृष्टिगत भेद, दिखे फितरत इंसानी।।... Read more
clicks 106 View   Vote 0 Like   7:49am 19 Feb 2017 #
Blogger: dinesh chandra gupta ravikar
रिश्ते को तितली समझ, ले चुटकी में थाम।पकड़ोगे यदि जोर से, भुगतोगे अंजाम।भुगतोगे अंजाम, पंख दोनो टूटेंगे ।दो थोड़ी सी ढील, रंग मोहक छूटेंगे।भर रिश्ते में रंग, चुकाओ रविकर किश्तें।तितली भ्रमर समेत, भरेंगे रंग फरिश्ते।... Read more
clicks 119 View   Vote 0 Like   4:52am 13 Feb 2017 #
Blogger: dinesh chandra gupta ravikar
सामाजिक मुखड़े पे मुखड़े चढ़े, चलें मुखौटे दाँव |शहर जीतते ही रहे, रहे हारते गाँव |रहे हारते गाँव, पते की बात बताता।गया लापता गंज, किन्तु वह पता न पाता।हुआ पलायन तेज, पकड़िया बरगद उखड़े |खर-दूषण विस्तार, दुशासन बदले मुखड़े ||जौ जौ आगर विश्व में, कान काटते लोग।गलाकाट प्रतियोगित... Read more
clicks 114 View   Vote 0 Like   11:23am 8 Feb 2017 #
Blogger: dinesh chandra gupta ravikar
मुखड़े पे मुखड़े चढ़े, चलें मुखौटे दाँव |शहर जीतते ही रहे, रहे हारते गाँव |रहे हारते गाँव, पते की बात बताता।गया लापता गंज, किन्तु वह पता न पाता।हुआ पलायन तेज, पकड़िया बरगद उखड़े |खर-दूषण विस्तार, दुशासन बदले मुखड़े ||... Read more
clicks 98 View   Vote 0 Like   5:39am 8 Feb 2017 #
Blogger: dinesh chandra gupta ravikar
अभ्यागत गतिमान यदि, दुर्गति से बच जाय।दुख झेले वह अन्यथा, पिये अश्रु गम खाय।पिये अश्रु गम खाय, अतिथि देवो भव माना।लेकिन दो दिन बाद, मारती दुनिया ताना।कह रविकर कविराय, करा लो बढ़िया स्वागत।शीघ्र ठिकाना छोड़, बढ़ो आगे अभ्यागत।।... Read more
clicks 99 View   Vote 0 Like   4:35am 7 Feb 2017 #
Blogger: dinesh chandra gupta ravikar
रोमन में हिन्दी लिखी, रो मन बुक्का फाड़।देवनागरी स्वयं की, रही दुर्दशा ताड़।रही दुर्दशा ताड़, दिखे मात्रा की गड़बड़।पाश्चात्य की आड़, करे अब गिटपिट बड़ बड़।सीता को बनवास, लगाये लांछन धोबन।सूर्पनखा की जीत, लिखें खर दूषण रोमन।।तप गृहस्थ करता कठिन, रविकर सतत् अबाध।संयम सेवा सहि... Read more
clicks 130 View   Vote 0 Like   10:20am 12 Jan 2017 #
Blogger: dinesh chandra gupta ravikar
दाढ़ी झक्क सफेद है, लेकिन फर्क महीन।सैंटा देता नोट तो, मोदी लेता छीन।मोदी लेता छीन, कमाई उनकी काली।कितने मिटे कुलीन, आज तक देते गाली।हुई सुरक्षित किन्तु, कमाई रविकर गाढ़ी।सुखमय दिया भविष्य, बिना तिनके की दाढ़ी।।... Read more
clicks 126 View   Vote 0 Like   9:11am 27 Dec 2016 #
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