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अरुण कुमार निगम (हिंदी कवितायेँ)

*अच्छे दिन आ गए* !!!!!पहले डाकिए की आहट भी किसी प्रेमी या प्रेयसी की आहट से कम नहीं होती थी। लंबी प्रतीक्षा के बाद महकते हुए रंगबिरंगे लिफाफों में शुभकामनाओं को पाकर जो खुशी मिलती थी वह संबंधित त्यौहार या अवसर की खुशी से कमतर नहीं होती थी। लिफाफे के रूप में प्रेषक बिल्कुल स...
अरुण कुमार निगम (हिंदी कविताये...
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  November 9, 2018, 2:06 pm
हिन्दी गजल -आपसी दुर्भावना है, एकता दिखती नहींरूप तो सुन्दर सजे हैं, आत्मा दिखती नहीं।।घोषणाओं का पुलिंदा, फिर हमें दिखला रहेहम गरीबों की उन्हें तो, याचना दिखती नहीं।।हर तरफ भ्रमजाल फैला, है भ्रमित हर आदमीसिद्ध पुरुषों ने बताई, वह दिशा दिखती नहीं।।संस्कारों की जमीं प...
अरुण कुमार निगम (हिंदी कविताये...
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  November 2, 2018, 3:26 pm
कौवा नजर आता नहीं........घर की चौखट पर कोई बूढ़ा नजर आता नहींआश्रमों में भीड़ है बेटा नजर आता नहीं।बैंक के खाते बताते आदमी की हैसियतप्यार का दिल में यहाँ जज़्बा नजर आता नहीं।दफ़्न आँगन पत्थरों में, खेत पर बंगले खड़ेअब दरख्तों का यहाँ साया नजर आता नहीं।पूर्वजों के पर्व पर हैं दा...
अरुण कुमार निगम (हिंदी कविताये...
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  October 8, 2018, 1:01 pm
*जलहरण घनाक्षरी*(विधान - परस्पर तुकांतता लिए चार पद/ 8, 8, 8, 8 या 16, 16 वर्णों पर यति/ अंत में दो लघु अनिवार्य)धूल धूसरित तन, केश राशि श्याम घनबाल क्रीड़ा में मगन, अलमस्त हैं किसन।छनन छनन छन, पग बजती पैजनलिपट रही किरण, चूम रही है पवन।काज तज देवगण, देख रहे जन-जनपुलकित तन-मन, निर्निमेष ...
अरुण कुमार निगम (हिंदी कविताये...
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  September 18, 2018, 9:14 am
*हिन्दी फिल्मों के गायक कलाकार*गायक कलाकार फिल्मों के, रहते हैं पर्दे से दूरकिन्तु नायिका नायक को वे, कर देते काफी मशहूर।।सहगल पंकज मलिक जोहरा, राजकुमारी और खुर्शीदतीस और चालीस दशक की जनता इसकी हुई मुरीद।।रफी मुकेश किशोर सचिन दा, मन्नाडे हेमंत सुबीरकभी शरारत कभी निव...
अरुण कुमार निगम (हिंदी कविताये...
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  September 15, 2018, 11:05 am
"हिन्दी भाषा भारत के लिए परम हितकारी है"(जनकवि कोदूराम "दलित"जी की ताटंक छन्द आधारित हिन्दी कविता)सरल सुबोध सरस अति सुंदर, लगती प्यारी-प्यारी हैदेवनागरी लिपि जिसकी सारी लिपियों से न्यारी हैऋषि-प्रणीत संस्कृत भाषा जिस भाषा की महतारी हैवह हिन्दी भाषा भारत के लिए परम हित...
अरुण कुमार निगम (हिंदी कविताये...
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  September 14, 2018, 8:58 am
हाकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के जन्मदिन, विश्व खेल दिवस पर.....शत-शत नमनहॉकीहाकी कल पहचान थी, आज हुई गुमनामखेल स्वदेशी खो गये , सिर चढ़ बैठा दामसिर चढ़  बैठा  दाम , शुरू  अब सट्टेबाजीलाखों लाख कमायँ,नहीं भरता उनका जीकलुषित है माहौल , कहाँ  सच्चाई बाकीकरें पुन: शुरुवात, उ...
अरुण कुमार निगम (हिंदी कविताये...
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  August 29, 2018, 9:46 am
"रेडियो श्रोता दिवस - 20 अगस्त, छत्तीसगढ़ के श्रोताओं द्वारा घोषित दिवस"   - संस्मरणआज रेडियो श्रोता दिवस पर मैं सत्तर के दशक के अपने अनुभव साझा कर रहा हूँ, मुझे विश्वास है कि उस दौर के श्रोता मित्र लगभग पचास वर्ष पुरानी स्मृतियों में जरूर खो जाएंगे। बाद के दशकों के श्रो...
अरुण कुमार निगम (हिंदी कविताये...
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  August 22, 2018, 8:32 am
गजल -सत्य जेल में पड़ा हुआ हैझूठ द्वार पर खड़ा हुआ है।।बाँट रहा वह किसकी दौलतकहाँ खजाना गड़ा हुआ है।।उस दामन का दाग दिखे क्याजिस पर हीरा जड़ा हुआ है।।अब उससे उम्मीदें कैसीवह तो चिकना घड़ा हुआ है।।पाप कमाई, बाप कमाएबेटा खाकर बड़ा हुआ है।।लोकतंत्र का पेड़ अभागापत्ता पता झड़ा हु...
अरुण कुमार निगम (हिंदी कविताये...
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  July 15, 2018, 12:06 pm
बहर221 1222, 221 1222कुछ काम नहीं करता, हर बार मिली कुर्सीमंत्री का भतीजा है, उपहार मिली कुर्सी।।गत सत्तर सालों में, कई रोग मिले तन कोजाँचा जो चिकित्सक ने, बीमार मिली कुर्सी।।पाँवो को हुआ गठिया, है पीठ भी टेढ़ी-सीलकवा हुआ हाथों को, लाचार मिली कुर्सी।।फिर भी इसे पाने को, हर शख्स मचलत...
अरुण कुमार निगम (हिंदी कविताये...
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  July 13, 2018, 5:38 pm
हे कॉपी-पेस्ट सन्त !!! हे आधुनिक जगत के अवैतनिक दूत !!!  आपका समर्पण स्तुत्य है। सूर्योदय काल से रात्रि नीम विश्राम बेला तक आपका परोपकारी व्यक्तित्व, पराई पोस्ट को कॉपी-पेस्ट करते नहीं थकता। इस व्यस्तता में आप स्वयं सृजन शून्य हो जाते हैं। शून्य ही तो सम्पूर्ण ब्रम्हाण...
अरुण कुमार निगम (हिंदी कविताये...
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  March 26, 2018, 1:33 pm
दोहा-गीतवन उपवन खोते गए, जब से हुआ विकास ।सच पूछें तो हो गया, जीवन कारावास ।।पवन विषैली आज की, पनप रहे हैं रोग ।जल की निर्मलता गई, आये जब उद्योग ।।अजगर जैसे आज तो, शहर निगलते गाँव ।बुलडोजर खाने लगे, अमराई की छाँव ।।वर्तमान में हैं सभी, सुविधाओं के दास ।सच पूछें तो हो गया, जीव...
अरुण कुमार निगम (हिंदी कविताये...
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  January 9, 2018, 9:32 am
      क्या होगा भगवान !अधजल गगरी करवाती है, अपना ही सम्मानभरी गगरिया पूछ रही है, क्या होगा भगवान !!(1)काँव काँव का शोर मचाते, दरबारों में कागबहरे राजा जी का उन पर, उमड़ रहा अनुराग।अवसर पाकर उल्लू भी अब, छेड़ रहे हैं तानभरी गगरिया पूछ रही है, क्या होगा भगवान !!(2)भूसे को पौष्टिक ...
अरुण कुमार निगम (हिंदी कविताये...
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  December 13, 2017, 7:34 pm
काव्य मंच की गरिमा खोई, ऐसा आज चला है दौरदिखती हैं चुटकुलेबाजियाँ, फूहड़ता है अब सिरमौर ।।कहीं राजनेता पर फब्ती, कवयित्री पर होते तंजअभिनेत्री पर कहीं निशाना, मंच हुआ है मंडी-गंज ।।मौलिकता का नाम नहीं है, मर्यादा होती अब ध्वस्तभौंडापन कोई दिखलाता, पैरोडी में कोई मस्त ।...
अरुण कुमार निगम (हिंदी कविताये...
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  November 28, 2017, 10:12 am
"यहाँ हमारा सिक्का खोटा"निर्धन को खुशियाँ तब मिलतीं, जब होते दुर्लभ संयोगहमको अपनी बासी प्यारी, उन्हें मुबारक छप्पन भोग।।चन्द्र खिलौना लैहौं वाली, जिद कर बैठे थे कल रातअपने छोटे हाथ देखकर, पता चली अपनी औकात।।जो चलता है वह बिकता है, प्यारे ! यह दुनिया बाजारयहाँ हमारा सि...
अरुण कुमार निगम (हिंदी कविताये...
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  November 9, 2017, 7:48 am
*यमक अलंकार - जब एक शब्द, दो या दो से अधिक बार अलग-अलग अर्थों में प्रयुक्त हो*।*दोहा छन्द* -(1)मत को मत बेचो कभी, मत सुख का आधारलोकतंत्र का मूल यह, निज का है अधिकार ।।(2)भाँवर युक्त कपोल लख, अंतस जागी चाहभाँवर पूरे सात लूँ, करके उससे ब्याह ।।*रूपक अलंकार - जब उपमेय पर उपमान का आरोप क...
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  October 27, 2017, 9:05 am
एक श्रृंगार गीत -कजरे गजरे झाँझर झूमर चूनर ने उकसाया थाहार गले के टूट गए कुछ ऐसे अंक लगाया था ।हरी चूड़ियाँ टूट गईं क्यों सुबह सुबह तुम रूठ गईंकल शब तुमने ही तो मुझको अपने पास बुलाया था।हाथों की मेंहदी न बिगड़ी और महावर ज्यों की त्योंहोठों की लाली को तुमने खुद ही कहाँ बचा...
अरुण कुमार निगम (हिंदी कविताये...
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  August 23, 2017, 5:41 pm
दोहा छन्दनैसर्गिक दिखते नहीं, श्यामल कुन्तल मीतलुप्तप्राय हैं वेणियाँ, शुष्क हो गए गीत।।पैंजन चूड़ी बालियाँ, बिन कैसा श्रृंगारअलंकार बिन किस तरह, कवि लाये झंकार ।।घट पनघट घूंघट नहीं, निर्वासित है लाजबन्द बोतलों में तृषा, यही सत्य है आज ।।प्रियतम की पाती गई, गए अबोले ब...
अरुण कुमार निगम (हिंदी कविताये...
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  July 13, 2017, 9:17 pm
*गुरु पूर्णिमा की शुभकामनायें*गुरु की महिमा जान, शरण में गुरु की जाओजीवन  बड़ा  अमोल, इसे  मत  व्यर्थ गँवाओदूर   करे   अज्ञान , वही   गुरुवर   कहलायेहरि  से  पहले  नाम, हमेशा  गुरु  का  आये ।।*अरुण कुमार निगम*आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)...
अरुण कुमार निगम (हिंदी कविताये...
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  July 9, 2017, 9:37 pm
गजल : खुशी  बाँटने की  कला  चाहता हूँन पूछें मुझे आप  क्या  चाहता हूँ खुशी  बाँटने की  कला  चाहता हूँ |गज़ल यूँ लिखूँ लोग गम भूल जायें ये समझो सभी का भला चाहता हूँ |बिना कुछ पिये झूमता ही रहे दिल  पुन: गीत डम-डम डिगा चाहता हूँ |न कोला न थम्सप न फैंटा न माज़ामृद...
अरुण कुमार निगम (हिंदी कविताये...
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  July 3, 2017, 9:58 pm
शायद असर होने को है...माँगने हक़ चल पड़ा दिल दरबदर होने को है खार ओ अंगार में इसकी बसर होने को है |बात करता है गजब की ख़्वाब दिखलाता है वो रोज कहता जिंदगी अब, कारगर होने को है |आज ठहरा शह्र में वो, झुनझुने लेकर नए नाच गाने का तमाशा रातभर होने को है |छीन कर सारी मशालें पी गया वो रोशन...
अरुण कुमार निगम (हिंदी कविताये...
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  July 2, 2017, 10:45 pm
ग़ज़ल पर एक प्रयास -आप कितने बड़े हो गए हैंवाह चिकने घड़े हो गए हैंपाँव पड़ते नहीं हैं जमीं पेकहते फिरते, खड़े हो गए हैंदिल धड़कता कहाँ है बदन मेंहीरे मोती जड़े हो गए हैंपत्थरों की हवेली बनाकरपत्थरों से कड़े हो गए हैंशान शौकत नवाबों सरीखीफिर भी क्यों चिड़चिड़े हो गए हैं ।अरुण कुमा...
अरुण कुमार निगम (हिंदी कविताये...
Tag :ग़ज़ल
  July 1, 2017, 6:24 pm
अरुण दोहे -पद के मद में चूर है, यारों उनका ब्रेनरिश्तों में भी कर रहे, डेकोरम मेन्टेन ।।साठ साल की उम्र तक, पद-मद देगा साथबिन रिश्तों के मान्यवर, खाली होंगे हाथ ।।पद-मद नश्वर जानिए, चिरंजीव है प्यारसंग रहेगी नम्रता, अहंकार बेकार ।।लाट गवर्नर आज हो, कल होगे तुम आमसिर्फ एक प...
अरुण कुमार निगम (हिंदी कविताये...
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  May 21, 2017, 6:48 pm
दोहा छन्द - बेला के फूल स्पर्धा थी सौंदर्य की, मौसम था प्रतिकूलसूखे फूल गुलाब के, जीते बेला फूल |चली चिलकती धूप में, जब मजदूरन नार अलबेली को देख कर, बेला मानें हार | हरदम हँसता देख कर, चिढ़-चिढ़ जाये धूपबेला की मुस्कान ने, और निखारा रूप | पहले गजरे की महक, कैसे जाऊँ भूल&nb...
अरुण कुमार निगम (हिंदी कविताये...
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  April 22, 2017, 9:45 am
कुण्डलिया छन्द:पहचाना जाता नहीं,  अब पलाश का फूलइस कलयुग के दौर में, मनुज रहा है भूलमनुज रहा है भूल,   काट कर सारे जंगलकंकरीट में  बैठ,  ढूँढता  अरे  सुमङ्गलतोड़ रहा है नित्य,  अरुण कुदरत से नाताअब पलाश का फूल,  नहीं पहचाना जाता।।अरुण कुमार निगम आदित्य नगर, द...
अरुण कुमार निगम (हिंदी कविताये...
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  April 15, 2017, 3:45 pm
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