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साहित्यालोचन

"निराला"पुस्तक की भूमिका (द्वितीय संस्करण) में डॉ० रामविलास शर्मा लिखते है कि तब से लेकर अब तक देश और साहित्य में अनेक परिवर्तन हो चुके हैं। भारत अब उपनिवेश न रहकर अर्द्ध-उपनिवेश हो गया है। परंतु यह जर्जर सामंती ढांचा अब भी है। जिससे निराला साहित्य का घनिष्ट संबंध अब भी...
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  July 14, 2016, 5:55 pm
रचनाकार की दृष्टि यदि उनकी रचनाओं में समाहित हो तो रचनाकार का व्यक्तित्व वउनकी विशेषताओं को उजागर करने के लिए रचना से परे कम ही भटकना पड़ता है. तुलसीदास को 'लोकवादी'का विशेषण देने के लिए डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी अपनीपुस्तक 'लोकवादी तुलसीदास' में उनकी रचनाओं को ही आधार ...
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  November 16, 2015, 8:22 pm
ज बच्चे हमारे सबसे मूल्यवान प्राकृतिक संसाधन हैं। वे समाज और संसार के नियंता हैं। नियंता इस दृष्टि से कि उनके द्वारा उस समाज को आगे बढ़ाया जाना है जिसमें उनका पालन हो रहा है, जिसमे उनका बचपन गुज़र रहा है। मानव जीवन के सबसे स्वतंत्र और स्वच्छंद समय को देखा जाए तो निःसंदेह ...
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  August 25, 2015, 1:28 am
रतीय इतिहास में मध्यकाल राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा सामाजिक सभी दृष्टि से महत्वपूर्ण था । एक और जहाँ इस्लामी संस्कृति भारतीय सामाजिक संरचना को प्रभावित कर रही थी तो वहीं इसकी पृष्ठभूमि में भक्ति आंदोलन का सूत्रपात भी होता है । साहित्येतिहास में इसे स्वर्णिम क...
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  January 18, 2015, 8:29 pm
दगाह पढ़ कर प्रायः पहला विस्मय हामिद के बारे में होता है। ऐसा बच्चा सचमुच का हो सकता है क्या। उम्र चार पांच साल। गरीब सूरत गरीब हालत। दादी का इकलौता अनाथ। अड़ोसियों पड़ोसियों की अभिभावकता में साथी बच्चों के साथ गांव से शहर तक पैदल चल कर जाता है , सारे दिन भूखा प्यासा मे...
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  September 1, 2014, 5:05 pm
कविता हमारी सांस्कृतिक धरोहर है. हमारे अपने समय का ऐसा दस्तावेज़, जिसके माध्यम से कवि प्रतीकों में इतिहास दर्ज करता है. इतिहास को तो तथ्यात्मक होना चाहिए, लेकिन कविता के पास यह स्पेस है कि वह अधिक विवरणात्मक और काल्पनिक होकर भी प्रतीकों में अपने समय के यथार्थ को अभिव्...
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Tag :नरेश
  June 18, 2014, 5:45 pm
विता हमारी सांस्कृतिक धरोहर है. हमारे अपने समय का ऐसा दस्तावेज़, जिसके माध्यम से कवि प्रतीकों में इतिहास दर्ज करता है. इतिहास को तो तथ्यात्मक होना चाहिए, लेकिन कविता के पास यह स्पेस है कि वह अधिक विवरणात्मक और काल्पनिक होकर भी प्रतीकों में अपने समय के यथार्थ को अभिव्य...
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Tag :नरेश
  June 18, 2014, 5:45 pm
वजागरण कालीन साहित्यकारों,पत्रकारों और चिंतकों ने यूरोप से भारतीय संसर्ग में जिन सरोकारों पर विस्तार से विचार किया उसमें शिक्षा को पर्याप्त महत्व दिया है | यह स्वाभाविक भी था क्योंकि तुलनात्मकता की दृष्टि ने उस समय के चिंतकों का ध्यान आकृष्ट किया था जिससे शिक्षा के ...
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  January 25, 2014, 4:56 pm
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  November 20, 2013, 1:18 am
लेरी जी ने कुल तीन कहानियां लिखीं और तीनो हीं प्रथम प्रेम की कहानियां हैं। 'सुखमय जीवन और 'बुद्धू का कांटा' की मनोभूमि चञ्चल और उत्फुल्ल है जबकि 'उसने कहा था' एक त्रासदी। इनमें तीसरी 'उसने कहा था' असंदिग्ध रूप से भाषा और विषयवस्तु के साथ व्यवहार, संरचना और गठन आदि को देखते ...
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  October 11, 2013, 9:30 pm
पन्यास सम्राट के नाम से सुप्रसिद्ध मुंशी प्रेमचन्द उर्दू का संस्कार लेकर हिन्दी में आए और हिन्दी के महान लेखक बने। उन्होंने हिन्दी को अपना खास मुहावरा और खुलापन दिया। कथा लेखन के क्षेत्र में उन्होंने युगान्तरकारी परिवर्तन किए। आम आदमी को उन्होंने अपनी रचनाओं का वि...
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  July 2, 2013, 5:49 pm
छले वर्ष फ़िल्मी गीतों की दुनिया में एक अभूतपूर्व विवाद जुड़ा जब ‘डी.के. बोस’ नाम के एक सज्जन को एक टीवी चैनल पर उनकी प्रतिक्रिया के लिए बैठा पाया | वे उस समय के एक प्रसिद्ध फिल्मी गीत ‘भाग-भाग डी के बोस’ से इतने प्रताड़ित हो चुके थे कि सीधे खबर का हिस्सा ही बना दिए गए | पत्...
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  June 26, 2013, 11:28 pm
‘क़िस्सा क्या है? कहानी का कच्चा माल’, कहानियों के इस कच्चे माल को बरतने में राजेश जोशी ने कोई कोताही नहीं बरती और अपने पाठकों के लिए विधागत सीखचों के बंधन से मुक्त एक ‘मुक्त-सा गल्प’रच डाला.यह उन्मुक्तता ‘किस्सा कोताह’में छाई हुई है.मुक्त-सा इसलिए भी कि ‘किस्सों को कह...
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  June 2, 2013, 3:19 pm
आज के साहित्य में वसंत की पड़ताल की जाए तो निश्चित ही यह समझ बनती है कि कहीं साहित्य से उसका सम्बन्ध ऐतिहासिक तो नहीं था ! पारंपरिक साहित्य वसंत के आगमन की सूचना रस के आस्वादन के साथ देखता था और उसे मनुष्य के जीवन का एक ऐसा पर्व मानता था जिसमें वह अपने मनुष्यत्व की रक्षा ...
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  April 15, 2013, 7:52 pm
ज के साहित्य में वसंत की पड़ताल की जाए तो निश्चित ही यह समझ बनती है कि कहीं साहित्य से उसका सम्बन्ध ऐतिहासिक तो नहीं था ! पारंपरिक साहित्य वसंत के आगमन की सूचना रस के आस्वादन के साथ देखता था और उसे मनुष्य के जीवन का एक ऐसा पर्व मानता था जिसमें वह अपने मनुष्यत्व की रक्षा औ...
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  April 15, 2013, 7:52 pm
                                            मिथक : अर्थ और स्वरूपव्य से मिथक का घनिष्ठ सम्बन्ध है जो भारतवर्ष में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी माना जाता है. हिंदी में मिथक शब्द का प्रयोग आधुनिक काल में प्रारंभ हुआ जो सन 1950 के बाद नयी कविता में सृजन के एक विशिष्ट उपादान की तरह प्रयुक्त होने ...
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  March 10, 2013, 11:21 pm
                                            मिथक : अर्थ और स्वरूप        काव्य से मिथक का घनिष्ठ सम्बन्ध है जो भारतवर्ष में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी माना जाता है. हिंदी में मिथक शब्द का प्रयोग आधुनिक काल में प्रारंभ हुआ जो सन 1950 के बाद नयी कविता में सृजन के एक विशिष्ट उपादान की तरह प्रयु...
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  March 10, 2013, 11:21 pm
            आलोचना की शुरूआत भारतेन्दु से मानी जाती है तो बालकृष्ण भट्ट से और ‘प्रेमघन’से भी. ‘‘साधारणतः हिन्दी-विद्वानों की यह धारणा बनी हुई है कि प्रेमघनजी ही हिन्दी के सर्वप्रथम समालोचक हैं.’’1इसके अलावा वैचारिक घालमेल भी है. जिसमें एक तरफ तो यह कहा जाता है कि, ‘‘भारते...
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  October 7, 2012, 4:17 pm
लोचना की शुरूआत भारतेन्दु से मानी जाती है तो बालकृष्ण भट्ट से और ‘प्रेमघन’से भी. ‘‘साधारणतः हिन्दी-विद्वानों की यह धारणा बनी हुई है कि प्रेमघनजी ही हिन्दी के सर्वप्रथम समालोचक हैं.’’1इसके अलावा वैचारिक घालमेल भी है. जिसमें एक तरफ तो यह कहा जाता है कि, ‘‘भारतेन्दु बाब...
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  October 7, 2012, 4:17 pm
शहूर उत्तरउपनिवेशवादी चिंतक एडवर्ड सईद ने कई अन्य पाश्चात्य चिंतकों की तरह निर्वासन के शिकार या विस्थापित लेखकों और अपने मुल्क से दूर कर दिये गये नागरिक समूहों के बारे में विस्तार से लिखा है। अपने इसी सैद्धान्तिक चिंतन के बीच उन्होंने महमूद दरवेश और फ़ैज़ अहमद फ़ै...
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  July 6, 2012, 2:03 am
मशहूर उत्तरउपनिवेशवादी चिंतक एडवर्ड सईद ने कई अन्य पाश्चात्य चिंतकों की तरह निर्वासन के शिकार या विस्थापित लेखकों और अपने मुल्क से दूर कर दिये गये नागरिक समूहों के बारे में विस्तार से लिखा है। अपने इसी सैद्धान्तिक चिंतन के बीच उन्होंने महमूद दरवेश और फ़ैज़ अहमद फ़...
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  July 6, 2012, 2:03 am
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  June 7, 2012, 4:41 pm
शमशेर से मुलाक़ात उस समय हुर्इ थी जब वे दिल्ली विश्वविधालय की टयूटोरियल लाइब्रेरी बिलिडंग की पहली मंजि़ल पर एक कमरे में उर्दू विभाग की एक योजना के तहत 'उर्दू-हिंदी शब्दकोश' बनाने के काम के सिलसिले में रोज़ बैठते थे और मैं एम. ए. अंग्रेज़ी करने के दौरान और फिर एक सांध्य क...
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  May 6, 2012, 8:36 pm
मशेर से मुलाक़ात उस समय हुर्इ थी जब वे दिल्ली विश्वविधालय की टयूटोरियल लाइब्रेरी बिलिडंग की पहली मंजि़ल पर एक कमरे में उर्दू विभाग की एक योजना के तहत 'उर्दू-हिंदी शब्दकोश' बनाने के काम के सिलसिले में रोज़ बैठते थे और मैं एम. ए. अंग्रेज़ी करने के दौरान और फिर एक सांध्य का...
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  May 6, 2012, 8:36 pm
यदि हम अपने समय के उपलब्ध मीडिया उत्पादों पर नज़र डालें तो पायेंगे कि वे अधिक से अधिक व्यावसायिक लाभ कमाने, अधिक से अधिक लोकप्रिय होने और अत्यधिक सत्ता प्राप्त करने की प्रक्रिया में विकसित हुए हैं | बाज़ारवादी मीडिया व्यवस्था किसी भी कीमत पर इन तीन उद्देश्यों को प्रा...
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  April 11, 2012, 3:29 pm
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