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Blog: साहित्यालोचन

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ज बाज़ारवाद पर जो लोग अच्छी चर्चा कर रहे हैं वे स्त्रीवादी विमर्श के लोग हैं. बाजार का सबसे बड़ा असर व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन पर पड़ा है. इसने व्यक्तिगत भावनाओं, धार्मिक आस्थाओं और परम्परागत समाज के स्त्रियोचित-पुरुषोचित व्यवहार को लाभ के लिए भुनाया है. औरत की द... Read more
clicks 96 View   Vote 0 Like   4:35pm 3 Feb 2018 #
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"निराला"पुस्तक की भूमिका (द्वितीय संस्करण) में डॉ० रामविलास शर्मा लिखते है कि तब से लेकर अब तक देश और साहित्य में अनेक परिवर्तन हो चुके हैं। भारत अब उपनिवेश न रहकर अर्द्ध-उपनिवेश हो गया है। परंतु यह जर्जर सामंती ढांचा अब भी है। जिससे निराला साहित्य का घनिष्ट संबंध अब भी... Read more
clicks 178 View   Vote 0 Like   12:25pm 14 Jul 2016 #
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रचनाकार की दृष्टि यदि उनकी रचनाओं में समाहित हो तो रचनाकार का व्यक्तित्व वउनकी विशेषताओं को उजागर करने के लिए रचना से परे कम ही भटकना पड़ता है. तुलसीदास को 'लोकवादी'का विशेषण देने के लिए डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी अपनीपुस्तक 'लोकवादी तुलसीदास' में उनकी रचनाओं को ही आधार ... Read more
clicks 212 View   Vote 0 Like   2:52pm 16 Nov 2015 #
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ज बच्चे हमारे सबसे मूल्यवान प्राकृतिक संसाधन हैं। वे समाज और संसार के नियंता हैं। नियंता इस दृष्टि से कि उनके द्वारा उस समाज को आगे बढ़ाया जाना है जिसमें उनका पालन हो रहा है, जिसमे उनका बचपन गुज़र रहा है। मानव जीवन के सबसे स्वतंत्र और स्वच्छंद समय को देखा जाए तो निःसंदेह ... Read more
clicks 153 View   Vote 0 Like   7:58pm 24 Aug 2015 #
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रतीय इतिहास में मध्यकाल राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा सामाजिक सभी दृष्टि से महत्वपूर्ण था । एक और जहाँ इस्लामी संस्कृति भारतीय सामाजिक संरचना को प्रभावित कर रही थी तो वहीं इसकी पृष्ठभूमि में भक्ति आंदोलन का सूत्रपात भी होता है । साहित्येतिहास में इसे स्वर्णिम क... Read more
clicks 259 View   Vote 0 Like   2:59pm 18 Jan 2015 #
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दगाह पढ़ कर प्रायः पहला विस्मय हामिद के बारे में होता है। ऐसा बच्चा सचमुच का हो सकता है क्या। उम्र चार पांच साल। गरीब सूरत गरीब हालत। दादी का इकलौता अनाथ। अड़ोसियों पड़ोसियों की अभिभावकता में साथी बच्चों के साथ गांव से शहर तक पैदल चल कर जाता है , सारे दिन भूखा प्यासा मे... Read more
clicks 218 View   Vote 0 Like   11:35am 1 Sep 2014 #
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कविता हमारी सांस्कृतिक धरोहर है. हमारे अपने समय का ऐसा दस्तावेज़, जिसके माध्यम से कवि प्रतीकों में इतिहास दर्ज करता है. इतिहास को तो तथ्यात्मक होना चाहिए, लेकिन कविता के पास यह स्पेस है कि वह अधिक विवरणात्मक और काल्पनिक होकर भी प्रतीकों में अपने समय के यथार्थ को अभिव्... Read more
clicks 197 View   Vote 0 Like   12:15pm 18 Jun 2014 #नरेश
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विता हमारी सांस्कृतिक धरोहर है. हमारे अपने समय का ऐसा दस्तावेज़, जिसके माध्यम से कवि प्रतीकों में इतिहास दर्ज करता है. इतिहास को तो तथ्यात्मक होना चाहिए, लेकिन कविता के पास यह स्पेस है कि वह अधिक विवरणात्मक और काल्पनिक होकर भी प्रतीकों में अपने समय के यथार्थ को अभिव्य... Read more
clicks 107 View   Vote 0 Like   12:15pm 18 Jun 2014 #नरेश
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वजागरण कालीन साहित्यकारों,पत्रकारों और चिंतकों ने यूरोप से भारतीय संसर्ग में जिन सरोकारों पर विस्तार से विचार किया उसमें शिक्षा को पर्याप्त महत्व दिया है | यह स्वाभाविक भी था क्योंकि तुलनात्मकता की दृष्टि ने उस समय के चिंतकों का ध्यान आकृष्ट किया था जिससे शिक्षा के ... Read more
clicks 247 View   Vote 0 Like   11:26am 25 Jan 2014 #
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clicks 184 View   Vote 0 Like   7:48pm 19 Nov 2013 #
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लेरी जी ने कुल तीन कहानियां लिखीं और तीनो हीं प्रथम प्रेम की कहानियां हैं। 'सुखमय जीवन और 'बुद्धू का कांटा' की मनोभूमि चञ्चल और उत्फुल्ल है जबकि 'उसने कहा था' एक त्रासदी। इनमें तीसरी 'उसने कहा था' असंदिग्ध रूप से भाषा और विषयवस्तु के साथ व्यवहार, संरचना और गठन आदि को देखते ... Read more
clicks 211 View   Vote 0 Like   4:00pm 11 Oct 2013 #
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पन्यास सम्राट के नाम से सुप्रसिद्ध मुंशी प्रेमचन्द उर्दू का संस्कार लेकर हिन्दी में आए और हिन्दी के महान लेखक बने। उन्होंने हिन्दी को अपना खास मुहावरा और खुलापन दिया। कथा लेखन के क्षेत्र में उन्होंने युगान्तरकारी परिवर्तन किए। आम आदमी को उन्होंने अपनी रचनाओं का वि... Read more
clicks 198 View   Vote 0 Like   12:19pm 2 Jul 2013 #
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छले वर्ष फ़िल्मी गीतों की दुनिया में एक अभूतपूर्व विवाद जुड़ा जब ‘डी.के. बोस’ नाम के एक सज्जन को एक टीवी चैनल पर उनकी प्रतिक्रिया के लिए बैठा पाया | वे उस समय के एक प्रसिद्ध फिल्मी गीत ‘भाग-भाग डी के बोस’ से इतने प्रताड़ित हो चुके थे कि सीधे खबर का हिस्सा ही बना दिए गए | पत्... Read more
clicks 187 View   Vote 0 Like   5:58pm 26 Jun 2013 #
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‘क़िस्सा क्या है? कहानी का कच्चा माल’, कहानियों के इस कच्चे माल को बरतने में राजेश जोशी ने कोई कोताही नहीं बरती और अपने पाठकों के लिए विधागत सीखचों के बंधन से मुक्त एक ‘मुक्त-सा गल्प’रच डाला.यह उन्मुक्तता ‘किस्सा कोताह’में छाई हुई है.मुक्त-सा इसलिए भी कि ‘किस्सों को कह... Read more
clicks 201 View   Vote 0 Like   9:49am 2 Jun 2013 #
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आज के साहित्य में वसंत की पड़ताल की जाए तो निश्चित ही यह समझ बनती है कि कहीं साहित्य से उसका सम्बन्ध ऐतिहासिक तो नहीं था ! पारंपरिक साहित्य वसंत के आगमन की सूचना रस के आस्वादन के साथ देखता था और उसे मनुष्य के जीवन का एक ऐसा पर्व मानता था जिसमें वह अपने मनुष्यत्व की रक्षा ... Read more
clicks 225 View   Vote 0 Like   2:22pm 15 Apr 2013 #
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ज के साहित्य में वसंत की पड़ताल की जाए तो निश्चित ही यह समझ बनती है कि कहीं साहित्य से उसका सम्बन्ध ऐतिहासिक तो नहीं था ! पारंपरिक साहित्य वसंत के आगमन की सूचना रस के आस्वादन के साथ देखता था और उसे मनुष्य के जीवन का एक ऐसा पर्व मानता था जिसमें वह अपने मनुष्यत्व की रक्षा औ... Read more
clicks 148 View   Vote 0 Like   2:22pm 15 Apr 2013 #
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                                            मिथक : अर्थ और स्वरूपव्य से मिथक का घनिष्ठ सम्बन्ध है जो भारतवर्ष में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी माना जाता है. हिंदी में मिथक शब्द का प्रयोग आधुनिक काल में प्रारंभ हुआ जो सन 1950 के बाद नयी कविता में सृजन के एक विशिष्ट उपादान की तरह प्रयुक्त होने ... Read more
clicks 168 View   Vote 0 Like   5:51pm 10 Mar 2013 #
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                                            मिथक : अर्थ और स्वरूप        काव्य से मिथक का घनिष्ठ सम्बन्ध है जो भारतवर्ष में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी माना जाता है. हिंदी में मिथक शब्द का प्रयोग आधुनिक काल में प्रारंभ हुआ जो सन 1950 के बाद नयी कविता में सृजन के एक विशिष्ट उपादान की तरह प्रयु... Read more
clicks 203 View   Vote 0 Like   5:51pm 10 Mar 2013 #
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            आलोचना की शुरूआत भारतेन्दु से मानी जाती है तो बालकृष्ण भट्ट से और ‘प्रेमघन’से भी. ‘‘साधारणतः हिन्दी-विद्वानों की यह धारणा बनी हुई है कि प्रेमघनजी ही हिन्दी के सर्वप्रथम समालोचक हैं.’’1इसके अलावा वैचारिक घालमेल भी है. जिसमें एक तरफ तो यह कहा जाता है कि, ‘‘भारते... Read more
clicks 242 View   Vote 0 Like   10:47am 7 Oct 2012 #
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लोचना की शुरूआत भारतेन्दु से मानी जाती है तो बालकृष्ण भट्ट से और ‘प्रेमघन’से भी. ‘‘साधारणतः हिन्दी-विद्वानों की यह धारणा बनी हुई है कि प्रेमघनजी ही हिन्दी के सर्वप्रथम समालोचक हैं.’’1इसके अलावा वैचारिक घालमेल भी है. जिसमें एक तरफ तो यह कहा जाता है कि, ‘‘भारतेन्दु बाब... Read more
clicks 219 View   Vote 0 Like   10:47am 7 Oct 2012 #
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शहूर उत्तरउपनिवेशवादी चिंतक एडवर्ड सईद ने कई अन्य पाश्चात्य चिंतकों की तरह निर्वासन के शिकार या विस्थापित लेखकों और अपने मुल्क से दूर कर दिये गये नागरिक समूहों के बारे में विस्तार से लिखा है। अपने इसी सैद्धान्तिक चिंतन के बीच उन्होंने महमूद दरवेश और फ़ैज़ अहमद फ़ै... Read more
clicks 160 View   Vote 0 Like   8:33pm 5 Jul 2012 #
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मशहूर उत्तरउपनिवेशवादी चिंतक एडवर्ड सईद ने कई अन्य पाश्चात्य चिंतकों की तरह निर्वासन के शिकार या विस्थापित लेखकों और अपने मुल्क से दूर कर दिये गये नागरिक समूहों के बारे में विस्तार से लिखा है। अपने इसी सैद्धान्तिक चिंतन के बीच उन्होंने महमूद दरवेश और फ़ैज़ अहमद फ़... Read more
clicks 243 View   Vote 1 Like   8:33pm 5 Jul 2012 #
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शमशेर से मुलाक़ात उस समय हुर्इ थी जब वे दिल्ली विश्वविधालय की टयूटोरियल लाइब्रेरी बिलिडंग की पहली मंजि़ल पर एक कमरे में उर्दू विभाग की एक योजना के तहत 'उर्दू-हिंदी शब्दकोश' बनाने के काम के सिलसिले में रोज़ बैठते थे और मैं एम. ए. अंग्रेज़ी करने के दौरान और फिर एक सांध्य क... Read more
clicks 245 View   Vote 0 Like   3:06pm 6 May 2012 #
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मशेर से मुलाक़ात उस समय हुर्इ थी जब वे दिल्ली विश्वविधालय की टयूटोरियल लाइब्रेरी बिलिडंग की पहली मंजि़ल पर एक कमरे में उर्दू विभाग की एक योजना के तहत 'उर्दू-हिंदी शब्दकोश' बनाने के काम के सिलसिले में रोज़ बैठते थे और मैं एम. ए. अंग्रेज़ी करने के दौरान और फिर एक सांध्य का... Read more
clicks 179 View   Vote 0 Like   3:06pm 6 May 2012 #
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