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बिखरे आखर .

बारूद की स्याही से , नया इंकलाब लिखने बैठा हूं मैं , सियासतदानों , तुम्हारा ही तो हिसाब लिखने बैठा हूं मैं बहुत लिख लिया , शब्दों को सुंदर बना बना के , कसम से तुम्हारे लिए तो बहुत , खराब लिखने बैठा हूं मैं टलता ही रहा है अब तक , आमना सामना हमारा ,लेके सवालों की तुम्हारी सूची, जव...
बिखरे आखर ....
अजय कुमार झा
Tag :चंद पंक्तियां
  October 13, 2016, 11:01 am
                                        औरत : एक अंतहीन संघर्ष यात्रा एक प्रकाशित आलेख आलेख को पढने के लिए उस पर क्लिक करें , आलेख अलग खिड़की में खुल जाएगा ...
बिखरे आखर ....
अजय कुमार झा
Tag :प्रकाशित आलेख
  October 11, 2016, 4:33 pm
सुनो !आरुषी,प्रियदर्शनी ,निर्भया ,करुणा ,सुनो लड़कियोंतुम यूं न मरा करो ,हत्या कर दो ,या अंग भंग ,फुफकार उठो ,डसो ज़हर से,बन करैत,बेझिझक , बेधड़क ,प्रतिवाद , प्रतिकार ,प्रतिघात , करा करोसुनो !आरुषी,प्रियदर्शनी ,निर्भया ,करुणा ,सुनो लड़कियोंतुम यूं न मरा करो ,तुम मर जाती हो ,फिर मर ज...
बिखरे आखर ....
अजय कुमार झा
Tag :करुणा
  September 24, 2016, 11:12 am
एक संत थे | उनके कई शिष्य थे | जब उन्हें महसूस हुआ कि उनका अंतिम समय आ गया है तो उन्होंने अपने सभी शिष्यों को बुलाया | जब सभी शिष्य आ गए तो उन्होंने कहा ,"ज़रा मेरे मुंह के अन्दर ध्यान से देखकर बताओ कि अब कितने दांत शेष बचे रहे गए हैं |"बारी बारी से सभी शिष्यों ने संत का मुंह देखा...
बिखरे आखर ....
अजय कुमार झा
Tag :दांत
  October 3, 2015, 6:37 am
आज गाने दे मुझको , गीत मातृवंदना के ,मुहब्बत के नगमे, फिर कभी तुझको सुना देंगे ||उठ बढ़ा कदम अपनी हिम्मत और विशवास से  "वो"रुदाली हैं जो , रो रो के तुझको डरा देंगे ||उन्हें भरोसा है अपनी काबलियत पर इतना कि ,मरने देंगे पहले , जी उठने की फिर वो दवा देंगे ||आग लगाने की उनको आदत नहीं ह...
बिखरे आखर ....
अजय कुमार झा
Tag :दो पंक्तियाँ
  September 28, 2015, 5:04 pm
आजकल दिल्ली का मौसम अफ़लातून हुआ जा रहा है , यूं तो "दिल्ली मेरी जान".की तर्ज़ पे यहीं उत्ता मसाला तो तकरीबन रोज़ ही फ़ैला या फ़ैलाया जाता रहता है कि शाम को टेलिविजन पर बकर काटने के लिए बैठे तमाम तबेलेनुमा टीवी महाबहस में सबको कुछ न कुछ जुगाली के लिए तो मिल ही जाना चाहिए , और मिल ...
बिखरे आखर ....
अजय कुमार झा
Tag :कुछ यूं ही
  February 7, 2015, 5:46 pm
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बिखरे आखर ....
अजय कुमार झा
Tag :बिखरे आखर
  December 28, 2014, 3:46 pm
....... फ़ोटो खींचने और सहेज़ने की स्वाभाविक सी आदत कब शौक बन गई पता ही नहीं चला , अब उन सहेज़ी गई फ़ोटो को "शब्द-चित्रों"के रूप में प्रस्तुत करने का एक प्रयास किया है ................
बिखरे आखर ....
अजय कुमार झा
Tag :शब्द चित्र
  December 27, 2014, 9:34 am
तेरे ही रहे चर्चे पिछले दिनों , सुना बडा नाम हुआ है ,हथकंडे चलते रहे थे जहां ,अबकि फ़ैसला-ए-अवाम हुआ है ॥हर रोज़ लिखे जाते हों कानून के नए मसौदे जहां ,काट दे थानेदार चालान बीवी का , लोगों ने कहा बडा काम हुआ है ॥ सुनो व्हाट्सअप को ही दुनिया मानने समझने वालों ,आउटडेटेड होकर इन सब...
बिखरे आखर ....
अजय कुमार झा
Tag :बिखरे आखर
  September 17, 2014, 4:28 pm
हम जानते हैं तुम जिस देस के वासी हो ,उस देश को अर्से से इस खेल का चाव है ,दिल थाम के बैठना सामने चुनाव है ॥बडे भोले हो ओ बाउजी , फ़न्ने बने फ़िरते हो ,वो पपलू बनाए जा रहे हैं ,पप्पू सा स्वभाव है ,दिल थाम के बैठना सामने चुनाव है साला मुर्गा टंगा है उलटा अस्सी रुपए में,एक किलो टमाटर&...
बिखरे आखर ....
अजय कुमार झा
Tag :दिल
  April 23, 2014, 4:47 pm
किताबों में बनके रहे , सूखे हुए गुलाबों की तरह ,सिर्फ़ देखना , जो छूने की कोशिश की , टूट के बिखर जाएंगे ॥सिमटा रहने दे हमें , अपनी यादों के बंद एलबम में ,जो पलट के देखा तस्वीरों को , अश्क बनके आंखों में उतर जाएंगे॥एक तू, एक मैं ही नहीं , जिस पर समय ने ढाए सितम ,तुझे ये लगा ही क्यूं , ...
बिखरे आखर ....
अजय कुमार झा
Tag :कुछ यूं ही
  March 2, 2014, 12:03 pm
जब भी ग्राम प्रवास पर निकलता हूं तो मेरी सबसे बडी कोशिश ये होती है कि पत्थरों के इन जंगल से निकल कर प्रकृति के करीब से होकर गुजरती जिंदगी के एक एक लम्हे को यादों में कैद करके सहेज़ लिया जाए , क्या पता कल होकर जिंदगी रहे न रहे , ये प्रकृति वैसी रहे न रहे ..यादें तो हमेशा ही शाश्...
बिखरे आखर ....
अजय कुमार झा
Tag :ग्राम यात्रा
  February 22, 2014, 8:22 pm
"पर्सन पॉलिटिक्स"टार्गेट है , तभी वो हो जाते हैं जरा , पर्सनल ,इतनी भी क्या तंगदिली साहेब, थोडा नज़रिया तो वाईड किया जाए .यूं तो "सपोर्ट"  और "सिस्टम"दोनों ही है मर्डर पर उतारू उनके ,मगर चाहत ये कि मफ़लर गले में लटका के हाकिम खुद "आप"ही सुसाईड किया जाए.तू भी गलत और तू भी गलत , सिर्...
बिखरे आखर ....
अजय कुमार झा
Tag :
  January 28, 2014, 6:24 pm
कभी नहीं चली है ,मुद्दों की सियासत इस देश में ,चलो इक दूजे पर लगाएं कोई नया सा इल्ज़ाम फ़िर ॥ .क्यूं खिलाफ़ किया जाए किसी को, किसी का अच्छा बोलकर,देखो जरा ऊंची गर्दन किसी की ,उसे फ़ौरन करो बदनाम फ़िर॥ .उन्हें बंदूक और बारूद की भाषा है मालूम ,बस जिन्हें ,तुम पता नहीं क्यूं हर बार भे...
बिखरे आखर ....
अजय कुमार झा
Tag :बिखरे आखर
  November 24, 2013, 7:24 pm
उसे नफ़े नुकसान की फ़िक्र नहीं बिल्कुल भी ,उसका सपने बेचने का ,सालों का कारोबार है ॥.हम फ़ूंक डालते हैं , खुद बस्तियों को अपनी ,बस एक अदद झूठी अफ़वाह की दरकार है ॥.तुम देश दुनिया मंगल करने के देखते हो सपने ,अगला बेबस है इतना , टमाटर प्याज़ से भी लाचार है ॥.राशन, रोज़गार की हालत में प...
बिखरे आखर ....
अजय कुमार झा
Tag :चंद पंक्तियां
  November 14, 2013, 6:37 pm
मत कर औकात की बात तू हाकिम , जब इत्ता सा सच सुनने का भी ,तुझमें माद्दा नहीं है ,"रेत की तलवार से" लडने चला है ,अडिग चट्टान से , दिन तेरे पास अब ज्यादा नहीं है ॥***********************अबे छोडो हाकिम, साला ,पिद्दी के शोरबे सा पडोसी , तो तुमसे ठोका ना जाए ,फ़िर ऐसा ही है तुम्हारी हिम्मत तो ,हमें भी ख...
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अजय कुमार झा
Tag :कुछ ख्याल
  August 10, 2013, 10:13 am
.............. जिंदगी !यूं तो हर सुबह किया तेरा इस्तकबालऔर हर शाम तुझको ही आदाब अर्ज़ किया है,मगर मौत इल्ज़ाम न लगा दे बेवफ़ाई का हमपे ,नाम-पता अपना ,दीवारों पे इसलिए तो दर्ज़ किया है ,***************************पूछ सवाल , तू पूछती जा जिंदगी , बताऊं तो किसके लिए ,न जिंदगी बचे न सवाल कोई अब , बचाऊं तो किसके ...
बिखरे आखर ....
अजय कुमार झा
Tag :कुछ शब्द
  June 5, 2013, 6:30 am
तुम,उन सपनों के,कतरों को,संभाल के रखना यार ,मुझे यकीन है,इक दिन ,बहुत याद आएंगे वे,खुली आंखों से ...ताउम्र तुम्हें,रात भर नींद कहां आएगी ......................................******************ये आखें ,बडी जीवट होती हैं ,जागती हैं तो ,होती है ,मंज़िलों पर नज़र ,और सोती हैं तो,नींद में ,मंज़िलों से भी,ऊंचे ख्वाब देख ...
बिखरे आखर ....
अजय कुमार झा
Tag :बिखरे आखर
  April 20, 2013, 9:57 pm
सब ठीक है खौफ़नाक है मंज़र क्यूं , आज मेरे शहर का , वो कहते हैं , ठीक है , मगर इस देश की हालत ठीक नहीं है ॥जंगलों में भी कहां दिखती है ऐसी हैवानियत अब,खुद की नस्ल का शिकार करता , ये आदमजात ठीक नहीं है ॥हर बार निपटने का वादा और अब न होने देने की बातें ,हर बार कुछ हो जाने पर यही कहते हो ...
बिखरे आखर ....
अजय कुमार झा
Tag :ठीक नहीं है
  March 31, 2013, 4:22 pm

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बिखरे आखर ....
अजय कुमार झा
Tag :
  March 31, 2013, 4:01 pm
उन्हें शक है कि उजले , चमकीले ,शहरों में ,शायद कभी कोई नहीं रोता कह दो है वो, इतना है हर रात ,रोता , पता चल गया होता कबका जो ,तुमने चख लिया कहीं होता  शहर में आंसुओं का स्वाद , अब नमकीन नहीं होता हर दरख्त की जड मिट्टी में होती है , हर पेड की मंज़िल आसमां हो बेशक ,लकडी का कोई टुकडा बन...
बिखरे आखर ....
अजय कुमार झा
Tag :हिंदी पंक्तियां
  June 28, 2012, 7:08 pm
चित्र , गूगल इमेज खोज इंजन के परिणाम से , साभार ये न पूछ मुझसे कि ये आज मुझे हुआ क्या है ,जो ज़िंदगी ही मर्ज़ है तो बता इसकी दवा क्या हैपत्थर के इस शहर में जाने हर ईंट क्यूं पराई हैधधक रहा है कुछ भीतर , किसने ये आग लगाई हैचल माना दस्तूर अदला बदली का है , द्स्तूर निभाया ही जाए जरूर...
बिखरे आखर ....
अजय कुमार झा
Tag :बिखरे आखर
  June 18, 2012, 8:46 pm
दौडती हुई ट्रेन की खिडकी से , मोबाइल द्वारा खींची गई एक फ़ोटो छुट्टी का दिन , सुहाना मौसम , सो आन पडी इक दुविधा ,कंप्यूटर तोडें खट खटाखट , या धूप में पढें कहानी कविता ..अलसाई , अल्हड और चमकीली सी उग आई है भोर ,फ़ागुन मास होवे मदमस्त ,किंतु इहां तो चले है चिल्ड हवा घनघोर जेटली चचा ...
बिखरे आखर ....
अजय कुमार झा
Tag :होली
  February 26, 2012, 8:44 am
गूगल सर्च इंजन द्वारा लिया गया चित्र , साभार छोटी सी झपकी भी नींद बडी लगती है , हाय कि अब तो सपने भी नहीं आते ,जिंदगी ने दायरा इतना कर दिया छोटा , अपने इस दायरे में कई अपने भी नहीं आते . सुनो , जो अब भी न बोले तो , कल सोचेगा ये कि , आज क्यूं ,हम मौन हैं ,लोकतंतर माने भारत है यदि , और जो...
बिखरे आखर ....
अजय कुमार झा
Tag :रद्दी की टोकरी
  February 12, 2012, 7:51 am
बिखरे आखर ट्विटर सेंसर को तैयार , गूगल ने किया इनकार ,उपयोग दुन्नो का अईसा करें , रहे टेंसन में सरकार मेरे इर्द गिर्द रहकर , तुम जो यूं , अपना ये वक्त बर्बाद करोगे ,मुहब्बत हो जाएगी मुझसे , मेरे जाने के बाद ,बहुत याद करोगे छन्नो मलिक भी स्वयंवर रचाने को हो गईं तैयार ,रखिया ,लल...
बिखरे आखर ....
अजय कुमार झा
Tag :बिखरे आखर
  February 2, 2012, 10:43 pm
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