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Blog: कवितावली

Blogger: swati
सुबह की पहली बसअक्सर छूट जाती है क्षणिक दूरी सेसांस सांस संभाले हुए देखूंबर्फ का विस्तार.  तुम्हारीपतली बाँहों की ओरन पुनारागन न पुनरावृति किन्तु लौट लौट कर आता है मन.इस जाड़े भीस्नो शू पर बनती हैं बेढब आकृतियां  उनमें दिख जाता हैउदास चेहरास्मृति से भरा हुआ.मेरे कच... Read more
clicks 145 View   Vote 0 Like   1:26am 13 Oct 2014 #
Blogger: swati
किसी ने नहीं कहा भद्र पुरुष कहाँ जाते हो तुम प्रिय को तज कर. मोक्ष किस जगह, किस विध किन्तु एक परछाई तो बाँध जाते सिरहाने. एक अंतिम विदा कहने आना लौट कर, बस एक बार. ... Read more
clicks 152 View   Vote 0 Like   3:21pm 6 Sep 2013 #
Blogger: swati
मैं अब अकेले चल नहीं पाती तुम्हें अपना हाथ थामते इतना सोचा है मैंने तुम्हारा परोक्ष होना इक ताबीज़ सा खुला है मेरे गले के ओर और जब सोचती हूँ कि इन गर्मियों में तुम्हारे नाम की है ठंडी मन्नतें और आधा साल बीत चुका है मैं बटोरने लगती हूँ फिर पुरानी प्रार्थनाओं के पंख ढह... Read more
clicks 235 View   Vote 0 Like   8:45pm 1 Jul 2013 #
Blogger: swati
मैं नाचती हूँ ,अपनी नदी से मृत काठ को बहा देने के लिए मैं नाचती हूँ ,उन्मादपूर्ण होकर पृथ्वी की आग को अपना घूमर देने के लिए मैं भर लेती हूँ देह की चाबियों में लचक अपनी और जब तुम गाते हो मेरे लिए मैं शांत होकर खोल देती हूँ ताले सारे रात भर दौड़ते हैं तुम्हारे साथ के सपने !... Read more
clicks 175 View   Vote 0 Like   8:42pm 1 Jul 2013 #
Blogger: swati
मेरा हर सूखा पत्ताजैसे बारिशें पी जाएउस नशे का आभास हो तुम ...मेरा हर सिकंदर शब्दजहाँ हार मान जाएउस उच्छवास की सांस हो तुम…... Read more
clicks 178 View   Vote 0 Like   8:41pm 1 Jul 2013 #
Blogger: swati
कुछ कांसे के रंग के थे छालेएक निरर्थक हीरा उँगलियों का नील छिपाता हुआमैंने सरका लिए सफ़ेद पन्ने खुद तकज़ख्म खुलते रहे बंद कमरों मेंएक घर बाकी था नसों में मेरीकुछ कम पड़े कोयले पैरों के नीचेतूने बिना किसी इश्वर की कुल्हाड़ीबना दी ये सड़क मुझ तकतुम लिख रहे हो मिटे हुए अ... Read more
clicks 159 View   Vote 0 Like   3:07pm 28 Jun 2013 #
Blogger: swati
तुम्हारे ही पानी में खोये हैं मेरी राह के पत्थरतुम्हारे ही पानी में है नक्शा मेरे भावी काअपनी नमी पर यकीन रखना !कि मैं पानी बन कर लौट रहीं हूँ ..मैं ...तुम्हारे नीचे ,तुम्हारे पीछे ,मैं ही हूँ तुम्हारे पानी की नीली मछलीमैं ही हूँ तुम्हारे पानी में गोते लगाती लहरवहीँ हूँ मै... Read more
clicks 232 View   Vote 0 Like   3:06pm 28 Jun 2013 #
Blogger: swati
तुम्हारे शब्दों के बीच होती है सड़केंमैं बसा लेती हूँ शहर पूराउन शहरों में होते हैं तुम्हारे सामीप्य से भरे घरतुम्हारे शब्दों के बीच होती हैं नौकाएँमैं बाँध लेती हूँ नदी पूरीउन नदियों में होती है रवानगी तुम तक पहुँच आने कीतुम्हारे शब्दों के बीच होती हैं सीढियाँमैं ... Read more
clicks 211 View   Vote 0 Like   5:10pm 24 Jun 2013 #
Blogger: swati
जिन्हें कभी छुओगे तुम ,उन सारी चूड़ियों को इकठ्ठा किया है मैंनेचूर कर खुशबू मैंने लीप लिया है कच्ची मिटटी का आँगनउनकी मणियाँ पिरो दी है चाँद की बालियों मेंऔर अब इन चूड़ियों में उलझेंगी जब उंगलियाँ तुम्हारीआँगन में पैरेगी रस वाली स्वर्ण-सोनजूहीचाँद का चमकेगा प्रेम-ल... Read more
clicks 191 View   Vote 0 Like   5:08pm 24 Jun 2013 #
Blogger: swati
अँधेरी रातों की अंधड़ बारिशें मैं आरज़ुओं की सड़क पर भीगती रही घर लौटने के लिए गिनती रही रुमाल में रखे दो सिक्के मैं काँपती ठंडी साँसों से बनाती रही बादलों के लच्छे तुम सहसा ओढ़ा गए महकते होंठों की शाल मुझ पर बची रही तुम्हारी मनपसंद चिपचिपाहट देर तक ! मैं खो गयी तुम्ह... Read more
clicks 202 View   Vote 0 Like   5:07pm 24 Jun 2013 #
Blogger: swati
कुछ फाँस सी धूप की… कुछ उमस के तिनके चुभते हैं ,भर जाते हैं बालों में मैं पीछे मुड़ कर नहीं देखना चाहती वो रूखी दुपहरी जहाँ मैं गिरी थी मैं गीली ज़मीं पीती हूँ मेरे पेड़ की हर फुनगी टूटी विक्षत सी सरकती है मेरे ही जड़ों के पास मैं फूँक कर उड़ा देती हूँ सारे पीले पल मैं ग... Read more
clicks 197 View   Vote 0 Like   5:05pm 24 Jun 2013 #
Blogger: swati
तेरे समंदर किनारे लहरों की ठंडी आग में जब पक जाती है रात तुम उनमें मेरी थाली परसना धीरे से खोलना तारों का डब्बा और चांदी की बरक वाला इक टुकड़ा चखना मैं घुल जाऊँगी ज़बां पर तेरी तू रात मेरी सुलगाये रखना ..... Read more
clicks 169 View   Vote 0 Like   1:31pm 23 Jun 2013 #
Blogger: swati
अध-ब्याही धूप कितने सुबहों से कैद खिली है इक पेड़ की छाया में.......आधी इक रात बिछी है बिस्तर पर मेरे तेरी चादर से दूर ........तू आधा वहाँ सोना मैं आधा यहाँ इक पूरी नींद बुनने को बहुत रेशे हैं प्यार केएक गर्म सा सपना सेंकेथाली दो रूहों की परसेंतेरी भूख से सने मैं बना दूँ निवाले... Read more
clicks 210 View   Vote 0 Like   1:40pm 16 Jun 2013 #
Blogger: swati
प्राकृतिक होना ही मेरा धार्मिक होना हैकि बहुत मुश्किल है प्राकृतिक होनामानो घर के अन्दर अपनी ही प्रकृति के साथ होनाजब जब कोशिश करती हूँ खुद से बाहर आने कीखुद से परे को पकड़ लेने कीमैं कुछ नहीं छू पातीमिडास के हाथों का स्वर्ण-शाप लगता है रूह कोऔर मैं टालने लगती हूँ पुक... Read more
clicks 190 View   Vote 0 Like   1:38pm 16 Jun 2013 #
Blogger: swati
मैं ले जा रही हूँ चादर इस रात की तुम छोड़ जाओ समेटी हुई सलवटें ना मैं बनी हूँ प्रेम के चमकीले रास्तों के लिए ना तुम्हें आदत है पथरीले राहों पर चलने की एक अँधेरे की कोख में पलती हुई चाहनायें तुम से ,तुम तक का प्रसव लिए मैं भर दुपहरी फिरती रही लादे हुए लालसाओं का गर्भ अभिश... Read more
clicks 174 View   Vote 0 Like   1:37pm 16 Jun 2013 #
Blogger: swati
जब मैं प्रेम करती हूँ मैंने देखा है ...वो सारे हुनर जिनकी मैं अनुरागी रही हूँ एक गुच्छे में बंध कर गोद में आ गिरते हैं मेरी उँगलियों में भर जाती हैं तुम्हारे होठों के गीली अंगूठियाँ कैनवस से उठती है गेहूँ की मादक महक और मैं बन जाती हूँ एक सुघड़ चित्रकार जब तुम प्रेम क... Read more
clicks 209 View   Vote 0 Like   6:35pm 7 Jun 2013 #
Blogger: swati
इक तुम ही नहीं पास आता है बाकी सब पास आता विरोध रेल की पटरियों सा दूर दूर तक फैला असामंजस्य शाम को होने वाली उदासियाँ देह में कैद नदियाँ तुम इतनी दूर हो मैं पिछड़ जाती हूँ नजदीकियों सेउत्तेजना सेआवेग सेदेह की कीलों पर छिल जाने सेमैं चिट्ठियों से खो बैठती हूँ संदेसेअ... Read more
clicks 244 View   Vote 0 Like   9:48pm 4 Jun 2013 #
Blogger: swati
हरसिंगार से भरी थाली और उनपर गीले बालों से रिसता पानी मैं कान्हा को देने से पहले रूठती हूँ वो निस्तब्ध निर्निमेष देखता है मैं छिपा देना चाहती हूँ बंसी उसकी कहती हूँ बैठो साथ ,बताओ कहाँ छिपाया है प्रणय मेरा  और प्रेमाभाव का आरोप उस पर थोप देती हूँ वो छोड़ देता है बंसी ... Read more
clicks 199 View   Vote 0 Like   11:35pm 1 Jun 2013 #
Blogger: swati
हर शाम मुझे क्या उत्साह अपने पास बुला रहा है ?जब देखती हूँ पत्तियों को ताली बजाते हुए हवाओं के लिए तब चुपके से कानों में उम्र का क्या भाग्य पढ रहा है ?गिरती हुई बिजली मेरे रूह का कौन सा गीत गा रही है ?किन देवताओं ने जला दिए हैं पवित्र संयम वाले पौधे दिल की गुफाओं में ?नहीं ,न... Read more
clicks 217 View   Vote 0 Like   7:48pm 31 May 2013 #
Blogger: swati
आकाश बरस रहा है बूंदों के पैरों की नीचे दब रही है ज़मीं हालांकि नील के निशान नहीं है पर तुम जानते थे तुम ये भी जानते थे कि मैं घायल हूँ तुम समझाते रहे कि कैसे कैद की झिझक से गिरफ्त हूँ मैं मैं समझाती रही कि क्यूँ मैं उड़ान नहीं भर पाऊँगी और जैसे जैसे ठण्ड बढती गयी मैं सु... Read more
clicks 186 View   Vote 0 Like   7:44pm 31 May 2013 #
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तुम समझ पाओगे इक दिनजो मैं कभी नहीं कहूँगीमैं कितनी अलग होकर जुड़ी हूँ तुमसेकिसी तस्वीर और उसके पीछे के हिस्से की तरहतुम्ही से विपरीत और तुम्ही से सार्थकतुम समझ पाओगे शायद उस दिनजब हम किसी सौम्य सुबह में बैठे होंगे किसी कला संग्रहालय के अन्दरऔर बुरे मौसम के बनावटी ब... Read more
clicks 211 View   Vote 0 Like   10:37pm 29 May 2013 #
Blogger: swati
मैं पढ़कर कहानी इक समंदर की किताब रख लेती हूँ गोद में इक तूफ़ान उठता है जड़े हुए शब्दों से यादों का बवंडर बढ़ता है…. मैं भरसक खींचती हूँ इक नाव उनमे भरी हुई थी मीठी आँखें ,नाव की पाल की रस्सी लेकिन छेद देती है हथेलियों की नसें मेरी ....ना जाने कितना बर्फीला पानी उलीचना है... Read more
clicks 188 View   Vote 0 Like   10:25pm 29 May 2013 #
Blogger: swati
घंटों बारिश होती रही...मैं घंटो टिप-टिप रिसती रही तेरी शिकन देख कर माथे से सरकी बूंदें तेरी उपेक्षा देख कर गालो से सरकी बूंदें तेरी बेरुखी देख कर धड़कन से सरकी बूंदें तेरी मरज़ी देखी .....और मैंने जाने दी सारी बूंदें.......... Read more
clicks 178 View   Vote 0 Like   10:24pm 29 May 2013 #
Blogger: swati
नींद की सिल्ली से आग जलाये मैंने देग चढ़ाई सुबहों की भात सपनो का रांधा दिन भर फिर राख बुझाई रातो की... Read more
clicks 217 View   Vote 0 Like   8:16pm 28 May 2013 #
Blogger: swati
मासूम उँगलियों सेमैं शाम ढले उतारती हूँ सूरजकुछ मिट्टी बुहार देती हूँ अंधेरे कीसुबह की देह पर खामोशी सेइक राहगीर के हाथोंनसीब ने भिजवाई है कहानी मेरीमैं पढ़ कर आधी किताबलौट गयी हूँ कब्र में सोने फिर से... Read more
clicks 207 View   Vote 0 Like   8:14pm 28 May 2013 #
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