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Blog: बेमक़सद

Blogger: AJAY GARG
जाने-माने हॉलीवुड डायरेक्टर अल्फ्रेड हिचकॉक ने एक बेहद पते की बात कही थी। वो ये कि एक कामयाब फिल्म बनाने के लिए केवल तीन चीजों की जरूरत है- स्क्रिप्ट, स्क्रिप्ट, और स्क्रिप्ट। अगर इशारा समझ रहे तो ठीक है... और अगर नहीं तो बताए देता हूं। फिल्म बनाने की कला के नजरिये से देखे... Read more
clicks 137 View   Vote 0 Like   11:44am 8 May 2015 #
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अभी कुछ देर पहले दिबाकर बनर्जी की फिल्म ‘डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी’देखकर लौटा हूं और लगातार दिमाग की उलझनें सुलझाने में व्यस्त हूं। ये उलझनें तभी बनना शुरू हो गई थीं जब मैं सिनेमाहॉल में बैठा फिल्म देख रहा था। दिबाकर का ये जासूस किरदार बेशक अपने दिमाग की ग्रे सेल्स क... Read more
clicks 65 View   Vote 0 Like   9:58am 3 Apr 2015 #Film Review
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अभी कुछ देर पहले दिबाकर बनर्जी की फिल्म ‘डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी’देखकर लौटा हूं और लगातार दिमाग की उलझनें सुलझाने में व्यस्त हूं। ये उलझनें तभी बनना शुरू हो गई थीं जब मैं सिनेमाहॉल में बैठा फिल्म देख रहा था। दिबाकर का ये जासूस किरदार बेशक अपने दिमाग की ग्रे सेल्स क... Read more
clicks 126 View   Vote 0 Like   9:58am 3 Apr 2015 #
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“ज़िंदगी में हम कितना भी भटक लें, शारीरिक ज़रूरतें पूरी करने के पीछे कितना भी लगे रहें, लेकिन आख़िरकार हमारे लिए जो सवाल मायने रखेगा, वो यह कि क्या कोई ऐसा इन्सान है हमारी ज़िंदगी में जो हमसे वाकई प्यार करता है... एक ऐसा साथी जिस पर हम इतना भरोसा कर सकें कि हमें कभी झूठ का ल... Read more
clicks 115 View   Vote 0 Like   12:33pm 20 Mar 2015 #
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वरुण धवन की मुख्य भूमिका वाली नई फिल्म ‘बदलापुर’की टैगलाइन है- ‘डोन्ट मिस द बिगनिंग’। यानी, इसकी शुरुआत देखने से मत चूक जाइएगा। फिल्म देखने के बाद इस टैगलाइन का मकसद शीशे की तरह साफ हो जाता है, क्योंकि शुरुआती दृश्यों के बाद फिल्म में कुछ भी तर्कसंगत नहीं है। फिल्म धीम... Read more
clicks 96 View   Vote 0 Like   12:26pm 20 Mar 2015 #
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वरुण धवन की मुख्य भूमिका वाली नई फिल्म ‘बदलापुर’की टैगलाइन है- ‘डोन्ट मिस द बिगनिंग’। यानी, इसकी शुरुआत देखने से मत चूक जाइएगा। फिल्म देखने के बाद इस टैगलाइन का मकसद शीशे की तरह साफ हो जाता है, क्योंकि शुरुआती दृश्यों के बाद फिल्म में कुछ भी तर्कसंगत नहीं है। फिल्म धीम... Read more
clicks 76 View   Vote 0 Like   12:26pm 20 Mar 2015 #Film Review
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फिल्मकार आर. बाल्की की जादुई पोटली एक बार फिर खुली है, और इस बार इसमें से पूरी शानो-शौकत तथा ढोल-धमाके के साथ निकली है‘शमिताभ’। ‘शमिताभ’में डबल डोज़ है;यह दानिश और अमिताभ का संगम के तौर पर सामने आती है। डबल डोज़, यानी डबल मज़ा। लेकिन यहां मज़ा कई गुणा है। अब आप पूछेंगे कि ... Read more
clicks 120 View   Vote 0 Like   11:32am 6 Feb 2015 #
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फिल्मकार आर. बाल्की की जादुई पोटली एक बार फिर खुली है, और इस बार इसमें से पूरी शानो-शौकत तथा ढोल-धमाके के साथ निकली है‘शमिताभ’। ‘शमिताभ’में डबल डोज़ है;यह दानिश और अमिताभ का संगम के तौर पर सामने आती है। डबल डोज़, यानी डबल मज़ा। लेकिन यहां मज़ा कई गुणा है। अब आप पूछेंगे कि ... Read more
clicks 74 View   Vote 0 Like   11:32am 6 Feb 2015 #Film Review
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आखिर किसने की आयशा महाजन की हत्या?फिल्म ‘रहस्य’की कहानी इसी सवाल की धुरी पर घूमती है। टीनएजर आयशा के माता-पिता डॉक्टर हैं। शक की पहली सुई पिता की तरफ घूमती है और केस आखिरकार सीबीआई के पास चला जाता है।क्या कहानी कुछ-कुछ नोएडा के सात साल पुराने आरुषि मर्डर केस जैसी लग रही... Read more
clicks 100 View   Vote 0 Like   4:43pm 30 Jan 2015 #
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अगर ‘हवाईजादा’के शुरुआती कुछ पलों में इसके शानदार सेट को देखकर आप मंत्रमुग्ध रह जाते हैं और बड़ी उम्मीदें बांध लेते हैं तो इसे आपकी ही गलती माना जाएगा, क्योंकि कुछ देर बाद आपका ऊब के समंदर में गोते लगाना और बार-बार झुंझलाहट से दो-चार होना तय है। पहले पौने घंटे तक आपको च... Read more
clicks 98 View   Vote 0 Like   4:30pm 30 Jan 2015 #
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फिल्मकार नीरज पांडेय की पहली दो फिल्मों ‘ए वेन्सडे’और ‘स्पेशल 26’ने एक तरह से ऐलान कर दिया था कि नीरज ऐसे थ्रिलर बनाना पसंद करते हैं जिनमें देशप्रेम के जज्बे का समावेश हो और जो बहुत हद तक वास्तविक लगें। लेकिन क्या उस वास्तविकता को अचूक ढंग से पेश करने के लिए नीरज रिसर्च... Read more
clicks 122 View   Vote 0 Like   9:58am 23 Jan 2015 #
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केवल चार साल बीते हैं जब इमेजिन टीवी पर अजित अंजुम का सीरियल ‘लुटेरी दुल्हन’आया करता था। कोई पांच महीने चलने वाले इस सीरियल में एक ठग परिवार गोद ली हुई बेटी बिल्लो से लोगों की शादी करवाता था और बिल्लो अगले दिन सारा माल-असबाब लेकर चंपत हो जाती थी। यह शो उत्तर भारत की कुछ ... Read more
clicks 139 View   Vote 0 Like   9:45am 23 Jan 2015 #
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पल-पल आते नए मोड़,कसी हुई पटकथा,महज छह किरदारों के आसपास घूमती कहानी,लगातार बनी हुई दिलचस्पी और शानदार अदाकारी... फिल्म 'शराफत गई तेल लेने'के बारे में कुछ बताने के लिए इतना काफी है। जिस तरह से इस फिल्म बारे में कम बात हुई, उसके मद्देनजर निर्देशक गुरमीत सिंह की यह फिल्म किस... Read more
clicks 141 View   Vote 0 Like   9:34am 23 Jan 2015 #
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अगर आपने लंबे समय से जी भरके उबासियां नहीं ली हैं तो पेश है ‘क्रेजी कुक्कड़ फैमिली’। इस फैमिली में क्रेजी कौन?क्रेजी हैं एक इस्टेट के मालिक मिस्टर बेरी की वो चार औलादें जो सिर्फ उनके मरने के इंतजार में हैं, ताकि बाप की जायदाद हाथ लग सके। बाप कोमा में है। वो पहले भी कोमा म... Read more
clicks 124 View   Vote 0 Like   9:31am 23 Jan 2015 #
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पश्चिमी उत्तर प्रदेश का इलाका, सियासी रंग में रंगा माहौल, सियासतदान के खासमखास लोगों की दंबगई, जब चाहे खूनखराबा करना, कोई कानून-व्यवस्था नहीं, दबंगों के तलवे चाटने वाले पुलिसवाले, खूबसूरत लड़की, विलेन का लड़की को देखते ही आसक्त हो जाना, शादी के लिए जबरदस्ती राजी करने की... Read more
clicks 140 View   Vote 0 Like   9:29am 9 Jan 2015 #
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क्या आप टेलीविजन पर ‘क्राइम पैट्रोल’ या ‘सावधान इंडिया’ जैसे कार्यक्रम देखते और पसंद करते हैं? जवाब अगर हां में है तो फिर अनुराग कश्यप की ताजातरीन पेशकश ‘अगली’ भी आपको पसंद आएगी। ‘अगली’ कुछ सच्ची घटनाओं एवं अनुभवों का मिश्रण है (इसका दावा फिल्म शुरू होने पर किय... Read more
clicks 128 View   Vote 0 Like   3:57pm 26 Dec 2014 #
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ज्ञानी लोग कहते हैं कि जब मौत सिर मंडरा रही हो तब इन्सान को ज़िंदगी के असल मायने समझ आते हैं, कितनी ही चीज़ें उसे बेमानी लगने लगती हैं और जीवन भर किए अपने ग़लत कामों पर उसे पछतावा महसूस होता है। इन्सान भ्रम के कितने भी चश्मे लगाए चलता रहे, मरते वक़्त उसके सामने सारी तस्वी... Read more
clicks 200 View   Vote 0 Like   4:18am 14 Sep 2013 #
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यह फ़िल्म देखने का मन बनाने से पहले कृपया ये तीन चेतावनियां ज़रूर पढ़ लें... यह परिवार के साथ देखे जाने वाली फ़िल्म कतई नहीं है। ऐसा न हो कि आप इस चेतावनी को नज़रअंदाज़ करते हुए परिवार को अपने साथ सिनेमा हॉल में ले जाएं और फिर पहले दो-चार मिनट में ही अपने अगल-बगल बैठे प... Read more
clicks 174 View   Vote 0 Like   6:39pm 13 Sep 2013 #
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आप एक अच्छी मनोरंजक फ़िल्म बनाते हैं तो फिर चालीस बरस पुरानी किसी हिट फ़िल्म के नाम का सहारा लेने की ज़रूरत कहां रह जाती है! क्यों एक फ़िल्मकार चाहता है कि उसकी रचना के हर कोण हर दृश्य को पुरानी फ़िल्म से तुलना करते हुए देखा जाए। ...और वह भी तब, जब उस पुरानी फ़िल्म की कहानी ... Read more
clicks 186 View   Vote 0 Like   2:54am 7 Sep 2013 #
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क्रांति तब होती है जब अति हो जाए;भीतर उबल रही भावनाएं जनाक्रोश की शक्ल में तब बाहर आती हैं जब कोई एक व्यक्ति पहला कदम बढ़ाए। यह ऐतिहासिक सत्य है कि नेतृत्व के बिना कारवां नहीं बनता...चाहे रास्ता सत्य का ही क्यों न हो, क़दम बढ़ाने वालों का मंज़िल पर अधिकार कितना भी क्यों न ... Read more
clicks 199 View   Vote 0 Like   2:48pm 31 Aug 2013 #
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‘मद्रास कैफ़े’ के रिलीज़ से पहले इसके निर्देशक शुजित सरकार बार-बार कह रहे थे कि वास्तविकता के जितना क़रीब उनकी यह फ़िल्म लगेगी उतना हिंदी सिनेमा की इससे पहले शायद ही कोई स्पाई-पॉलिटिकल थ्रिलर फ़िल्म लगी होगी। ...और अब जब फ़िल्म परदे पर सबके सामने है तो इसे देखते समय शुज... Read more
clicks 218 View   Vote 0 Like   6:16am 24 Aug 2013 #
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जब दर्शक एक दमदार फ़िल्म देख चुका हो, तो उसकी अगली कड़ी से उसकी अपेक्षाएं बेहद बढ़ी हुई रहती हैं। इस वजह से फ़िल्मकार पर ज़िम्मेदारी भी यक़ीनन ज़्यादा हो जाती है। लेकिन इस ज़िम्मेदारी का निर्वहन करते वक़्त हर कोई उन अपेक्षाओं को पूरा कर पाए, यह हमेशा नहीं हो पाता। ‘वन्... Read more
clicks 204 View   Vote 0 Like   2:09am 23 Aug 2013 #
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ख़ूबसूरत लोकेशन्स, शानदार फ़िल्मांकन, शाहरुख की ताज़गी-भरी मौजूदगी, दीपिका का दमदार अभिनय, बीच-बीच में हल्के-फुल्के लम्हे, चुटीले संवाद, लेकिन एक कमज़ोर पटकथा... ‘चेन्नई एक्सप्रेस’का सार यही है। मुंबई से शुरू हुई ‘चेन्नई एक्सप्रेस’के रास्ते में फन स्टेशन जगह-जगह हैं, ... Read more
clicks 181 View   Vote 0 Like   1:45am 23 Aug 2013 #
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अगर हास्य केवल संवादों में होता तो चार्ली चैपलिन को कोई नहीं जान पाता। असल हास्य परिस्थितियों में छुपा होता है और संवाद उस हास्य के सोने पर महज़ सुहागा बुरकने का काम करते हैं। यह बात शायद युवा निर्देशक के. राजेश अच्छे से समझते हैं। अपनी फ़िल्म ‘चोर चोर सुपर चोर’में उन... Read more
clicks 162 View   Vote 0 Like   7:30am 3 Aug 2013 #
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अगर हास्य केवल संवादों में होता तो चार्ली चैपलिन को कोई नहीं जान पाता। असल हास्य परिस्थितियों में छुपा होता है और संवाद उस हास्य के सोने पर महज़ सुहागा बुरकने का काम करते हैं। यह बात शायद युवा निर्देशक के. राजेश अच्छे से समझते हैं। अपनी फ़िल्म ‘चोर चोर सुपर चोर’में उन... Read more
clicks 127 View   Vote 0 Like   7:30am 3 Aug 2013 #
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