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Blog: "मेरे भाव मेरी कविता"

Blogger: अखिलेश रावल
यहाँ हो रहे बस मौत के सौदे,इस हैवानी खेल को देख हम ,बस  इतनी  सी दुआ करते,काश हम भी इंसान होते।यूँ तो कोई नयी बात नहीं है,इंसानियत तो बिकती ही है,कभी तो लुटेरों का वार था,कभी व्यापारी हथियार था,कभी शहंशाह का मन था,कभी कबीलों का द्वंद्व था,वजह अलग अंजाम वही है... Read more
clicks 139 View   Vote 0 Like   2:27pm 4 May 2016 #
Blogger: अखिलेश रावल
हमने तो तोहफे में दिल दिया,जाने वे उसे क्या समझ बैठे ,दूसरे नजरानो की तरह ही,रख किसी कोने में घर के,दिल की कद्र ना कर सके,आज तन्हाई में दिल शायद,उन यादों में मुश्कुराहट खोजता है,जब लब खामोश थे,इकरार और इज़हार का द्वन्द्ध थाऔर उनके दीदार का सहारा था,आज ना कोई चाहत, नहीं कोई म... Read more
clicks 143 View   Vote 0 Like   11:56am 8 Jan 2016 #
Blogger: अखिलेश रावल
सरल है बहुत कहना मगर,मुमकिन नहीं जीना यहाँ,हर डगर एक सवाल है,खो गए जवाब जाने कहाँ,मुश्किलों से विचलित नहीं,मुश्किलों के लिए विचलित है,काँटों से भय अब नहीं है,डर फूलो के कांटे बनने का है,खोज रहा हूँ में वो बगिया,जहाँ फूल फिर महक सके,हर सांस पहेली ना होकर,साकार स्वप्न की सीड... Read more
clicks 148 View   Vote 0 Like   11:53am 8 Jan 2016 #
Blogger: अखिलेश रावल
चीख रही है आज परिपाठी,देख पतन कलम योद्धाओ का,जिनका धर्म था सत्य संग्राम,वे मिथ्या भाषण रच रहे है,जहाँ व्यंग बाणों की ज़रूरत,वहाँ जय गान सुनाई दे रहे,दर्द जन-जन का देख भी,बरबस ख़ामोशी का आलम है,शर्मशार लेखकों का कुनबा हुआ,हताहत आज कलम है,देख कलम योद्धा का यह पतन,वसुधा भी आत... Read more
clicks 147 View   Vote 0 Like   11:52am 8 Jan 2016 #
Blogger: अखिलेश रावल
कभी सोचता हूँ क्या पाया है,ज़माने ने विकास के नाम पर,जो जीवन रत्न थे सब खो गए,बर्बर मानव से अब पशु हो गए,पाषण को जीवित से अधिक महत,यत्न था जीवन सरल और सुखद हो,मगर जीवन को ही हम भूल गए,जो साधन था वो लक्ष्य हुआ,और लक्ष्य को इंधन समझ रहे,जल रही है चिता मानव की ,अब तो चिंता की वेदी प... Read more
clicks 130 View   Vote 0 Like   11:52am 8 Jan 2016 #
Blogger: अखिलेश रावल
मेरी दीवानगी अब भी वही है,बस इज़हार का अंदाज़ अलग है,तब बिखरे मोती की माला थी,आज बिखरे सपनो की सौगात है,लफ्ज़ मुश्कुराहट बिखेरते थे,अब आँखे नम कर जाते है,यकीन तब भी था लकीरों पर,यकीन आज भी है लकीरों पर,बस गम इतना सा है की ,वो लकीरे खुदा ने खिची थी,यह लकीरे तुमने खिची है,मैं ब... Read more
clicks 177 View   Vote 0 Like   9:40am 11 Nov 2014 #
Blogger: अखिलेश रावल
मौत महसूस तो होने दे,मैं भी कभी जिंदा था,इस जग के गमो में ख़ुशी के कुछ पलो मे,मैं भी कभी मौजूद था,ज़माने की ख्वाहिश को,अपनों की आरज़ू को,पूरा करने के बाद भी,खुद को खोज पता था,जी रहा था मुर्दे की तरह,आज तुझे देख जीना है,संग तेरे फिर मैं चलूँगा,अपनी बात कहने दे तू ,बस एक बार अपनी मु... Read more
clicks 180 View   Vote 0 Like   9:39am 11 Nov 2014 #
Blogger: अखिलेश रावल
हमारी गुलामी की भी हद है,हर दम आँख में आसूं मगर,फिर भी सियासत बुलंद है,शोर कई सुनाई देते है मगर,आज भी सिंहासन अडिग है,जिनको मान अपना हमदर्द,दिल के गहरे घाव बताते थे,आज वे खुद कटार चला रहे,भय से भाग्य लिखे जा रहे है,दासता का दर्द तब अपार होता है,जब कोई सक्षम  जन सत्ता में,कुब... Read more
clicks 138 View   Vote 0 Like   9:30am 11 Nov 2014 #
Blogger: अखिलेश रावल
बेवजह एक जंग सी छिड़ी है,मेरे घर के सुन्दर आँगन में,तलवार लिए हर भाई खड़ा है,मंथरा सिंहासन पर बैठी है,हो रहा ज़िन्दगी का सौदा,अब तो चोपट की चालो से,कोई ऐसा नहीं मिला जिसकी,तलवार पर निर्दोष का लहू नहीं,सब कुछ बिलकुल सही है मगर,राम - कृष्ण की कोई खबर नहीं,अब हर मनुज को बन कृष्ण,वि... Read more
clicks 168 View   Vote 0 Like   7:55pm 31 May 2014 #
Blogger: अखिलेश रावल
बना झुण्ड गीदड सिहों का शिकार कर रहे|जब से रंगे सियार तख़्त पर है सो रहे|पाबंधी है सिंह को अब दहाड़ने पर मगर|हो निर्भीक स्वान अपना राग है रो रहे|है बाज पिंजरे में निरपराध बंद हुए|और कबूतरबाज़ी के खेल है हो रहे|जब बर्बरता को एक चूक कही गयी|तब मेरी भी मूक बगुला साध टूटी|तु ही ... Read more
clicks 185 View   Vote 0 Like   7:37pm 31 May 2014 #
Blogger: अखिलेश रावल
जननी तेरी कोख काली हो गयी,कुदरत तेरे तप में श्राप दे गयी,जिन हाथो को देखना ही सुकून था,आज उनकी सिरत खुनी हो गयी,जिन आँखों में तेरा हर सपना था,जिनको नमी से तूने दूर रखा था,आज अजब तमाशा देखता है,उन आँखों में अब लहूँ बस्ता है,जिन कदमो को चलना सिखाया,जिनके लिए चुन सभी काँटों को,... Read more
clicks 173 View   Vote 0 Like   7:35pm 31 May 2014 #
Blogger: अखिलेश रावल
बनाया भीरु नायक ने भिक्षुक,कर रहे हर दर फरियाद,आत्मसम्मान को बेच कर,जी रहे है जिंदगी आज,सब होठ सिल बैठे है,मान ज़ुल्म को भाग्य,इन रगों का लावा अब,शीतल नीर सा हो चूका,मायूसी की चिता से फिर,जिंदा हो उठने की खातिर,कोई तो बतला  दो मुझे,किससे आखिर दुआ करूँ|लफ्ज़ ही खो चूका हूँ,लल... Read more
clicks 165 View   Vote 0 Like   5:16am 20 Feb 2014 #
Blogger: अखिलेश रावल
कैसी अजब रित है जग की,सच को पाबंध करे बेडियो में,झूठ को छप्पन भोग लगे,कराह रही नेकी देख दर्द,बदी की सल्तनत बन गयी,सवाल पूछे इंसानों से जटिल,हैवान बिन रोक-टोक गुमे,गजब है तासीर हमारी तभी,विनाश को तकदीर समझे,जो जग के शासक बने हैकागजो सी शक्सियत है,कांच सा है इनका सीना,है मनुज... Read more
clicks 144 View   Vote 0 Like   5:09am 19 Feb 2014 #
Blogger: अखिलेश रावल
बैठा हूँ सागर के साहिल पर,लहरे कदमो को छू रही है,मादकता ले चल रही पवन,चांदनी से रोशन अम्बर है,खो जाये खुदरत के सौन्दर्य मेंइतना मनमोहक वातावरण है,मगर अशांत कुछ बातों मन,खुद ही खुद में उलझा है,सवाल जवाब हो रहे अंतर में,चल रहा अजब सा मंथन ये,अपने कर्तव्य को समझने कीएक नाकाम ... Read more
clicks 184 View   Vote 0 Like   11:31am 17 Sep 2013 #
Blogger: अखिलेश रावल
किसके गुनाहों की सजा,मेरा देश भुगत रहा है,वो धरा जिसे प्रकृति ने हर सम्पदा प्रदान की,जहाँ सभ्यता के अंकुरवट-वृक्ष में बदले,क्यूँ आज वही देशना सभ्य है ना समृद्द,क्यूँ धुंधला भविष्य और लहू-लज्जा से सना अतीत,क्यूँ नीर बहाती है आज बहु बेटियाँ हर घर में,क्यूँ सांझ भी अब... Read more
clicks 150 View   Vote 0 Like   3:35am 16 Sep 2013 #
Blogger: अखिलेश रावल
मैं बस यही अब चिंतन करूँ,क्रंदन करूँ या अभिनन्दन करूँ,जीत की इस मधुर बेला में,तम हरण का उत्सव करूँ या,विधाता की इस निष्ठुर लेखन पर,भिगो नैन अब मातम करूँ,लहू से सुसज्ज्ति हो इठलाती, उस खडग की मैं पूजन करूँ,या प्रियजन का लहू देख,क्रोधित हो उसे दफ़न करूँ,हूँ बस इसी चिंतन मैं क... Read more
clicks 169 View   Vote 0 Like   2:45pm 4 Aug 2013 #
Blogger: अखिलेश रावल
फिर आज वही कशमकश,दिनकर का बीज है विवश,लोक लाज में इस समाज से,त्याग रही कर्ण को फिर कुंती,है ललाट पर धरा का भाग्य लिखा,इतिहास गढ़ने की बाजुओ में क्षमता,मगर नहीं किसी को सत्य ज्ञात है,मुंद आँखे गंतव्य की और बढ़ रहे,महज भय से भाग्य बदलना है,फिर सुयोधन को दुर्योधन बना,एक अर्जु... Read more
clicks 170 View   Vote 0 Like   5:18am 13 Apr 2013 #
Blogger: अखिलेश रावल
रेत को देख ख्याल आया,यहीं तो जिंदगी का सार है ,रेत के कण की तरह है इंसान,बंधन देता एक हद तक प्यार है,जब हद से अधिक प्रेम हो,तो छूटता अपनों का साथ है,जो स्नेह की डोरी ना हो,तो होता ना कोई साथ है,जो समझ ना सका सीमा को,तन्हाई ही मिलती हर ओर है,       रहता अंधियारे में निशा के,भाग्य म... Read more
clicks 177 View   Vote 0 Like   4:53pm 14 Jan 2013 #
Blogger: अखिलेश रावल
तमन्ना मन में है यह उठी,खुद से रूबरू हो कर आज,एक खूबसूरत ख्वाब देखे,निगाहों से धोखे खाए कई,मगर आज निगाहों से ही,एक धोखा कर कर देखे ,हवा के संग रेत से चलते रहे,सोचा आज तूफान बन,बहने की मस्ती समझ देखे,रोशन जहान सितारों से हुआ,चाह हुई की आतिशबाजी से,आसमान रोशन कर देखे|कदमो में ब... Read more
clicks 197 View   Vote 0 Like   2:35am 8 Dec 2012 #
Blogger: अखिलेश रावल
जिंदगी का हर मोड आशिकी नहीं,यारो तुम्हारे बिन यह जिंदगी नहीं,एक मतवाले की तरह जाने क्यूँ,परछाई को पकड़ने की आस करता था,जाने क्यूँ पवन को मुट्टी में कैद करने का,हर दम असफल असंभव प्रयास करता था,जिंदगी की खुशी तुम्हारी दोस्ती से है,गम का सागर मिला मुझे, आशिकी से है,जिसे नूतन... Read more
clicks 160 View   Vote 0 Like   12:20pm 3 Dec 2012 #
Blogger: अखिलेश रावल
किसी की आँखें नम है,किसी का दिल टुटा है,कोई अँधेरे में खोयाकोई जग से रूठा है,हर कोई कह रहा है,ठीक हूँ मैं,खुश हूँ मैं,मगर जाने क्यूँ मुझे,हर चेहरे के पीछेछिपा गम दिख रहा,हर दिल अपनी दास्तान कह रहा है,मगर शोर में कोई ना उसे सुन रहा,तेज है रफ़्तार जिंदगी की इतनी,की खुद ही की बा... Read more
clicks 198 View   Vote 0 Like   5:31pm 4 Nov 2012 #
Blogger: अखिलेश रावल
दर्द दिल का मैं जाने क्यूँ दबाए बैठा हूँ,आँखों में अपनी दरिया छुपाये बैठा हूँ ,जिसे खुदा से बढकर इश्क किया मैंने,उसी ने अनजानो की तरह अलविदा किया,आज टूट कर मैं खुद को खो रहा हूँ,तन्हाई, बेरुखी बेकरारी क्या होती है,मुझको ये खबर अब भी नहीं,शायद मैं अपने अहम पर हुई चोट से,मिले... Read more
clicks 195 View   Vote 0 Like   2:31am 29 Oct 2012 #
Blogger: अखिलेश रावल
कहाँ घुमती है ये किस्मत,किस दर पर  है हकीकत,चमक हर और बिखरी है,काली अमावस में भी यारो,मिलती अब तो चांदनी है,मगर जब नैन बंद होते है,खुद से होता दीदार है,पूनम का पूरा चाँद कम है,ना दिनकर उतना उजियारा है,कालिमा अंधियारे में ही मेरा,शायद  हो रहा गुजारा है,यह दोनों जग एक संग कैसे,... Read more
clicks 198 View   Vote 0 Like   3:26pm 27 Oct 2012 #
Blogger: अखिलेश रावल
लफ्जों में अपनी जिंदगी को,यूँ बयां कर सकते नहीं,कई अक्स ऐसे होते है,जो ज़हन में जिंदा होते है,मगर कलम से गुज़रकलाम में उतरते नहीं|कई मंज़र दिल की गहराई में,रह कर अपनी हस्ती बनाये है,यारों वाकिफ तुम भी हो,वाकिफ मैं भी हूँ मगर,हमारे सिवा उनको और कोई,महसूस कर दिल में रख सकता न... Read more
clicks 190 View   Vote 0 Like   6:22am 2 Sep 2012 #
Blogger: अखिलेश रावल
एक ही टीस मन में उठती है,क्या ख्वाब  संजोया था और क्या हो गए,सोचा था हमने कुछ ज़माने को दे जायेंगे,दो लम्हे ख़ुशी के, दो पल की मुस्कराहट,कुछ ज़हन में छपी तस्वीरे छोड़ जायेंगे ,विदा जब होंगे इस जहान से एक याद बन,सबके दिलो को उल्लास से भरकर जायेंगे,मगर ज़माना इतना भी अपना ना ह... Read more
clicks 201 View   Vote 0 Like   7:25am 14 Aug 2012 #
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