| जिंदगी ने कर लिया स्वीकार,अब तो पथ यही है|अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है,एक हलका सा धुंधलका था कहीं, कम हो चला है,यह शिला पिघले न पिघले, रास्ता नम हो चला है,क्यों करूँ आकाश की मनुहार ,अब तो पथ यही है |क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाए,एक मामूली कहानी है, अधूरी ... |
| एक बेहद सुन्दर ब्लॉग से मुझे आज चाणक्य सीरियल का चन्द्रगुप्त मौर्या द्वारा दिया गया वह भाषण मिला जो उन्होंने अपने राज्याभिषेक पर दिया था। इसे पढ़ें और आज की स्थिति के अनुसार इसके बारे में सोचें, मैं इसको लिखित रूप में प्रस्तुत करने के लिए इस ब्लॉग के लेखक का आभारी हूँ:-... |
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November 28, 2012, 11:55 am |
| गुरु नानक देव जी के जन्मदिन पर अल्लामा इकबाल जी के द्वारा लिखी गयी एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह ग़ज़ल उन्होंने गुरु नानक देव जी के लिए ही लिखी थी।कौम ने पैग़ाम-ए-गौतम की ज़रा परवा न कीक़द्र पहचानी न अपने गौहर-ए-यक-दाना कीआह बदकिस्मत रहे, आवाज़-ए-हक़ से बेख़बरग़ाफ़ि... |
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November 28, 2012, 11:52 am |
| फेसबुक से कुछ समय के लिए छुट्टी ली है तो सोचा है कि कुछ अपने लिए लिखूं और कुछ पढूं। इस ही कड़ी में मैंने एक ब्लॉग पढ़ते हुए मनु स्मृति का एक श्लोक ढूँढा जो शायद मेरी कई दुविधाओं का हल हो सकता है। मैं हमेशा से इच्छुक रहा हूँ यह जानने का कि धर्म क्या है और क्यों इसे धर्म कहते ... |
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November 26, 2012, 10:52 pm |
| दुष्यंत कुमार की पुस्तक "साए में धूप " एक अपाहिज समाज की व्यथा है जो भारत के आजाद होने के बाद इसके नेताओं ने इसे बना दिया है। एक ग़ज़ल नीचे प्रस्तुत कर रहा हूँ कृपया ध्यान से पढ़ें और सोचें:ये रौशनी है हक़ीक़त में एक छल, लोगोकि जैसे जल में झलकता हुआ महल, लोगो देखिये यहाँ पर ... |
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November 17, 2012, 10:57 am |
| राम गइओ रावन गइओ, जाको बहु परिवार।कहु नानक थिरु कुछ नहीं, सुपने जिऊँ संसार॥एक बेहद सुन्दर साखी के साथ आप सब को प्रणाम। श्री गुरु तेग बहादुर के द्वारा रचित इस साखी में वे कहते हैं कि इस संसार से श्री राम भी चले गए, रावण भी चला गया, वे कहते हैं कि आपका कुछ नहीं है और यह संसार ए... |
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November 13, 2012, 10:05 am |
| यही कोई पंद्रह वर्ष पहले दूरदर्शन पर एक सीरियल आता था "चाणक्य" नाम से . देश प्रेम के वाक्यों से लबालब यह सीरियल सही मायने में एक महान रचना थी। उस सीरियल के एक एपिसोड में चाणक्य कहते हैं,"यवनों ने भिन्न-भिन्न जनपदों के आस्था के भेद को नहीं देखा था. आक्रान्ताओं ने सभी के सा... |
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September 2, 2012, 11:11 am |
| हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रह कर,हमको भी पाला था माँ-बाप ने दुःख सह-सह कर ,वक्ते-रुख्सत उन्हें इतना भी न आये कह कर,गोद में अश्क जो टपकें कभी रुख से बह कर ,तिफ्ल उनको ही समझ लेना जी बहलाने को !अपनी किस्मत में अजल ही से सितम रक्खा था,रंज रक्खा था मेहन रक्खी थी गम रक्खा था ,किसको ... |
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August 18, 2012, 12:08 pm |
| आज मानव सड़क पर चला जा रहा था। उसके मन में कई तरह की गुत्थियां चल रही थीं।नौकरी मिल नहीं रही थी, ऊपर से माँ उसकी चिंता में मरी जा रही थी। मानव के तीन भाइयों में वह ही ऐसा था जिसके पास नौकरी नहीं थी, इसलिए उसे घर में कोई बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं दी जाती थी। पिता जी कुछ चाय बनान... |
| शहर में चारों और दंगे हो रहे थे और तबाही मची थी, तभी एक छोटी सी कुटिया के पास आकर भीड़ रुकी. मुस्लिम लोगों की भीड़ थी वह; उस भीड़ ने आवाज लगाईं, "जो कोई भी है बाहर निकले, अपना मजहब बताये वरना हम कुटिया को जला देंगे". एक अधेड़ उम्र की बुढ़िया बाहर आई, एक प्रश्न चिह्न लगाते हु... |
| तय करो किस ओर हो तुम तय करो किस ओर हो ।आदमी के पक्ष में हो या कि आदमखोर हो ।।ख़ुद को पसीने में भिगोना ही नहीं है ज़िन्दगी,रेंग कर मर-मर कर जीना ही नहीं है ज़िन्दगी,कुछ करो कि ज़िन्दगी की डोर न कमज़ोर हो ।तय करो किस ओर हो तुम तय करो किस ओर हो ।।खोलो आँखें फँस न जाना तुम सुनहरे ... |
| आजादी की छुट्टी पर एक छोटा बच्चा अपनी माँ से पूछ बैठा, "माँ, ये छुट्टी क्यों होती है" माँ परेशान रहती हुई कोई जवाब न दे पायी. इतने में बच्चे ने फिर से पूछा, "माँ जवाब क्यों नहीं देती?" माँ ने सोचा फिर जवाब दिया,"बेटा क्योंकि आज के दिन हमें गुलामी से आजादी मिली थी, इस से ... |
| इस किनारे चलते हुए चुन्नी लाल ने बहती नदिया के पार देखा. इस किनारे बड़े बंगले थे, बड़े बाजार थे, उन बाजारों में केवल कुछ हजार लोग थे। वे लोग ऐसे थे जो चलते थे, उड़ते थे, कभी कभी तो कर्म ऐसा करते थे, जिन कर्मों में कोई धर्म नहीं, जिन आदमियों में कोई सच्चा कर्म नहीं,पर उनका ... |
| जब भारत के अंतिम वायसराय को भारत में ब्रिटेन की लेबर गवर्नमेंट ने भेजा था तो उनके पास एक बहुत मुश्किल लक्ष्य था और वह था भारत को आजाद करना और भारत का होने वाला बंटवारा. हालांकि बड़े बड़े विद्वान् इस बात के पूरी तरह से खिलाफ थे. उनमें से एक थे सर जान स्ट्रेची. उनके हिसाब से ... |
| मैत्री की राह बताने को,सबको सुमार्ग पर लाने को,दुर्योधन को समझाने को,भीषण विध्वंस बचाने को,भगवान् हस्तिनापुर आये,पांडव का संदेशा लाये।‘दो न्याय अगर तो आधा दो,पर, इसमें भी यदि बाधा हो,तो दे दो केवल पाँच ग्राम,रक्खो अपनी धरती तमाम।हम वहीं खुशी से खायेंगे,परिजन पर असि न उठ... |
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August 13, 2012, 10:57 pm |
| क्रांति का अर्थ:क्रांति का आज कल हर जगह मजाक उड़ाया जा रहा है.कभी ये आन्दोलन तो कभी वो आन्दोलन, लगता है जैसे भारतवर्ष में आंदोलनों की बहार आ गयी है.पंद्रह अगस्त क्या आई रामदेव जी ने अगस्त क्रांति का ऐलान कर दिया. कुछ ही दिन बीते थे जब अन्ना हजारे जी एक क्रांति का नेतृत्व क... |
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August 13, 2012, 10:43 pm |
| वृक्ष हों भले खड़े,हों घने हों बड़े,एक पत्र छांह भी,मांग मत, मांग मत, मांग मत,अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथतू न थकेगा कभी,तू न रुकेगा कभी,तू न मुड़ेगा कभी,कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथयह महान दृश्य है,चल रहा मनुष्य है,अश्रु श्वेत रक्त से,लथपथ लथपथ लथपथ,अग्निपथ अ... |
| गति प्रबल पैरों में भरीफिर क्यों रहूं दर दर खडाजब आज मेरे सामनेहै रास्ता इतना पडाजब तक न मंजिल पा सकूँ,तब तक मुझे न विराम है,चलना हमारा काम है ।कुछ कह लिया, कुछ सुन लियाकुछ बोझ अपना बँट गयाअच्छा हुआ, तुम मिल गईकुछ रास्ता ही कट गयाक्या राह में परिचय कहूँ,राही हमारा नाम है,... |
| चाहे जो हो धर्म तुम्हारा चाहे जो वादी हो ।नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।जिसके अन्न और पानी का इस काया पर ऋण हैजिस समीर का अतिथि बना यह आवारा जीवन हैजिसकी माटी में खेले, तन दर्पण-सा झलका हैउसी देश के लिए तुम्हारा रक्त नहीं छलका हैतवारीख के न्यायालय में तो तुम... |
| 2010 में जब भारत सरकार ने आद्र्भूमियों के संरक्षण और प्रबंधन के लिए नियम बनाए थे तो सबको आशा थी के जयराम रमेश के पर्यावरण मंत्री होने के नाते शायद सरकार कोई ठोस कदम उठाए, पर यह कानून भी अन्य कानूनों की तरह बिना धार की तलवार बना दिया गया. पूरे विरोध के बावजूद भी इसे 2011 में सरक... |
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February 12, 2012, 9:52 am |
| लार्ड मैकालेने भारत में ब्रिटिश शिक्षा पद्दति को जब सख्ती से लागू किया था तो उसने ब्रिटिश सरकार को यह विश्वास दिलवाया था कि भारत में अंग्रेजी और अंग्रेजियत का प्रचार एवं प्रसार यदि किया गया तो भारत की संस्कृति धीरे धीरे समाप्त हो जाएगी और भारत की आने वाली पीढियां एक ऐ... |
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February 11, 2012, 5:08 pm |
| मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने,मैं कब कहता हूँ जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने?काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है,मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने?मैं कब कहता हूँ मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले?मैं कब कहता हूँ प्यार करूँ तो मुझे प... |
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February 11, 2012, 2:59 pm |
| जो लोग जान बूझ के नादान बन गएमेरा ख्याल है कि वो इंसान बन गए हम हश्र में गए मगर कुछ न पूछिएवो जानबूझ कर वहाँ अनजान बन गएहँसते हैं हम को देख के अरबाबे-आगाहीहम आपके मिजाज की पहचान बन गएमंझधार तक पंहुचना तो हिम्मत की बात हैसाहिल के आस पास ही तूफ़ान बन गएइंसानियत की बात तो ... |
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February 10, 2012, 10:33 pm |
| इतिहास परीक्षा थी उस दिन, चिंता से हृदय धड़कता था |थे बुरे शकुन घर से चलते ही, दाँया हाथ फड़कता था ||मैंने सवाल जो याद किए, वे केवल आधे याद हुएउनमें से भी कुछ स्कूल तलक, आते-आते बर्बाद हुएतुम बीस मिनट हो लेट द्वार पर चपरासी ने बतलायामैं मेल-ट्रेन की तरह दौड़ता कमरे के भीतर आय... |
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February 9, 2012, 12:11 am |
| शबाब आया किसी बुत पर फ़िदा होने का वक़्त आयामेरी दुनिया में बन्दे के खुदा होने का वक़्त आयाउन्हें देखा तो जाहिद ने कहा ईमान की ये हैकि अब इंसान के सिजदा रवा होने का वक़्त आयातकल्लुम की ख़ामोशी कह रही है हर्फे-मतलब सेकि अश्क-आमेज नज़रों से अदा होने का वक़्त आयाखुदा जा... |
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February 4, 2012, 10:33 pm |
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