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स्व.आयुवान सिंह शेखावत,हुडील

भाग 3 से आगे ...... राजपूत जाति की एक मुख्य आंतरिक कमजोरी उसकी आर्थिक विषमता रही है| आर्थिक विभाजन के अनुसार राजपूत जाति को तीन भागों में बांटा जा सकता है| अरबपति और करोड़पति राजा-महाराजाओं से लेकर अर्द्ध-नग्न और अर्द्ध-भूखा श्रमिक राजपूत परिवार रक्त और परम्परा की दृष्टि से ...
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Tag :Rajput aur Bhavishy
  June 10, 2013, 9:38 pm
भाग-२ से आगे.... इन सब परिस्थितियों में राजपूत के नेतृत्व का प्रश्न एक अत्यंत ही जटिल समस्या है| इस कमी की पूर्ति सफलता के प्रथम सोपान की प्राप्ति है| सफल नेतृत्व की कसौटी के विषय में इसी पुस्तक में आगे विचार किया गया है, अतएव यहाँ अब दूसरी आंतरिक कमजोरियों की और ध्यान देना...
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Tag :Rajput aur Bhavishy
  November 12, 2012, 7:26 pm
भाग- १ से आगे..... राजपूत जाति अपने रूढ़िवादी संस्कारों के करण इन्हीं राजाओं को अपना स्वामी और नेता समझती रही| उसने स्वतंत्र रूप से सोचने और कार्य करने की शक्ति को एकदम कुंठित कर दिया| किन्हीं विशेष परिस्थितियों में व्यवहृत और लाभदायक स्वामी-भक्ति की ओट लेकर राजपूत जाति ...
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Tag :Rajput aur Bhavishy
  November 12, 2012, 7:21 pm
राजपूत जाति के पतन के कारणों पर एक पक्षीय विचार हम गत अध्याय में कर चुकें है| विपक्षी हमारे विनाश के लिए कितने उतरदायी है और हम स्वयं अपने विनाश के लिए कितने उत्तरदायी है, समस्या के इन दोनों पहलुओं पर सम्यक रीती के विचार करने पर ही हम अपने पतन के वास्तविक कारणों को समझने ...
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Tag :Rajput aur Bhavishy
  November 2, 2012, 7:03 pm
भाग सात से आगे.... जब सामाजिक ढांचा विश्रंखलित और अस्त व्यस्त हो जायेगा तब अब तक के समस्त रीती-रिवाज, रहन-सहन, व्यवहार आदि के तरीकों में भी आमूल परिवर्तन आ जायेगा| सामाजिक आदर्श और मान्यताएं बदलकर नवीन प्रकारों को जन्म देंगी| सामाजिक ढांचे का यह परिवर्तन अनियंत्रित परिस...
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Tag :Rajput aur Bhavishy
  November 1, 2012, 7:18 pm
भाग छ: से आगे... मध्यम-वर्ग का जीविकोपार्जन का सबसे बड़ा साधन कृषि था| महाजनों से ऋण लेकर और अपनी औरतों के जेवर तक बेच कर इस वर्ग के अधिकाँश लोगों ने अपनी भूमि पर कुए,तलब आदि बनवाये थे| इस प्रकार कृषि की भूमि पर उत्पादन बढाने के लिए सुधार कर वे अपनी भूमि कृषकों को जोतने के लिए ...
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Tag :Rajput aur Bhavishy
  November 1, 2012, 6:11 pm
भाग पांच से आगे .....देशी राज्यों की इस प्रकार की समाप्ति के रूप में बुद्धिजीवी नेताओं के शब्दों में राष्ट्र की एकता पूर्ण हुई,इतिहासज्ञों के विचारों में वह एक रक्तहीन राज्य-क्रान्ति थी;-देश के अनुत्तरदायी विध्वंसक तत्वों की वाणी में वह बर्बर सामंतीय युग की स्वाभाविक इ...
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Tag :Rajput aur Bhavishy
  November 1, 2012, 6:04 pm
भाग-चार के आगे .... भारत का चतुर बुद्धिजीवी-वर्ग यह भली भांति जनता था कि विदेशी सत्ता की भारत में उपस्थिति के समय इन देशी राज्यों की समाप्ति की बात से प्रतिकूल परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती थी| अतएव जब तक देश में अंग्रेज सत्ता रही तब तक धूर्त-वर्ग ने भूलकर भी इन राज्यों की स...
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Tag :Rajput aur Bhavishy
  October 8, 2012, 6:28 pm
भाग -३ से आगे ....... ये सब कार्य लुभावनें सिद्धांतों की ओट लेकर, कहीं शोषण से कहीं दासता से और कहीं सामंतशाही के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के नाम पर कराये गए| कहीं राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक समानता की दुहाई दी गयी तो कहीं राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक न्याय की स्थापना की प...
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Tag :Rajput aur Bhavishy
  September 28, 2012, 7:22 pm
भाग दो से आगे........ उस समय ब्रिटिश भारत में स्वतंत्रता का जो संग्राम अंग्रेजों और भारतीय जनता के बीच चल रहा था, राजस्थान में उसका रूप सामंत-वर्ग और प्रजा-मंडलों के पारस्परिक द्वेष के रूप में प्रकट हुआ| सामंत-वर्ग उस समय अपने कर्तव्यधिकारों के प्रति जागरूक नहीं था और ण प्र...
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Tag :Rajput aur Bhavishy
  September 28, 2012, 7:22 pm
भाग एक से आगे.... पाकिस्तान की स्थापना कांग्रेस ने इसलिए कराई कि जिससे देश का प्रबल और प्रभावशाली मुस्लिम-वर्ग शेष भारत से प्रथक होकर अन्य राष्ट्र का शाषक बन जाय और इस प्रकार भारत में कांग्रेसी प्रभुत्व के अबाध रूप से प्रसार के लिए एकदम मार्ग खुल जाए| दुर्नितिपूर्ण योज...
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Tag :Rajput aur Bhavishy
  September 26, 2012, 5:01 pm
सन् 1957में स्व.श्री आयुवानसिंह जी ने उस समय की सामाजिक,राजनैतिक परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए "राजपूत और भविष्य" नामक पुस्तक लिखी थी| उसी पुस्तक के अंश यहाँ प्रस्तुत है -- देश के विभाजन पर कांग्रेसी चालों का विश्लेषण करते हुए स्व.आयुवानसिंह जी ने उन तथ्यों व कारणों प...
स्व.आयुवान सिंह शेखावत,हुडील...
Tag :Rajput aur Bhavishy
  September 25, 2012, 6:49 pm
सन् 1957में स्व.श्री आयुवानसिंह जी ने उस समय की सामाजिक,राजनैतिक परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए "राजपूत और भविष्य" नामक पुस्तक लिखी थी| उसी पुस्तक के अंश यहाँ प्रस्तुत है -- देश के विभाजन पर कांग्रेसी चालों का विश्लेषण करते हुए स्व.आयुवानसिंह जी ने उन तथ्यों व कारणों प...
स्व.आयुवान सिंह शेखावत,हुडील...
Tag :राजपूत और भविष्य
  July 21, 2012, 6:49 pm
- ओ देवी! सिंह-वाहिनी, असुर-संहारिणी, शुम्भ-निशुम्भ-निपातिनी, चक्र-धारिणी, रक्त-बीज-नाशिनी तेरा यह रौद्र रूप शत शत कोटि बार वन्दनीय है| समस्त विश्व का धारण और संहार करने वाला तेरा यह प्रचंड चंडी रूप स्तुत्य है| तू जीवन का जीवन, प्राणों की प्राण, आत्मा की आत्मा है| विश्व के कण...
स्व.आयुवान सिंह शेखावत,हुडील...
Tag :मेरी साधना
  October 29, 2011, 10:30 pm
- मेरे देखते ही देखते वह समाज-भवन ढहने लगा| भगवान राम और कृष्ण, कर्ण और युधिष्टर, बुद्ध और चंद्रगुप्त का समाज इतना निर्बल, पंगु, साहसहीन, निर्लज्ज और मूढ़ निकलेगा;- यह विचारातीत था| पर मैंने देखा उसका चतुर्मुखी पतन उन आँखों से जिनसे कभी विश्व-विजय, वैभव-विलास और सर्वोत्कर्...
स्व.आयुवान सिंह शेखावत,हुडील...
Tag :मेरी साधना
  October 26, 2011, 7:09 pm
-मैं सुनूं - अपने पूर्वजों का उपालम्भ,ऋषियों का आदेश,राष्ट्र की पुकार,समाज क्रन्दन,दुष्टों का अट्टहास और आत्मा की ध्वनि|मैं देखूं- विध्वंस का नृत्य, सर्व-नाश का दृश्य, सत्य का दमन और जीवन का पतन|अनुभव करूं- इनके प्रति भारी उत्तरदायित्व को, मोटी ऋण राशि को, कृतज्ञता और अल्...
स्व.आयुवान सिंह शेखावत,हुडील...
Tag :मेरी साधना
  October 21, 2011, 7:53 pm
-मैंने अमरता और क्षणभंगुरता के रहस्य को समझ लिया है| स्व-धर्म रूपी अमृत के आस्वादन से मैं देवत्व की अमर योनि का अधिकारी और धर्म-विमुखता रूपी गरल-सीकर पान कर मृत्यु का ग्रास बन सकता हूँ|तो मैं क्या करूं?- मैं मृत्यु और जीवन दोनों का रसास्वादन करना चाहता हूँ;- मर कर भी जीवित ...
स्व.आयुवान सिंह शेखावत,हुडील...
Tag :मेरी साधना
  October 19, 2011, 7:54 am
- जरा समझूँ भगवान के मंगलमय विधान को| विष्णु शक्ति का आव्हान करूं| अमृत रूपी तत्वों की वृद्धि,पोषण और रक्षण में योग दूँ| उन्हें क्षय से बचाऊं| क्षत्रिय-संज्ञा को सार्थक करूं| फिर मैं ही रूद्र बनकर विषरूपी तत्वों का संहार करूं| मेरे प्रचंड आघातों से विप्लव का कलेजा फट जाए; ...
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Tag :मेरी साधना
  October 17, 2011, 7:15 pm
-चेतना के स्वाभाविक जागरण से सब जाग उठे; ज्ञान की उज्जल प्रदीप्ति से सब दीप्त हो जाएँ; स्फूर्ति के मंगलमय प्रांगण में सब प्रवेश कर जाएँ;- सबको कर्तव्य-पथ-गामी बनाने के लिए शंखधारी विष्णु के गुणों को मैं धारण करूँ;- उद्बोधन का महा-शंख बजाऊं;- महानिशा की समाप्ति का ढिंढोरा प...
स्व.आयुवान सिंह शेखावत,हुडील...
Tag :मेरी साधना
  October 16, 2011, 9:15 am
-पर मुझे आवश्यकता है धर्म के व्यावहारिक स्वरूप की; उसके मूर्तिमान अस्तित्व की,- गोचर,व्यक्त,प्रकट और स्थूल की उपासना की| मैं समाज-सीमाओं में आबद्ध समाज-धर्म से आगे जा भी नहीं सकता| क्षितिज के उस पार,अवनि के कोलाहल से परे नि:स्तब्ध एकांत साधना मेरे-गुण स्वभाव के प्रतिकूल प...
स्व.आयुवान सिंह शेखावत,हुडील...
Tag :मेरी साधना
  October 14, 2011, 6:27 pm
उस दिन बादशाह औरंगजेब लम्बी बीमारी से उठ कर पहली बार दरबार में आया था | दीवाने ख़ास का वह दरबार खचाखच भरा हुआ था | बीमारी की थकावट और साम्राज्य की नित नई उत्पन्न होती समस्याओं के कारण बादशाह का चेहरा गंभीर था | बादशाह ने मयूर सिंहासन पर बैठकर ज्योंहि अपनी दृष्टि चारों और ...
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Tag :ममता और कर्तव्य
  October 13, 2011, 7:00 pm
स्वमाता और मातृत्व-आरोपित अन्य स्त्री में वात्सल्य का मूल स्रोत एकसा होते हुए भी उसका उपयोग स्व पर आकर भिन्न भिन्न हो जाता है| स्वमाता और विमाता का भी अंतर प्राकृतिक है| यही अवस्था और संबंध स्वधर्म और विश्व धर्म की है; - यही प्राकृतिक अंतर स्वधर्म और पर-धर्म में है| अतएव ...
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Tag :मेरी साधना
  October 13, 2011, 6:41 pm
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