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चिकोटी

यों, दुनिया में मूर्खों की कमी नहीं। सबसे अधिक मूर्ख अब सोशल मीडिया पर ही पाए जाने लगे हैं। सोशल मीडिया पर पाए जाने वाले मूर्खों की अजब ही कहानियां है। ये मूर्ख यहां या तो एक-दूसरे से लड़ते-भिड़ते रहते हैं या फिर लाइक-कमेंट की आस में ‘दुबले’ होते रहते हैं। किसी का खुद पर ...
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  April 1, 2017, 7:50 am
न केवलमेरे मोहल्ले बल्कि समूचे उत्तर प्रदेश के रोमियों पर ‘विकट संकट’ आन खड़ा हुआ है। एंटी रोमियो स्कावॉयड बन जाने से उनकी इज्जत पर ‘तगड़ा हमला’ हुआ है। बेचारे अब न खुलकर लड़कियों के स्कूल-कॉलेजों के आसपास टहलकदमी कर सकते हैं न अपनी महबूबा को बाइक पर बैठा कोचिंग छोड़...
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  March 23, 2017, 7:30 am
मुझमेंऔर शरारत में छत्तीस का आंकड़ा बचपन से रहा है। बताते हैं- जब मैं पैदा हुआ था तब गोदी में आने के बहाने मैंने नर्स को डाइरेक्ट तमाचा जड़ दिया था। बस तभी से मुझे शरारती टाइप बच्चा माना जाने लगा। बचपना गुजर जाने के बाद जवानी आ जाने पर भी मैंने अपनी शरारतों को नहीं छोड़ा...
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  March 21, 2017, 3:30 pm
मेरेएक वामपंथी मित्र हैं। पेशे और स्वभाव दोनों में केवल वामपंथ को ही जीते हैं। वामपंथ के अतिरिक्त पूरी दुनिया उन्हें नश्वर और पूंजीवादी टाइप नजर आती है। भीतर से लेकर बाहर तक लाल वस्त्र पहनते हैं। पैरों में लाल चप्पल और सिर में लाल तेल लगाते हैं। खाने में या तो लाल टमा...
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  March 18, 2017, 7:57 am
मैंनेइस मसले पर तमाम लोगों से बात की। बीवी से लेकर गर्लफ्रेंड तक की राय ली। सभी छंटे हुए वरिष्ठ व्यंग्यकारों को पढ़ा-सुना। फेसबुक-टि्वटर तक छान मारा। किंतु व्यंग्य में सरोकार का तड़का कैसे डाला जाए- यह बताने को कोई राजी नहीं। अरे, मैं तो उस बंदे को रिश्वत तक देने को तैय...
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  March 16, 2017, 7:36 am
आजकल‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ हर किसी की खूब जोर मार रही है। सोशल मीडिया पर तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ‘नागिन डांस’ टाइप ही चल रहा है। जिसे देखो वो अपने गले में तख्ती लटकाए झूमे पड़ा है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के गाने पर। स्टेप कहीं के कहीं पड़ रहे हैं तब भी मन ...
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  March 10, 2017, 9:42 am
एंवईसब मिलकर बिचारी छिपकली को ‘बदनाम’ करे पड़े हैं। इसमें छिपकली का क्या ‘दोष’? छिपकली को क्या मालूम कि वो एक ऊंची कंपनी के फ्रेंच फ्राइज में ‘शहादत’ देने जा रही है। छिपकली अपने नेचर में कतई ‘स्वतंत्र’ होती है। बेरोक-टोक कहीं भी आ-जा सकती है। कहीं भी गिर या निकल सकती है...
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  March 9, 2017, 9:59 am
फेसबुकपर लाइक के मसले तगड़े हैं। आए-दिन अखबारों में छपने वाली रपटें बताती रही हैं कि लाइक की चाह में लोग ‘डिप्रेशन’ तक का शिकार होने लगे हैं। लोगों में अपने काम एवं नींद के प्रति इत्ता उत्साह देखने में न आता, जित्ता एक लाइक को लेकर रहता है। लाइक पाना मानो उनकी जिंदगी का ...
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  March 7, 2017, 9:48 am
उसरोज मेरे मोबाइल पर एक कॉल आई। कॉल चूंकि अनजान नंबर से थी, सो मैंने रिसिव नहीं की। दस मिनट बाद उसी नंबर से पुनः कॉल आई। मैंने यह सोचकर रिसिव कर ली कि शायद किसी अखबार के संपादक का फोन रहा, मुझसे कुछ लिखवा हो।कॉल रिसिव करते ही, उधर से बंदा बोलता है। सर, ‘मैं फलां मार्केटिंग ...
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  March 6, 2017, 9:37 am
कृश्न चंदर गधे की वापसीमें लिखते हैं- ‘इंसानों की दुनिया में वही लोग प्रसन्न रह सकते हैं, जो गधे बनकर रहें।‘वाकई। गधे बनकर रहने का ‘सुख’ क्या है, यह कोई मुझसे पूछे। मैं अपने खानदान का एक मात्र गधा हूं, जिसे स्कूल से लेकर परिवार तक हमेशा गधा ही कहा-माना जाता रहा है। किंतु ...
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  February 23, 2017, 10:13 am
मेरेपड़ोस में एक ‘दुमदार बुद्धिजीवि’ रहते हैं! नहीं.. नहीं..उनकी सचमूच की ‘दुम’ नहीं है। हैं वो हमारी-आपकी तरह ही सामान्य इंसान। दुमदार उन्हें इसलिए कह रहा हूं क्योंकि वे हर वक्त मुझे यह एहसास करवाते रहते हैं कि उनकी बुद्धिजीविता उनकी दुम (विचारधारा) में बसा करती है। यो...
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  February 22, 2017, 10:13 am
टि्वटरपर बाबाओं की धूम है। ये बाबा धरती पर पाए जाने वाले भगवा-धारी बाबाओं से भिन्न होते हैं। ज्यादातर बाबा ‘ट्रौलर्स’ हैं पर हैं ‘मजेदार’। उनके ट्वीटस पढ़कर तबीयत हरी हो जाती हैं। विषय चाहे राजनीति का हो या कोई और बाबा किसी को नहीं बख्शते। टि्वटर पर सबसे उम्दा वनलाइन ...
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  February 16, 2017, 10:38 am
बातेंचाहे कित्ती ही क्यों न बना लें पर दुनियां-जहां में चलती लाठी के वीरों की ही है। लाठी के वीरों से आम तो क्या खास भी ‘कंपता’ है। उचित दूरी बनाकर रहता है। न उनका साया खुद पर, न खुद का साया उन पर पड़ने देता है। लाठी के वीरों का क्या भरोसा कब में अपना ‘ब्रहमास्त्र’ चल दें। ...
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  February 14, 2017, 9:59 am
ज्ञानलेने या देने के मामले में मैं जरा ‘चूजी’ हूं। एंवई, हर किसी से न ज्ञान लेता हूं, न देता है। आज के डिजिटल युग में लोग ज्ञानियों की शरण में न जाकर सीधा गूगल करना ज्यादा पसंद करते हैं। सही भी है। अपना ज्ञान, अपना रिस्क।लेकिन संसद में प्रधानमंत्रीजी से ‘रेनकोट’ वाला जो ...
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  February 10, 2017, 9:34 am
डिसक्लेमर- यह किस्सा नितांत काल्पनिक है। अतः रत्तीभर भी दिल पे न लिया जाए।तो प्यारे, किस्सा कुछ यों है। हमारे पड़ोस में रहने वाले एक सज्जन अचानक से स्वर्ग सिधार गए। बतला दूं, सज्जन हर काम अचानक से ही किया करते थे। अचानक से ही हमारे घर आ धमकते थे। अचानक से ही कहीं भी चल पड...
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  February 8, 2017, 10:05 am
मुझेकभी इस बात की चिंता नहीं रही कि बजट मुझे समझ आया कि नहीं। बजट दरअसल चीज ही ऐसी है, जो समझ में तो किसी के नहीं आता फिर भी लोग पब्लिक में जतलाते ऐसे हैं कि वित्तमंत्री के बाद अगर बजट किसी को समझ आया तो वे ही हैं। किंतु मैं ऐसा ‘शो-ऑफ’ करना पसंद नहीं करता। मेरा बजट से उत्ता ...
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  February 3, 2017, 9:30 am
हालांकिमैं कॉमर्स का स्टूडेंट जरूर रहा लेकिन मुझे न कभी कॉमर्स पल्ले पड़ी, न अर्थशास्त्र, न ही बजट। कॉमर्स का इस्तेमाल मैंने केवल पास हो जाने भर के लिए ही किया। इसमें न कभी गंभीरता दिखाई, न दिलचस्पी। वो क्या है, मेरी कोशिश हमेशा से अपनी अक्ल को पढ़ाई के बोझ से मुक्त करने ...
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  January 30, 2017, 9:59 am
गणतंत्र दिवसपर हम शहीदों को तो याद करते ही हैं। साथ-साथ इस दिन लगने वाली ‘सेल’ का फायदा उठाना भी हम नहीं भूलते। अब गणतंत्र और सेल एक-दूसरे के पूरक टाइप बन गए हैं। जब भी गणतंत्र दिवस आने को होता है, अखबारों के पहले पन्ने सेल-डिस्काउंट-ऑफर्स के विज्ञापनों से भर जाते हैं। ग्...
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  January 26, 2017, 7:01 pm
चुनावी घोषणपत्रोंको भले ही आप-हम ‘जुमलेबाजी की किताब’ मानें लेकिन ये होते बड़े ‘दिलचस्प’ हैं। घोषणपत्रों का हिसाब ‘जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि’ टाइप होता है। राजनीतिक दल जित्ते किस्म के वायदे जनता से कर सकते हैं; सब के सब घोषणापत्रों में घुसेड़ देते हैं। साथ-स...
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  January 25, 2017, 9:49 am
दौरे-गुजिश्तामें चुनाव ‘लोकतंत्र का उत्सव’ सरीखे हुआ करते थे, लेकिन अब ‘दंगल’ सरीखे हैं। इस दंगल में एक से बढ़कर एक तगड़ा पहलवान अपने ‘पहलवानी दांव-पेच’ के साथ तैयार रहता है, विरोधी को ‘धोबी-पछाड़’ देने के लिए। चुनावी-दंगल के बीच सिर्फ ‘जीत’ या ‘हार’ ही मायने रखती है, ब...
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  January 23, 2017, 9:48 am
पुस्तक मेला- खासकर लेखकों के- बड़े काम का होता है। उनके बीच यह ‘पिकनिक स्पॉट’ की भूमिका निभाता है। जहां किस्म-किस्म के लेखक एक-दूसरे से मिलते-जुलते हैं। अपनी किताबों की ‘मार्केटिंग’ करते हैं। किताबों का विमोचन करवाते हैं। किताबों पर चर्चा-बहस, विवाद-संवाद होता है। इसी...
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  January 20, 2017, 11:57 am
पॉलिटिक्सकेवल ‘दांव-पेच’ का खेल है। दांव सही निशाने पर लग गया तो ‘जीत’, चूक गए तो ‘हार’। इन दांव-पेच में न सगे को बख्शा जाता है न पराए को। इत्ते खेल-तमाशे के बाद भी यहां इस बात की कोई गारंटी न रहती कि कौन नेता अपनी पार्टी में या बाहर कित्ते लंबे समय तक टिका रह पाएगा। लंबी र...
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  January 18, 2017, 11:35 am
यकायकगांधी का चरखा, खादी और कैलेंडर तीनों ही खासी चर्चा में आ गए हैं। मुझे नहीं मालूम इन तीन मुद्दों पर जमीन पर कहीं कोई बहस या चर्चा हो रही है या नहीं लेकिन फेसबुक पर लोग आपस में गुथम-गुथा हैं। जैसाकि होता आया है, परस्पर दो धड़े बना लिए गए हैं। एक गांधी का पक्षधर है तो दूस...
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  January 14, 2017, 9:07 am
मेरेएक कवि मित्र हैं। फेसबुक पर अपना अकाउंट रखते हैं। मित्र-सूची में पुरुषों से ज्यादा महिलाओं को रखना पसंद करते हैं। फेसबुक के स्टेटट पर कम ‘इन-बॉक्स’में ही अधिक नजर आते हैं। दिनभर में जित्ती कविताएं लिखते हैं, पढ़वाने के तईं इन-बॉक्स करते रहते हैं। चूंकि मैं कविताए...
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  January 13, 2017, 10:00 am
पिता-पुत्रके बीच छिड़े ‘दंगल’ में बेचारी साइकिल की सत्या पिट गई है। साइकिल यह निर्णय नहीं ले पा रही कि किस रास्ते चले? जिस रास्ते साइकिल चलने की कोशिश किया करती है, कोई न कोई बंदा आके उसकी ‘हवा’ निकाल जाता है। निरंतर हवा निकाले जाते रहते, साइकिल के पहियों में इत्ते ‘छेद...
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  January 5, 2017, 11:58 am
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