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ख़लिश

यूँ तो इसका कोई ख़ास महत्व नहीं रह गया है क्योंकि रोज़ ही कई-कई तरह से आदमी बनता-बनाता है। फिर भी, जैसी कि परंपरा है कि एक अप्रैल को आप ख़ास तौर से बेवकूफ़ बनाए जा सकते हैं, सो सतर्कता रखना लाजिमी था। मैं पूरी तरह सतर्क था और सोच रहा था कि वैसे ठीक ही है कि एक दिन लोग घोषित तरीके स...
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Tag :भाजपा
  April 2, 2015, 9:38 pm
16 मई के बाद से अब तक की अवधि में ऐसे कई मुद्दे रहे हैं जो बेहद संक्रामक ढंग से लोगों तक पहुंचे हैं. इसे यूँ कहा जाये तो ज़्यादा सटीक होगा कि कई मुद्दे जनता के बीच संक्रामक बनाकर छोड़े गए हैं. सरकार और उससे जुड़े तमाम हिन्दूवादी संगठन पूरी गंभीरता से इस काम में जुटे हुए हैं. क्य...
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Tag :ऐतराज़
  January 9, 2015, 7:38 pm
साम्प्रदायिकता की चपेट में साझा गर्वफेसबुक पर भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम 1857 के विस्मृत नायकों में से एक मौलवी अहमदुल्लाह शाह के बारे में जानकारी देती एक पोस्ट देखी जिसे 700 लोग शेयर कर चुके हैं. यूँ ही इच्छा हुई कि देखूँ किस-किस ने शेयर किया है. जो सूची सामने आई उसमें 25-30 स...
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Tag :आलेख
  November 6, 2014, 7:40 am
शहर में आजकल झगड़ा बड़ा हैकिसी की आँख में तिनका पड़ा हैबहुत कमज़ोर आँखें हो गई हैंअजब ये मोतिया इनमें मढ़ा हैकभी आकर हमारे पास बैठोपसीना ये नहीं, हीरा जड़ा हैकोई कैसे उसे अब सच बतायेइदारा झूठ का जिसका खड़ा हैवही दिखता है जो वे चाहते हैंनज़र पे उनकी इक चश्मा चढ़ा हैबटेरों की भी य...
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Tag :नज़्म
  October 31, 2014, 4:19 pm
शहर की भीड़ में यूँ तो बहुत ज़्यादा निकलते हैं मगर कुछ तो हैं सन्नाटे जो अपने साथ चलते हैं कोई रस्ता नहीं सच का जहाँ क़दमों को राहत हो जहाँ भी जाएँ हम ये आबले भी साथ चलते हैं उन्हें ख़ुशफ़हमियाँ हैं ये के सबकुछ है यहाँ बेहतर हमीं जानें के कब कैसे ये अपने दिन निकलते हैं&...
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Tag :ग़ज़ल
  August 8, 2014, 10:31 am
काग़ज़ स्याही कलम दवातअक्षर-अक्षर ढलती रातबादल ख़्वाब सितारे चाँदगहरी बुझती जलती रातढोंगी लम्पट कुंठित लोगबस्ती में इनकी इफ़रातगली-मोहल्ला मुल्क़-जहानखींचा-तानी झगड़े घात गोली भाले ख़ंजर आगफिरते पूछें सबकी जातमज़हब दौलत सत्ता नाकहत्या शोषण धोखा लातसैनिक जनता जंग फ़साद ...
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Tag :ग़ज़ल
  July 20, 2014, 11:23 pm
अभी-अभी लल्लन मियाँ ने फ़ोन पर एक सवाल दागा - "भाई मियाँ, मान लो कि हम तुम्हें कहते हैं कि तुम ऑटो से बाज़ार जाओ-आओ और किसी बढ़िया सी फिलम की पाइरेटेड सीडी हमारे लिए खरीदकर लाओ. इस काम के तुम्हे 500रुपये मिलेंगे. तुम ये काम कर दो फिर पता चले कि सीडी तो चल ही नहीं रही, तब क्या तुम हमस...
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Tag :लल्लन मियाँ
  July 10, 2014, 12:40 pm
यह सब कुछ हो रहा है अभी मेंवे जो कहते हैं अब नहीं है ऐसाउन्हें चाहिए पड़ताल करें अपने 'अब'कीझाँकें अभी की झिर्रियों से अभी भी बंद दरवाज़ों के पारअभी-अभी ख़त्म हुआ है अधिकारों पर भाषणअभी-अभी कहा गया है लड़ो अपनी स्वतंत्रता के लिएअभी-अभी निकली है कई संगठनों की रैलीअभी-अभी गूँ...
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Tag :अभिव्यक्ति
  July 8, 2014, 2:18 pm
बीत गए थे जो फिर से क़िस्से दुहराने वाले हैंशोर बड़ा घनघोर है ये अच्छे दिन आने वाले हैंअभी समझ की देहरी तक जो पहुँचे हैं मुश्किल सेउन नादानों के फिर से सपने भरमाने वाले हैंदेख-भाल के सोच-समझ के खाद-पानी ये डाला हैनागफनी के पौधों से आलम हरियाने वाले हैंफूल दिखा कर सुंदरता ...
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Tag :ऐतराज़
  May 19, 2014, 8:59 pm
(हमज़बानके लिये 13 मई 2014 को लिखा गया आलेख)- रजनीश‘साहिल’16मई को जो अद्भुत नज़ारा पेश होने जा रहा है वह ऐतिहासिक साबित होगा या नहीं यह तो उसी दिन पता चलेगा, लेकिन इस नज़ारे के तैयार होने के पीछे की कहानी ज़रूर आने वाले वक़्त में याद की जाएगी। एक नहीं कई वजहों से। इस बार के लोकसभा चु...
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Tag :कुछ अखबारी कतरनें
  May 14, 2014, 2:18 pm
कल लल्लन मियाँ को पुलिस पकड़ कर ले गई। रात भर थाने में रखा और सुबह छोड़ दिया। वे रात को 12 बजे शहर से सटे तालाब पर अकेले भटक रहे थे, जब पुलिस ने उन्हें पकड़ा। अब पकड़ा या धर दबोचा ये तो पुलिस जाने या लल्लन मियाँ, पर किस्सा मजेदार था जो उन्होंने बताया।लल्लन मियाँ बोले- भाई मियाँ व...
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Tag :चुनाव
  May 6, 2014, 10:38 am
बात मानसिकता और अधिकारों की है------------------------------------------प्रेम का स्वीकार एक सहज स्वाभाविक बात है, लेकिन दिग्विजय सिंह की स्वीकारोक्ति के बाद सोशल मीडिया और ख़ासकर फेसबुक पर जिस तरह से उनके प्रेम का चर्चा और उस पर टिप्पणियों का तांता लगा है उसने एक स्वाभाविक-सी बात को अस्वाभाविक ...
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Tag :ऐतराज़
  May 2, 2014, 2:27 am
लल्लन मियाँ बोले - 'अमां यार, हम सोच रहे हैं कि अपने लौंडे को अगले सरपंची के चुनाव में खड़ा कर दें.'मैंने पूछा कि क्यों तो बोले - 'कल ताश का महल बना रहा था. टेबल हिल रही थी सो कमबख्त ने बगल की अलमारी में रखी गुटका रामायण टेबल के टूटे पाए के नीचे सरका दी. टेबल पर रखी अपनी इतिहास की ...
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Tag :चुनाव
  April 29, 2014, 6:53 pm
ज़िद पे अपनी वो अड़े हैं, हद्द हैहम इबादत में पड़े हैं, हद्द हैलाख समझाने की कोशिश हो चुकींचिकने लेकिन वो घड़े हैं, हद्द हैजिनको बहा देने थे सारे बाँध वोअश्क़ मोती से जड़े हैं, हद्द हैबेतरह टूटे हैं कई-कई बार हमहाँ मगर अब भी खड़े हैं, हद्द हैहाथ में है चाँद लेकिन पाँव तोअब भी मिट्...
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Tag :नज़्म
  March 10, 2014, 6:01 pm
सुबह-सुबह मोबाइल फोन की घंटी बजी तो आदत के मुताबिक नींद में ही हरा बटन दबाया और कान पर लगा लिया। सुनाई दिया- ‘मन न रंगाए जोगी कपड़ा रंगाए....’। हरिओम शरण की आवाज़ में कबीर की यही एक लाइन बार-बार सुनाई दे रही थी, लगा कि टेप एक जगह अटक गया है शायद, लेकिन पीछे से गूँजी दूसरी खुरदर...
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Tag :किसान
  November 9, 2013, 1:53 am
ठीक-ठीक याद नहीं पर शायद दसवीं या ग्यारहवीं में पढ़ता था, जब बड़े भाइयों और उनकी इप्टा, प्रलेसं वाली मित्र मंडली की सोहबत का असर मुझ पर होने लगा था और स्कूल के कोर्स में शामिल कहानियों से इतर भी हिन्दी साहित्य पढ़ने की ठीक-ठाक आदत विकसित हो चुकी थी। प्रेमचंद के 'गबन'और 'गो...
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Tag :आलेख
  November 6, 2013, 3:54 pm
गलती अपनी ही थीपरवाह ही न कीअब भुगतनी तो होगी ही तकलीफ़ हरारत महसूस होने पर हर बारगले से उतार ली कोई क्रोसिनटूटा शरीर, फैलने लगा दर्द तो गटक ली कॉम्बीफ्लेम या उबाल लिया देसी नुस्खा हल्दी वाला दूधख़ून में घुलते गए वायरस और हमरोकते रहे शरीर का गरम होनादबाते रहे आँख...
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Tag :कविता
  October 30, 2013, 3:51 am
कहते हैं कि अगर आप संगीत की बारीकियों को समझते हैं तो इसका आनंद दोगुना हो जाता है. सुर-ताल-लय, राग-रागनियाँ, आरोह-अवरोह के ज्ञान के साथ इस समंदर की लहरों का कुछ अलग ही भान होता है. कुछ अलग ही मज़ा आता है स्वरलहरियों पर तैरने का. पर जब मामला डूबने का हो, तब! .....तब कहाँ याद रहता ...
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Tag :याद
  October 26, 2013, 4:36 pm
ख़रामा ख़रामा गजब कर रहे हैंफ़स्ल-ए-मोहब्बत हड़प कर रहे हैंहमारी रगों में ज़हर भर रहे हैंथा उन्वान तो ख़ूबसूरत बड़ाअंजाम पर मुँह के बल गिर पड़ाकिरदार बदलते गए, रंग भीइक अफ़साने में हम सफ़र कर रहे हैंअपनी ज़मीं क्यों गई उनकी जानिबकोई बता दे कारण मुनासिबअपने ही घर से बे...
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Tag :गीत
  October 19, 2013, 1:34 am
ज़रा कल्पना कीजिये- 'एक पुरुष का सिर दर्द से फटा जा रहा है और आसपास से लड़कियां उसकी तरफ देखकर नाक-भौं सिकोड़ती हुई दूर-दूर से निकली चली जा रही हैं. फिर वो पुरुष सिर दर्द से निजात दिलाने वाली एक गोली खाता है, गोली खाते ही उसका सिर दर्द दूर होता है और लड़कियों की उसी भीड़ से ए...
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Tag :हम
  August 14, 2013, 11:00 am
एक ताज़ा ग़ज़ल -बज़्मे ख़ुश है सजी हुई रंग शाद डाले बैठे हैंये बात अपने तक रही कि ग़म संभाले बैठे हैंइक अजनबी सा शख़्स है रिश्ता है मुस्कान कायूँ भी हम जीने का इक अन्दाज़ पाले बैठे हैंग़म बरसता खूब है चश्म पुरनम भी मगरदिल में अब तक रंज की इक आग पाले बैठे हैंजब से हमने चाँ...
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Tag :ग़ज़ल
  August 5, 2013, 8:04 pm
अभी-अभी लल्लन मियाँ का फोन आया था। यूँ तो वे आसानी से होते नहीं हैं लेकिन बड़े परेशान थे। उनका परेशान होना ही गंभीर मसले का आभास देता है, सो इस बार तो वे बड़े परेशान थे। बोले- ‘भाई मियाँ गजब हो गया। मेरे मोहल्ले के सारे जानवर अचानक से विरोधी हो उठे हैं। गाय, भैंस, गधे, कुत्त...
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Tag :कुछ अखबारी कतरनें
  July 18, 2013, 3:47 pm
तीन साल पहले एक शेर कहा था, दो साल पहले दो और कहे और फिर तीन शेर अभी कुछ दिन पहले। तीन साल का सफ़र तय करके एक गज़ल बनी और मजे की बात यह कि मतला, जो किसी ग़ज़ल का प्रस्थान बिंदु होता है और सबसे पहले अस्तित्व में आता है, सबसे आख़िर में कहा गया। बहरहाल ग़ज़ल यूं है-हम रह गए थे बुल...
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Tag :ग़ज़ल
  July 17, 2013, 1:26 am
आसाननहींहोताकिआपकेकमीनेपनकेअभिनयकोदेखकरलोगआपकोसचमुचकमीनाहीमाननेलगजाएं।परउन्होंनेऐसाकरदिखाया।मुझेयादहैबचपनेमेंजबटीवीपरउनकीकोईफिल्मदेखरहाहोताथा, तोउनकीएंट्रीहोतेहीदर्शककहतेथे- ‘आगयागद्दार, जरूरकोईकमीनगीकरेगा।’ (मेरेगांवमेंविलेनकोगद्दारहीकहा...
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Tag :प्रोफाइल
  July 13, 2013, 12:14 am
ज़ुल्म बढ़ते थे पर झुका न गयाउनके सजदे में कुछ कहा न गयातेरी ख़्वाहिश तड़प के बोलूँ कभीहाय हमसे ये उफ़! कहा न गयाजबसे बाज़ार ख़बरें देने लगाखेत का हाल कुछ कहा न गयाआज बाज़ार में मैं उतरा थाएक ठप्पे के बिन बिका न गयालब को उसके गुलाब कैसे कहूँबात जिसकी से इक छुरा न गयाअब भ...
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Tag :ग़ज़ल
  June 28, 2013, 12:18 am
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