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रूप-अरूप

साँझ के झुटपुटे मेंछाये की तरहफैलती है उम्मीदपाँव का महावर ईर्ष्यादग्ध है अब तकउसके अधर आलते सेयोजन भर की दूरीदेह तय नहींकर पाती कभी पल मेंआमंत्रण परआत्मा क्षणांश मेंलिपटती है आकरआज भी रास्ता देखाप्रतिदिन की तरहदिन के अवसान मेंसूरज ढले-निकलेएक बार की विदाईसहस्...
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  February 23, 2018, 2:48 pm
जैसे खेलते हैं कुछेक गाँव में छुप्पम-छुपाई का खेल अब भी कुछ बच्चे, वैसे ही कभी खेलते थे आदिवासी बच्चेअत्ती-पत्ती कौन पत्तीअलग-अलग पेड़ की पत्तियों के रंग और गंध सूँघते थे,छूते थे पेड़, पत्ती और झाड़ों को पहचानते थे आदिवासी बच्चेखेल ही खेल में सीखते थे ला...
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  February 20, 2018, 3:12 pm
युवा दिलों की धड़कनों के लिए किसी महापर्व से कम नहीं है 'वेलेंटाइन डे'अर्थात 'प्रेम दिवस'। प्रत्येक वर्ष 14 फरवरी को यह मनाया जाता है। लेकिन इसे सिर्फ स्त्री-पुरुष की सीमा में बांधेंगे तो यह अपना असली मकसद खो देगा। यह पर्व हर उस रिश्ते के लिए है  जो प्रेम की डोर से बंधे है...
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  February 14, 2018, 9:44 pm
बहुत शोर है हवाओं का सरसरा रहे हैं पत्तेझूम रहे हैं पेड़ सभीधूलों का बवंडरउठ-उठ कर खिड़कियों के रास्तेबिछ रहा कमरे की फ़र्श परमन भी ज़रा अनमना सा हैबताए कोईयह बसंत है याहै पतझड़ की आहट.......
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  February 9, 2018, 1:28 pm
देखा मैंने चाँद को बढ़ते, घटतेफिर बढ़तेतिल-तिल कर आधा चाँद जब छुपा था धरती के साये मेंतब भी लगा था ख़ूबसूरतऔर जब लाल होते हुएग़ायब हुआनहीं लगा एक बार भीलगा है कोई ग्रहणछुपते-छुपते निकल ही आयामाघी पूर्णिमा कादूधिया चाँद...
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  January 31, 2018, 11:02 pm
जाने कहाँ गयीवोजो मेरे साथ रहती थीनहीं देखाबहुत दिनों से नाज़ुक कोंपलों परऊँगलियाँ फिरातेकबूतरों के झुंड कोधप्प से कूदकर डरातेरात कोतारों भरे आकाश मेंनक्षत्रों को झूठ-मूठ दौड़ातेजाने कहाँ गयीवोजो मेरे साथ रहती थीहर मौसम, हर सुबहहर शाम से प्यार था उसकोकभी बारिश ...
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  January 31, 2018, 2:03 pm
प्रकृति का उत्सव है बसंत।मौसम का यौवन है बसंत। फूलों के खिलने और धरती के पीले वसन में रंगने का समय है बसंत।यौवन का प्रतिनिधित्व करता है बसंत। इस संत धरती की ख़ूबसूरती इतनी अधिक बढ़ जाती है कि सब कुछ जवाँ लगता है। पेड़ पुराने पत्तों को छोड़ देता है, झाड़ देता है अपने तन स...
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  January 23, 2018, 5:09 pm
 "मन हुआ पलाश"काव्य संग्रह_ रश्मि शर्मा" : एक पाठकीय समीक्षा - कण्डवाल मोहन मदन "तन का वनफूल खिला - खिला सा / बिछुड़ा कोई मीत कल मिला - मिला सा / अलसाई प्रीत का / रतनार अक्स झिलमिला सा / किस का गुंजलक याद कर विहँस पडी हो अँगारमणिका ?.." (अंगार मणिका से ही )....एक कच्चे जुलाहे का कवित...
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  January 18, 2018, 6:28 pm
वक्‍त हि‍रण की तरह कुलांचे मार रहा है। कल बेहद बेहद ठंड थी। पि‍छले कई सप्‍ताह से बेतरह ठंढ़ है। आज धूप खि‍ली है...कल.....फि‍र कल......कि‍सी के रोके से कब रूका है वक्‍त.....फि‍तरत है.....ये जा..............वो जा।अालमीरे की गर्द झाड़ी तो लगा वक्‍त का आईना साफ हो गया.....कई कि‍ताबें, अनखुली...बेपढ़...
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  January 17, 2018, 2:04 pm
चंद्रभागा के तट पर, जहाँ समुद्र से समाहि‍त होती है नदी, आज वहीँ ,आखों में असीम आनंद लि‍ए प्राची वि‍शाल समुद्र में नदियों का मि‍लन देख रही थी, कि सहसा बालुई तट पर खड़ी प्राची के पैर सागर ने पखार लि‍ए। आह.....आनंद की अनुभूति, एक  गजब का आकर्षण होता है समुद्र का। प्राची का जी च...
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  January 17, 2018, 1:50 pm
इन दिनों ज़बरदस्त इच्छा हो रही है ख़ुद के साथ रहने की । ठंड इतनी ज़्यादा है कि धूप अपने पास बुलाती लगती है। एक वक़्त था जब सर्दियों की दोपहर माँ और आस-पास की चाची, बुआ सब एक साथ छत या आँगन में एकसाथ बैठतीं। सिलाई-बुनाई या फिर गपशप। मैं सोचती और कहती भी कई बार....ये धूप में क्य...
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  January 13, 2018, 2:55 pm
हमसे था कोई रिश्ता,इकरार तो करता हैछुप छुप के मुझे देखे,वो प्यार तो करता हैथम जाए मेरी सिसकी,मिल जाए सुकूँ थोड़ाकाँधे पे रखे सर वो ,इज़हार तो करता हैशिकवा करे दिल मेरा,मशरूफ मुहब्बत काहर रोज मुझे मिलकर तकरार तो करता हैवो दूर खड़ा मुझसे,पास आना भी गर चाहेदिल उसका है दीवाना ,द...
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  January 8, 2018, 2:33 pm
शाम उतर गयी पेड़ों के पीछे। मन भी धुँधलाया सा है जैसे कम रोशनी में आँखों को थोड़ी तकलीफ़ होती है स्पष्ट देखने के लिए।मैं भी समझ नहीं पायी हूँ कुछ रिश्तों का ताना-बाना। बार-बार कुछ जुड़ता है...टूटता है। आस भी बड़ी अजीब चीज़ होती है ..ज़िद्दी...टूट के फिर जुड़ जाती है एक बार और...
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  November 11, 2017, 12:11 pm
शर्ट ख़रीदा उस दिन । अपनी फ़ेवरेट ब्लू जीन्स के साथ व्हाइट शर्ट। झक्क सफ़ेद। उसने कहा - 'एकदम व्हाइट शर्ट क्यों पहनती हो। कोई प्रिंट लेना था। कुछ लिखा ही होता तो क्या बुरा था ...'मैंने कहा- पेन देती हूँ। तुम ही लिख दो। देखूँ ज़रा क्या लिखते हो .....'You aur mine '...बस ये तीन शब्द लिख दूँग...
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  November 9, 2017, 10:54 am
दुनिया के शोर सेऊबा हुआ मनएकांत तलाशता हैजब उस एकांत काशोर भीबहुत तीखा हो जाता हैतो आवाज़ लगाता हैउसेजिससे उम्मीद हो किइन सब से परे ले जाएगामगरदुनिया अपने मन के जैसीनहीं होतीआपको दुनिया के साथ- साथख़ुद से भी लड़ना होता हैक्योंकिज़रूरत के वक़्त आपकभी किसी को पास नही...
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  November 6, 2017, 2:06 pm
तुम्हारे नाम की शाम अब तक है मेरे पास नहीं सौंप पायी किसी को भी अपनी उदासी अपना दर्द, अपना डर और अपना एकांत भीबस करती रही इंतज़ारना तुम लौटेना कोई आ पाया जीवन मेंतुम्हारे नाम सौंपी गयी शाम परकिसी और का नामकभी लिख नहीं पायीवो वक़्तअधूरा ही रहा जीवन मेंकुछ के रा...
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  November 2, 2017, 10:07 pm
जड़ें कहीं जमती नहींतो पीछे कुछ भी नहीं छूटताज़िंदगी ख़ानाबदोश सीरही अब तकजब तक रहे, वहीं के हुएफिर कहीं के नहीं हुएलगता है इस बारजड़ें जम गईं हैं गहरे तककष्ट होता हैनिकलने में, बढ़ने मेंछूटने का अहसासलौटा लाता है बार-बारजंगल सी खामोशीमहसूस होती हैकई बार आसपासरात वि...
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  November 1, 2017, 1:45 pm
धागा, जो प्रेम का होता है धागा, जो मोतियाँ पिरोता है धागा, जो फूलों की माला गूँथता हैवही धागामाटी को माटी से जुदा करता हैअलग रूप, अलग रंग,अलग आकार देता हैधागा,जोड़ता ही नहीं, तोड़ता भी हैजैसे प्रेम मेंसँवरते नहीं,कुछ बिखर भी जाते हैंमाटी का तनमाटी में मिलना है ए...
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  October 11, 2017, 10:22 pm
ओ साथीतेरे इंतज़ार में गिन रहेसमुद्र की लहरेंजाने कितने समय सेसमेट लो अपने डैनेमत भरो उड़ानलौट आओ वापससमुद्र वाली काली चट्टान परजहाँ समुन्दर कानिरंतर प्रहार भीपथ से विचलित न कर पायामैं थमा हूँ अब भीमेरी एकाग्रता और इंतज़ार कीमत लो और परीक्षाकि आना ही होगा एक दिन औ...
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  September 7, 2017, 12:55 pm
अपनी अँगूठीकहीं रखकर भूल गयीभूल जाती है अक्सरवो इन दिनोंदराज़ की चाबी कहीं कभी गैस पर कड़ाही चढ़ाकरकई बार तोगाड़ी चलाते वक़्तचौराहे पर रूककर सोचने लगती हैकि उसे जाना कहाँ थावो भूलती हैबारिश में अलगनी से कपड़े उतारनाचाय में चीनी डालनाऔर अख़बार पढ़ना भीआश्चर्य है...
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  September 2, 2017, 8:04 pm
दर्दइतना हल्‍का भी नहींकिशब्‍दों के गले लगरो लेमिट जाए।रेशे-रेशे में रवां हैजोदिया तुमनेऔर अनचाहे हीस्‍वीकारा मैंने।एक सूत बराबर थीखाईजोड़ने के बजायदो ईंट तुमने हटाईंदो मैंनेखिसकाई।अबटूटा जुड़ता नहींखालीपनभरता नहींखिसकी ईंटो सेकमजोर हो रहीअभेद इमारत।गिर जा...
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  August 30, 2017, 8:53 pm
चुप की छाया नेनिगल लिया उस वक़्त कोजो एक खूबसूरतलम्हा बन सकता था।समय भीहरसिंगार साझड़ता है धरती परऔर धूल में लिपट जाता है।रात हसीन लगती हैजबआँखों में कोई ख्वाब होऔर नींद से दुश्मनी हो जाएकुछ आँखो कोसपने गिराने की आदत होती हैखो जाने के बाद सब स्वीकारनाअकेलपन से किया सम...
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  August 28, 2017, 12:08 pm
नीलगगन की थाली मेंमक्खन जैसे बादल ।सूरज घेवर के टुकड़े सा नदियां जैसे छागल ।बर्फीली चादर तान सुमेरु मस्त धूप में सोए ।श्योक नदी के तट किसनेरेत के टिब्बे बोए ।मरीचिका सी लेह भूमिमन को कर गई पागल ।...
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  August 25, 2017, 12:54 pm
मि‍त्रों.....आपके साथ एक खुशी साझा करने का मन है। मेरे दूसरे एकल कवि‍ता संग्रह का कल दि‍नांक 20 अगस्‍त को लोकार्पण हुआ। साहि‍त्‍यकार महुआ माजी मुख्‍य अति‍थि‍ थीं और अध्‍यक्षता की थी कुलपति‍ डा. रमेश कुमार पांडेय जी ने। कुछ तस्‍वीरें आपके लि‍ए ... ...
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  August 21, 2017, 4:58 pm
"डूबती सांझ का सूरज सदा देद‍िल में है क्‍या आज बता देनद‍ियों के संगम में भीगी है यादेंसामने आकर तू भी मुस्‍करा दे "...
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  August 8, 2017, 1:47 pm
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