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सुनेत्रा sunetra

गुज़र गया फूलों का मौसम चर्चा फ़िऱ भी फूल की।इसी बात पर और कंटीली काया हुई बबूल की।जुड़ने वाले हाथ कटे हैं झुकने वाला सिर गिरवीऐसा लगता है मैंने मंदिर में आकर भूल की।रोज़ खुली रामायण पढ़ते-पढ़ते जाते छोड़ पिताबड़े प्यार से हवा बिछा जाती है परतें धूल की।राजतिलक की रस्...
सुनेत्रा sunetra...
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  July 11, 2011, 11:05 pm
बाहर आने को मुश्किल से कोई दुख राज़ी होता है।इन पानी जैसी ग़ज़लों का पत्थर सा माज़ी होता है।रूहानी सेहत की बातें रहने दो अब मरहम बाँटोहर ग़म होता है जीते जी, हर ज़ख्म मज़ाज़ी होता है।आशिक हो तो क़ुर्बत रखना काले तेज़ाबी लम्हों मेंचांदनी रात में छत पर तो हर शख़्स नियाज...
सुनेत्रा sunetra...
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  July 7, 2011, 11:54 pm
पूरी साड़ी फटी हुई है, नयी किनारी दिल्ली में।तरल आग की लहर बेचती बर्फ हमारी दिल्ली में।हर मज़हब तंदूर-छाप, हर नीयत ख़ुद में खोयी सीखंज़र जिसके हाथ लगा वह शख़्स शिकारी दिल्ली में।साबुत जूते, ज़ख्मी तलवे कैसी किरचें बिखरी हैंरोज़ बुतों की आईनों से मारामारी दिल्ली में।...
सुनेत्रा sunetra...
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  July 6, 2011, 11:20 pm
शाम जो सुर्ख परिंदे की तरह उड़ती हैमेरे मुस्ताक  नशेमन की तरफ मुड़ती हैपर सरे राह चटख रंग बिखर जाता हैगर्द-आलूद हवाओं में बिखर जाता हैनीमतारीक़ मनाजिर का असर क्या कहिएराख जाती है  निगाहों पे पसर क्या कहिएराख घुलती है लहू लाल नहीं रहता हैजान ओ दिल का वही हाल नहीं रहत...
सुनेत्रा sunetra...
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  July 5, 2011, 2:18 pm
हावड़ा से जाती है हावड़ा को आती हैचलती है समय चाल करती है कदमताललोगों को चलाती हैएक साथ सैकड़ों पैर बन जाती हैबिछुड़ती-बिछुड़ाती हैमिलती-मिलाती हैएक अदद दिन में कई सदियां बनाती हैमिदनापुर लोकलचलती है पटरी पररहती है पटरी परसुनती है है पटरी परसहती है पटरी परकथनी की भाषा मे...
सुनेत्रा sunetra...
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  December 1, 2010, 10:32 am
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