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MERI KAVITAYEN

                         देश को खाते रहे   दीमकों से हम इधर घर को बचाते रह गए ,   और  कीड़े  कुर्सियों के,  देश  को खाते  रहे.   हम इधर लड़ते रहे आपस में दुश्मन की तरह,   उधर  सरहद  पार से  घुसपैठिये  आते  रहे .   जल रहा था देश , दंगों से, धमा...
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  November 11, 2013, 4:25 pm
   पिछले करीब दस माह से कैंसर से लड़ रहा हूँ। यह जंग अभी भी जारी है , इसलिए ब्लॉग पर सक्रियता भी बाधित रही। आप मित्रों की शुभकामनाओं का ही असर है कि अब बहुत  सुधार है। आशा है मेरी अनुपस्थिति और जवाब न दे पाने की विवशता को समझेंगे।                       हिम सदृश मुझको गलना ही है सूर्...
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  May 2, 2013, 8:51 pm
   पिछले करीब दस माह से कैंसर से लड़ रहा हूँ। यह जंग अभी भी जारी है , इसलिए ब्लॉग पर सक्रियता भी बाधित रही। आप मित्रों की शुभकामनाओं का ही असर है कि अब बहुत  सुधार है। आशा है मेरी अनुपस्थिति और जवाब न दे पाने की विवशता को समझेंगे।                       हिम स...
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  May 2, 2013, 8:51 pm
               कभी रस्ता नहीं मिलता जमीं  महगी , दुकाँ   महगी , दवा महगी, दुआ महगी ,फ़कत इनसान के, कुछ भी यहाँ सस्ता नहीं मिलता।कभी जोरू के ताने, तो कभी बच्चों की फरमाइश ,गिरस्ती में  वही हर रोज जैसी  जोर आजमाइश ,गरीबों की किसी बस्ती में, जब भी झाँक कर देखो ,किसी घर में बशर कोई, कहीं...
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  January 9, 2013, 5:46 pm
                             "झूठ बोलो"                                   सच ! सियासत क्या,अदालत में भी अब मजबूर है,झूठ  बोलो,  झूठ  की  कीमत  बहुत  है  आजकल।जो  शराफत  ढो  रहे  हैं , हर  तरह  से  तंग  हैं ,बदगुमानों की कदर, इज्जत बहुत है आजकल।छोड़िये ईमानदारी , छोड़िये रहम-ओ-करम,लूट कर भरते र...
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  December 29, 2012, 6:15 pm
                             "झूठ बोलो"                                   सच ! सियासत क्या,अदालत में भी अब मजबूर है, झूठ  बोलो,  झूठ  की  कीमत  बहुत  है  आजकल। जो  शराफत  ढो  रहे  ह...
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  December 29, 2012, 6:15 pm
कौन करता है इबादत , सब तिजारत कर रहे ,ख्वाहिशें पसरी  हुई  हैं ,  हर  इबादतगाह  में।भीड़ से ज्यादा  कहीं अब , मन्नतों  की  भीड़ है,चर्च, गुरुद्वारों, शिवालों, मस्जिद-ओ-दरगाह में।कितनी खुदगर्जी , कि सौदेबाजी भी भगवान से,भीख   देते  , रहमतें  हैं   देखते   अल्लाह   में।मजहबों   के   ...
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  December 7, 2012, 11:21 am
                                                 मुक्तक                                               (1) हवस  इनसान को  अंधा बना देती है ,  ये सच है। हवस  किरदार  को गंदा बना  देती है ,  ये सच है।हवस  में आदमी , फिर आदमी रह ही कहाँ जाता ,हवस , इज्जत को भी  धंधा बना देती है , ये सच है।                          ...
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  December 2, 2012, 6:23 pm
                                     खुदा ज़न्नत  है  आसमान में , ये तो  पता नहीं ,दोजख जमीन पर है , इसका इल्म है हमें।जो आसमान पे है उस खुदा का खौफ क्या ,खुद को खुदा समझने वाले आदमी से डर।हमको लगता है, खुदा बन्दों से खुद खाता है खौफ ,इसलिए  चाहे  जो हो , वह  सामने  आता  नहीं।कौन  कहता  है  , खुदा ...
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  October 18, 2012, 10:02 am
तेल  बाती  से  परिपूर्ण  हूँ , मुग्ध  हूँ ,प्रज्ज्वलन की मिली पर कला ही नहीं।वे  दमकते  रहे ,  मैं  तमस  से  घिरा ,वह  दिया  हूँ ,  कभी जो जला ही नहीं।सैकड़ों सांझ ले आस जीता रहा ,कोई स्पर्श दे , थपथपाये मुझे ,मेरी बाती को भी, कोई निज ज्योति से ,जोड़ , स्पन्दित कर जगाये मुझे ,पर वो हत...
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  October 10, 2012, 9:58 am
परिंदों के घरौंदों को , उजाड़ा था तुम्हीं ने कल ,मगर अब कह रहे हो , डाल पर पक्षी नहीं गाते।तुम्हीं थे जिसने वर्षों तक , न दी जुम्बिश भी पैरों को ,शिकायत किसलिए , गर दो कदम अब चल नहीं पाते ?वो पोखर , झील , नदियाँ , ताल सारे पाटकर तुमने ,बगीचे  ,  पेड़  -  पौधे ,  बाग़  सारे  काटकर  तुमन...
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  September 29, 2012, 10:49 am
उम्मीद की  दरिया में  कवँल  कैसे  खिले  है ,लम्हों की खता की सज़ा , सदियों को मिले है।मज़बूर बशर की कोई सुनता नहीं सदा ,वह बेगुनाह होके भी , होठों को सिले है।इनसान की फितरत में ही , इन्साफ कहाँ है,जर, जोर, ज़बर हैं जहां , सब माफ़ वहाँ  है।हर दौर गरीबों पे सितम , मस्त सितमगर ,कब  मं...
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  September 22, 2012, 9:42 am
ज्यों गंगा संग विविध नदियाँ , सरस्वति है , कालिंदी है  /त्यों अपनी अन्य सखियों संग , बड़ी बहना सी हिन्दी है  /इसी में  कृष्ण  का  शैशव ,  इसी  में  राम  का  वैभव ,ये भारत भाल चन्दन  है , ये  भारत  माँ की  बिंदी है  /यहाँ   उर्दू  है  ,  बंगाली  ,  मराठी  और  गुज़राती ,तमिल, तेलगू , असमिया...
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  September 13, 2012, 9:16 pm
       हकीकत को तेरी इक जिद ने अफसाना बना डाला /तेरी  मासूमियत  ने , मुझको   दीवाना  बना डाला /ये दुनिया भी तेरी ही हमनवा , दुश्मन हमारी है ,तुझे रोशन शमा  ,तो मुझको परवाना बना डाला /तू समझे या न समझे , अपने दिल को तेरी फुरकत में ,हमेशा  के  लिए  मैंने  ,  सनमखाना  बना  डाला /तेरी ही य...
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  September 12, 2012, 9:14 am
जागती रातों में , सपनों का खजाना हो  तुम  /कैसे बतलाएं , कि  जीने  का बहाना हो तुम  /अब तो हर साँस में , धड़कन में तुम्हारी ही रिदम ,तुम  मेरी  नज़्म , रुबाई  हो ,  तराना  हो  तुम  /मेरे  गुलशन  में , खिलाये हैं  फूल तुमने ही ,रंग- ओ - खुशबू से , सजाये हैं फूल तुमने ही ,इस इनायत का , तहे दिल ...
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  September 2, 2012, 8:11 pm
जीवन ऐसे जियो , कि जैसे दीपक जीता है  /तब भी लड़ता , तेल पात्र जब होता रीता है  /भरा पात्र हो ,  दीपशिखा  तब रहती तनी खड़ी  ,कीट - पतंगों की भी , उस पर रहती लगी झड़ी  /झप - झप करते आते वे , लेकिन जब टकराते ,कहाँ तेज  सह  पाते ,  पंख  जलाते , मर जाते  /पवन वेग  भी ,  उसे बुझाने  का  प्रयत्न  कर...
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  August 26, 2012, 10:50 am
जड़ी शीशे में जो तस्वीर पुरानी होगी  /नयी तामीर तुझे खुद से करानी  होगी  /आइना  सिर्फ  दिखाता  है  बाहरी  सूरत  ,क्या वो तस्वीर , किसी रूह की मानी होगी ?शराब सी ये ज़िंदगी है , बहकना न कहीं  ,आग में आग  और पानी में पानी होगी  /ज़िंदगी रोज नए रंग बदलती है खुद  ,ज़िंदगी है , तो नयी रोज क...
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  August 17, 2012, 12:00 pm
राहे -गुनाह चल के , बता  तुझको  मिला क्या  ,छलनी में गाय दुह के ,मुकद्दर का गिला क्या ?इंसान  होके  कर  रहा , इंसानियत  का  खूं  ,अन्दर के तेरे आदमी का , दिल न हिला क्या ?जितना है , उससे और भी ज्यादा की आरजू ,इंसान  की  हवस की ,  यहाँ  कोई  हद नहीं ,इस  चंद - रोजा  ज़िंदगी  के  वास्ते  फरे...
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  August 12, 2012, 9:16 am
जो आसमान पे है उस खुदा का खौफ क्या ,खुद को खुदा समझने वाले आदमी से डर  /गैरों में कमी खोज रहा , खुद से बेखबर ,नासेह तू नहीं है , खुद अपनी कमी से डर /दोजख - बहिश्त दोनों , तखैयुल की चीज हैं ,तू जिस जमी की गोद में है , उस जमी से  डर /हिटलर , मुसोलिनी -ओ - सिकंदर चले गए ,शाह -ए - जहान तू भी नह...
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  August 9, 2012, 10:31 am
जो मेहनत और हिकमत को ,  इबादत मान लेता है  /उसे मिलता है वह सब कुछ , जो चाहत ठान लेता है  / तवंगर  भी  कदमबोशी  को  तब  मज़बूर  होता  है  ,वो फाकेमस्त ! जिस दम अपनी ताकत जान लेता है /बदल जाती हैं हाथों  की  लकीरें , और  किश्मत भी ,बशर जब जीतने की जिद , को मन में ठान लेता है /मचलता दिल , मग...
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  August 1, 2012, 1:22 pm
प्रिय महोदय                                    "श्रम साधना "स्मारिका के सफल प्रकाशन के बाद                                                      हम ला रहे हैं ..... स्वाधीनता के पैंसठ वर्ष और भारतीय संसद के छः दशकों की गति -प्रगति , उत्कर्ष -पराभव, गुण -दोष , लाभ -हानि और सुधार के उपायों पर आधारित सम्पूर्ण विव...
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  July 31, 2012, 9:11 am
या ढलें वक़्त के सांचों में, हवा संग बहिये  /या लड़ें वक़्त से  , इतिहास  रचाते  रहिये  /या चलें देख किसी और के पैरों के निशाँ  ,या निशाँ वक़्त के , सीने पे बनाते रहिये  /या जियें खुद के लिए , खुद की परस्ती के लिए ,या  जियें  सबके  लिए  ,  प्यार  लुटाते  रहिये  /या रहें तन के खड़े , खुश्क प...
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  July 26, 2012, 1:17 pm
पकड़ के बाहँ चलूँ मैं , ये ज़रूरी  तो नहीं  /पुरानी  राह चलूँ  मैं ,  ये ज़रूरी  तो नहीं  /तुम्हें जो ठीक लगे , शौक से करते रहिये ,वही गुनाह करूँ  मैं , ये ज़रूरी  तो नहीं  /जो गुनहगार हैं , उनको सज़ा मिले तो मिले ,बे-वजह आह  भरूँ  मैं , ये  ज़रूरी  तो नहीं  /बहुत से लोग , सिर झुका के चल र...
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  July 22, 2012, 3:32 pm
इस चकाचौंध में , मतलबी हर नज़र  /गाँव अपने से  हैं  , अज़नबी से शहर  /धर्म-ओ -मजहब वहां , जातियां हैं मगर ,रिश्ते - नातों की भी , थातियाँ  हैं  मगर ,पर शहर में किसे , कौन , कब  पूछता  ,मरने - जीने से  भी , लोग  हैं  बेखबर   /गाँव अपने से  हैं  , अज़नबी से शहर  /दौड़ती  -  भागती   जिन्दगी  है  यह...
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  July 13, 2012, 12:15 pm
(156) हमें रोना नहीं आता  वो बेशक हैं मुसलमां , सिख हैं , हिन्दू हैं , ईसाई हैं , मगर हमको सिवा इन्सां के , कुछ होना नहीं आता / वो मालिक एकड़ों  के हैं ,  हमारी क्यारियाँ छोटी , वजह ये है , कि हमको नफरतें बोना नहीं आता  /वो चलती आँधियों को देखकर , मुह फेर लेते हैं ,हमें गर तल्ख़  हो माहौ...
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  July 13, 2012, 11:47 am
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