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उन्मेष …

तेरी दुनिया का हर दस्तूर हो जाऊँमैं तेरी माँग का सिन्दूर हो जाऊँमेरी आँखें रही हैं मुन्तज़िर कब सेतेरी आँखों का कब मैं नí...
उन्मेष …...
Tag :
  May 30, 2015, 8:12 am
बहता सरल समीर तुम्हारी आँखों मेंबनती एक नज़ीर तुम्हारी आँखों मेंधीरे-धीरे ज्यों-ज्यों खुलती जाती हैंसुबह की किरणों सी &...
उन्मेष …...
Tag :प्रेम
  May 27, 2015, 12:40 pm
बिहार के जनता परिवार महाठगबन्धन के ताज़ा राजनैतिक हालात पर कुछ लिखा गया...क्या पुराना क्या नवेला देखियेनीम पर चढ़ता करेला...
उन्मेष …...
Tag :जनता
  May 22, 2015, 8:10 pm
कई दिनों बाद आज बैठे-बैठे ग़ज़ल हो गयी...अरसे बाद वियोग शृंगार लिखा गया..देखें ... :)"कच्ची दुपहरियों में जामुन के नीचे वह बाट जोहत&...
उन्मेष …...
Tag :वियोग
  May 18, 2015, 4:09 pm
लो यह आया मधुमास प्रिये!कुछ मैं बोलूँ, कुछ तुम बोलोवनचारिणि हरिणी के जैसेसुन्दर नयनों के पट खोलोबस, आज ज़रा जी भर करकेकुछ मैं देखूँ, कुछ तुम देखोप्रिये! गुलाबी पंखुडियोंजैसे होठों से कुछ बोलोअब तलक तुम्हारी कोकिल-सीबोली को मैं न सुन पायाशब्दों के प्यासे कानों मेंथोड...
उन्मेष …...
Tag :प्रणय
  February 17, 2015, 10:57 pm
ग़रीबों की जो बस्ती है, उसी में, हाँ, उसी में हीज़माना पोंछता है आस्तीनें, हाँ, उसी में हीसितमगर को सितम ढाने में कुछ ऐसा मज़ा आयाकि आकर फिर खड़ा मेरी गली में, हाँ, उसी में हीहै कुदरत की अजब नेमत, लुटाने से ही बढ़ती हैकि सब दौलत छिपी है इक हँसी में, हाँ, उसी में हीवो है अच्छी मगर डर ह...
उन्मेष …...
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  August 22, 2014, 6:06 am
ये जो  भी चंद  शेर लिखे गए हैं, इनमें शायद साहित्य जैसा कुछ नहीं हो...मगर सच्चाई पूरी है..कथ्य को पूरी शिद्दत से जिया है, जाना है, महसूस किया है... मेरे ज़हन में उतर कर पढ़ियेगा तो शायद आप ख़ुद भी कुछ पुरानी यादों में गोते लगा आइयेगा... :)  रिश्तों में सुबह की हवा सी ताज़गी रहीये ...
उन्मेष …...
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  August 3, 2014, 4:48 pm
सबको ही मुहब्बत ने तो मजबूर किया हैतुझको न किया हो, मुझे ज़रूर किया हैउस शाम को दिखी तेरी पहली ही झलक नेआँखों को मेरी तब से पुरसुरूर किया हैअपलक निहारता हूँ मैं लेटा हुआ छत कोइस काम ने मुझको बड़ा मसरूफ़ किया हैसब यार मेरे रश्क भी करने लगे हैं अबअपनी पसंद ने मुझे मगरूर किया ह...
उन्मेष …...
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  August 2, 2014, 7:59 am
दिन भर मन-ही-मन क्या-कुछ गुनती रहती हैमाँ बैठे-बैठे रिश्ते बुनती रहती हैनज़रों को दौड़ा लेती है हर कोने मेंमाँ घर की सब दीवारें रँगती रहती हैजो भी हो थाह समन्दर की, उससे ज़्यादामाँ गहरी, गहरी, गहरी, गहरी रहती हैधीरे-धीरे जैसे-जैसे मैं बढ़ता हूँमाँ वैसे-वैसे ऊँची उठती रहती हैघ...
उन्मेष …...
Tag :बचपन
  July 31, 2014, 4:23 am
सुनने के, सुनाने के लिए कुछ भी न रहाअब तुमको मनाने के लिए कुछ भी न रहायादों को तेरी, आँख से मैंने सुखा दियापलकों को भिगाने क...
उन्मेष …...
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  July 12, 2014, 12:59 pm
अच्छी अंग्रेज़ी में लिखने पर लोग आपकी भाषा की तारीफ़ करते हैं, अच्छी हिन्दी में लिखने पर वही लोग कहते हैं कि लिखा तो अच्छा है लेकिन भाषा क्लिष्ट है। अपने अज्ञान का ठीकरा भाषा की शब्द-सम्पदा पर फोड़ने वालों को मुँह लगाने में कोई सार नहीं है। ऐसों से प्रभावित होकर अपना स्वाध...
उन्मेष …...
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  July 1, 2014, 9:22 pm
मैं लिखता हूँया लिख देता हूँया कि कागज़ पर स्याही से यूँ ही कुछ बना देता हूँपता नहीं..लेकिन ज़रूरी नहीं कि जो कुछ लिखा गयावो मेरे साथ घटा भी होदेखता-सुनता हूँ मैंअपने आस-पासचीज़ों को, लोगों कोकभी नहीं भी देखता,नहीं भी सुनता केवल सोच भर लेता हूँलेकिन हाँ,इतना पक्का हैकि काग...
उन्मेष …...
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  May 14, 2014, 9:53 pm
कलम लिखती हैसब कुछजो उससे लिखवाया जायेजैसे उसे घुमाया जायेकभी सच,तो कभी बस कल्पनाकभी कुछ कम,कभी कुछ ज़्यादा भीहाँ,सुख-दुःख भी..सुख सुन्दर होते हैंअज़ीज़ होते हैंअपने भी हो सकते हैंकिसी और के भीपढ़े जाते हैंकिसी और के हों तो जल्दी भुला दिए जाते हैंअपने हों तो ख़ुशी एक और बार ...
उन्मेष …...
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  May 13, 2014, 6:31 pm
कहीं आते-जाते,उठते-बैठते,उसे लोग मिलतेबात-चीत होतीपरिचय आरम्भ होता-"मेरे पिता अमुक काम करते हैं..."वह अक्सर सोचताकि लोग क्&#...
उन्मेष …...
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  May 12, 2014, 10:00 pm
आसमान...उनमें से किसी के लिए हीरों जड़ी चादरकिसी के लिए चाँद-तारों से सजा औंधा थालकिसी के लिए हल्की नीली रेशमी ओढनी की मानिन्दकभी रोशनी की जगहतो कभी बरसात से भरे बादलों का घरकभी 'ऊपर वाले'की आरामदेह रिहाइशगाह...वही आसमान...मेरे लिए तुम्हें देखने, तुमसे बतिया लेने का ज़रियात...
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  May 3, 2014, 11:34 am
हालाँकि मैं "आम आदमी पार्टी"की विचारधारा से कई मुद्दों पर सहमत नहीं हूँ, फिर भी जब वे आये थे तब के उनके उद्देश्य के साथ आज भी मेरा मत है.. पढ़िए एक रचना..आज ही सुबह लिखी है..कोई प्रधानमन्त्री बनकर कुर्सी पर चुप हो बैठा हैकोई अपने दल के भीतर ही झगड़ों वाला नेता हैदो बेईमान दल कर ...
उन्मेष …...
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  March 16, 2014, 11:08 am
सुबह की शुरुआत..एक ताज़ा नज़्म दुनिया के सबसे खूबसूरत रिश्ते के नाम..बहुत कम लिखा है..लेकिन जो भी है..पढ़िए..ज़रा देखो इधर आकर, ये कैसा शोर आता हैकि बढ़ जाती है धड़कन, कौन ऐसे मुस्कुराता हैबहुत दिन बाद आता हूँ मैं अपने घर के आँगन मेंमुझे जब माँ नज़र आती है, बचपन दौड़ आता हैमे...
उन्मेष …...
Tag :घर
  September 12, 2013, 8:13 am
अन्धा है कानून, न इसको दीखेलम्बे हाथों से भी किसको खींचे?संविधान अविधान हुआ जाता है!भारत का निर्माण हुआ जाता है!Courtesy: Googleआयुर्बन्धन की यह विषम कड़ी हैजघन्य अपराधों को छूट बड़ी हैभारत की बेटियाँ सिसकती जायेंहम क्यों हाथ धरे बैठे रह जायें?निज-कर्तव्यों की कर लें अब रक्षाइ...
उन्मेष …...
Tag :delhi
  September 1, 2013, 6:28 pm
भारत! संज्ञा नाम हैकर्ता है, निष्काम हैकर्म भी, क्रिया भी, तु हीरमने वाला राम हैतेरा भाव सुगीत हैकारक- परमपुनीत हैजीवन की आशा लिएगौरवमयी अतीत हैतेरा ही अभिमान होतेरा सुयश बखान होएक यही अभियान होतुझमें रत मन-प्राण होंदेश! तुझे वरदान हैदर्शन का सुज्ञान हैईश्वर का, महिमा...
उन्मेष …...
Tag :भारत
  August 13, 2013, 9:58 pm
कुछ समय पूर्व फेसबुक पर इस प्रसंग को उठाया था। आज एक चर्चा के दौरान फिर एक वैसा ही अनुभव हुआ तो फेसबुक की उस सामग्री को यहाँ भी पोस्ट कर रहा हूँ। हम अक्सर तब गलती कर बैठते हैं जब हम आस्था को केवल भक्ति से जोड़ते हैं। यहीं से मेधा बाधित होने लगती है। तुच्छ स्वार...
उन्मेष …...
Tag :बुद्धि
  August 6, 2013, 12:29 am
अपनी तन्हाइयों से  मुहब्बत करो अब चलो ग़म ग़लत करके आगे बढ़ो ये इशारे जो करती हैं खामोशियाँ इनको समझो, परखने की जिद ना करो इन हवाओं के रुख़  में भले घुल रहो इनसे लड़ने का दम भी जिगर में रखो जब भी मौक़ा मिले तुमको, ऐ मेरे दिल!अपनी रूबाइयों की मरम्मत करो हम मुहाजिर हैं इस...
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  October 25, 2012, 10:07 pm
मैं अब कुछ बेवफ़ाई चाहता हूँकि ख़ुद से ही रिहाई चाहता हूँजज़्बो-बज़्म की जो रोशनी हैंमैं उनकी रहनुमाई चाहता हूँये जो भी मुझसे मेरे फ़ासले हैंमैं इन सबकी जुदाई चाहता हूँसदा मेरी, ज़मीं से ताफ़लक, दो-जहाँ में दे सुनाई, चाहता हूँ'तख़ल्लुस' कुफ़्र की पहचान है येकि बन्दा हूँ, खुद...
उन्मेष …...
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  October 11, 2012, 3:22 pm
गर्दिश-ए-ख़याल  से बाहर निकल के देखऐ यार मिरे! अपनी बनावट बदल के देख मुश्किलें हालात से पैदा नहीं होतीं आ बैठ, ज़रा सब्र की ताक़त में ढल के देख रंगीन है ये दुनिया, रंगीन ज़मानातू एक सितारे को उसकी शफ़क़  में देख गुस्ताख़ हैं तहज़ीब के अंदाज़ निराले अपने अदब से इनकी आदत सँभ...
उन्मेष …...
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  September 24, 2012, 12:10 am
..अब इस बार कुछ थोड़ा सा अलग...न सुनने को कुछ है, न कहने को कुछ हैन तो आज दिल के बहकने को कुछ हैमेरी आरज़ू की बुलन्दी की खातिरन दरिया मेँ कुछ है, न सहरा मेँ कुछ हैबताए ज़रा चाँद को भी तो कोईन उसकी चमक मेँ दहकने को कुछ हैसूरज से कह दो मशालेँ जला लेअभी और उसमेँ न जलने को कुछ हैगलतफ...
उन्मेष …...
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  June 26, 2011, 4:35 pm
स्वकीयता और परकीयता -पारस्परिक वैलोम्य में अवगुण्ठित दो भाव,एक-दूसरे की वैयक्तिकता की गरिमा का सम्मान करते हुए,अपनी शुचिता की मर्यादा में रहते हुए...सर्वथा विपरीत,किन्तु..एक-दूसरे के चिर-पूरक...सदैव एकाकी,किन्तु..स्वयमेव परिपूर्ण...एक-दूसरे की विरोधी उपस्थिति के सत्य से...
उन्मेष …...
Tag :
  June 25, 2011, 1:36 pm
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