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कहां आवाज़ देनी थी, कहां दस्तक लगा बैठे.चिता को आग देने में हथेली ही जला बैठे.मिला मौका तो वो ज़न्नत को भी दोज़ख बना बैठे.जिन्हें सूरज उगाना था, दीया तक को बुझा बैठे.अलमदारों की बस्ती में लगी थी हाट गैरत कीहमारे पास इक खोटा सा सिक्का था, चला बैठे.बदी फितरत में थी ताउम्र बदक...
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  July 10, 2018, 5:34 pm
जिसे ज़न्नत बनाना था उसे दोजख़ बना बैठे.चिता को आग देने में हथेली ही जला बैठे.ख़ुदा जाने ये कोई हादसा था या कि नादानीजहां सूरज उगाना था, दीया तक को बुझा बैठे।-देवेंद्र गौतम...
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  July 4, 2018, 2:07 am
चार तिनकों का आशियाना हुआ,आंधियों में मेरा ठिकाना हुआ।जिसको देखे बिना करार न था,उसको देखे हुए जमाना हुआ।मरना जीना तो इस जमाने मेंं,मिलने-जुलने का इक बहाना हुआ।हर कदम मुश्किलों भरा यारबकिस मुहूरत में मैं रवाना हुआ।और दुश्वारियां न कर पैदा,बस बहुत सब्र आजमाना हुआ।भूल ...
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  June 11, 2018, 2:10 pm
ग़म की धूप न खाओगे तो खुशियों की बरसात न होगी.दिन की कीमत क्या समझोगे जबतक काली रात न होगी.जीवन के इक मोड़ पे आकर हम फिर से मिल जाएं भी तोलब थिरकेंगे, दिल मचलेगा, पर आपस में बात न होगी.पूरी बस्ती सन्नाटे की चादर ओढ़ के लेट चुकी हैऐसे में तूफान उठे तो कुछ हैरत की बात न होगी.हम ...
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  June 8, 2018, 5:51 pm
आखिर कहां से लाइए सब्रो-करार और.अच्छे दिनों का कौन करे इंतजार और.कुछ रहगुजर पे धूल भी पहले से कम न थीकुछ आपने उड़ा दिए गर्दो-गुबार और.बिजली किधर से दौड़ रही थी पता नहींहर तार से जुड़ा हुआ था एक तार और.शायद अभी यक़ीन का दर हो खुला हुआचक्कर लगा के देखते हैं एक बार और.हम उनकी अ...
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  June 7, 2018, 5:06 pm
वक्त के सारे सिकंदर इक तरफ.इक तरफ सहरा, समंदर इक तरफ.इक तरफ तदबीर की बाजीगरीऔर इंसां का मुकद्दर इक तरफ.आस्मां को छू लिया इक शख्स नेरह गए सारे कलंदर  इक तरफ.इक तरफ लंबे लिफाफों का सफरपांव से छोटी है चादर इक तरफ.इक तरफ खुलती हुई नज्जारगीडूबते लम्हों का लश्कर  इक तरफ.रोज ह...
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Tag :शायरी
  September 6, 2017, 1:30 am
जो यकीं रखते नहीं घरबार में.उनकी बातें किसलिए बेकार में.दर खुला, न कोई खिड़की ही खुलीसर पटककर रह गए दीवार में.बस्तियां सूनी नज़र आने लगींआदमी गुम हो गया बाजार में.पांव ने जिस दिन जमीं को छू लियाज़िंदगी भी आ गई रफ्तार में.बांधकर रखा नहीं होता अगरहम भटक जाते किसी के प्यार ...
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Tag :शायरी
  September 2, 2017, 1:01 am
चाल वो चलिए किसी को शक न हो.बस मियां की दौड़ मस्जिद तक न हो.सल्तनत आराम से चलती नहींसरफिरा जबतक कोई शासक न हो.सांस लेने की इजाजत हो, भलेज़िंदगी पर हर किसी का हक न हो.खुश्क फूलों की अदावत के लिएएक पत्थर हो मगर चकमक न हो.रंग काला हो, कोई परवा नहींहाथ में उसके मगर मस्तक न हो.तब त...
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Tag :शायरी
  August 26, 2017, 5:58 pm
हम उनकी उंगलियों में थे कब से पड़े हुए.कागज में दर्ज हो गए तो आंकड़े हुए.ऊंची इमारतों में कहीं दफ्न हो गईंवो गलियां जिनमें खेलके हम तुम बड़े हुए.मुस्किल है कोई बीच का रस्ता निकल सकेदोनों तरफ के लोग हैं जिद पर अड़े हुए.दरिया में थे तो हम सभी कश्ती की तरह थेमिट्टी के पास आ ग...
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Tag :शायरी
  August 15, 2017, 2:52 pm
दास्तां उनकी अलग, मेरी कहानी और हैमैं तो दरिया हूं मेरे अंदर रवानी और है.कौन समझेगा हमारी कैफ़ि‍यत अबके बरसकह रही है कुछ ज़बां लेकिन कहानी और है.वो अगर गूंगा नहीं होगा तो बोलेगा ज़रूरचुप लगा जाना अलग है, बेजु़बानी और है.आपने अबतक ज़मीं की तह में देखा ही नहींऔर बर्फ़ीली नद...
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  October 2, 2016, 2:23 pm
हर घड़ी ग़म से आशनाई है.ज़िंदगी फिर भी रास आई है.आस्मां तक पहुंच नहीं लेकिनकुछ सितारों से आशनाई है.अपने दुख-दर्द बांटता कैसेउम्रभर की यही कमाई है.ख्वाब में भी नज़र नहीं आतानींद जिसने मेरी चुराई है.अब बुझाने भी वही आएगाआग जिस शख्स ने लगाई है.काफिले सब भटक रहे हैं अबरहनुम...
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  June 30, 2016, 2:17 am
https://www.youtube.com/watch?v=qxhwTDI1lZQ...
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  June 25, 2016, 5:28 pm
और कुछ दूर काफिला तो चले.हम कहां हैं, हमें पता तो चले.हमसफर की तलब नहीं हमकोसाथ कदमों के रास्ता तो चले.बंद कमरे में दम निकलता हैइक जरा सांस भर हवा तो चले.हर हकीक़त बयान कर देंगेआज बातों का सिलसिला तो चले.अपनी मर्जी के सभी मालिक हैंकोई कानून-कायदा तो चले.वो अकेले कहां-कहां ...
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  June 11, 2016, 1:24 am
अपनी रफ़्तार दे गया है मुझेजब कोई रहनुमा मिला है मुझेवक़्त के साथ इस ज़माने मेंहर कोई भागता मिला है मुझेउससे मिलने का या बिछड़ने काकोई शिकवा न अब गिला है मुझेतजरबे हैं जो खींच लाते हैंवर्ना अब कौन पूछता है मुझेक्या बताएगा अब नजूमी भी‘अपने अंजाम का पता है मुझे’वैसी सूरत उ...
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  May 4, 2016, 4:00 pm
फुगाओं से निकलूं तो आहों में आऊं.कदम-दर-कदम बेपनाहों में आऊं.मैं चेहरों के जंगल में खोया हुआ हूंमैं कैसे तुम्हारी निगाहों में आऊं.कभी मैं अंधेरों की बाहें टटोलूंकभी रौशनी की पनाहों में आऊं.मैं इक सनसनीखेज़ किस्सा हूं गौयाशराफत से निकलूं गुनाहों में आऊं.अभी तक तो पगडं...
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  February 28, 2016, 3:49 pm
(जेएनयू प्रकरण पर)तिल का ताड़ बना बैठे.कैसी आग लगा बैठे.वही खता दुहरा बैठे.फिर इतिहास भुला बैठे.फर्क दोस्त और दुश्मन काकैसे आप भुला बैठे.पुरखों के दामन में वोगहरा दाग लगा बैठे.सबका हवन कराने मेंअपने हाथ जला बैठे.उसकी गरिमा रख लीजेजिस कुर्सी पर जा बैठे.बैठे-बैठे वो हमकोक...
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  February 17, 2016, 4:17 pm
               उलझनों की धुंद सबके ज़ेहन में फैली हुई सी.वक़्त की गहराइयों में ज़िंदगी उतरी हुई सी.हर कोई अपनी हवस की आग में जलता हुआ साऔर कुछ इंसानियत की रूह भी भटकी हुई सी.आपकी यादें फज़ा में यूं हरारत भर रही हैंधूप जैसे चांदनी रातों में हो घुलती हुई सी.बर्फ से जम...
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  February 7, 2016, 6:43 pm
                              रहगुजर पे रहबरों की रहबरी रह जाएगी.ज़िंदगी फिर ज़िंदगी को ढूंढती रह जाएगी.मैं चला जाउंगा अपनी प्यास होठों पर लिएमुद्दतों दरिया में लेकिन खलबली रह जाएगी.रौशनी की बारिशें हर सम्त से होंगी मगरमेरी आंखों में फरोजां तीरगी रह जाएगी....
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  February 1, 2016, 3:14 pm
आंच शोले में नहीं, लह्र भी पानी में नहीं.और तबीयत भी मेरी आज रवानी में नहीं.काफिला उम्र का समझो कि रवानी में नहीं.कुछ हसीं ख्वाब अगर चश्मे-जवानी में नहीं.खुश्क होने लगे चाहत के सजीले पौधेऔर खुशबू भी किसी रात की रानी में नहीं.क्या जरूरी है उसे सबको सुनाया जाएकुछ नई बात अगर...
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  January 19, 2016, 1:51 pm
कोई सुर था न ताल था क्या थाबेख़ुदी का धमाल था क्या थाख्वाब था या खयाल था क्या थाहमको जिसका मलाल था क्या थातुमने पत्थर कहा, खुदा हमनेअपना-अपना ख़याल था क्या थाआग भड़की तो किस तरह भड़कीजेहनो-दिल में उबाल था क्या थासारे किरदार एक जैसे थेहर कोई बेमिसाल था क्या थामौत को हम गल...
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  October 18, 2015, 1:58 pm
मन की गहराई का अंदाजा न था.डूबकर रह जायेंगे, सोचा न था.कितने दरवाज़े थे, कितनी खिड़कियांआपने घर ही मेरा देखा न था                                                    एक दुल्हन की तरह थी ज़िन्दगीगोद में उसके मगर बच्चा न था.                           &n...
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  July 22, 2015, 9:16 pm
मसअ़ले अपने सुलझते ही नहीं.पेंच इतने हैं कि खुलते ही नहीं.हम कसीदे पर कसीदे पढ़ रहे हैंआप पत्थर हैं पिघलते ही नहीं.लोग आंखों की जबां पढ़ने लगे हैंकोई बहकाये बहकते ही नहीं.बात कड़वी है, मगर सच है यहीजो गरजते हैं, बरसते ही नहीं.चार अक्षर पढ़ के आलिम हो गयेपांचवा अक्षर समझत...
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  July 9, 2015, 3:56 pm
न नौसबा की बात है, न ये किसी बयार कीये दास्तान है नजर पे रौशनी के वार कीकिसी को चैन ही नहीं ये क्या अजीब दौर हैतमाम लोग लड़ रहे हैं जंग जीत-हार कीन मंजिलों की जुस्तजू, न हमसफर की आरजून काफिलों की चाहतें न गर्द की, गुबार कीजहां तलक है दस्तरस वहीं तलक हैं हासिलेंन कोशिशों की ...
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  July 1, 2015, 2:42 pm
हर तलातुम से गुज़र जाना हैदिल के दरिया में उतर जाना हैज़िंदा रहना है कि मर जाना है‘आज हर हद से गुज़र जाना है’मौत की यार हक़ीक़त है यहीबस ये अहसास का मर जाना हैपेड़ से टूट गए हैं जैसेखुश्क पत्तों सा बिखर जाना हैसब ज़मींदोज़ उभर आये हैंअब दुआओं का असर जाना हैवादा करना तो अदा है उनक...
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Tag :तरही गज़ल
  February 26, 2015, 1:27 pm
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