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Blog: जो न कह सके

Blogger: सुनील दीपक
हिन्दी फ़िल्में देखिये तो लगता है कि छोटे शहरों में रहने वाली लड़कियों के जीवन बदल गये हैं. "बरेली की बरफ़ी", "शुद्ध देसी रोमान्स", और "तनु वेड्स मनु"जैसी फ़िल्मों में, छोटे शहरों की लड़कियों को न सड़कों पर डर लगता हैं, न वह लड़कों से वे स्वयं को किसी दृष्टि से पीछे समझती हैं. जान... Read more
clicks 285 View   Vote 0 Like   3:18pm 23 Aug 2017 #जीवन
Blogger: सुनील दीपक
परिवार के पुराने कागजों में कुछ खोज रहा था, तो उनके बीच में कुछ पत्र भी दिखे. इन पत्रों में हिन्दी साहित्य के जाने माने लेखक भी थे. उनमें से कुछ पत्र प्रस्तुत हैं।यह पत्र मेरे पिता स्व. श्री ओमप्रकाश दीपक के नाम थे, जो कि १९५०-६० की कुछ समाजवादी पत्रिकाओं, जैसे कल्पना, चौखम... Read more
clicks 335 View   Vote 0 Like   11:30am 12 Mar 2017 #कहानी
Blogger: सुनील दीपक
यह दुनियाँ तेज़ी से बदल रही है और इस बदलती दुनियाँ में तकनीकी तथा अन्य विकासों की वजह से जीवनयापन के नये तरीके निकालना आवश्यक हो गया है. आज मैं उतरी इटली के एक गाँव की बात लिख रहा हूँ, जहाँ पर्यटकों को आकर्षित करने तथा स्थानीय व्यवसाय को बढ़ावा देने का एक नया तरीका अपनाया ... Read more
clicks 357 View   Vote 0 Like   8:45am 21 Feb 2017 #कला
Blogger: सुनील दीपक
कुछ दिन पहले विश्व स्वास्थ्य संस्थान की भारत में स्वास्थ्य कर्मियों की स्थिति के बारे में एक दिलचस्प रिपोर्ट को पढ़ा. अक्सर इस तरह की रिपोर्टों में समाचार पत्रों या पत्रिकाओं को दिलचस्पी नहीं होती. इनके बारे में अंग्रेज़ी प्रेस में शायद कुछ मिल भी जाये, हिन्दी के समाच... Read more
clicks 359 View   Vote 0 Like   6:37am 14 Sep 2016 #चिकित्सा
Blogger: सुनील दीपक
सुश्री रमा मित्रका यह आलेख समाजवादी पत्रिका "जन"के मार्च-अप्रैल १९६८ के अंक से लिया गया है।‌ इस अंक के सम्पादक मेरे पिता श्री ओमप्रकाश दीपकथे। डा. राम मनोहर लोहियाकी अक्टबर १९६७ में मृत्यु के बाद यह उनका पहला "स्मृति अंक"था जिसमें उन्हें जानने वालों के उनके बारे में आल... Read more
clicks 307 View   Vote 0 Like   12:26pm 1 Mar 2016 #भारत
Blogger: सुनील दीपक
सँस्कृत तथा उससे जुड़ी विभिन्न भारतीय भाषाओं को इँडोयूरोपी (Indo-European) भाषाओं में गिना जाता है. यह सब भाषाएँ एक ही भाषा-परिवार का हिस्सा है जो पूर्व में भारत से ले कर पश्चिम में यूरोप तक जाता है. विश्व में चार सौ से अधिक इँडोयूरोपी भाषाओं को पहचाना गया है. इन इँडोयूरोपी भा... Read more
clicks 341 View   Vote 0 Like   2:57am 27 Dec 2015 #तकनीकी
Blogger: सुनील दीपक
भारत की जनसंख्या में बदलाव आ रहा है, बूढ़ों की संख्या बढ़ रही है. अधिक व्यक्ति, अधिक उम्र तक जी रहे हैं. दूसरी ओर परिवारों का ध्रुविकरण हो रहा है. आधुनिक परिवार छोटे हैं और वह परिवार गाँवों तथा छोटे शहरों से अपने घरों को छोड़ कर दूसरे शहरों की ओर जा रहे हैं. जहाँ पहले विवाह के ब... Read more
clicks 286 View   Vote 0 Like   12:49am 6 Aug 2015 #तस्वीरें
Blogger: सुनील दीपक
बहुत साल पहले एक पत्रिका होती थी "सारिका", उसमें किशन चन्दर की एक कहानी छपी थी "नीले फीते का जहर". क्या था उस कहानी में यह याद नहीं, बस यही याद है कि कुछ ब्लू फ़िल्म की बात थी. पर दुकानों पर लटकती चमकीली थैलियों के फीते देख कर मुझे हमेशा उसके शीर्षक की याद आ जाती है.हवा में लटक... Read more
clicks 275 View   Vote 0 Like   1:53am 17 Jul 2015 #तकनीकी
Blogger: सुनील दीपक
आजकल मोदी जी ने चायवालों को प्रसिद्ध कर दिया है, लेकिन यह आलेख उनके बारे में नहीं है. वैसे चाय की बातें मोदी जी के पहले भी महत्वपूर्ण होती थीं जैसा कि अमरीकी इतिहास बताता है, जहाँ अमरीका की ब्रिटेन से स्वतंत्रता की लड़ाई भी सन् 1733 के चाय लाने वाले पानी के जहाज़ से जुड़ी थी जि... Read more
clicks 538 View   Vote 0 Like   1:58am 17 Apr 2015 #एशिया
Blogger: सुनील दीपक
पिछले कई दिनों से बीबीसी की डाकूमैंटरी फ़िल्म "इंडियाज़ डाटर" (India's daughter) के बैन करने के बारे में बहस हो रही थी. आजकल कुछ भी बहस हो उसके बारे में उसके विभिन्न पहलुओं का विषलेशण करना, अन्य शोर में सुनाई नहीं देता. शोर होता है कि या तो आप इधर के हैं या उधर के हैं. अगर आप प्रतिबन्ध ल... Read more
clicks 311 View   Vote 0 Like   2:31am 30 Mar 2015 #नारी
Blogger: सुनील दीपक
चिकित्सा विज्ञान तथा तकनीकी के विकास ने "जीवन का अंत"क्या होता है, इसकी परिभाषा ही बदल डाली है. जिन परिस्थितियों में दस बीस वर्ष पहले तक मृत्यू को मान लिया जाता था, आज तकनीकी विकास से यह सम्भव है कि उनके शरीरों को मशीनों की सहायता से "जीवित"रखा जाये. लेकिन जीवन का अंतिम समय... Read more
clicks 262 View   Vote 0 Like   1:50am 4 Mar 2015 #जीवन
Blogger: सुनील दीपक
अक्सर लोग, विषेशकर युवा, मुझसे ईमेल के माध्यम से स्वप्नदोष या शीघ्रपतन के बारे में सलाह माँगते हैं, कि क्या करना चाहिये. किशोरों तथा युवाओं के मन में इस तरह की चिन्ताएँ उठना कुछ हद तक स्वाभाविक है, क्योंकि इस विषय पर अन्य लोगों से बात करना या सलाह माँगना आसान नहीं है.आज क... Read more
clicks 283 View   Vote 0 Like   3:01am 9 Dec 2014 #जीवन
Blogger: सुनील दीपक
हम लोग यात्रा में मिले थे. वह मुझसे करीब चालिस वर्ष छोटा था. बातों बातों में जाति की बात उठी तो वह बोला कि भारत में जातिवाद बहुत उपयोगी है, इससे समाज के हर व्यक्ति को मालूम रहता है कि समाज में उसका क्या स्थान है और उसे क्या काम करना चाहिये.मुझे पहले तो कुछ हँसी आयी, सोचा कि श... Read more
clicks 295 View   Vote 0 Like   3:57am 1 Dec 2014 #भारत
Blogger: सुनील दीपक
शिक्षा को जीवन की व्यवाहरिक आवश्यकताओं को पाने के माध्यम, विषेशकर नौकरी पाने के रास्ते के रूप मे देखा जाता है. यानि शिक्षा का उद्देश्य है लिखना, पढ़ना सीखना, जानकारी पाना, काम सीखना और जीवन यापन के लिए नौकरी पाना.शिक्षा के कुछ अन्य उद्देश्य भी हैं जैसे अनुशासन सीखना, नै... Read more
clicks 409 View   Vote 0 Like   3:22am 17 Sep 2014 #दक्षिण अमरीका
Blogger: सुनील दीपक
पिछली सदी में दुनिया में स्वास्थ्य सम्बंधी तकनीकों के विकास के साथ, बीमारियों के बारे में हमारी समझ बढ़ी है जितनी मानव इतिहास में पहले कभी नहीं थी. पैनिसिलिन का उपयोग द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान प्रारम्भ हुआ. पहली डायलाईसिस की मशीन का उपयोग भी द्वितीय विश्व महायुद्ध ... Read more
clicks 323 View   Vote 0 Like   3:14am 18 Aug 2014 #चिकित्सा
Blogger: सुनील दीपक
पाराम्परिक भारतीय सोच के अनुसार अक्सर बच्चों को क्या पढ़ना चाहिये और क्या काम करना चाहिये से ले कर किससे शादी करनी चाहिये, सब बातों के लिए माता पिता, भैया भाभी, दादा जी आदि की आज्ञा का पालन करना चाहिये. कुछ उससे मिलती जुलती सोच हमारे नेताओं और समाजसेवकों की है जो हर बात मे... Read more
clicks 315 View   Vote 1 Like   5:11am 4 Apr 2014 #जीवन
Blogger: सुनील दीपक
इस वर्ष की ऑस्कर पुरस्कार समारोह में जब इतालवी फ़िल्म "द ग्राँदे बेलेत्ज़ा" (La grande Bellezza - एक बड़ी सुन्दरता) को विदेशी फ़िल्मों के श्रेणी का प्रथम पुरस्कार मिला है तो बहुत खुशी हुई. फ़िल्म के नायक हैं जीवन की सच्चाईयों से थके हुए साठ साल के पत्रकार जेप गाम्बेरदेल्ला, जो अपने ज... Read more
clicks 297 View   Vote 0 Like   6:01am 7 Mar 2014 #चिकित्सा
Blogger: सुनील दीपक
सदियों से पैसे वाले व ताकतवर लोग अपनी तस्वीरें अपनी तस्वीरें बनवाते आये हैं. पिछली सदी में फोटोग्राफ़ी के विस्तार से हर कोई अपनी तस्वीरें खिचवाने लगा. पिछले दशक में डिजिटल कैमरों के प्रचार से और फेसबुक, टिविटर जैसी वेबसाइट के वजह से तस्वीर खीचना और उस पर बातें करना इत... Read more
clicks 363 View   Vote 0 Like   10:14am 22 Feb 2014 #कला
Blogger: सुनील दीपक
पहले भी कई बार सेक्स सम्बँधी विषयों पर लिख चुका हूँ, लेकिन इस विषय पर कुछ भी लिखने की सोचूँ तो हर बार मेरे बचपन में सीखे भद्रता-अभद्रता या शालीनता-अश्लीलता के पाठ हर बार मन में कुछ दुविधा सी कर देते हैं कि क्या इन बातों पर चिट्ठे जैसे माध्यम पर लिखना ठीक होगा? फ़िर सोचता ह... Read more
clicks 377 View   Vote 0 Like   8:55am 9 Feb 2014 #नारी
Blogger: सुनील दीपक
1980 में में इटली घूमते हुए एक डिज़ाईन पुस्तिका में मैं रेखाचित्र बनाता था. उन्हीं रेखाचित्रों पर आधारित यह एक स्मृति यात्रा के विवरण का तीसरा व अंतिम भाग है. ( पहला भाग - दूसरा भाग)***अस्पताल में कुछ मित्रों ने एक एल्पस् के पहाड़ पर चढ़ाई का कार्यक्रम बनाया था. उन्होंने मुझे भ... Read more
clicks 395 View   Vote 0 Like   8:24am 3 Feb 2014 #यात्रा
Blogger: सुनील दीपक
1980 में जब छात्रवृति ले कर इटली आया था तो वेनिस के पास विचेन्ज़ा नाम के शहर में रहता था. तब मेरे पास कैमरा नहीं था लेकिन एक डिज़ाईन पुस्तिका थी, जिसमें मैं रेखाचित्र बनाता था. कुछ दिन पहले तैंतीस साल पुरानी वह डिज़ाईन पुस्तिका हाथ में आ गयी. उसे देख कर, बहुत सी पुरानी बातें ... Read more
clicks 371 View   Vote 0 Like   5:59am 22 Jan 2014 #कला
Blogger: सुनील दीपक
1980 में जब छात्रवृति ले कर इटली आया था तो वेनिस के पास विचेन्ज़ा नाम के शहर में रहता था. वहाँ के अस्पताल में आईसीयू में प्रोफेसर रित्ज़ी के शाथ काम कर रहा था. तब मेरे पास कोई कैमरा नहीं था. हाँ तस्वीरें बनाने का शौक था और पास में डिज़ाईन पुस्तिका थी. हर जगह अपनी डिज़ाईन पुस्... Read more
clicks 299 View   Vote 0 Like   8:06am 19 Jan 2014 #कला
Blogger: सुनील दीपक
स्वीडन के आविष्कारक फ्रेडरिक कोल्टिन्ग ने क्राउडसोर्सिन्ग के माध्यम से पैसा इक्टठा किया और एक नयी तरह की घड़ी बनायी है जिसमें आप देख सकते हैं कि आप के जीवन के कितने वर्ष, दिन, घँटे व मिनट बचे हैं. इसका यह अर्थ नहीं कि आप उस निर्धारित समय से पहले नहीं मर सकते या आप की आयु घड़... Read more
clicks 289 View   Vote 0 Like   5:00am 15 Jan 2014 #जीवन
Blogger: सुनील दीपक
मेरे विचार में आधुनिक समाज में विज्ञान व तकनीकी के बेलगाम बाज़ारीकरण से हमारे जीवन पर अनेक दिशाओं से गलत असर पड़ा है. जब इस तरह के विषयों पर बहस होती है तो मेरे कुछ मित्र कहते हैं कि मैं व्यर्थ की आदर्शवादिता के चक्कर में जीवन की सच्चाईयों का सामना नहीं करना चाहता. पर मैं ... Read more
clicks 292 View   Vote 0 Like   3:00pm 11 Jan 2014 #पर्यावरण
Blogger: सुनील दीपक
पिछले दो दशकों में भारत में टीवी चैनलों और इंटरनेट के माध्यम से पत्रकारिता के नये रास्ते खुले हैं. शायद पत्रकारिता के इतने सारे रास्ते होने के कारण ही पिछले कुछ सालों में किसी भी बात को बढ़ा चढ़ा कर उसे "ब्रेकिन्ग न्यूज़", कुछ जाने माने नाम हों उनके आसपास स्केन्डल बनाना... Read more
clicks 622 View   Vote 0 Like   5:57am 5 Jul 2013 #नारी
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