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फुलकारी : View Blog Posts
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फुलकारी

तू बीत चुके पुरातन युग की , तू नए समय के साथ समकालीन भी,तू पुराने चलन के साथ चलने वाली,ओ री साड़ी!तू नयी रीत का परचम लहराने वाली भी |तेरे विस्तार में खुला आकाश तू बँध जाए तो  समेटे है रहस्य अपार तू बंधनों में बँध शर्माने -सकुचाने वाली,ओ री साड़ी!तू रिवाज़ों, समाजों में रसूख ...
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  October 5, 2017, 2:34 am
कोमलांगी, गौरवर्णा , चंचल, चपला छदम उपमाओं से हुई पराजितबूझ कर, जान कर विडम्बना को इस फिर भी करती रही स्वयं को शापित | न पायी स्व को तू जान,न पा सकी तू वो स्थान,सौंदर्य अलंकारों को मान कर अपना मान ,न देख सकी तू पौरुष दम्भ, न विस्तृत अभिमान | उर्वशी बन कभी, मेनका बन कभी ...
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  September 2, 2017, 7:36 am
चल रे मन बतिया ले खुद से ,मत डर ,दुनिया के डर  से । घबराए, धमकाए अँधेरा जब ,निराशा भर कर, संग लाये जब ,पलट कर, घूम कर ,धकिया दे उसको ,गहरी साँस खींच कर भीतर ,फूँक मार उड़ा दे उसको । चल रे मन बतिया ले खुद से ,मत डर ,दुनिया के डर  से । अकेलापन जब घर कर जाए  तुझमे ,खुद को ख...
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  May 10, 2016, 7:50 pm
कहीं गोद में कहीं  उंगली थामे खड़ी होती हैहाथ फैलाये बेबसी में बड़ी होती है ,भूख स्कूलों -मदरसों के पाठ  से बड़ी होती है |खाली बर्तन, ठन्डे चूल्हों में रखी होती हैटपकती छतों और खाँसती दीवारों  में पली होती है ,भूख अकेलेपन  के  साथ सदा जुड़ी होती है ।नाकामियों से नाउम्म...
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  December 21, 2015, 1:48 am
बेटे की पिग्गी बैंक की जमा-पूँजी और मेरे बचपन की  मिट्टी की गुल्लक ,सिक्के अलग, पर कहानी वैसी ही दोहराते |जैसे मेरी पंजी, दस्सी, चवन्नी, अठन्नी , वैसे उसके डॉलर, क्वार्टर, निकेल, पैनी |कुछ चमकते  नए  से,  कुछ सकुचाते-पुराने, कुछ तीन दशकों को ओढ़े, मेरे जन्म के साल के...
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  September 6, 2014, 1:02 am
टाँक कर अपने दुशाले पर अनगिन तारे ,देर ना करना , जल्दी आना ,तुम आज ओ चाँद !इतरा लेना पर जल्दी आना ओ चाँद !   देखो तो मैंने भी सजाये हैं , अनगिन तारेअपनी पूजा की थाल में ,प्रार्थना के , मनुहार के ,विश्वास के ,अधिकार के,और प्रिय के लिए असीम प्यार के |            ...
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  October 22, 2013, 5:21 pm
उस रात जब चाँद नदारद था,शायद मावस की छुट्टी मना रहा था ,और तारे-सितारे ऊँघ रहे थे गहरी नींद में ,ओढ़कर लिहाफ अँधियारे आसमान का झुरमुटे से चल पड़ी थी जगमगाती पलटन ,गहराईयों  से ऊँचाइयों को उठती ,पँखो पर झपझपाती  रोशनी  बिठा ,जन-जन के मन को सम्मोहित करती ,समय की परते उध...
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  October 8, 2013, 10:29 pm
उस रात जब चाँद नदारद था,शायद मावस की छुट्टी मना रहा था ,और तारे-सितारे ऊँघ रहे थे गहरी नींद में ,तब ओढ़कर लिहाफ अँधियारे आसमान का ,झुरमुटे से चल पड़ी थी एक  जगमगाती पलटन ,गहराईयों  से ऊँचाइयों को उठती ,पँखो पर झपझपाती  रोशनी  बिठा ,जन-जन के मन को सम्मोहित करती ,सम...
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  October 8, 2013, 10:29 pm
चुप्पियों के पीछे छुपे,शब्द बीनने हैं  ,जैसे बीना जाता है,एकदम धवल चावलों के बीच , परात में धान .लापरवाह उँगलियाँ चूक जाएँ तो,फिर छुप जाता है ये धान, ओट में चावलों की ,और संख्या का गणित लगा,खेलते हैं चावल एकतरफा लुका-छिपी पर फिर भी ,ऐनक पहनकर दूरदर्शिता की ,ढूँढने हैं...
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  September 5, 2013, 9:54 pm
ख्वाहिशों वाली मशीन जाने कहाँ से बनवाता है ऊपरवाला,कल-पुर्जे चुकते नहीं उसके,और बैट्री चलती रहती है लगातार ,   बिना रुके , बिना वियर एंड टियर के    एक के बाद एक दागती है, नयी ख़्वाहिशें,और हम नींद में , जाग में,सुबह से शाम तक, फिर रात में,  घूमते हैं चकरघिन्नी से,पीछॆ इन ख्वाह...
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  April 23, 2013, 8:28 pm
कुछ घर देखे हैं जहाँ ,पानी प्यासा ,रोटी भूखी ,तन पर पड़े कपड़े ,अंतर्मन की नग्नता  उघाड़ते  हुए से लगते हैं ।सब कुछ है वहाँ खूबसूरत ,करीने से लगा हुआ,चमकदार ,बेशकीमती |सुना है , कुछ चूल्हों से आग छीनकर ,ऊपर वाले का दिया ज़मीर बेचकर,  इकठ्ठा किया उन्होंने ये असला ।हिसाब थोड़...
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  December 12, 2012, 11:37 pm
जब धान की पूलियों पर ठहरी धूप,खिड़की पर पड़ी चिक से झाँककर विदा ले गयी थी  ।जब जाड़े के आलसी सूरज ने, अपना बोरिया जल्दी समेटा था और मद्धिम अम्बर जुगनुओं का मैदान बना था ।जब रात की चादर ने अपने दो छोरों के बीच ,ठण्ड से सिकुड़े दिन को छुपा लिया था ।जब कोहरा  हवा में,बालूश...
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  December 8, 2012, 4:03 am
एक अबूझ पहेली सा  ,पहाड़ पर उगे ताड़ सा ,खुले गगन पर लगी बाड़ सा ,  सागर में अटकी लहर सा ,जंगल में बसे शहर सा ,बीच रात में हुई दोपहर सा ,बबूल पर खिले गुलाब सा ,स्वप्न ही था शायद प्रिय !तुम मेरे उलझे बाल सँवार  रहे थे ,और शायद मुस्कुरा भी रहे थे ।...
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  December 7, 2012, 8:59 pm
पिघल रहा था वो बादल,निचोङ अपने हर अंश को,बरखा की निखरी सी बूंदों में|ढल रहा था उसका अस्तित्व,उनींदी सी कोमल कलियों का,यौवन सँवारने में|जी उठे थे सूखे पात,सौन्धी हो गयी थी मिट्टी ,बुझा अपनी प्यास भीगी बरसात में|असीमित ,निर्बाध, गगन को,जब फैला हथेली देख रही थी मैं ,लदी थी वो ब...
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  November 7, 2012, 1:19 am
सूरज के घर जाकर ,ले आये हम उजाला | पंछियों से पूछा  तिनकों का पता,अपना बसेरा  बनाने के लिये |की  चाँद की चिरौरी,चाँदनी को घर बुलाने के लिये|तकी सितारोँ की राह ,अपना घरौंदा  सजाने के लिये |चले  थकन की पगडण्डियों पर,चौबारे के बरगद की छाँव पाने   के लिये |गये किरणों के रथ पर चढ,...
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  November 5, 2012, 8:58 pm
हमारे एक मित्र Entomologist हैं, अर्थात कीट-विज्ञान शास्त्री|एक दिन उनसे मिलने के लिये हम उनकी लैबोरेट्री  पँहुच गये| डेंगू जैसी प्राणघातक  बीमारी फैलाने वाले जीव के विषय में जानने की इच्छा प्रकट करने पर उन्होने हमें एक किस्सा सुना कर टरका दिया| हमने सोचा ज्ञान नही बाँट सकते त...
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  November 4, 2012, 5:52 am
उम्र के बोझ तले, पीले सांचे में ढले ,पन्ने कुछ अधखुले, आज यों खुले ,सूखे गुलाबों की बासी खुशबू समेटे ,वक़्त से पिछड़, कल को आज में लपेटे,कागज़ के तुड़े-मुड़े पुर्जे छुपाये हुये,जाने कितने राज़ सीने में दबाये हुये,भीगे मौसमों की स्याही फैलाये हुये,अश्कों के निशान, गालों पर ...
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  November 2, 2012, 8:33 pm
अजीर्ण में जीवन का राग ,जादुई रंगों के पात ,खो कर पाने की बात  ,सतरंगी सौंदर्य सर्वत्र ,नयी फसल का उत्सव ,जाड़े के आगमन का नाद आँगन  के अनूठे  अलाव,जुड़ाव और फिर अलगाव, गिर कर उठने की सीख ,क्षण-भंगुर माया से प्रीत ,जीवन-मरण की रीत , ना होने में होने का आभास ,दुःख में सुख का वास ,...
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  October 19, 2012, 8:55 am
हरी मिर्च सी तीखी ,शक्कर- पारे सी मीठी ,आँखों से नींदों की चोरी सी ,अनगिन रागों वाली लोरी सी ,दूरदर्शन के चित्रहार सी ,चिर नवल  उपहार सी ,जाड़े के ज़ुकाम सी ,कमर दर्द में बाम सी ,सर्कस के उन्मत्त  मंचन सी ,सरल मधुर जीवन-दर्शन सी,डार्विन के सिद्धांत सी,उन्मादी कभी शाँत सी ,सुबह ...
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  July 5, 2012, 12:40 am
नये ज़माने के रंग में,पुरानी सी लगती है जो|आगे बढने वालों के बीच,पिछङी सी लगती है जो|गिर जाने पर मेरे,दर्द से सिहर जाती है जो|चश्मे के पीछे ,आँखें गढाए,हर चेहरे में मुझे निहारती है जो|खिङकी के पीछे ,टकटकी लगाए,मेरा इन्तजार करती है जो|सुई में धागा डालने के लिये,हर बार मेरी मन...
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  May 13, 2012, 7:01 pm
उसने पहली बार पुकारा ,इतने लोगों में सिर्फ मुझे |उस एक शब्द ने,पिघला दिया मेरे मन को, बहुत से शब्द गढ़ रही थी वो,पर उस शब्द पर उसने,अथाह प्रेम की नक्काशी की है |" मम्मा "पहली बार छलका, शब्द बन कर उसका प्यार मैंने सहेज लिया है वो पल,बड़ी होगी तो दिखाऊँगी उसेकैसे एक शब्द में गढ़ दी ...
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  October 13, 2011, 1:25 am
महँगाई रे महँगाई , जमी जमाने में जैसे ससुराल जमा जमाई | सूर्पनखा जैसे क्यों तूने नाक कटाई , बार-बार भरे बाज़ार रोज़ गाली खाई | दुर्योधन सी दुष्टता जाने कहाँ से लायी, दीन की दरिद्रता पर दया तुझे ना आयी | पूंजीपतियों की पूज्य बन उनकी पूंजी बढ़ाई,चूल्हे की चिंगारी की चाह भी तून...
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Tag :महँगाई
  September 30, 2011, 2:55 am
महँगाई रे महँगाई , जमी जमाने में जैसे ससुराल जमा जमाई | सूर्पनखा जैसे क्यों तूने नाक कटाई , बार-बार भरे बाज़ार रोज़ गाली खाई | दुर्योधन सी दुष्टता जाने कहाँ से लायी, दीन की दरिद्रता पर दया तुझे ना आयी | पूंजीपतियों की पूज्य बन उनकी पूंजी बढ़ाई,चूल्हे की चिंगारी की चाह भी तून...
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  September 26, 2011, 8:13 pm
महँगाई रे महँगाई , जमी जमाने में जैसे ससुराल जमा जमाई |सूर्पनखा जैसे क्यों तूने नाक कटाई , बार-बार भरे बाज़ार रोज़ गाली खाई |दुर्योधन सी दुष्टता जाने कहाँ से लायी, दीन की दरिद्रता पर दया तुझे ना आयी |पूंजीपतियों की पूज्य बन उनकी पूंजी बढ़ाई,चूल्हे की चिंगारी की चाह भी तूने ...
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  September 26, 2011, 8:35 am
अम्मा क्यों नहीं वो बचपन वापस आता ,जब तेरी कचौड़ी बिन गिने खाता थादेसी घी पड़े साग को खा ,मन को कोई डर ना सताता था,तेरे हाथ के लड्डू की महक से ,स्कूल से ही दौड़ा आता थागोल गुलाबजामुन देख कढाई मेंबाल मन बल्लियों उछल जाता थाअम्मा क्यों नहीं वो बचपन वापस आता ,जब दिन चढ़े तक बेफिक...
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  June 23, 2011, 8:00 pm
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