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Blog: फुलकारी

Blogger: Shilpa Agrawal
कितने दर्द कितने किस्से हर किस्से के कितने कितने हिस्से सही ग़लत क्या, बताए कौन आधे बैठे चुप, आधे मौन बाँटना आसान हो जब जोड़ने की जुगत लगाए कौन सियासतें सेक रहीं रोटी अपनी अपनी तमाशा रोके कौन लाठी खाये कौन... Read more
clicks 4 View   Vote 0 Like   1:32pm 21 Jan 2020 #
Blogger: Shilpa Agrawal
पतंगें जो ऊँची  उड़ती हैं,ओझल होने से पहलेटीस जाती हैं मन कोबिछड़े किसी की याद,नम कर जाती हैं फिर से,गुज़री किसी सिसकी कोघुमड़ के चल देती है रेलेंपटरियाँ बनी रहती हैं वहीँ ,राह बताती उस आख़री डिब्बे कोकलम जो घिस जाती हैं,अपने लिखे में फिर फिर पढ़ जाती हैंभूली हुई अपनी ... Read more
clicks 3 View   Vote 0 Like   10:51pm 31 Dec 2019 #
Blogger: Shilpa Agrawal
गर शीश उठा तुम चल सकते हो जब माने दोषी प्रियजन भी गर विश्वास स्वयं  पर कर सकते हो जब  छाया हो चहुँ ओर गहन अँधेरा ही गर हो संयम करने का प्रतीक्षा भोर की गर हो सम्बल लड़ने का गहन तिमिर से, गर हो इच्छा द्वेष को, प्रेम के आलिंगन में भरने की गर शब्दों से नहीं, कर्मों से ला पाओ तु... Read more
clicks 2 View   Vote 0 Like   10:42pm 31 Dec 2019 #
Blogger: Shilpa Agrawal
एक गरम अदरक वाली चाय ,माँ के बने दस्ताने में थमी हुई खिड़की से झाँकता, मुस्कुराता ढीठ सा ठूँठ,रुई के फ़ाहों से हारा, कातर नींबूई सूरजदिसंबर की सुबहें, अलार्म से चौंककर ऐसे ही धीमे से शुरू होती हैं पर फिर ओवरकोट पहन निकल पड़ती हैं,अदरक वाली चाय को दस्तानों में थामे ह... Read more
clicks 2 View   Vote 0 Like   6:23pm 27 Dec 2019 #
Blogger: Shilpa Agrawal
क्यों ज़ाया करें खुद को, सोच के ये के ख़रे उतरते हैं क्या हम पैमानों पे किसीके  खुदगर्ज़ी के लगें हैं इल्ज़ाम हम पर कई,की खुद को बदलने की अदा आती हमें नहीं क्यों कहें अफ़साने बस किसी और की पसंद के,के बातें बहुत हैं हँस देते हैं जिन पर हम भी नामंज़ूर है, मंज़ूरी हर बा... Read more
clicks 2 View   Vote 0 Like   10:36pm 14 Nov 2019 #
Blogger: Shilpa Agrawal
स्कूल के जूतों पर ब्रश लोक गीत की थाप बजातीदायें से बाएं, फिर घूम कर बाएँ  से दाएं आती जाती परेड लगाती चेरी ब्लॉसम की महक कुछ छोड़ आती और कुछ समेट लाती,उफ़! ये जूते झक्क सफ़ेद मोजों पर चढ़े,कुछ अड़े- अड़े से, कुछ बड़े बड़े से,टकटकाते से हर आते-जाते को आईना दिखलाते ... Read more
clicks 23 View   Vote 0 Like   3:16am 7 Jul 2019 #
Blogger: Shilpa Agrawal
तुम बड़े हो गए थेजब नन्हें कदम तुम्हारे डगमग़ से चार कदम चले थेजब छोटी बहन को गोद में ले तुम खिलखिलाकर हँसे थेजब बस्ता टाँग कँधे पर डरे से तुम स्कूल को चले थेतुम्हारेपजामा उल्टा ही सही पहन कर इतराने परहाथी बन्दर में भरते रंगों की  सीमा रेखा तय कर पाने परउल्टे- पुल्टे स... Read more
clicks 28 View   Vote 0 Like   3:13am 12 Jun 2019 #
Blogger: Shilpa Agrawal
कभी छलछलाई आँखें,नमकीन सा एक नगमा गुनगुना देती हैं ,कभी उमसती दोपहरीपेशानी पर पसीना बन कर आती हैके  खारे से शिकवे खुदा सेनमक बन के यों बहते हैंकभी आँसू  पसीना बन,कभी पसीना आँसू बननमक का क़र्ज़ बारी से अदा  करते हैं... Read more
clicks 66 View   Vote 0 Like   2:12am 3 Jun 2019 #
Blogger: Shilpa Agrawal
ख़्वाहिश- ख्वाहिश फंदे दर फंदे बुनती रही,एक पूरी हो तो दूजी का सिरा चुनती रहीचुक गया मान कर, फ़ेंक दिया था जो टुकड़ा हमने कभी,नन्हीं ज़िद्दी ख़्वाहिशों ने खींच दिया उस पेंसिल से पूरा आकाशआगाज़ ख्वाहिशों का सभी की एकसा होता नहीं,किसी को मिलती बंदिशों के साथ, किसी को उड़ा... Read more
clicks 32 View   Vote 0 Like   12:07pm 16 May 2019 #
Blogger: Shilpa Agrawal
प्रेम को पाना कितना सुर- ताल से प्रतिपादित हैसंगीतमयी, रोम- रोम को झंकृत करने वाला,जैसे सारे राग एक साथ बजने लगे हों.... और उतना ही बेतरतीब है प्रेम का बिखरनाकोई संगीत नहीं, कोई शब्द नहीं |बस शून्य सा खालीपन, शोर मचाता हुआबिना किसी पूर्वाग्रह के आकर बसने वाला  .... छोड़ आना... Read more
clicks 69 View   Vote 0 Like   1:29am 13 May 2019 #
Blogger: Shilpa Agrawal
प्रेम!मैं मानती हूँ, कि मैं तुम्हें तबसे जानती हूँ जब मुझे ऋतुओं का अंतर समझ आया था,जब मुझे समझ आया था कि बसंत आना, प्रेम की प्रत्यक्ष पुनरावृत्ति है| परोक्ष में तो प्रेम कह रहा था निरंतर अपनी कहानी,पतझड़ में भी, पतझड़ के बाद भी,जब बहा ले गयी थी ठंडी, तीखी बयार स्वप्... Read more
clicks 84 View   Vote 0 Like   2:37pm 7 Apr 2019 #
Blogger: Shilpa Agrawal
उस रोज़ जब पहली बार मिले थे तुम ,बाग़ ही में से एक गुड़हल तोड़कर दिया था तुमने  मुझे ,घुँघरुओं वाली बंधेज की चूनर पहने ,मैं इतरा के चल दी थी,तुम रुक रुक के, झुक-झुक के ,जाने क्या ढूँढा करते थे और मैं तुमको हैरानी से,मुड़ -मुड़ के देखा करती थी | हाँ बोलूँ या ना बोलूँ,असमंजस ... Read more
clicks 113 View   Vote 0 Like   11:56pm 22 Mar 2019 #
Blogger: Shilpa Agrawal
लाल चूड़ियों से सजी कलाई, अंतिम विदा भी ना कह पाई ,दूध पीता  नौ- निहाल बैठना सीखा तो ,पिता के काँधे की सवारी मिल न पाई छड़ी टूटी, आँख धुँधली, पर हिम्मत न टूटी बूढ़े कन्धों को इस उम्र में भी बेफिक्री मिल न पाई लोरियाँ धमाकों के बीच सिसकती  रहीं राह ताक -ताक ... Read more
clicks 41 View   Vote 0 Like   6:15pm 23 Feb 2019 #
Blogger: Shilpa Agrawal
भरम जुड़  गया इस शहर सेपर मन तो  अब भी उस  गाँव ही में हैठिकाना बना लिया इस शहर में हमनेपर घर तो अब भी उस गाँव ही में हैमाना मंज़िलें मिली इस शहर में,पर रास्ते तो अब भी उस गाँव ही में हैपा गए ओहदे, जान गए सलीके ,पर मासूमियत वो मेरी अब भी उस गाँव ही में है... Read more
clicks 42 View   Vote 0 Like   5:42am 23 Feb 2019 #
Blogger: Shilpa Agrawal
नाक रगड़ कर,कान पकड़ कर,जाड़ा  जकड़  कर,अकड़ -अकड़ कर ,अकड़ गया है मरा ज़ुकाम ।टप - टप ,टप- टप आँख टपकतीसूँ -सूँ ,सूँ- सूँ  नाक सुबकती ,सीधी - सादी साँस अटकती ,नींद बेचारी की रात को बंद है दुकान ।गले का गलियारा हो गया है तंग,बद-मिजाज़ मौसम से हार  कर जंग ,नाक -निकम्मी का सुर्ख ... Read more
clicks 65 View   Vote 0 Like   9:37pm 4 May 2018 #
Blogger: Shilpa Agrawal
आँख भर आकाश ले, पँखों पर रक्खी थी उड़ान अब ना मीलों की गिनती, ना दूरियों का हिसाब रहा | दिन दहकता सा उठता है और सो जाता है दहकते हुए बेपरवाह से उस सूरज का अब जुगनुओं से नाता न रहावो जो धूप का कोना पकड़ कभी, कभी बारिशों की भीगी लटें सुलझाता रहा,सिरे जोड़ते हुए आसमाँ के ज़मीं स... Read more
clicks 79 View   Vote 0 Like   3:51pm 4 May 2018 #
Blogger: Shilpa Agrawal
तू बीत चुके पुरातन युग की , तू नए समय के साथ समकालीन भी,तू पुराने चलन के साथ चलने वाली,ओ री साड़ी!तू नयी रीत का परचम लहराने वाली भी |तेरे विस्तार में खुला आकाश तू बँध जाए तो  समेटे है रहस्य अपार तू बंधनों में बँध शर्माने -सकुचाने वाली,ओ री साड़ी!तू रिवाज़ों, समाजों में रसूख ... Read more
clicks 119 View   Vote 0 Like   9:04pm 4 Oct 2017 #
Blogger: Shilpa Agrawal
कोमलांगी, गौरवर्णा , चंचल, चपला छदम उपमाओं से हुई पराजितबूझ कर, जान कर विडम्बना को इस फिर भी करती रही स्वयं को शापित | न पायी स्व को तू जान,न पा सकी तू वो स्थान,सौंदर्य अलंकारों को मान कर अपना मान ,न देख सकी तू पौरुष दम्भ, न विस्तृत अभिमान | उर्वशी बन कभी, मेनका बन कभी ... Read more
clicks 143 View   Vote 0 Like   2:06am 2 Sep 2017 #
Blogger: Shilpa Agrawal
चल रे मन बतिया ले खुद से ,मत डर ,दुनिया के डर  से । घबराए, धमकाए अँधेरा जब ,निराशा भर कर, संग लाये जब ,पलट कर, घूम कर ,धकिया दे उसको ,गहरी साँस खींच कर भीतर ,फूँक मार उड़ा दे उसको । चल रे मन बतिया ले खुद से ,मत डर ,दुनिया के डर  से । अकेलापन जब घर कर जाए  तुझमे ,खुद को ख... Read more
clicks 185 View   Vote 0 Like   2:20pm 10 May 2016 #
Blogger: Shilpa Agrawal
कहीं गोद में कहीं  उंगली थामे खड़ी होती हैहाथ फैलाये बेबसी में बड़ी होती है ,भूख स्कूलों -मदरसों के पाठ  से बड़ी होती है |खाली बर्तन, ठन्डे चूल्हों में रखी होती हैटपकती छतों और खाँसती दीवारों  में पली होती है ,भूख अकेलेपन  के  साथ सदा जुड़ी होती है ।नाकामियों से नाउम्म... Read more
clicks 125 View   Vote 0 Like   8:18pm 20 Dec 2015 #
Blogger: Shilpa Agrawal
बेटे की पिग्गी बैंक की जमा-पूँजी और मेरे बचपन की  मिट्टी की गुल्लक ,सिक्के अलग, पर कहानी वैसी ही दोहराते |जैसे मेरी पंजी, दस्सी, चवन्नी, अठन्नी , वैसे उसके डॉलर, क्वार्टर, निकेल, पैनी |कुछ चमकते  नए  से,  कुछ सकुचाते-पुराने, कुछ तीन दशकों को ओढ़े, मेरे जन्म के साल के... Read more
clicks 194 View   Vote 0 Like   7:32pm 5 Sep 2014 #
Blogger: Shilpa Agrawal
टाँक कर अपने दुशाले पर अनगिन तारे ,देर ना करना , जल्दी आना ,तुम आज ओ चाँद !इतरा लेना पर जल्दी आना ओ चाँद !   देखो तो मैंने भी सजाये हैं , अनगिन तारेअपनी पूजा की थाल में ,प्रार्थना के , मनुहार के ,विश्वास के ,अधिकार के,और प्रिय के लिए असीम प्यार के |            ... Read more
clicks 149 View   Vote 0 Like   11:51am 22 Oct 2013 #
Blogger: Shilpa Agrawal
उस रात जब चाँद नदारद था,शायद मावस की छुट्टी मना रहा था ,और तारे-सितारे ऊँघ रहे थे गहरी नींद में ,ओढ़कर लिहाफ अँधियारे आसमान का झुरमुटे से चल पड़ी थी जगमगाती पलटन ,गहराईयों  से ऊँचाइयों को उठती ,पँखो पर झपझपाती  रोशनी  बिठा ,जन-जन के मन को सम्मोहित करती ,समय की परते उध... Read more
clicks 185 View   Vote 0 Like   4:59pm 8 Oct 2013 #
Blogger: Shilpa Agrawal
उस रात जब चाँद नदारद था,शायद मावस की छुट्टी मना रहा था ,और तारे-सितारे ऊँघ रहे थे गहरी नींद में ,तब ओढ़कर लिहाफ अँधियारे आसमान का ,झुरमुटे से चल पड़ी थी एक  जगमगाती पलटन ,गहराईयों  से ऊँचाइयों को उठती ,पँखो पर झपझपाती  रोशनी  बिठा ,जन-जन के मन को सम्मोहित करती ,सम... Read more
clicks 144 View   Vote 0 Like   4:59pm 8 Oct 2013 #
Blogger: Shilpa Agrawal
चुप्पियों के पीछे छुपे,शब्द बीनने हैं  ,जैसे बीना जाता है,एकदम धवल चावलों के बीच , परात में धान .लापरवाह उँगलियाँ चूक जाएँ तो,फिर छुप जाता है ये धान, ओट में चावलों की ,और संख्या का गणित लगा,खेलते हैं चावल एकतरफा लुका-छिपी पर फिर भी ,ऐनक पहनकर दूरदर्शिता की ,ढूँढने हैं... Read more
clicks 159 View   Vote 0 Like   4:24pm 5 Sep 2013 #
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