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Blog: विशाल__दिल की कलम से

Blogger: vishal
बैरंग ----------तुम लौटे हो,बरसों बाद,लंबा सफ़र तय करके,देखने फिर ,मेरे पुराने रंग,अफ़सोस मेरे रंग बिक गए सारे,ज़िन्दगी के उधार चुकाते चुकाते,बस बची है,स्याही और सफेदी,स्याही भी कम है अब सफेदी कुछ ज़्यादा है,तुम ज़रा देर से पहुंचे,मुझे मुआफ़ करना,लौटा रहा  हूँ मैं तुम्हे बे... Read more
clicks 99 View   Vote 0 Like   3:54pm 23 May 2013 #
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बैरंग ----------तुम लौटे हो,बरसों बाद,लंबा सफ़र तय करके,देखने फिर ,मेरे पुराने रंग,अफ़सोस मेरे रंग बिक गए सारे,ज़िन्दगी के उधार चुकाते चुकाते,बस बची है,स्याही और सफेदी,स्याही भी कम है अब सफेदी कुछ ज़्यादा है,तुम ज़रा देर से पहुंचे,मुझे मुआफ़ करना,लौटा रहा  हूँ मैं&... Read more
clicks 89 View   Vote 0 Like   3:54pm 23 May 2013 #
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पीढ़ियों का अंतर पीढ़ियों का अंतर एक पुल है,उस पार रहता है भविष्य इस पार आज है जो सिर्फ आज को ही देख पाता है,अगर तुम कल को देख पाओ तो पार कर लोगेयह पुल,नहीं तो खाईयोंमें तुम्हारास्वागत है।... Read more
clicks 129 View   Vote 0 Like   2:04am 15 Jan 2013 #
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अहं की अभिव्यक्तिमैं से शुरूमैं से इतिमैं बेहतरतू कमतर मैं आकाश तू थलचरमैं रसनामैं श्रुतिमैं दृष्टामैं श्रृष्टि  तू आलोचकमैं कृतिसब परायेमेरा दुर्योधनमैं स्वीकृतिमैं अनुमोदनमैं ही प्रश्न मैं ही उत्तर मैं ही सत्यतू निरुत्तरमोह की हवाफूला गुब्बारा फटा त... Read more
clicks 148 View   Vote 0 Like   3:30am 28 Jan 2012 #
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भाव के गर्भ से जन्म लेते शब्दज़ेर से अटेनग्नकरते हैं रुदनपर होते हैं जीवंतशब्दों सेभाव का निर्माणमूर्तिकार की रचनातराशी हुईसुन्दरमनमोहकपर निष्प्राण  ... Read more
clicks 168 View   Vote 0 Like   3:15am 27 Jan 2012 #
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क्यों बुनती रहती हो तुमशब्दों के मकड़ जालउलझा कर कागज़ के टुकड़ों परफिर कहती हो हल करो पहेलियाँ देखो कितने रंग भर के बनाई हैकितने गूढ़ रहस्य छिपे हैंइन तस्वीरों में ज़िन्दगी पहले ही कम उलझी हुई नहीं है क्याखुलते ही नहीं ज़िन्दगी के रहस्यपार कर लूं एक दरवाज़ातो फ... Read more
clicks 117 View   Vote 0 Like   4:00am 5 Jan 2012 #
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एक सिगरेटतेरे अतृप्त लबों की तलबएक पैकेटमेरी जेब के अन्दर सरकता हैएक मुश्किलसिर्फ सुलगाने की हैये कैसी बस्ती हैयहाँ हर बशरकिसी जुगनू का सर पकड़आग सुलगाने कीअसफल सी कोशिश करेयख़ सर्द मौसम मेंकंपकपाने से डरेसर्दी मारे शरीर कीबेचारा मन जरेये सभी सडकेंनपुंसकों के वज... Read more
clicks 107 View   Vote 0 Like   7:30am 4 Dec 2011 #
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रिश्तों में बंधी ज़िन्दगीकच्ची डोर का जालरिश्ते मौसम के गुलामपानी की तरह बदल लेते हैं रूप राखी में महक उठती है हवसभर लेता खून स्वांग ज़हर कापंख लग जाते दूध की मिठास कोमगर पत्थर मौसम की क़ैद से आज़ाद हैंउन पर नहीं पानी का असरपत्थर है एक रिश्ता काम कारिश्तों में बंधी ज... Read more
clicks 121 View   Vote 0 Like   3:16am 30 Nov 2011 #
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               श्री नसीब चेतन                            हवा की तरह बात उड़ी उड़ती रहीकानों से जीभों तलकजीभों से कानों तकचलती रहीजूठन बनी कई जीभों काकई कानों का उतारकुडती  रहीकुछ कानों ने घोला नामकुछ जीभों ने खाकर लिया चाटभाव शब्दों के  बदलेअर्थ लंगडा  कर चलेउतरों की क... Read more
clicks 103 View   Vote 0 Like   12:14am 26 Nov 2011 #
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मेरे स्वर्गीय  पिता जी श्री नसीब चेतन जी की पुस्तक "कोरे कागज़" (1973) में से एक नज़्म पेशे खिदमत है.मेरे अज़ीज़ दोस्त डॉक्टर सतनाम सिंह  जी ने मेरे अनुरोध पर इस पुस्तक की एक प्रति  पंजाबी university ,पटियाला के पुस्तकालय से मुझे उपलब्ध करवाई है.मेरे पिता जी की यह तस्वीर इमरोज... Read more
clicks 113 View   Vote 0 Like   10:20am 20 Nov 2011 #
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तआल्लुकतर्के तआल्लुक के बाद भीतआल्लुक बचा रहातू बेशक बचा रहामैं नाहक बचा रहारिश्ताआज खोली हैमैंनेरिश्तों की किताबहैरां हूँकिसी भी वर्क परतेरा नाम नहींलगता हैतू मैं हो गयाअतिक्रमणसम्बन्ध जबलांघने लगते हैंसीमाएंऔर गढ़ने लगते हैंनयी परिभाषाएंतो शुरू हो जाता है... Read more
clicks 140 View   Vote 0 Like   2:42am 3 Nov 2011 #
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हुस्न की हम पर इनायत हो गयी,क़त्ल होने की इजाज़त हो गयी,हमने तो इक बार सजदा था किया,उनके कूचे में बग़ावत हो गयी,हमको उनसे शिकायत क्यों नहीं,अपनी शराफ़त भी शिकायत हो गयी,एक आगे तो दो कदम पीछे रखूँ,उनकी गली जैसे विलायत हो गयी,देख उसको मुस्कराना छोड़ दोरक़ीब से काफ़ी रियायत... Read more
clicks 113 View   Vote 0 Like   5:06am 30 Oct 2011 #
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शाम को बैंक से निकला ही था कि बड़े भाई साहिब का चंडीगढ़ से फ़ोन आ गया."विशाल,लिखने को कुछ है तेरे पास. "डैश बोर्ड टटोला तो एक कलम हाथ लग गयी."हाँ जी""एक नंबर लिख.987 ........ .'मैंने गाडी साइड पर लगा कर लिखने लगा."किसक... Read more
clicks 87 View   Vote 0 Like   4:30am 22 Oct 2011 #
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                                                      श्री प्रेम पखरोलवी              {श्री प्रेम पखरोलवी जी का 1993 -94 की दीपावली के उपलक्ष्य में लिखा गया निबंध आज के दौर में कितना सार्थक है ,ज़रा देखिये. }                    अन्धेरा और भटकाव,इनमें एक समीकरण मौजूद है.दोनों एक दुसरे के तई पर्यायवाची हैं.जुड़... Read more
clicks 138 View   Vote 0 Like   2:52pm 15 Oct 2011 #
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मेरे अल्फ़ाज़ की इमारत मेंमेरा चेहरा तलाशने वालेतुझको इसकी नींव तक जाना होगाबड़ी ज़रखेज मिट्टी थीकभी वहां फसले गुल लहलहाती थी आज बस रेत हैदबे हुए हैं  जिसमेंगुलों के पिंजर कितनेइसी रेत मेंउठा करते हैंबवंडर हर रोज़इनसे ही मेरे अल्फ़ाज़ की इमारतें बनती हैं बिखर ... Read more
clicks 128 View   Vote 0 Like   1:49pm 7 Oct 2011 #
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                    गुमउसने मुझे ढूंढ लिया,उसने मुझे पा लिया,मैं गुम था हमेशा से,गुम ही रहा सदा.... Read more
clicks 115 View   Vote 0 Like   4:16pm 3 Oct 2011 #
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पहला  |  < पिछला  |  अगला >  |  अंतिमउसने मुझे ढूंढ लिया,उसने मुझे पा लिया,मैं गुम था हमेशा से,गुम ही रहा सदा.... Read more
clicks 104 View   Vote 0 Like   4:04pm 3 Oct 2011 #
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सिफ़रमनफ़ी और जमा कोअपनी ज़िन्दगी सेकैसे हटाऊँ,तुम ही बताओ कोई फ़ॉर्मूला कि मैं फिर से,सिफ़र हो जाऊं.लम्हेमैं वक़्त की शाख सेगिरते हुएलम्हे समेटता  हूँ,जो बच जाते हैं साबुत, उन्हें करीने सेसजा देता हूँजो गिर करटूट जाते हैंउनकी किरचों को उठा करसीने से लगा लेता हूँ... Read more
clicks 119 View   Vote 0 Like   3:57pm 28 Sep 2011 #
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गयी रात तेरी गली का,इक चक्कर लगा आये,अँधेरे के सिवा,कुछ न मिलाहम अन्धेरा उठा लाये,यादों की गठरिया में ,उसको किया है कैद,रहता है डर हमेशा,कहीं गाँठ खुल न जाए.... Read more
clicks 147 View   Vote 0 Like   2:50pm 25 Sep 2011 #
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दोस्तों का झूठा सच्चा प्यार देख देख करकर रहा हूँ अब मैं ,ऐतबार देख देख कर,मैं हूँ उसकी ज़िन्दगी,वो है मेरी ज़िन्दगी,बीमा एजेंट कर रहा इसरार देख देख कर,वो भी क्या वक़्त था, किया करता था गुटरगूं,भुन चुका वो कबूतर तेरी तकरार देख देख कर, करता हूँ रोज़  याद ,आती नहीं  है छींक, ... Read more
clicks 151 View   Vote 0 Like   3:36pm 21 Sep 2011 #
Blogger: vishal
आज ज़रा सी पी है साहिब,एक गम की खुशी है साहिब,जब भी हमसे मिली मुहब्बत,फटे हाल मिली है साहिब,बस आरज़ू ही आरज़ू है,काहे की ज़िन्दगी है साहिब,यूं सफ़ेद था लिबास मेरा,दागों की दिल्लगी है साहिब,वो ज़ख्म तो नासूर हुए,यही चोट नयी है साहिब,यहाँ उगे हुए हैं कैक्टस ,ये अपनी ज़मी है... Read more
clicks 116 View   Vote 0 Like   4:42pm 19 Sep 2011 #
Blogger: vishal
हमने खाया है हर कदम धोखा,प्यार धोखा है और सनम धोखा,उसके चेहरे का भोलापन धोखा,उसकी ज़ुल्फ़ का पेचो ख़म धोखा,उसके लबों का तबस्सुम धोखा,उसके अश्कों का हरेक गम धोखा,उसकी बातों का तलातुम धोखा,उसकी खामोशियों का भ्रम धोखा,उसने जो दिया है वो ज़ख्म धोखा,और उस पर लगाया मरहम धोखा,ल... Read more
clicks 134 View   Vote 0 Like   5:09pm 12 Sep 2011 #
Blogger: vishal
आधुनिकता की अंधी दौड़ में,टूटा हुआ रिश्ता हूँ मैं,ग्राहकों की भीड़ में गुम हुए,इंसान सरीखा हूँ मैं,इश्तिहार के इस दौर में,मेरी पहचान न पूछिए,पुती हुई  दीवारों के बीच,एक खाली झरोखा हूँ मैं.... Read more
clicks 134 View   Vote 0 Like   3:05am 10 Sep 2011 #
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