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Blog: रचना रवीन्द्र

Blogger: Rachana Dixit
सभी ब्लॉगर मित्रों को मेरा नमस्कार.आज बहुत समय बाद ब्लॉग पर कुछ लिख रही हूँ .आप लोगों से अपनी ख़ुशी साझा करना चाहती हूँ .मेरी पहली पुस्तक प्रकाशित हुई है उसके बारे में आप लोगों को अवगत कराना था ये किताब मेरी कविताओं का एक पुलिंदा नहीं, ये आइना है, जिसके सामने मैं अपने आप ... Read more
clicks 28 View   Vote 0 Like   7:20am 12 May 2019 #
Blogger: Rachana Dixit
अच्छे दिन खुश हूँ अच्छे दिन आए हैं सदियों से झुग्गी बस्तियों में बसने वाले सडान बदबू में रहने वाले नाले नालिओं में पनपने वालेअब नहीं रहते हैं वहां.बदल गया है बसेरा आयें है अच्छे दिन रहते हैं साफ़ सुथरी हवा मेंअति विशिष्ट व्यक्तियों के घरों मेंदीदार करते हैं... Read more
clicks 109 View   Vote 0 Like   12:30am 15 Nov 2015 #डेंगू
Blogger: Rachana Dixit
अभिशप्तमैं चाँद हूँदागदार हूँअनिश्चितता मेरी पहचान हैकभी घटता  कभी  बढ़ताकभी गुम  कभी हाज़िर मैं सूरज की तरह चमकता नहींपर उसकी तरह अकेला भी नहींमेरे साथ हैं अनगिनत सितारों की चादरमेरे न होने पर भी टिमटिमाते हैं तारेआने वाली है दीपावलीघुटने लगा हूँ&nb... Read more
clicks 87 View   Vote 0 Like   12:30am 8 Nov 2015 #अमावस
Blogger: Rachana Dixit
मासूम चाँद भीयूँ ही एक दिनपूंछा था चाँद सेक्यों घटते बढ़ते होक्यों रहते नहीं एक सेसूरज की तरह.इधर उधर देखामायूसी  कोभरसक छुपायाबोला एक दीपावली की रातदेखने कोधरती की जगमगाहटआँखों में भर लाने कोराम को शीश नवाने कोअनवरत प्रयत्नरत हूँसदियों सेकभी घटता कभी बढ़ताकभी द... Read more
clicks 114 View   Vote 0 Like   12:30am 1 Nov 2015 #मासूम
Blogger: Rachana Dixit
दशाननमैं रावणअधम पापी नीचसीता हरण का अक्षम्य अपराधीसब स्वीकार है मुझे.मैं प्रतिशोध की आग में जला  था,माना कि मार्ग गलत चुना था.किया सबने भ्रमित मुझे मार्ग दर्शन किया नहीं किसी ने.मैं वशीभूत हुआ माया जाल के.मैंने भी फिर कियाविस्तार माया जाल का. देख सीता मुग्ध हु... Read more
clicks 113 View   Vote 0 Like   12:30am 25 Oct 2015 #रचना
Blogger: Rachana Dixit
एक रामलीला यह भी यूं तो होता है रामलीला का मंचनवर्ष में एक बारपर मेरे शरीर के अंग अंग करते हैंराम, लक्ष्मण,सीता और हनुमानके पात्र जीवन्त.देह की सक्रियतासतर्कता, तत्परता और चैतन्यता केलक्ष्मण की उपस्थितिके बाद भीमष्तिष्क का रावण देता रहता है प्रलोभनभांति भ... Read more
clicks 177 View   Vote 0 Like   4:44am 18 Oct 2015 #राम
Blogger: Rachana Dixit
कुछ सपने मेरेआज एक अजीब सीउलझन, कौतुहल,बेचैनी, उद्विग्नता है.भारी है मनऔर उसके पाँव.कोख हरी हुई हैमन की अभी अभी.गर्भ धारण हुआ है अभी अभीकुछ नन्ही कोपले फूटेंगी,एक बार फिरडरती हूँ,ना हो जायेजोर जबर्दस्ती सेगर्भपातएक बार फिर.ना तैयार होदूध भरा कटोरा,जबरदस्ती डुबोने को,य... Read more
clicks 99 View   Vote 0 Like   12:30am 11 Oct 2015 #कोख
Blogger: Rachana Dixit
महात्मादेखती आई हूँ बरसों सेअपनी ही प्रतिमा में कैदमहात्मा को धूप धूलचिड़ियों के घोसलेऔर बीट से सराबोर,मायूसहर सितम्बर माहांत मेंचमकते है,मुस्कुराते हैं,दो अक्टूबर को बाहर भी आते हैं.हम सब के बीचहमारे मन मष्तिष्क मेंविचरते हैंपर इस बारकुछ भी नहीं हुआ ऐसाअंग्रेजो... Read more
clicks 85 View   Vote 0 Like   12:30am 4 Oct 2015 #महात्मा
Blogger: Rachana Dixit
रिश्तों में जीवन भूकंप में नहीं गिरते घर गिरते हैं मकानमकान ही नहीं गिरतेगिरती हैं उनकी छतेंछतें भी यूँ ही नहीं गिरतीगिरती हैं दीवारेंगिरातीं हैं अपने साथ छतेंफिर अलग अलग घरों केबचे खुचे जीवित लोगमिल कर बनाते हैंपहले से कहीं अधिकमजबूत दीवारों वाले मकानफिर बना... Read more
clicks 87 View   Vote 0 Like   12:08pm 27 Sep 2015 #दीवारें
Blogger: Rachana Dixit
प्यासप्याज में मात्रभोजन की सीरत सूरत स्वाद सुगंधबदलने की कूबत ही नहींसत्ता परिवर्तन की भी क्षमता है.प्याज और सरकारएक दूसरे के पर्याय हैं.एक जैसे गुण अवगुणएक जैसे भूमिगत तलघरों की तरहएक के भीतर एकपरत दर परत खुलनागोपनीयता यथावत.हर बार बढती जिज्ञासाअंततः हाथ खाली के... Read more
clicks 98 View   Vote 0 Like   1:00am 20 Sep 2015 #प्यास
Blogger: Rachana Dixit
पतनसुना है गिरना बुरा है देखती हूँ  आसपास कहीं न कहीं,कुछ न कुछ गिरता है हर रोज़.कभी साख गिरना कभी इंसान का गिरना इंसानियत का गिरनामूल्यों का गिरना   स्तर गिरना कभी गिरी हुई मानसिकतागिरी हुई प्रवृत्तियां.   अपराध का स्तर गिरना नज़रों से गिरना और कभ... Read more
clicks 93 View   Vote 0 Like   1:00am 13 Sep 2015 #गुरुत्वाकर्षण
Blogger: Rachana Dixit
कश्तीआम बच्चों की तरहकागज की कश्ती बनानाउसे पानी में तैरानातैरते देखनाखुश होनातालियाँ बजानामैंने भी किया थाये सब कभी.पर मैंने बह जाने नहीं दीकश्ती अपनी कभी.आज भी सहेजी है.सोचती हूँकभी तो फिर तैरेगीबचपन की तरह.अंतर इतना हैकभी मीठेसोंधे पानी मेंउबड खाबडरास्तों से ज... Read more
clicks 100 View   Vote 0 Like   3:56am 6 Sep 2015 #कागज़
Blogger: Rachana Dixit
हाथ का मैलबचपन से सुनती आई हूँ आप सब की ही तरह  पैसा ही जीवन है. पैसा आना जाना है.पैसा हाथ का मैल है. समय के साथ बदलती परिभाषाओं नेइसे भी अछूता नहीं छोड़ा बदल गई है इसकी किस्मत,कीमत और तबियतहमारें संस्कारों मेंउच्चतम स्थान प्राप्तव पाप धोने का साधनगंगा हो ... Read more
clicks 107 View   Vote 0 Like   12:29am 30 Aug 2015 #रचना
Blogger: Rachana Dixit
दुआएंकल के उस त्यौहार में पाप धोने के उस प्रयास में इंसान ही नहीं जानवरों ने भी दी दुआएंवो रुपहली प्लेटे,प्लास्टिक की डिज़ाइनर कटोरियाँ,जरूर जानती हैं कोई वशीकरण मंत्रखींचती हैं सबको अपनी ओर कुत्तों ने सूंघा, चाटा, खाया कुछ ने ढूंढी हड्डियां. इतना स... Read more
clicks 114 View   Vote 0 Like   4:55am 23 Aug 2015 #प्लास्टिक
Blogger: Rachana Dixit
अतिथिकुछ समय सेघर भर गया हैमेहमानों से.घर ही नहीं शरीर, मन, मस्तिष्कचेतन, अवचेतन.ये मात्र मेहमान नहींमेहमानों का कुनबा है.सोचती हूँमन दृढ करती हूँ आज पूंछ ही लूँ अतिथितुम कब जाओगेपर संस्कार रोक लेते है.ये आते जाते रहते है पर क्या मजालकि पूरा कुनबाएक साथ चला जाय... Read more
clicks 98 View   Vote 0 Like   1:00am 16 Aug 2015 #मेहमान
Blogger: Rachana Dixit
सावनसब कुछ साफ,धुला, उजला,हरा, चमकदारनिरंतर गति प्रवाह,कर्णप्रिय ध्वनि संगीतसब कुछलगता है अच्छा  अखरता हैतो ठहराव,जल भराव,कीचड़, सडांध   नमी, दरारेंउनमें उगतेजंगली घास फूसकाई, बिछलन, फिसलन.वर्ष में कुछ निश्चित समय के लिएअच्छा लग भी जाए ये,पर मन के भीतररहता ये सावन ज... Read more
clicks 110 View   Vote 0 Like   12:30am 9 Aug 2015 #श्वेत श्याम
Blogger: Rachana Dixit
सरगोशीबारिश में भीगी गीली सीली सराबोर धूप ने कल मेरी सांकल बजाई. राहत की साँस ली,चलो कहीं कोई तो है.हताश थी,कितना हठी,और बेपरवाह है सूरज. जब भी आता है, धूप के बिनानहीं आता.सूरज और धूप ज्यों धूप और साया हो गये.आ जाओ,कभी बदली का आंचल भी थाम लोकभी उसके पीछे ... Read more
clicks 100 View   Vote 0 Like   7:14am 2 Aug 2015 #बारिश
Blogger: Rachana Dixit
मन की बातमन की बात जबसे मन की न रही, इनकी उनकी जन जन की हो गई.पूरे शहर में चर्चा ये पुरजोर है बात भी अब बदचलन हो गई.मुद्रा का उठना, उठ-उठ के गिरना,समस्या देश के उत्प्लवन की हो गई,जो मुह खोले उसकी हत्या, आत्महत्या, बात इंसानियत के हनन की हो गयी.अपराध जगत और उसके किस्सेसुन ... Read more
clicks 120 View   Vote 0 Like   6:36am 26 Jul 2015 #मन की बात
Blogger: Rachana Dixit
याददाश्त  मैं कुंठित हूँ,व्यथित हूँ,क्षुब्ध हूँ, क्या हृदय ही जीवन है ?मैं भी तो हृदय की खुशी में खुश उसके दुख,असफलता, दर्द, पीड़ा में उसके साथ ही ये सब अनुभव करता हूँ फिर हृदय ही क्यों क्या सही रक्तचाप, हृदय गतिरक्त विश्लेषण औरधमनियों में... Read more
clicks 94 View   Vote 0 Like   5:41am 19 Jul 2015 #रचना
Blogger: Rachana Dixit
जीततुम्हारी वो जीतने की,शीर्ष पर रहने की, सदैव अव्वल आने की जिद, हर छोटी होती लकीर के आगे बड़ी लकीर खींचते रहना. छोटी लकीरों को पीछे छोड़ते रहना मात्र बड़ी लकीरों में जीना,सदैव जीतते रहना. और मैं तुम्हारी छोड़ी हर लकीर में जीती रही,जीवंत होती रही, जीतती र... Read more
clicks 112 View   Vote 0 Like   7:01am 12 Jul 2015 #रचना
Blogger: Rachana Dixit
इत्मिनान है की वो खुश हैं चलती हूँ जब भी, उतरती चढ़ती हूँ सीढ़ियाँ, आती हैं अजब सी आवाज़े,घुटनों में हड्डियों से,   कभी कड़कड़ाती, खड़खड़ाती,कभी कंपकपाती.गुस्से में लाल पीला होते तो सुना था,यहाँ तो नीली हो जाती हैं नसें.दबोचती हैं हड्डियां उन्हें जब. कभी खींचती हैं मां... Read more
clicks 110 View   Vote 0 Like   5:07am 5 Jul 2015 #दर्द
Blogger: Rachana Dixit
इज़हारे- ख़यालये उम्र अपनी इतनी भी कम न थी,अपनों को ढूंढने में गुजार दी दोस्तों.पांव में छाले पड़े है इस कदर,अपनों में, अपने को खो दिया दोस्तों.कसमें वादों पे न रहा यकीं अब हमें,बंद आँखों से सच को टटोलते हैं दोस्तों.वो इश्क वो चाँद तारे जमीं पर,सब किताबों की बाते है दोस्तो... Read more
clicks 101 View   Vote 0 Like   9:02am 28 Jun 2015 #उम्र
Blogger: Rachana Dixit
हृदयाघातधमनी के गलियारों में तब उत्सव होता है रक्तजड़ित सिंहासन पर जब हिय बैठा होता हैवसा से  चहुँ ओर सुगन्धित फिर लेपन होता है तेरे भित्ति चित्रों से हिय का अभिवादन होता हैहर्ष उल्लास का प्रथम अवलोकन होता है रुधिराणुओं की रोली से अभिनन्दन होता हैघृत शर्करा, म... Read more
clicks 93 View   Vote 0 Like   1:41pm 21 Jun 2015 #हिन्दी कविता
Blogger: Rachana Dixit
वजूदकल उतारी थी गठरी ताक से.झोंके थे उसमें से कुछ तुड़े-मुड़े,गीले-सीलेअपने वजूद को तलाशते. कुछ वर्ण, अक्षर और शब्द समय के साथ खो चुके अपनी गरिमा, अपना अर्थ, रंग रूप यौवन नैन नक्शअपना होना ना होना नहीं था वहाँकोई चिन्हअपने होने काअहसास दिलाने की जद्दोजहद वा... Read more
clicks 84 View   Vote 0 Like   6:56am 14 Jun 2015 #वजूद
Blogger: Rachana Dixit
सच ऐसा भी  मेरे शहर की झुकी हुई इमारते,यूँ ही नहीं गुमनामी में खो जाना चाहती हैं. खाक में मिल जाना चाहती हैं.मिटटी हो जाना चाहती हैं.उन्हें इन्तेज़ार है,मजबूत कांधों का, बाहों का, जो उन्हें आगोश में ले सके.बाहुपाश में समां सके अपने में समाहित कर सके.पूर्ण... Read more
clicks 116 View   Vote 0 Like   12:30am 31 May 2015 #रचना
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